11/03/2025
जमानत नियम व जेल अपवाद का विधि सिद्धांत तब बेकार हो जाता जब किसी अपराध के विचाराणाधीन बंदी को जमानत मिलने के बाद भी रिहाई के लिए जमानत प्रतिभूति दाखिल न कर पाने के कारण जेल से रिहाई नहीं हो पाती है।
कानूनी औपचारिकता के तहत किसी बंदी को जमानत के बाद एक स्वयं व दो जमानती की प्रतिभूति पेश करना अनिवार्य होता है, तभी जेल से रिहाई हो पायेगी, अन्यथा नहीं।
प्रतिभूति प्रस्तुत करने का मक़सद सिर्फ यह होता है कि बंदी प्रकरण के साक्ष्य तथा विचारण में कोई बाधा नहीं डालेगा, उपस्थित होता रहेगा और कहीं फरार नहीं होगा।
अगर जमानत के उक्त शर्तों की शर्त का अनुपालन नहीं करता तो इस अपराध के लिए मूल अपराध से अलग दण्ड देने की कानूनी व्यवस्था है।
प्रश्न अब यह कि जमानत के शर्तों की शर्त का अनुपालन नहीं करने के लिए दण्ड़, फरार होने पर पुनः गिरफ्तारी है, फिर जमानत हो जाने के बाद प्रतिभूति प्रस्तुत करने का ज्यादा कोई औचित्य नहीं रह जाता है।
सोचनीय की जेल से रिहाई के बाद जब रिहाई शर्त के अनुपालन न करने के लिए दण्ड का प्रावधान है तो जमानत के बाद जेल में रख कर कोई फायदा नहीं है, पुलिस ने एक बार मूल अपराध में गिरफ्तार कर जेल में बंद करा दिया, वह पुलिस जमानत की शर्त का अनुपालन न करने पर पुनः गिरफ्तार कर के जेल में बंद भी करा सकती है।
माह मई वर्ष 2017 की बात होगी, साथ में साथी अधिवक्ता श्री अरूण कुमार भण्डारी थे, हम किसी मुल्जिम की जमानत होने के बाद उस मुल्जिम के जमानत प्रपत्र को कोर्ट में प्रस्तुत कर रहे थे, और समय 04: 30 बजे शाम का रहा होगा, बाहर तेज आंधी व बारीश हो रही थी, इसी बीच पुलिस ने एक व्यक्ति को गैर जमानती वारंट पर गिरफ्तार कर के कोर्ट में ले आयी, उस व्यक्ति को कारण पूछा तो उसने बताया की केस की तारीख पर नहीं आ रहा था इसलिए वारंट हो गया, उस को बताया, पुलिस ने वारंट निष्पादन कर दिया है, अब दुबारा से जमानत करानी पड़ेगी, फाइल भी नहीं देखी थी, उस व्यक्ति के बताये अनुसार फिर सोचा जमानत हो गयी होगी और पेशी पर न आने के कारण उसका वारंट हो गया होगा और आज पुलिस गिरफ्तार कर के ले आयी होगी, उस व्यक्ति ने भी यह नहीं बताया की मेरी अभी तक कोई जमानत नहीं हो रखी है I
मैंने उसे कहा जमानत प्रार्थना पत्र तथा जमानती दाखिल करने का आज समय बचा नहीं, आज जेल ही जाना होगा, दूसरे दिन जमानत हो जायेगी, फिर सोचा कुछ कोशिश कर लेता हूँ ।
एक वारंट रिकाॅल प्रार्थना पत्र को लिख कर कोर्ट के समक्ष गया, अपनी बात रखनी शुरू कर दी की साहब यह गरीब और बीमार व्यक्ति है, आज वारंट रिकाॅल कर दीजिए, और आगे सदैव पेशी पर आता रहेगा, जज साहब ने भी उसे एक आवाज में पूछा क्या तारीख पर आता रहेगा, उसने कहा जी सर, वारंट रिकाॅल हो कर जेल जाने से उस दिन बच गया।
वह व्यक्ति उस के बाद प्रत्येक तारीख पर कोर्ट में उपस्थित आता रहा, एक दिन दूसरे पक्ष के वकील साहब ने फाइल देखी होगी, तो उसमें न तो कोई जमानत आदेश, ना ही कोई जमानती प्रतिभूति है।
मैंने भी फाइल देखी तो वास्तव में नहीं है, हैरान रह गया, दूसरे पक्ष ने तिलमिला कर कहा देखिए साहब, वकील कैसी प्रैक्टिस करते हैं, मैंने न्यायाधीश महोदय को विनम्र भाव में कहा श्रीमान जी जिस पक्ष की पैरवी कर रहा हूँ , अगर उसने सच में भी कोई अपराध किया भी होगा तो पेशा दायित्व के कारण उसके लिए यही तो पैरवी करूँगा की साहब जेल न भेजा जाय, सजा न दी जाय, निर्णय तो माननीय न्यायालय को करना है।
अगर यह कहूँगा की मेरे मुवक्किल को साहब जेल भेज दो, सजा दे दो तो यह तो मेरे पेशा के कदाचार के खिलाफ हो जायेगा।
जमानत आदेश तथा जमानती प्रतिभूति की रही बात तो मुल्जिम प्रत्येक पेशी पर बिना जमानत आदेश व जमानती प्रतिभूति के तब भी उपस्थित आ रहा और आगे भी आता रहेगा, मुल्जिम ने ऐसा कोई कृत्य भी नहीं किया की साक्ष्य व विचारण में कोई बाधा डाल दिया हो, माननीय न्यायालय के पास विवेक की अथाह शक्ति है, किसी को छोड़ भी सकती, जेल भी भेज सकती है, विवेक शक्ति या मुल्जिम की एक सदभाविक त्रुटि से छोड़ना कोई गुनाह नहीं है, यदि आप आज भी जमानत आदेश करते हैं, तो मुल्जिम आज भी जमानती दाखिल करने को तैयार हैं, दायित्व से कहीं भाग नहीं रहा है, फिर जमानत आदेश हुए जमानत प्रापत्र दाखिल किया गया।
देश की जेलों में न्यायालय से जमानत पा चुके इतनी बड़ी संख्या में विचाराणाधीन बंदी है, जब तक अंतिम अपीलीय न्यायालय से कोई दोष सिद्ध नहीं हो जाता, भारतीय संविधान के तहत तब तक बेकसूर है, इतनी बड़ी संख्या में बंदियों को बंद रखे जाने से कोई लाभ नहीं, बल्कि बोझ ही है, ये वे लोग होंगे जिनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होगी, आर्थिक स्थिति अच्छी होती तो सब कुछ व्यवस्था होते हुए भी देखा है, सभी बंदी न तो साक्ष्य, विचारण में बाधा डालेंगे और न भागेंगे बल्कि कुछ ऐसे भी होंगे जो डट कर निर्दोष हेतु विचारण करेंगे।
जो बंदी जमानत पर छूटने के बाद साक्ष्य, विचारण में बाधा डालेंगे और भागेंगे उनको पुनः पकड़ कर जेल में डाल कर दण्ड से दण्डित किया जा सकता है I
जेल में बंद के बाद यदि भविष्य में कोई दोषमुक्त हो कर बरी होता तो उस बंदी के संवैधानिक व मानवाधिकार के हनन का जिम्मेदार फिर कौन रहेगा, उसकी पूर्ति कौन करेगा, जो कि सोचनीय है ?
द्वारा
मदन मोहन कंसवाल
एडवोकेट