Sunil kumar maurya Advocate

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एडवोकेट" (Advocate) के लिए हिंदी शब्द अधिवक्ता है, जो एक कानूनी पेशेवर होता है और अदालत में किसी मुवक्किल (client) का प्रतिनिधित्व करने के लिए प्रशिक्षित और पंजीकृत होता है; इसके अन्य अर्थों में वकील, पक्षसमर्थक, या सलाहकार भी शामिल हैं,

मेंटेनेंस (भरण-पोषण) से जुड़े एक मामले में पति की याचिका खारिज करते हुए High Court ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है कि कोई भी...
23/04/2026

मेंटेनेंस (भरण-पोषण) से जुड़े एक मामले में पति की याचिका खारिज करते हुए High Court ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है कि कोई भी पति अपनी खराब आर्थिक स्थिति का हवाला देकर पत्नी और बच्चों की जिम्मेदारी से बच नहीं सकता।

⚖️ “खर्च नहीं उठा सकते तो शादी न करें” — इलाहाबाद हाईकोर्ट का सख्त संदेश

📌 क्या था मामला?
पति द्वारा दायर याचिका में यह दलील दी गई थी कि उसकी आर्थिक स्थिति कमजोर है, इसलिए वह भरण-पोषण देने में सक्षम नहीं है।

⚖️ अदालत की स्पष्ट टिप्पणी
कोर्ट ने कहा—
👉 शादी एक कानूनी और सामाजिक जिम्मेदारी है
👉 एक बार विवाह हो जाने के बाद पति पर पत्नी और बच्चों के भरण-पोषण की कानूनी बाध्यता होती है
👉 आर्थिक कठिनाइयों का हवाला देकर इस जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता

💬 कड़ा संदेश
👉 “यदि कोई व्यक्ति यह सोचता है कि वह भविष्य में परिवार का खर्च नहीं उठा पाएगा, तो उसे विवाह ही नहीं करना चाहिए।”

📜 कानूनी दृष्टिकोण
• भरण-पोषण का अधिकार पत्नी और बच्चों का वैधानिक अधिकार है
• यह उनके सम्मानजनक जीवन (dignified life) से जुड़ा हुआ है
• पति की जिम्मेदारी से बचने के प्रयास को अदालत ने अस्वीकार्य माना

📢 कानूनी महत्व
✔️ यह फैसला पारिवारिक जिम्मेदारियों को लेकर स्पष्ट संदेश देता है
✔️ मेंटेनेंस मामलों में “आर्थिक कमजोरी” को बचाव के रूप में सीमित करता है
✔️ पत्नी और बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा को प्राथमिकता देता है

📚 Case Title: X v. Wife & Ors. (Maintenance Matter, Allahabad High Court)



इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मेंटेनेंस (Maintenance) को लेकर पति द्वारा दाखिल याचिका को खारिज करते हुए अपने महत्वपूर्ण फैसले में टिप्पणी करते हुए कहा है कि कोई भी पति अपनी खराब आर्थिक स्थिति का हवाला देकर पत्नी और बच्चों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी से बच नहीं सकता. कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी व्यक्ति को यह आशंका हो कि वैवाहिक संबंध खराब होने की स्थिति में वह परिवार का खर्च नहीं उठा पाएगा, तो उसे विवाह ही नहीं करना चाहिए. कोर्ट ने माना कि एक बार जब कोई पुरुष किसी महिला से शादी कर लेता है, तो वह कानून के तहत उसका भरण-पोषण करने के लिए बाध्य होता है. यह टिप्पणी जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस विवेक सरन की डिविजन बेंच ने अपीलकर्ता तेज बहादुर मौर्य की फर्स्ट अपील को खारिज करते हुए की है.

अदालत ने 4000 रुपये मेंटेनेंस का दिया था आदेश
अपीलकर्ता ने यह अपील हाई कोर्ट में प्रयागराज फैमिली कोर्ट द्वारा दिए गए आदेश के खिलाफ दायर की थी. फैमिली कोर्ट के एडिशनल प्रिंसिपल जज ने हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 की धारा 24 के तहत आवेदन में आदेश दिया था जिसे पत्नी ने मुकदमा लंबित रहने तक मेंटेनेंस के लिए फाइल किया था. अपीलकर्ता पति तेज बहादुर मौर्य ने फैमिली कोर्ट के आदेश को इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी. जिसमें उसे वैवाहिक विवाद लंबित रहने के दौरान पत्नी को मेंटेनेंस के रूप में 4,000 प्रति माह देने का निर्देश दिया गया था.

