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प्रत्येक अधिवक्ता के चेंबर में इन 10 मुकदमों की हार्ड कॉपी होनी ही चाहिए 1. भूपेन्द्र शर्मा बनाम एच.पी. राज्य, ए.आई.आर. ...
07/09/2026

प्रत्येक अधिवक्ता के चेंबर में इन 10 मुकदमों की हार्ड कॉपी होनी ही चाहिए

1. भूपेन्द्र शर्मा बनाम एच.पी. राज्य, ए.आई.आर. 2003 एस.सी. 4684 = (2003) 8 एस.सी.सी. 551 = 2004 क्रि. लॉ ज. 1 (एस.सी.) के मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा यह प्रतिपादित किया गया था कि यौनजनित हिंसा की शिकार महिला का नाम निर्णय में इंगित नहीं किया जाना चाहिए।

2. देवरापल्ली लक्ष्मीनारायण रेड्डी बनाम वी. नारायण रेड्डी, ए.आई.आर. 1976 एस.सी. 1672 = (1976) 3 एस.सी.सी. 252 = 1976 क्रि. लॉ ज. 1361 (एस.सी.) के मामले में उच्चतम न्यायालय ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 156(3) तथा धारा 202 के अधीन पुलिस अन्वेषण के लिए दिए गए आदेश के बीच भेद को स्पष्ट किया।

3. मो. अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम, ए.आई.आर. (1985) एस.सी. 945 = (1985) 2 एस.सी.सी. 556 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 सभी लोगों पर लागू होती है चाहे वे किसी भी धर्म के हों।

4. मुकुंद लाल एवं अन्य बनाम भारत संघ एवं अन्य, ए.आई.आर. 1989 एस.सी. 144 = 1988 एस.सी.सी. सप्लीमेंट (1) 622 = 1988 एस.सी.आर. सप्लीमेंट (3) 524 = जे.टी. 1988 (4) 143 के मामले में अभिनिर्धारित किया गया कि अभियुक्त केस डायरी मंगाने या उसका अवलोकन करने का सामान्य अधिकार नहीं रखता।

5. उड़ीसा राज्य बनाम देवेन्द्र नाथ पाढ़ी, ए.आई.आर. 2005 एस.सी. 359 = (2005) 1 एस.सी.सी. 568 = 2005 क्रि. लॉ ज. 38 के मामले में निर्णय दिया गया कि अभियुक्त के विरुद्ध आरोप विचारित करने के चरण पर अभियुक्त को अपने बचाव के दस्तावेज प्रस्तुत करने का सामान्य अधिकार नहीं है।

6. डी.के. गणेश बाबू बनाम पी.टी. मनोकरण एवं अन्य, ए.आई.आर. 2007 एस.सी. 1450 = (2007) 4 एस.सी.सी. 434 = (2007) 2 एस.सी.सी. (क्रि.) 345, आपराधिक अपील संख्या 249 वर्ष 2007, के मामले में उच्चतम न्यायालय ने अग्रिम जमानत और नियमित जमानत के बीच अंतर स्पष्ट किया।

7. हरजिंदर सिंह बनाम पंजाब राज्य एवं अन्य, ए.आई.आर. 1985 एस.सी. 404 = (1985) 1 एस.सी.सी. 422 = 1986 क्रि. लॉ ज. 831 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह प्रतिपादित किया कि यदि परिवाद और पुलिस प्रतिवेदन में वर्णित घटनाक्रम पूर्णतः भिन्न, विरोधाभासी और परस्पर असंगत हों, तो उन मामलों को एक में मिलाकर विचारित नहीं किया जाना चाहिए।

8. ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार एवं अन्य, ए.आई.आर. 2014 एस.सी. 187 = (2014) 2 एस.सी.सी. 1 = (2014) 1 एस.सी.सी. (क्रि.) 524 के वाद में उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 154 के अधीन संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर, पुलिस अधिकारी प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने हेतु बाध्य है।

9. डी.के. बासु एवं अशोक के. जौहरी बनाम पश्चिम बंगाल राज्य एवं उत्तर प्रदेश राज्य, ए.आई.आर. 1997 एस.सी. 610 = (1997) 1 एस.सी.सी. 416 = 1997 एस.सी.सी. (क्रि.) 92 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने गिरफ्तार व्यक्ति के अधिकारों और गिरफ्तारी के दौरान अपनाए जाने वाले महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश निर्धारित किए हैं।

