30/05/2023
यदि महिलाओं के साथ अन्याय, अत्याचार होता हैं तो दुनिया भर के महिला आयोग, मानव अधिकार, नारीवाद के पैरोकार आदि अनेकानेक महिला झंडाबरदार संगठन, संस्था खड़े हो जाते हैं लेकिन यदि पुरुषों के साथ अत्याचार- अन्याय हो तो उनके साथ खड़े होने वाले तो छोड़ो सुनने वाला भी कोई नहीं हैं महिलाओं की सुरक्षा के लिए तो अनेक नियम-कानून बने हुए हैं, जिनका वह अपनी सुरक्षा के लिए नहीं अपितु पुरुषों को प्रताड़ित करने के लिए दुरूपयोग कर रही हैं
भारत में बाल, महिला, बुजुर्ग और यहां तक की जीव-जंतु, जानवर, जल, जंगल, जमीन, वृक्ष, पर्यावरण की सुरक्षा के लिए भी कानून, आयोग, मंत्रालय बने हुए हैं परन्तु पुरुषों की सुरक्षा के लिए कुछ भी नहीं क्या उनकी सुरक्षा कोई मायने नहीं रखती हाल के कुछ वर्षों में महिलाओं द्वारा पुरुषों पर अत्याचार, क्रूरता के मामले तेजी से लगातार बढ़ते जा रहे हैं जिससे त्रस्त होकर पीड़ित पुरुषों ने भी लामबंद होकर अपना दर्द बयां किया है और पुरुष आयोग एवं पुरुष मंत्रालय बनाने की मांग कर रहे हैं वैसे स्त्री-पुरुष समानता की बात की जाती हैं, लिंग भेद को समाप्त करने की बात कही जाती हैं, तो फिर पुरुषों को न्याय देने में भेदभाव क्यों ?
बदलनी होगी समाज की पुरुष विरोधी सोच-
पुरुषों के साथ होने वाले उत्पीड़न, उन पर लगने वाले झूठे आरोपों के निदान और पुरुष आयोग की मांग लम्बे अरसे से की जाती रही हैं ताकि वह भी अपनी बात किसी के सामने कह सके, अपनी शिकायत दर्ज करा सके। महिला सुरक्षा से किसी को आपत्ति नहीं हैं लेकिन कानून का जिस तरह से दुपयोग हो रहा हैं, जिनमें एकतरफा केवल महिलाओं की बात को ही सत्य मानकर उसे महत्व दिया जा रहा हैं, यह बिलकुल न्यायसंगत नहीं हैं। महिला हो या पुरुष समान न्याय सभी को मिलना ही चाहिए। पुरुष विरोधी सोच बदलने के लिए कई संस्थाएं मिलकर काम कर रही हैं। हर बार दोष पुरुषों का ही नहीं होता बल्कि महिलाएं भी अपराध जगत में तेजी से आगे बढ़ रही हैं।