09/07/2016
late chandra Mohan pandey with Anil Srivastava Anu
#बनारस की राजनीति
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वाराणसी क्षेत्र से कांग्रेस की बात तो छोड़िए किसी भी दल का कभी कोई ब्राह्मण नेता विधायक क्यों नहीं हुआ ? कांग्रेस में तो बहुतायात है ब्राह्मण नेताओं की - फिर एैसा क्यों ? पं० कमलापति त्रिपाठी जी स्वंय ब्राह्मण थे फिर भी उन्होंने व उनकी बहू श्रीमती चन्द्रा त्रिपाठी जी ने चन्दौली व उनके पुत्र पं० लोकपति त्रिपाठी जी ने मिर्जापुर को क्यों चुना ? संगठन व चुनाव में कभी ब्राह्मणों को आगे क्यों नहीं बढाया कांग्रेस ने बनारस में ?
दनादन इतने सवाल दाग दिए मैने शहर कांग्रेस अध्यक्ष चन्द्रमोहन पाण्डेय जी के सामने की वह एकदम से चुप हो गये-- यह बात 1993 के विधानसभा चुनाव पूर्व की है जब हम प्रत्याशी चयन के लिए आवेदन भर रहे थे - हर आवेदन के साथ तब भी जातीय समीकरण भरे जाते थे -- हम सब चाहते थे कि अध्यक्ष जी शहर दक्षिणी से भी अपना आवेदन भरें -- उन्होंने अपना आवेदन चिरईगांव विधानसभा के लिए किया था-- बाद में हम सबके कहने पर शहर दक्षिणी से भी आवेदन भरा -- मैने शहर उत्तरी से आवेदन भरा था ।
हमारे प्रश्नों का उत्तर उन्होंने यह कह के टाल दिया कि फिर कभी बताउंगा -- जनचर्चा यह थी कि औरंगाबाद हाउस जिसको चाहेगा वही टिकट पायेगा , हुआ भी यही -- चन्द्रमोहन जी को टिकट नहीं मिला और शहर उत्तरी से आवेदन न करने वाले जनाब सफीउर्रहमान अंसारी को मिला -- विपरीत परिस्थितियों में उन्होंने चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया --संगठन ने पहले ही मेरा व डिप्टी मेयर श्री अनिल सिंह का नाम शहर उत्तरी के लिए संस्तुति कर भेज रखा था -- जातीय समीकरण के आधार पर मेरी प्रबल संस्तुति अध्यक्ष जी ने की थी -- औरंगाबाद हाउस श्री अनिल सिंह को चुनाव लड़ाना चाहता था -- पर परिस्थिति विपरीत होने के कारण केन्द्रीय चुनाव समिती के समक्ष शहर संगठन का महत्व अचानक बढ़ गया -- क्योंकि अध्यक्ष की संस्तुति मेरे पक्ष में थी -- स्वंय अनिल सिंह चिरईगांव या दक्षिणी से लड़ना चाहते थे -- शहर उत्तरी का आवेदन तो उनकी ओर से प्रशासनिक महासचिव श्री बैजनाथ सिंह जी ने भर दिया था -- बहरहाल अनिल सिंह ने स्वंय चन्द्रमोहन जी से सम्पर्क किया -- अध्यक्ष जी ने मुझसे पूछा तुम क्या चाहते हो ? -- मैने कहा कि जब गुरू का टिकट कट गया है तो चेला लड़कर क्या करेगा -- अध्यक्ष जी ने श्री बैजनाथ सिंह को बुलवाकर एक संस्तुति पत्र अनिल सिंह के पक्ष में तत्काल केन्द्रीय चुनाव समिती के सदस्य श्री जी० वेंकटस्वामी को फैक्स द्वारा प्रेषित कराया व श्री अरूण चौबे वही पत्र लेकर नई दिल्ली रवाना हुए -- संस्तुति के आधार पर अनिल सिंह को टिकट मिल गया ।
उस रात अध्यक्ष जी बहुत दुखी थे -- मैने ज्यादा कुरेदना उचित नहीं समझा -- जब मैं उनको घर छोड़कर जाने को हुआ तो उन्होंने कहा अभी रूको -- बाद में जाना -- उनका सोचना यह था कि मेरे टिकट की लड़ाई छोड़कर उन्होंने अच्छा नहीं किया उनको लड़ना चाहिए था मेरे लिए - शहर कांग्रेस का टिकट तो कहलाता -- मैने उनको आश्वस्त किया कि दिल पर ना लें मुझे कोई दुखः ऩहीं है -- तब उन्होंने स्थानीय राजनीति पर ढेर सारी चर्चांए की -- और तब जाकर उन्होंने बताया कि ब्राह्मण क्यों नहीं अपना स्थान बना सके विधानसभा में -- उन्होंने बताया कि बनारस के ब्राह्मण ज्यादातर अन्य जनपदों से आकर बसे हैं -- छोटा व बड़ा का झगड़ा भी है -- अपने को सर्वोच्च मानना इनकी विशेषता ।
पं० कमलापति त्रिपाठी राजनैतिक अनुभवी व दूरदर्शी थे वह यह अच्छी तरह से जानते थे कि बनारस में सभी जातियों व धर्मों का संख्याबल में समान समावेश है और ब्राह्मण की संख्या अनिर्णायक -- यही कारण है कि पंण्डित जी स्वंय अपने भी बाहर लड़े व अपने परिवार को भी यही सलाह दी -- यहां तक की कांग्रेस संगठन का मुखिया भी उन्होंने कभी ब्राह्मण को नहीं बनाया -- हमेशा बनिया , भूमिहार , अन्य जाति व मुसलमान साथ लेकर चले -- कई ब्राह्मण नेता बनारस के उनसे इसी बात को लेकर अलग हुए - पर वह भी चुनाव लड़कर जीत नहीं पाये -- विपरीत स्थिति में जब उन्हें स्वंय लड़ना पड़ा तो ब्राह्मणों से ज्यादा उनको अन्य जातियों व संघ से मदद मिली थी उस वक्त -- तब जाकर वह श्री राजनारायण जैसे नेता को हरा पाये थे।
आज की परिस्थिति में अगर आप स्वंय गौर करें तो आप पायेंगे कि यही एक कड़वा सच है --अब तक बनारस ने चार सांसद ब्राह्मण दिए दो भाजपा के और दो कांग्रेस के -- किन परिस्थितियों में -- यह बताने की आवश्यकता नहीं -- विधायक एक भी नहीं हुए आज तक - देखा जाय तो यह सच ही प्रतीत होता है कि सर्वाधिक ब्राह्मण नेता कांग्रेस में हैं व ब्राह्मण वोट बैंक भाजपा के कब्जे में ।
शायद यही कारण है कि गैर कांग्रेसी दल इस हकीकत को जानते हुए ब्राह्मण जाति का प्रत्याशी बनारस में देने से परहेज करते हैं ।
( क्रमशः)