10. हरियाणा राज्य बनाम राम मेहर एवं अन्य, ए.आई.आर. 2016 एस.सी. 3942 = (2016) 8 एस.सी.सी. 762 = (2016) 3 एस.सी.सी. (क्रि.) 577, आपराधिक अपील संख्या 805–806 वर्ष 2016, के मामले में उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि साक्ष्य की कमी को पूरा करने के उद्देश्य से गवाह को बार-बार बुलाने की अनुमति नहीं दी जा सकती और धारा 311 दंड प्रक्रिया संहिता की शक्ति का प्रयोग न्यायपूर्ण निर्णय के लिए आवश्यक होने पर ही किया जाना चाहिए।

05/08/2026

The Allahabad High Court has clarified that an affidavit duly notarised anywhere in the country is accepted at the stage of filing a writ petition, and that litigants are not required to travel to the HC benches in Allahabad or Lucknow for photo verification before instituting writ proceedings.
Link in comment box

01/08/2026
24/07/2026

👇🏻पढ़ने के बाद अगर मिर्ची लगे, तो समझ लेना बात बिल्कुल सच है! 👇🏻
🥱क्या आपने कभी सोचा है कि इस देश में फूल किस पर बरसते हैं और लाठियाँ किस पर चलती हैं? 🥸

​ज़रा ठंडे दिमाग से सोचिए और अपने आसपास के माहौल को देखिए।

​अगर आप कावड़ उठाकर सड़कों पर निकलेंगे, तो आप पर हेलिकॉप्टर से फूल बरसाए जाएँगे।

​प्रशासन आपकी खातिरदारी में झुक जाएगा, आपके लिए रास्ते साफ कर दिए जाएँगे।
​लेकिन... जैसे ही आप अपने बच्चों के अच्छे स्कूल और बेहतर शिक्षा की माँग करेंगे,
​जैसे ही आप अस्पतालों में इलाज और युवाओं के लिए रोज़गार माँगेंगे,

​जैसे ही आप संविधान से मिले अपने हक और अधिकार की बात करेंगे...
​अचानक से पूरी व्यवस्था बदल जाती है और आपके हिस्से में सिर्फ़ पुलिस की लाठियाँ आती हैं!

​क्या यही है आज के दौर का असली न्याय और 'राम राज्य'?
​जहाँ धार्मिक दिखावे और भीड़ तंत्र को सर-आँखों पर बिठाया जाता है,
​और अपने बुनियादी अधिकारों के लिए आवाज़ उठाने वालों को अपराधी बना दिया जाता है।

​सरकारों को पता है कि जब तक जनता को आयोजनों में उलझा कर रखा जाएगा,
​तब तक कोई भी सड़क, स्कूल, अस्पताल और नौकरियों पर सवाल नहीं पूछेगा।
​गुलामी की मानसिकता से बाहर निकलिए और पहचानिए कि आपकी असली ज़रूरत क्या है।

​फूल और लाठियों का यह अंतर जिस दिन आपकी समझ में आ गया,
​उसी दिन से आप भीड़ बनना छोड़कर अपने अधिकारों के लिए लड़ना सीख जाएँगे।
​अंधभक्ति छोड़िए, संवैधानिक अधिकारों को जानिए और अपने बच्चों का भविष्य बचाइए।
​जागिए... इससे पहले कि अधिकारों की माँग करना पूरी तरह अपराध घोषित हो जाए! ✊

17/07/2026
17/07/2026

⚖️ निजी आवास के भीतर, जहां कोई स्वतंत्र सार्वजनिक व्यक्ति उपस्थित न हो, कथित जातिसूचक शब्दों का प्रयोग SC/ST Act की धारा 3(1)(r) एवं 3(1)(s) के अपराध का गठन नहीं करता; "Public View" होना अनिवार्य शर्त है : सुप्रीम कोर्ट