पति का आरोप पत्‍नी किसी और के साथ रह रही
हाई कोर्ट में पति के वकील ने दलील दी कि अपीलकर्ता की आर्थिक स्थिति कमजोर है और ट्रायल कोर्ट ने इस पहलू पर पर्याप्त विचार नहीं किया. साथ ही उसने यह आरोप भी लगाया कि उसकी पत्नी किसी अन्य व्यक्ति के साथ रह रही है और दोनों के बीच आपसी सहमति से अलगाव हो चुका है. सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट ने सभी तथ्यों और पक्षों के तर्कों पर उचित विचार किया था. कोर्ट ने पत्नी के इस बयान को भी संज्ञान में लिया कि वह अधिक शिक्षित नहीं है और उससे कथित रूप से धोखे से हलफनामा लिया गया. पत्नी ने यह भी कहा कि वह बच्चों का पालन-पोषण स्वयं कर रही है और उसके पास आय का कोई स्वतंत्र स्रोत नहीं है.

बच्‍चों के लिए अलग से मेंटेनेंस मांग सकती है पत्‍नी
अदालत ने कहा कि मौजूदा समय में जीवन जीने के लिए 4,000 रुपये न तो अत्यधिक है और न ही पति की क्षमता से बाहर मानी जा सकती है. कोर्ट ने यह भी माना कि पति ने अपनी आय के संबंध में पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए. ट्रायल कोर्ट ने माना है कि पत्नी अपने बच्चों के मेंटेनेंस के लिए अलग से कार्रवाई शुरू करने के लिए आज़ाद है, लेकिन हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 की धारा 24 के तहत, सिर्फ़ पति या पत्नी ही उस याचिका के लंबित रहने के दौरान एक दूसरे से मेंटेनेंस का दावा कर सकते हैं. कोर्ट ने पाया कि अभी तथ्यों पर विचार करने के बाद ट्रायल कोर्ट ने आदेश पारित किया है और अपीलकर्ता को हर महीने 4,000 रुपए भरण–पोषण देने का निर्देश दिया गया. ट्रायल कोर्ट ने अपील करने वाले को बकाया पांच किश्तों में देने का भी निर्देश दिया.

सभी पक्षों को सुनने के कोर्ट ने कहा...
अपीलकर्ता के वकील की यह दलील कि अपील करने वाला खुद सिर्फ़ एक मज़दूर है (और इस बारे में इस कोर्ट को कोई और जानकारी नहीं दी गई) इस कोर्ट को सही नहीं लगती, क्योंकि एक बार जब कोई आदमी किसी औरत से शादी कर लेता है तो वह कानून के तहत उसका गुज़ारा करने के लिए बाध्य हो जाता है. हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए अपील को खारिज कर दिया और कहा कि जो व्यक्ति यह मानते हैं कि शादी विफल होने की स्थिति में वो अपनी पत्नी और बच्चों का भरण-पोषण नहीं कर पाएंगे उन्हें विवाह नहीं करना चाहिए. हालांकि, एक बार विवाह करने के बाद वे अपनी खराब आर्थिक स्थिति का हवाला देकर मुकदमे की सुनवाई के दौरान पत्नी के गुज़ारे की जिम्मेदारी से बच नहीं सकते. कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ट्रायल कोर्ट के आदेश में कोई गंभीर त्रुटि नहीं पाई गई है. इसी आधार पर अपील को खारिज कर दिया गया.


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21/04/2026

⚖️ क्या आपको पता है? अब शादी का झूठा वादा करना पड़ सकता है बहुत भारी! 😳👇

Section 69 BNS के तहत अगर कोई व्यक्ति झूठा भरोसा देकर संबंध बनाता है, तो उसे 10 साल तक की सजा हो सकती है।

👉 अब भावनाओं के साथ खेलना पड़ेगा महंगा
👉 कानून हुआ और भी सख्त

📌 पूरा सच जानने के लिए यह पोस्ट जरूर पढ़ें और शेयर करें ताकि हर कोई जागरूक बने।👇

⚖️ POCSO मामलों को रद्द (Quash) करने पर दिल्ली हाईकोर्ट ने तय किए अहम सिद्धांतDelhi High Court ने एक महत्वपूर्ण फैसले मे...
20/04/2026

⚖️ POCSO मामलों को रद्द (Quash) करने पर दिल्ली हाईकोर्ट ने तय किए अहम सिद्धांत

Delhi High Court ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह स्पष्ट किया है कि किन परिस्थितियों में POCSO Act के तहत दर्ज मामलों को रद्द (quash) किया जा सकता है—खासकर उन मामलों में जहां संबंध सहमति (consensual) और बाद में विवाह या आपसी समझौते में बदल गया हो।

