10/09/2024
'ग्रेट वारियर टैंक डिस्ट्रॉयर अमर शहीद परमवीर अब्दुल हमीद
भारतीय इतिहास मुस्लिम शहीदों और गाज़ियों की शौर्य गाथाओं से भरा पड़ा है।आज़ादी के बाद भी देश की हिफ़ाजत के लिए जान की बाज़ी लगाने वाले सेनानियों की शहादत की कहानियों से खाली नहीं है। जिसमें ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान और वीर अब्दुल हमीद इदरीसी का नाम सरे फेहरिस्त है। आइए आज जानते हैं 1965 की भारत पाक जंग के नायक परमवीर चक्र विजेता टैंक डेस्ट्रायर अमर शहीद वीर अब्दुल हमीद इदरीसी की गौरव गाथा जो नौजवान पीढ़ी के लिए मशअले राह होगी। वीर अब्दुल हमीद की वीरता को देश का हर नागरिक सैल्यूट करता है।
वीर अब्दुल हमीद का जन्म उत्तर प्रदेश में ग़ाज़ीपुर ज़िले के धामुपुर गांव के एक मुस्लिम दर्जी (इदरीसी) परिवार में 1 जुलाई, 1933 को हुआ था। कपड़ों की सिलाई का काम करने वाले मोहम्मद उस्मान के पुत्र अब्दुल हमीद की रुचि अपने इस परम्परागत काम में बिलकुल नहीं थी। पहलवानी में रुचि रखने वाले पिता का असर उनके बेटे पर भी था। लाठी चलाना, कुश्ती की प्रैक्टिस करना, उफनती नदी पार करना, गुलेल से निशाना लगाना आदि सभी क्षेत्रों में हमीद पारंगत थे। उनकी एक बड़ी खासियत थी कि वो सबकी हर मुमकिन मदद करने को तैयार रहते। नाइंसाफ़ी को बर्दाश्त करना उनके स्वाभाव में ही नहीं था। इसी वजह से जब एक ग़रीब किसान की फसल जबरन काटकर ले जाने के लिए जमींदार के कारिंदे उस किसान के खेत पर पहुंचे तो हमीद ने उनको ललकारा और कारिंदों को अपना मकसद पूरा किये बिना उल्टे पाँव वापस लौटना पड़ा। बाढ़ प्रभावित गाँव की नदी में डूबती दो युवतियों के प्राण बचाकर अपने अदम्य साहस का परिचय दिया। अब्दुल हमीद रोज़ी रोटी कमाने के लिए रेलवे में भर्ती होने के लिए गये लेकिन उनके अन्दर दबा देश प्रेम का जज़्बा उन्हें उकसा रहा था, फ़ौज़ में भर्ती होकर वतन की ख़िदमत करने के लिए। इस लिए एक फ़ौज़ी के रूप में 1954 में उन्होने अपनी नौकरी शुरू की। 27 दिसंबर, 1954 को अब्दुल हमीद ग्रेनेडियर्स इन्फैन्ट्री रेजिमेंट में शामिल किये गये। जम्मू काश्मीर में तैनात अब्दुल हमीद पाकिस्तान से आने वाले घुसपैठियों की खबर लेते हुए मजा चखाते रहते थे। ऐसे ही एक दुर्दांत डाकू इनायत अली को जब उन्होंने पकड़वाया तो प्रोत्साहन स्वरूप उनको प्रोन्नति देकर सेना में लांस नायक बना दिया गया।