🏛️ मामला : Gunjan @ Girija Kumari & Ors. v. State (NCT of Delhi) & Anr.
📌 Criminal Appeal No. 2446 of 2026 (Arising out of SLP (Crl.) No. 9198 of 2025)
📅 निर्णय दिनांक : 11 मई 2026
⚖️ पीठ : माननीय न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा एवं माननीय न्यायमूर्ति एन. वी. अंजारिया, सर्वोच्च न्यायालय।
📌 Citation : 2026 INSC 468

⚖️ संक्षिप्त तथ्य

मामले में शिकायतकर्ता एवं अभियुक्त आपस में पारिवारिक सदस्य थे। दोनों पक्षों के बीच पैतृक संपत्ति को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा था। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि अभियुक्तगण ने उसके साथ दुर्व्यवहार किया तथा एक अभियुक्ता द्वारा उसके विरुद्ध जातिसूचक शब्दों का प्रयोग किया गया। साथ ही जान से मारने एवं झूठे मुकदमे में फंसाने की धमकी देने का भी आरोप लगाया गया।

उक्त शिकायत के आधार पर FIR दर्ज की गई तथा अभियुक्तों के विरुद्ध SC/ST (Prevention of Atrocities) Act, 1989 की धारा 3(1)(r), 3(1)(s) एवं IPC की धारा 506/34 के अंतर्गत आरोप निर्धारित किए गए। दिल्ली हाईकोर्ट ने भी आरोप निर्धारण के आदेश को बरकरार रखा, जिसके विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर की गई।

⚖️ सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि—

> SC/ST Act की धारा 3(1)(r) एवं 3(1)(s) के अपराध के गठन हेतु यह अनिवार्य है कि कथित जातिसूचक अपमान अथवा गाली-गलौज "किसी सार्वजनिक दृष्टि (Public View)" वाले स्थान पर हुई हो।

न्यायालय ने Swaran Singh v. State, Hitesh Verma v. State of Uttarakhand तथा Karuppudayar v. State के निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि—

> "Public Place" और "Place within Public View" दोनों अलग-अलग अवधारणाएं हैं।

कोई स्थान निजी (Private Place) होने के बावजूद "Public View" में हो सकता है, यदि वहां उपस्थित घटनाओं को स्वतंत्र सार्वजनिक व्यक्ति देख या सुन सकते हों।

⚖️ वर्तमान मामले में न्यायालय के निष्कर्ष

न्यायालय ने पाया कि—

✅ FIR में कहीं भी यह उल्लेख नहीं था कि कथित घटना किसी सार्वजनिक दृष्टि वाले स्थान पर हुई;

✅ कथित घटना आवासीय मकान (Residential House) के अंदर हुई थी;

✅ कोई स्वतंत्र सार्वजनिक व्यक्ति (Independent Public Witness) घटना का प्रत्यक्षदर्शी नहीं था;

✅ जिन दो व्यक्तियों का नाम लिया गया, वे शिकायतकर्ता के मित्र थे और उनके कथनों से भी यह सिद्ध नहीं हुआ कि उन्होंने घटना को देखा था।

न्यायालय ने कहा—

> केवल निजी आवास के भीतर हुई कथित गाली-गलौज, जहां कोई स्वतंत्र सार्वजनिक व्यक्ति उपस्थित न हो, धारा 3(1)(r) एवं 3(1)(s) SC/ST Act के अपराध का गठन नहीं करती।

⚖️ IPC की धारा 506 के संबंध में न्यायालय

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि—

> आपराधिक धमकी (Criminal Intimidation) के अपराध के लिए "Alarm" अर्थात भय या आतंक उत्पन्न करने का आशय (Intent to Cause Alarm) सिद्ध होना आवश्यक है।

न्यायालय ने पाया कि FIR में ऐसे कोई तथ्य नहीं थे, जिनसे यह प्रतीत हो कि अभियुक्तों द्वारा शिकायतकर्ता को वास्तविक भय या आतंक उत्पन्न करने के उद्देश्य से धमकी दी गई थी।

⚖️ IPC की धारा 34 के संबंध में न्यायालय

न्यायालय ने कहा कि—

✅ रिकॉर्ड पर ऐसा कोई साक्ष्य नहीं था जिससे यह सिद्ध हो सके कि अभियुक्तों की कोई साझा आपराधिक मंशा (Common Intention) थी;

