21/03/2026
MACT केस की पूरी प्रक्रिया (Step-by-Step)
MACT क्या है?
MACT का गठन मोटर वाहन अधिनियम (Motor Vehicles Act), 1988 के तहत किया गया है। यह निम्नलिखित मामलों में मुआवजे (Compensation) के दावों को सुलझाता है:
• दुर्घटना में मृत्यु होने पर
• चोट लगने या विकलांगता होने पर
• वाहन के नुकसान पर (कुछ सीमित मामलों में)
1. दुर्घटना का होना (शुरुआती बिंदु)
दुर्घटना के तुरंत बाद ये कदम उठाएं:
• ✔️ पुलिस को सूचित करें।
• ✔️ घायल को अस्पताल ले जाएं।
• ✔️ जरूरी जानकारी जुटाएं:
• गाड़ी का नंबर
• ड्राइवर का नाम
• बीमा (Insurance) की जानकारी
• गवाहों के नाम और नंबर
2. FIR और पुलिस दस्तावेज
पुलिस FIR दर्ज करती है और जरूरी कागजात तैयार करती है:
• FIR की कॉपी
• घटनास्थल का नक्शा (Site Plan)
• MLC (मेडिको-लीगल केस रिपोर्ट)
• चार्जशीट (आरोप पत्र)
ये सभी MACT केस के मुख्य दस्तावेज होते हैं।
3. DAR (Detailed Accident Report - विस्तृत दुर्घटना रिपोर्ट)
पुलिस MACT के सामने DAR पेश करती है (विशेषकर दिल्ली जैसे राज्यों में):
• यह 30 दिनों के भीतर दी जाती है।
• इसमें शामिल होता है: दुर्घटना का विवरण, इंश्योरेंस की जानकारी और पीड़ित का विवरण।
• इससे मुआवजे की प्रक्रिया तेज हो जाती है।
4. दावा याचिका (Claim Petition) दायर करना
अगर DAR काफी न हो या अलग से क्लेम करना हो, तो याचिका दायर की जाती है:
• धारा 166: मोटर वाहन अधिनियम के तहत।
• धारा 140: (अस्थायी राहत के लिए)।
• कौन फाइल कर सकता है? घायल व्यक्ति, मृतक के कानूनी वारिस, या वाहन का मालिक।
5. क्षेत्राधिकार (केस कहाँ फाइल करें?)
MACT केस वहाँ फाइल किया जा सकता है जहाँ:
• दुर्घटना हुई हो या
• दावा करने वाला व्यक्ति (Claimant) रहता हो या
• बीमा कंपनी का ऑफिस हो।
6. विपक्षी पार्टियों को नोटिस
अदालत (Tribunal) इनके नाम नोटिस जारी करती है:
• ड्राइवर
• वाहन मालिक
• बीमा कंपनी
7. लिखित जवाब (Written Statement)
बीमा कंपनी अपना बचाव पक्ष रखती है। उनके सामान्य तर्क होते हैं:
• ड्राइवर की लापरवाही नहीं थी।
• दस्तावेज फर्जी हैं।
• पॉलिसी की शर्तों का उल्लंघन हुआ है।
8. विवाद के बिंदु (Issues) तय करना
कोर्ट कुछ मुख्य सवाल तय करता है, जैसे:
• क्या दुर्घटना लापरवाही के कारण हुई थी?
• क्या दावेदार मुआवजे का हकदार है?
• मुआवजे की राशि कितनी होनी चाहिए?
9. साक्ष्य/गवाही का चरण (Evidence Stage)
• दावेदार के सबूत: हलफनामा (Affidavit), मेडिकल बिल, विकलांगता प्रमाण पत्र, आय का प्रमाण (Income Proof)।
• गवाह: चश्मदीद गवाहों (Eye witnesses) की गवाही।
10. जिरह (Cross-Examination)
जब दावेदार (पीड़ित) अपने गवाह और सबूत पेश करता है, तो विपक्षी पार्टी (बीमा कंपनी के वकील) उनसे सवाल पूछते हैं।
• इसका मकसद गवाह की सच्चाई और दावों की शुद्धता को परखना होता है।
11. प्रतिवादी का साक्ष्य (Respondent Evidence)
अब बीमा कंपनी, वाहन मालिक या ड्राइवर को अपने सबूत पेश करने का मौका मिलता है।
• वे यह साबित करने की कोशिश कर सकते हैं कि ड्राइवर के पास वैध लाइसेंस था या दुर्घटना पीड़ित की अपनी गलती से हुई थी।
12. अंतिम बहस (Final Arguments)
दोनों पक्षों के वकील कोर्ट के सामने अपनी-अपनी दलीलें पेश करते हैं:
• दावेदार के वकील: अधिकतम मुआवजे की मांग करते हैं।
• बीमा कंपनी के वकील: मुआवजे को कम करने या खारिज करने के कानूनी तर्क देते हैं।
13. निर्णय / अवॉर्ड (Judgment / Award)
सभी सबूतों और दलीलों को देखने के बाद, ट्रिब्यूनल अपना फैसला सुनाता है। इसमें तय किया जाता है:
• लापरवाही किसकी थी? (Liability)
• मुआवजा कितना होगा? (Quantum of Compensation)
• ब्याज (Interest): आमतौर पर दुर्घटना की तारीख से भुगतान की तारीख तक का ब्याज भी दिया जाता है।
14. भुगतान की प्रक्रिया (Payment of Award)
• कोर्ट बीमा कंपनी को आदेश देता है कि वह एक निश्चित समय (आमतौर पर 30 दिन) के भीतर मुआवजे की राशि जमा करे।
• यह राशि अब सीधे पीड़ित के बैंक खाते में जमा की जाती है।
15. अपील (Appeal)
अगर कोई भी पक्ष (पीड़ित या बीमा कंपनी) फैसले से खुश नहीं है, तो वे हाई कोर्ट (High Court) में अपील कर सकते हैं।
• इसके लिए फैसले के 90 दिनों के भीतर अपील करनी होती है।
मुआवजा (Compensation) कैसे तय होता है?
कोर्ट इन मुख्य बातों पर ध्यान देता है:
1. उम्र: पीड़ित की आयु क्या थी?
2. आय: वह महीने का कितना कमाता था?
3. निर्भरता: उस पर कितने लोग निर्भर थे?
4. खर्च: अस्पताल का बिल और भविष्य का इलाज।
5. मानसिक कष्ट: दर्द और पीड़ा (Pain and Suffering) के लिए अलग से राशि।
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Advocate Sidharth Narula
(Punjab and Haryana High Court)
(District & Session Court Sirsa)
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