MohitVerse

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04/08/2025

यह जरूरी था कि मैं खुद से ईमानदारी से बात करूं।
मुझे ज़िंदगी नहीं रोक रही थी - मैं खुद को रोक रहा था।
मैं बार-बार उसी चीज़ को चुनता रहा जो मुझे जानी-पहचानी थी,
न कि जो मेरे लिए सही और सेहतमंद थी।
मैं कहता रहा कि मुझे कुछ बेहतर चाहिए,
लेकिन अपने फैसलों में कोई बदलाव नहीं लाया।
मैं उस असहजता से भागता रहा जो असली बदलाव के साथ आती है।
मैं शांति चाहता था, बिना किसी त्याग के।
विकास चाहता था, बिना कुछ लोगों को पीछे छोड़े।
नया परिणाम चाहता था, बिना नई आदतें अपनाए।
लेकिन ज़िंदगी ऐसे नहीं चलती।
आप उस जगह पर ठीक नहीं हो सकते, जो खुद आपको रोक रही हो।
तय करना पड़ेगा...
कुछ अलग चुनना पड़ेगा,
चाहे वो कितना भी असहज क्यों न लगे।

25/06/2025

"बदलाव की चुभन"
बदलें तो बहुत चुभते हैं,
क्या लोग, क्या रिश्ते, क्या मिज़ाज,
हर मुस्कुराहट के पीछे अब,
छुपा बैठा है कोई राज़।
वो बातें जो दिल को छू जाती थीं,
अब सिलसिले नहीं रह गए,
वो आँखें जो सब समझ जाती थीं,
अब अजनबी से हो गए।
रिश्तों की गर्मी बर्फ़ सी लगती है,
ना शिकायत, ना उलाहना बाक़ी रहा,
बस तहज़ीब में लिपटी हुई दूरी है,
जिसे 'अदब' कहकर निभाया गया।
लोग भी कब पहले जैसे रहते हैं,
वक़्त की चाल में सब बदल जाते हैं,
जो आज पास हैं, कल याद भी न रहें,
यही दस्तूर है, यही रिवायत बन जाते हैं।
मिज़ाज वो नहीं जो कल था मेरा,
अब ठहराव में भी एक बेचैनी है,
हर लफ़्ज़ तौल कर बोलते हैं सब,
जैसे हर दिल में कोई गै़र बैठा हो चुप।
फिर भी…
इन बदलते लहज़ों में मोहब्बत तलाशते हैं,
कभी दुआ बनकर, कभी शिकायत में छुप जाते हैं,
कि शायद किसी मोड़ पर, फिर मिल जाए कोई,
जो कह दे — "मैं बदला नहीं, तुझे अब भी समझता हूँ।"

25/06/2025

बहुत तेज़ दौड़ते हैं हम ज़िंदगी में।
ऐसा लगता है कि पीछे कोई कुत्ता पड़ा है... या सामने नौकरी दौड़ रही है... या फिर समाज नाम की शक्लबदलू चुड़ैल हमें ‘कुछ’ बन जाने को कह रही है।
हम दौड़ते हैं।
कभी इस उम्मीद में कि आगे कोई मंज़िल है।
कभी इस भ्रम में कि बाकी सब पीछे रह जाएँगे।
और ज़्यादातर तो इसलिए दौड़ते हैं कि… सब दौड़ रहे हैं।
कभी-कभी रुक भी जाते हैं —
पर रुकने में भी एक स्टाइल होता है —
जैसे मोबाइल चार्ज पर लगाकर भी फेसबुक चलाना।
हम रुकते नहीं, बस ब्रेक पर पाँव रखा होता है — दिमाग फिर भी एक्सीलेरेटर पर।
हम जिसको पीछे छोड़ने के लिए भागते हैं,
वो कभी हमारे साथ था ही नहीं।
और जिसे साथ समझा, वो तो दो कदम बाद ही दूसरी लेन में मुड़ गया।
भागते-भागते जब थकते हैं,
तो कहते हैं – ‘ज़िंदगी बड़ी थकाऊ है।’
अरे भाई! ज़िंदगी ने तो कहा ही नहीं था दौड़ो,
वो तो बस धीरे-धीरे चल रही थी… तुम ही थे जो अपनी चप्पलें घिस रहे थे।
हम कभी दौड़ते हैं अहंकार में,
कभी दौड़ते हैं डर में —
कहीं दुनिया हमें "नालायक" ना कह दे।
कभी खुद को साबित करने के लिए,
तो कभी साबित करने के बाद भी,
फिर से उसी चीज़ को साबित करने के लिए।
सवाल यह नहीं है कि हम कहाँ जा रहे हैं,
सवाल यह है कि हम क्यों जा रहे हैं?
और ज़्यादा गंभीर सवाल यह है —
कि क्या सच में कहीं जा भी रहे हैं,
या बस वहीं खड़े हैं, जहाँ से चले थे —
बस थोड़ा थके हुए और बालों में कुछ सफ़ेदी लेकर।
कभी सूरज डूब चुका होता है,
दीया भी बुझ चुका होता है,
पर हम हाथ में मोबाइल लिए,
गूगल पर "मोटिवेशनल कोट्स" ढूँढ रहे होते हैं।
और अंत में,
हमेशा की तरह एक ही निष्कर्ष —
"हमने तो बहुत कोशिश की, पर सिस्टम ही ख़राब है!"

25/06/2025

🌊 हम भी दरिया हैं 🌊
— आत्मबल की एक प्रेरणात्मक कविता

हम भी दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है,
हर एक लहर में छुपा अपना सफ़र मालूम है।
न थकते हैं, न रुकते हैं — चलन हमारा खास है,
जहाँ भी बढ़ते हैं हम, बनता वहीं पास है।

क़दम जहाँ रख दें, ज़मीं रास्ता बन जाती है,
हर एक दीवार हमारे आगे झुक जाती है।
हम अपनी मंज़िल खुद अपने दम से पाते हैं,
हर मोड़ पे जीत के दीपक जलाते हैं।

ठोकरों से गिरें हैं, पर रुके नहीं हैं हम,
हर हार से सीखा है — झुके नहीं हैं हम।
काँटों में भी हमने फूलों को खिला डाला है,
अंधेरे में भी रच डाला उजाला है।

जो कहते हैं राहें मुश्किल हैं — उन्हें दिखा देंगे,
अपने इरादों से पत्थर भी हटा देंगे।
हम भी दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है,
जिस दिशा में चल पड़ें — रास्ता बना देंगे।

ी_दरिया_हैं

31/01/2022

तुम, पुकार लो, तुम्हारा इंतज़ार है,
हेमंत कुमार साहब का एक बेहतरीन गीत और मेरा प्रयास।

11/12/2021
कुछ पल सुकून के
19/11/2021

कुछ पल सुकून के

06/11/2021

Happy Deepavali!
A festival full of sweet childhood memories, a sky full of fireworks, mouth full of sweets, house full of diyas and heart full of joy. Wishing you all a very happy Diwali. *

May millions of lamps illuminate your life with endless joy, prosperity, health and wealth forever.

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