✅ अभियुक्तों द्वारा किसी आपराधिक कृत्य को संयुक्त रूप से करने का कोई ठोस आधार उपलब्ध नहीं था।

🎯 अंतिम निर्णय

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि—

> FIR एवं उपलब्ध सामग्री को उसके मूल रूप में स्वीकार करने पर भी SC/ST Act तथा IPC की धाराओं के आवश्यक तत्व (Essential Ingredients) स्थापित नहीं होते।

अतः—

✅ दिल्ली हाईकोर्ट एवं ट्रायल कोर्ट के आदेशों को निरस्त कर दिया गया।

✅ FIR No. 42/2021, Police Station Kirti Nagar, Delhi को निरस्त (Quashed) कर दिया गया।

✅ अभियुक्तों के विरुद्ध समस्त आपराधिक कार्यवाही समाप्त कर दी गई।

🎯 विधिक सिद्धांत (Ratio Decidendi)

> SC/ST Act की धारा 3(1)(r) एवं 3(1)(s) के लिए "Place within Public View" होना एक अनिवार्य एवं मूलभूत तत्व (Sine Qua Non) है।

> निजी आवास के भीतर, जहां स्वतंत्र सार्वजनिक व्यक्ति उपस्थित न हों, कथित जातिसूचक अपमान SC/ST Act के उक्त प्रावधानों के अंतर्गत अपराध नहीं बनाता।

> धारा 506 IPC के लिए "Intent to Cause Alarm" सिद्ध होना आवश्यक है।

> यदि FIR अपने प्रथम दृष्टया पठन से ही आवश्यक तत्वों को प्रकट नहीं करती, तो ऐसी FIR को Bhajan Lal सिद्धांतों के अनुसार निरस्त किया जा सकता है।

🏛️ व्यावहारिक महत्व

✅ SC/ST Act में "Public View" की अवधारणा पर महत्वपूर्ण निर्णय।

✅ Swaran Singh, Hitesh Verma एवं Karuppudayar के सिद्धांतों की पुनः पुष्टि।

✅ FIR की प्रारंभिक सामग्री में आवश्यक तत्वों के अभाव की स्थिति में FIR निरस्तीकरण से संबंधित महत्वपूर्ण निर्णय।

✅ यह निर्णय पुनः स्थापित करता है कि—

> "SC/ST Act के अंतर्गत अपराध स्थापित करने हेतु केवल जातिसूचक शब्दों का आरोप पर्याप्त नहीं है; यह भी सिद्ध होना आवश्यक है कि घटना सार्वजनिक दृष्टि वाले स्थान पर हुई हो।"

> "आपराधिक कानून का प्रयोग पारिवारिक अथवा संपत्ति विवादों में दबाव के साधन के रूप में नहीं किया जा सकता।"

⚠️ अस्वीकरण (Disclaimer): यह सारांश माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय है किसी भी न्यायिक कार्यवाही में इस निर्णय पर निर्भर होने से पूर्व मूल निर्णय का अध्ययन अवश्य किया जाना चाहिए।
धर्मेंद्र सिंह यादव
एडवोकेट
इलाहाबाद हाईकोर्ट
जिला न्यायालय वाराणसी
094152 84482
7355300907