सन् 1962 में चीन से भारत की जंग के समय अब्दुल हमीद नेफा में तैनात थे। इस जंग में उनको अपने अरमान पूरे करने का मौका नहीं मिल सका। वीर अब्दुल हमीद ने पाकिस्तान से सन् 1965 में हुई लड़ाई में 8 सितंबर की रात में, पाकिस्तान द्वारा भारत पर हमला करने पर, हमले का जवाब देने के लिए एक अडिग चट्टान की तरह सबसे आगे खड़े हो गए। उस रात वीर अब्दुल हमीद पंजाब के तरन तारन जिले के खेमकरण सेक्टर में सेना की अग्रिम पंक्ति में तैनात थे। तभी पाकिस्तान ने आपराजेय माने जाने वाले "अमेरिकन पैटन टैंकों" के साथ, "खेम करन" सेक्टर के "असल उताड़" गाँव पर हमला कर दिया। यह हमला इतना शक्तिशाली था कि पहले तो भारत के जवानों को संभलने का मौका नहीं मिला। लेकिन जैसे ही वीर अब्दुल हमीद मोर्चे पर आए। पाकिस्तानी सैनिकों के छक्के छूट गए। उस समय भारतीय सैनिकों के पास न तो टैंक थे, और न ही आधुनिक हथियार, लेकिन उनके पास देश के लिए लड़ते हुए शहीद हो जाने का हौसला था। अपने इसी हौंसले के बलबूते भारतीय सैनिकों 'थ्री नॉट थ्री रायफल' और एलएमजी के साथ पैटन टैंकों का सामना करते रहे। वहाँ वीर अब्दुल हमीद के पास सिर्फ एक 'गन माउनटेड जीप' थी जो पैटन टैंकों के सामने कुछ भी नहीं थी। जैसे हाथी के सामने चींटी, लेकिन उन्होने अदम्य साहस का परिचय देते हुए दुश्मनों की नाक में दम कर दिया। वीर अब्दुल हमीद ने गन माउंटेड जीप से अमेरिकी सुपर स्टार पैटन टैंकों के कमजोर हिस्सों पर सटीक निशाना साधते हुए एक-एक कर 7 पैटन टैंक तबाह कर दिए। उनके इस अदम्य साहस को देखकर अन्य सैनिकों का भी हौसला बढा । जिसके बाद वे भी मज़बूती से क़दम जमाते हुए आगे बढ़ने लगे। पाक सेना के कदम उखड़ने लगे और वो उल्टे पांव भागने पर मज़बूर हुई। इसी बीच वीर अब्दुल हमीद पाकिस्तानी टैंकों की नज़र में आ गये और उन की जीप पर टैंक द्वारा दागा गया एक गोला आ गिरा। जिससे वे बुरी तरह जख्मी हो गए। अगले दिन 9 सितम्बर को उनकी शहादत हो गयी। लेकिन उनकी शहादत की आधिकारिक घोषणा 10 सितम्बर को की गई। युद्ध में अप्रतिम बहादुरी के लिए सम्मानसवरूप मरणोपरांत उन्हें सेना के सर्वोच्च अलंकरण परमवीर चक्र से नवाज़ा गया।साधारण "गन माउनटेड जीप" के हाथों हुई "पैटन टैंकों" की बर्बादी को देखते हुए अमेरिका में पैटन टैंकों के डिजाइन को लेकर पुन: समीक्षा करनी पड़ी थी।
अब्दुल हमीद भारतीय सेना की ४ ग्रेनेडियर में एक सिपाही थे। जिन्होंने 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान खेमकरण सैक्टर के आसल उत्ताड़ में लड़े गए युद्ध में अद्भुत वीरता का प्रदर्शन करते हुए वीरगति प्राप्त की जिसके लिए उन्हें मरणोपरान्त भारत का सर्वोच्च सेना पुरस्कार परमवीर चक्र मिला। यह पुरस्कार इस युद्ध, जिसमें वे शहीद हुये, के समाप्त होने के एक सप्ताह से भी पहले १६ सितम्बर १९६५ को घोषित हुआ।
उपाधि
कम्पनी क्वार्टर मास्टर
हवलदार
दस्ता४ ग्रेनेडियर
युद्ध/झड़पें
आसल उत्ताड़ का युद्ध
(१९६५ भारत-पाक युद्ध
निवेदक: मौहम्मद जावेद एडवोकेट
095822 21648