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Official Page Of Adv Atul Kumar
Criminal Lawyer⚖️⚖️
High Court
Court Supaul
Prohibition And Exise Act
Drugs and Psychotropic Substances Act

08/04/2026

कोई भी #दरोगा नया-नया जब किसी चौकी पर आता है तो सबसे पहले अपने क्षेत्र का भ्रमण करता है भ्रमण करने के साथ-साथ सबसे पहले वह क्षेत्र के #प्रतिष्ठित_होटल का निरीक्षण करता है यह निरीक्षण कानून व्यवस्था का पार्ट नहीं होता है ये निरिक्षण इसलिए होता है ताकि होटल वाले को यह बताया जा सके की बेटा अब मैं आ गया हूं और जब मेरे यहां से फोन आए तो चुपचाप आज्ञा का अनुपालन हो जाना चाहिए और इस आज्ञा अनुपालन का सबसे आधारभूत शब्द है छापा मारना
हुआ यह कि आज हम मनोज भाई के साथ अपने एक मित्र के होटल में बैठकर एक मुकदमे का डिस्कशन कर रहे थे तभी एक दरोगा जी दो सिपाहियों के साथ होटल में धड़ धडाते हुए घुस आए और तुरंत रजिस्टर लाओ कौन-कौन कमरे में कौन-कौन है ब्ला ब्ला करके उन्होंने अपना भौकाल दिखाया .
उसके बाद हम लोगों की प्रेम पूर्वक #विधिक_वार्ता हो गई जिसे यहां बताना उचित नहीं है और विधिक वार्ता के परिणाम स्वरूप दरोगा जी बगैर कुछ किए चले गए तो हम उनके #प्रकट_होने_के_मूल_आधार यानी छापे पर चर्चा करते हैं

सीधी भाषा में समझिए—पुलिस को छापा मारने का अधिकार है, लेकिन “जैसे मन किया वैसे” नहीं।

1. छापा मारने का कानूनी आधार क्या है
मुख्य रूप से Criminal Procedure Code, 1973 (CrPC) के तहत powers मिलती हैं:

CrPC 93 (Search वारंट ) → BNSS 96
CrPC 165 (Urgent Search बिना वारंट) → BNSS 185
CrPC 100 (Search Procedure) → BNSS 103
CrPC 102 (Seizure) → BNSS 106

2. सही प्रोसीजर क्या होना चाहिए (A) सामान्य स्थिति: वारंट के साथ छापा मजिस्ट्रेट द्वारा Search Warrant जारी होना चाहिए वारंट में साफ लिखा हो: जगह (दुकान/होटल/घर)
क्या ढूंढना है पुलिस को वारंट दिखाना जरूरी है
बिना वारंट के अगर छापा है, तो पुलिस को justify करना पड़ेगा कि “urgent” क्यों था

(B) बिना वारंट के छापा (Urgent Case)

धारा 165 CrPC के तहत: पुलिस को लिखित में कारण दर्ज करना होगा बताना होगा कि वारंट लेने में देर से सबूत नष्ट हो सकते थे बाद में Magistrate को इसकी सूचना देना अनिवार्य है “सिर्फ शक था” — यह पर्याप्त कारण नहीं है

(C) तलाशी के समय जरूरी बातें

धारा 100 CrPC के अनुसार:
2 स्वतंत्र गवाह (local respectable persons) होने चाहिए,तलाशी से पहले पुलिस खुद की तलाशी देने को तैयार हो,महिलाओं की तलाशी महिला पुलिस द्वारा
पूरी सर्च की Panchnama/Seizure Memo बननी चाहिए
जिसकी जगह पर छापा पड़ा, उसे उसकी कॉपी दी जाए

(D) समय और तरीका
रात में छापा (private place) → विशेष कारण होना चाहिए
बिना जरूरत “force” या तोड़फोड़ नहीं intimidation (डराना-धमकाना) नहीं होना चाहिए

पुलिस द्वारा मारा गया हर छापा अवैध है अगर वह इन चार बातों को #जस्टिफाई नहीं करता है और उसे स्थिति में यह छापे अवैध हो जाएंगे और पुलिस को हाई कोर्ट के अंदर दायर होने वाली याचिका में जवाब देना भारी पड़ जाएगा

ऐसे अवैध छापे पर पुलिस पर क्या कार्रवाई हो सकती है
अगर छापा गलत तरीके से हुआ है, तो पुलिस खुद फँस सकती है:

Indian Penal Code की धाराएं:

IPC 166 → BNS 198 कानून का उल्लंघन
IPC 220 → BNS 248 गलत तरीके से हिरासत
IPC 342 → BNS 127 अवैध बंदी

Departmental inquiry बोनस में
Compensation (constitutional remedy)

5. सुप्रीम कोर्ट का डंडा अभी बाकी है क्योंकि Supreme Court of India बार-बार कह चुका है: Search और seizure “procedure established by law” के अनुसार होना चाहिए Arbitrary action = fundamental rights का violation (Article 21)

आजकल कुछ जगह “छापा” ऐसा मारा जाता है जैसे “चलो आज कुछ action करते हैं…”

पहले पुलिस आती है
फिर कारण ढूंढती है
और अंत में कागज़ बनते हैं

जबकि कानून कहता है—
पहले कारण, फिर कागज़, फिर कार्रवाई।

छापा पुलिस का अधिकार है, लेकिन यह “unlimited power” नहीं है। हर कदम कानून से बंधा हुआ है।