📌 क्या था मामला?
अदालत के सामने ऐसे कई मामले आए, जहां—
• लड़का-लड़की के बीच संबंध सहमति से था
• बाद में दोनों ने शादी कर ली या साथ रहने लगे
• पीड़िता (victim) ने किसी प्रकार के शोषण या ज़बरदस्ती से इनकार किया

ऐसे मामलों में अदालत ने यह तय करने के लिए गाइडलाइन/प्रिंसिपल्स तय किए कि FIR को जारी रखा जाए या रद्द किया जाए।

⚖️ हाईकोर्ट द्वारा तय मुख्य सिद्धांत (Principles):

🔹 1. वास्तविक शोषण (Exploitation) होना ज़रूरी है
यदि रिकॉर्ड से यह स्पष्ट हो कि संबंध सहमति से था और किसी प्रकार का दबाव या शोषण नहीं था, तो मामला जारी रखना उचित नहीं।

🔹 2. पीड़िता का स्पष्ट बयान महत्वपूर्ण
यदि पीड़िता खुद कहती है कि—
👉 उसे कोई नुकसान नहीं हुआ
👉 संबंध उसकी इच्छा से था
तो अदालत इस पहलू को गंभीरता से देखेगी।

🔹 3. ‘Revictimisation’ से बचाव
अगर मुकदमा चलाने से पीड़िता को और मानसिक/सामाजिक नुकसान (revictimisation) होता है, तो केस रद्द किया जा सकता है।

🔹 4. विवाह या स्थायी संबंध एक महत्वपूर्ण फैक्टर
यदि दोनों पक्ष अब शादीशुदा हैं या स्थायी रिश्ते में हैं, तो अदालत इस सामाजिक वास्तविकता को भी ध्यान में रखती है।

🔹 5. कानून का उद्देश्य – सुरक्षा, न कि दंड हर हाल में
कोर्ट ने दोहराया कि POCSO का मकसद बच्चों को यौन शोषण से बचाना है, न कि हर सहमति वाले रिश्ते को अपराध बना देना।

🔹 6. तथ्यों का गहराई से परीक्षण जरूरी
हर केस अपने तथ्यों पर निर्भर करेगा—कोर्ट बिना जांच के सिर्फ समझौते के आधार पर केस खत्म नहीं करेगी।

⚠️ महत्वपूर्ण सीमा (Limitations):
👉 POCSO में 18 वर्ष से कम उम्र की “सहमति” कानूनी रूप से मान्य नहीं होती
👉 कोर्ट ने यह भी साफ किया है कि हर “near-majority” या किशोर प्रेम संबंध को स्वतः वैध नहीं माना जा सकता

📢 अदालत का संतुलित दृष्टिकोण:
👉 जहां शोषण है → सख्त कार्रवाई
👉 जहां वास्तविक प्रेम संबंध और कोई नुकसान नहीं → न्यायिक विवेक से राहत

🧾 कानूनी संदेश:
क्रिमिनल लॉ का उद्देश्य वास्तविक अपराधों को दंडित करना है, न कि सहमति आधारित संबंधों को जबरन अपराध में बदलना।

📚 Case Title: X v. State (NCT of Delhi) & Anr. (POCSO Quashing Principles Case)

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20/04/2026

🚨 “थाने में FIR लिखने से मना कर दिया गया… तो क्या अब आपका न्याय भी खत्म?”
अगर आपके मन में भी यह सवाल आया है, तो यह जानकारी आपके लिए बेहद जरूरी है — क्योंकि सच जानने के बाद आप कभी कमजोर नहीं पड़ेंगे ⚖️

📌 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 — धारा 173 (FIR का अधिकार)

👉 कानून साफ कहता है कि किसी भी संज्ञेय अपराध की सूचना:
✔ मौखिक, लिखित या ऑनलाइन — किसी भी माध्यम से दी जा सकती है

👉 अगर आपने मौखिक सूचना दी:
✔ पुलिस उसे लिखेगी
✔ आपको पढ़कर सुनाएगी
✔ और आपके हस्ताक्षर लेगी

👉 अगर आपने ऑनलाइन शिकायत की:
✔ 3 दिन के भीतर उसे सत्यापित करना आवश्यक है

👩 महिलाओं के लिए विशेष सुरक्षा:
✔ महिला से जुड़े मामलों में FIR महिला पुलिस अधिकारी द्वारा दर्ज होगी
✔ यदि पीड़िता असमर्थ है — FIR उसके घर/सुरक्षित स्थान पर दर्ज होगी
✔ पूरी प्रक्रिया की वीडियो रिकॉर्डिंग भी की जाएगी

♿ दिव्यांग व्यक्ति के अधिकार:
✔ FIR उसके स्थान पर जाकर दर्ज की जाएगी
✔ आवश्यक सहायता उपलब्ध कराई जाएगी

📄 सबसे जर�

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