07/07/2026

उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 की धारा 24 एवं उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता नियमावली, 2016 के नियम 22 के अंतर्गत खेती योग्य भूमि की पैमाइश एवं पत्थरगढ़ी की चरणबद्ध प्रक्रिया
चरण 1 – आवेदन (Application)
संबंधित उप जिलाधिकारी (SDM)/सहायक कलेक्टर प्रथम श्रेणी के समक्ष धारा 24 के अंतर्गत आवेदन प्रस्तुत किया जाता है।
आवेदन में निम्न विवरण दिए जाते हैं:
गाटा संख्या
रकबा
ग्राम, परगना, तहसील, जनपद
विवाद का संक्षिप्त विवरण
सीमांकन (पैमाइश) एवं पत्थरगढ़ी की प्रार्थना
चरण 2 – आवेदन की जांच
न्यायालय आवेदन की प्रारंभिक जांच करता है।
यदि आवेदन विधि अनुसार है तो उसे पंजीकृत (Registered) किया जाता है।
चरण 3 – नोटिस जारी
सीमावर्ती (Adjacent) सभी खातेदारों एवं संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया जाता है।
नोटिस में पैमाइश की तिथि, समय एवं स्थान का उल्लेख होता है।
बिना नोटिस की गई पैमाइश प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के विरुद्ध मानी जा सकती है।
चरण 4 – अभिलेखों की तैयारी
राजस्व अधिकारी निम्न अभिलेख साथ लेकर जाते हैं:
खतौनी
खसरा
शजरा नक्शा
फील्ड बुक
स्थायी फिक्स प्वाइंट (Permanent Reference Point)
चरण 5 – मौके पर पैमाइश
पैमाइश के समय:
सभी पक्षों की उपस्थिति दर्ज की जाती है।
स्थायी बिंदु (Fixed Point) से माप शुरू होती है।
चेन, टेप, टोटल स्टेशन या अन्य स्वीकृत उपकरण से माप लिया जाता है।
प्रत्येक सीमा का सत्यापन किया जाता है।
चरण 6 – आपत्ति
यदि किसी पक्ष को पैमाइश पर आपत्ति हो:
मौके पर ही आपत्ति दर्ज कराई जा सकती है।
या बाद में न्यायालय में लिखित आपत्ति प्रस्तुत की जा सकती है।
चरण 7 – पैमाइश रिपोर्ट
राजस्व निरीक्षक/लेखपाल अपनी रिपोर्ट तैयार करते हैं, जिसमें:
पैमाइश का विवरण
सीमांकन का नक्शा
उपस्थित पक्षों के हस्ताक्षर
आपत्तियों का उल्लेख
चरण 8 – सुनवाई
SDM:
रिपोर्ट का परीक्षण करता है।
सभी पक्षों को सुनता है।
आवश्यक होने पर पुनः पैमाइश का आदेश दे सकता है।
चरण 9 – अंतिम आदेश
SDM सीमांकन का अंतिम आदेश पारित करता है। आदेश में स्पष्ट किया जाता है:
वास्तविक सीमा कहाँ है।
किस भूमि पर किसका अधिकार है।
कहाँ पत्थर लगाए जाएंगे।
चरण 10 – पत्थरगढ़ी (Boundary Pillars)
अंतिम आदेश के बाद:
राजस्व अधिकारी मौके पर सीमा चिन्ह (Boundary Pillars) स्थापित करते हैं।
प्रत्येक मोड़ (Turning Point) पर पत्थर लगाए जाते हैं।
इसकी कार्यवाही की रिपोर्ट न्यायालय में प्रस्तुत की जाती है।
चरण 11 – अनुपालन रिपोर्ट
पत्थरगढ़ी पूरी होने के बाद:
अनुपालन रिपोर्ट न्यायालय में दाखिल की जाती है।
इसके बाद वाद का निस्तारण कर दिया जाता है।
यदि कोई पक्ष सहयोग न करे
प्रशासन पुलिस बल की सहायता ले सकता है।
सरकारी कार्य में बाधा डालने पर विधि अनुसार कार्रवाई की जा सकती है।
अपील
SDM के आदेश के विरुद्ध संबंधित अपीलीय प्राधिकारी (आयुक्त/Commissioner) के समक्ष 30 दिन के अन्दर अपील की जा सकती है।
महत्वपूर्ण न्यायिक सिद्धांत
पैमाइश स्थायी फिक्स प्वाइंट से ही की जानी चाहिए।
सभी सीमावर्ती खातेदारों को नोटिस देना अनिवार्य है।
यदि भूमि आबादी (Residential Abadi) बन चुकी है, तो धारा 24 के अंतर्गत पैमाइश सामान्यतः नहीं होगी; ऐसे मामलों में सिविल न्यायालय का क्षेत्राधिकार हो सकता है।
निर्मित मकानों के अंदर कब्जा दिलाने के लिए धारा 24 का उपयोग नहीं किया जा सकता; केवल बाहरी सीमाओं पर पत्थरगढ़ी कराई जा सकती है।
पैमाइश निर्धारित फिक्स प्वाइंट एवं राजस्व अभिलेखों के आधार पर ही की जानी चाहिए;
मनमाने ढंग से नहीं।
Dharmendra Yadav Advocate
Allahabad High Court & District court
Varanasi
094152 84482
7355300907

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