अगर प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ,
तो वही छापा अदालत में टिकता नहीं—
और कभी-कभी पुलिस के खिलाफ केस बन जाता है।

लेकिन किताबों में पढ़कर, पोस्टों में समझकर और बहसों में जीतकर खुद को मजबूत समझ लेना आसान है…
लेकिन असली मजबूती तब आती है, जब आप सिस्टम से टकराने की हिम्मत रखते हों।

वरना सच्चाई तो यह है कि अधिवक्ता की ताकत उसके तर्क नहीं, उसका क्लाइंट होता है…
और जब क्लाइंट ही अंदर से कमजोर निकले, तो फिर कानून की मोटी-मोटी किताबें भी चुपचाप तमाशा देखती रह जाती हैं।

ज्ञान कितना भी हो…
अगर हिम्मत उधार की है, तो लड़ाई पहले ही हार चुके होते हैं।

21/01/2026

अधिवक्ता एकता जिंदाबाद

18/01/2026

वकालत कोई शौक या समाजसेवा नहीं, एक जिम्मेदार पेशा और व्यवसाय है।

जिस तरह डॉक्टर अपनी सलाह, इंजीनियर अपनी डिजाइन और व्यापारी अपने माल का मूल्य तय करता है, उसी तरह वकील भी अपने ज्ञान, अनुभव और समय का मूल्य तय करता है।
वकालत में केवल कोर्ट में खड़े होकर बहस करना ही काम नहीं होता—
मामले की फाइल पढ़ना, कानूनों का अध्ययन, फैसलों का विश्लेषण, ड्राफ्टिंग, रणनीति बनाना और वर्षों का अनुभव—यह सब समय, मेहनत और बुद्धि की कीमत पर आता है।

यह सोच कि “दो मिनट देख लीजिए”, “बस एक सलाह फ्री दे दीजिए”—वकालत के पेशे की गरिमा को कम करती है।
समय ही वकील की पूंजी है, और व्यवसाय में समय कभी फ्री नहीं होता।

न्याय की लड़ाई भावनाओं से नहीं, कानूनी समझ और पेशेवर प्रतिबद्धता से लड़ी जाती है।
जो व्यक्ति अपने अधिकारों की रक्षा चाहता है, उसे उस ज्ञान और समय का सम्मान करना चाहिए जो उसकी रक्षा में लगाया जा रहा है।

सम्मान दीजिए पेशे का,
क्योंकि जहाँ कानून बोलता है, वहाँ मुफ्त में कुछ नहीं चलता।

17/01/2026

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में टोल प्लाजा पर वकील की पिटाई के बाद शुरू हुए बवाल के बाद राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) ने बड़ा कदम उठाया है। तीन दिनों से लगातार चल रहे आक्रोशित वकीलों के हंगामे को देखते हुए NHAI ने टोल वसूलने वाली एजेंसी ‘मेसर्स स्काईलार्क इंफ्रा इंजीनियरिंग प्राइवेट लिमिटेड’ का अनुबंध खत्म कर दिया है। इधर, वकीलों ने एसपी ऑफिस का घेराव कर पुलिस अधीक्षक से आरोपी टोल कर्मियों पर गैंगस्टर और रासुका के तहत कार्रवाई की मांग की है।

इस मामले में पुलिस टोल मैनेजर सहित 5 लोगों को जेल भेज चुकी है।लखनऊ-सुल्तानपुर (NH-731) के बारा टोल प्लाजा पर बीते बुधवार को हुए वकील रत्नेश शुक्ला की पिटाई ने बड़ा रूप ले लिया। घटना के तीसरे दिन शुक्रवार को भी वकीलों ने जोरदार प्रदर्शन किया। बार कौंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश के चुनाव और वोटिंग होने के चलते नाराजगी और भड़क गई।

04/01/2026

Reduces Penalty to 10% of Insured Value for Seized Motorcycle in Bihar Liquor Case
In a significant ruling on vehicle confiscation under Bihar's stringent prohibition laws, the Patna High Court has directed the release of a petitioner's motorcycle seized during a liquor transportation incident upon payment of just 10% of its insured value. The bench, comprising Justices Rajeev Ranjan Prasad and Sourendra Pandey, set aside an initial penalty of Rs. 1,05,000—nearly 84% of the vehicle's Rs. 1,25,123 insured value—imposed by the Sub-Divisional Officer (SDO), Gopalganj Sadar. This decision in Alok Pandey v. State of Bihar (CWJC No. 15636 of 2025) underscores the principle of proportionality in penalties, particularly when the offense involves a modest quantity of liquor and no prior criminal history. The case highlights ongoing tensions between Bihar's zero-tolerance excise regime and judicial oversight ensuring fair treatment for vehicle owners.

What is an F.I.R ?F.I.R. means First Information Report, made to police, about commission of a cognizable offence, In ef...
04/01/2026

What is an F.I.R ?
F.I.R. means First Information Report, made to police, about commission of a cognizable offence, In effect, it amounts to putting law in to motion by giving information relating to the commission of a cognizable offence to an officer in charge of a police station, (which shall be reduced into writing and read over to the informant) and shall be signed by the person giving such information. It is mandatory to give a copy of the first information report (as recorded by police) to the complainant or informant free of cost.

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