22/06/2025
"इस्राइल बनाम इस्लामी कट्टरता: अब चुप रहना पाप है"
आज जब पूरी दुनिया आंखें मूंदे तमाशा देख रही है इस्राइल अकेला लड़ रहा है, पर यह कोई सीमाओं की लड़ाई नहीं है। यह यहूदियों और फिलिस्तीनियों के बीच का संघर्ष मात्र नहीं है। यह युद्ध है इंसानियत बनाम मजहबी उन्माद।
यह लड़ाई धर्म की आड़ में छिपे उस अंधकार के विरुद्ध है, जो आत्मघात को शहादत, और हत्या को इबादत मानता है। कट्टरपंथ का असली चेहरा ईरान और उसके समर्थक..
दुनिया के किसी भी इस्लामिक देश के हाथ में परमाणु बम सिर्फ हथियार नहीं, मानवता के गले पर रखी तलवार है।
यह पूर्वाग्रह नहीं इतिहास के रक्तरंजित पन्नों और मजहबी किताबों की घुटी हुई स्याही से निकला कड़वा सत्य है।
क्योंकि इस्लामी कट्टरपंथ में जीवन का मूल्य नहीं, मौत के बाद मिलने वाले सुखों का सौदा है। हूरें, शराबें, जन्नत, और शहीदों की कथाएँ यह सब एक बीमा पॉलिसी जैसी लगती है, "मरिए, तभी मिलेगा बोनस!"
ईरान भारत का रणनीतिक मित्र हो सकता है, लेकिन
अगर वह मजहबी जुनून में अंधा होकर परमाणु बम बना रहा है,तो उसे रोकना केवल राजनीतिक कर्तव्य नहीं,
मानव धर्म है।
और यदि आप रोक नहीं सकते...
तो कम से कम जो रोक रहा है, उसके खिलाफ खड़े मत होइए। मित्रता अपनी जगह, मानवता सर्वोपरि।
जब ईरानी राजदूत भारत को "ग्लोबल साउथ" का नेता बनने के लिए इस्राइल की आलोचना करने की सलाह देते हैं,
और फिर सोनिया गांधी जैसे नेता इस्राइल को कोसने लगते हैं,तो सवाल बनता है, क्या आपने कभी बांग्लादेश में हिंदुओं के कत्लेआम पर यही तीव्रता दिखाई थी?
कट्टरपंथ की कार्यप्रणाली इतिहास गवाह है....
जो लोग कहते हैं कि इस्राइल "जमीन हड़प रहा है",
उन्हें समझना चाहिए कि यह वही लोग हैं जो:
पहले शरण लेते हैं,
फिर अधिकार माँगते हैं,
अंततः ज़मीन, धर्म और सभ्यता पर कब्जा कर लेते हैं।
यही इतिहास रहा है।
अब्राहम को इब्राहीम बना दिया,
मोज़ेस को मूसा,
मंदिरों को मस्जिदें,
यरुशलेम को "विवादित"।
पारसी अपने ही ईरान से निर्वासित हुए,
कश्मीरी पंडित अपने ही देश में बेघर कर दिए गए।
और जब वे वापसी की बात करते हैं, तो सेकुलरिज़्म, संविधान और मानवाधिकार की ढाल खड़ी कर दी जाती है।
अब निर्णायक घड़ी है...
इस्राइल की चुप्पी कमजोरी नहीं रणनीति है। वह हमले झेल रहा है ताकि जब जवाब दे
तो दुनिया में कोई चेहरा बचा न रहे खुद को "न्यायप्रिय" कहने का।
दुनिया के वो तमाम देश, जो आज चुपचाप इस तमाशे को देख रहे हैं उनकी नेतृत्व क्षमता नपुंसकता की चरम सीमा पर है।
अगर ईरान को नहीं रोका गया,तो वह जापान के बाद दूसरा देश होगा जिस पर परमाणु हमला “न्यायसंगत” कहा जाएगा।
यह इस्राइल की नहीं आपकी लड़ाई है
जो कहते हैं कि यहूदी आक्रांता हैं, पहले उनके 5000 वर्षों के विस्थापन, नरसंहार, और पीड़ा की गाथा पढ़िए।
उन्होंने दुनिया से सिर्फ जीने का हक माँगा है सत्ता नहीं।
और याद रखिए..
अगर ईरान के पास बम आ गया, तो इस्राइल को मिटाने में वह एक क्षण भी नहीं गँवाएगा। इसलिए आज, मैं दुनिया से नहीं आपसे अपील करता हूँ, इस्राइल को अकेला मत छोड़िए।
जो देश कट्टरपंथ को बढ़ावा देते हैं, उनके खिलाफ प्रखर आवाज़ उठाइए। ईरान की मंशा को पहचानिए और उसका विरोध कीजिए, क्योंकि अगर आज आप चुप रहे,
तो कल वही कट्टरपंथी आपके दरवाज़े पर दस्तक देगा,
जो आज इस्राइल पर हमला कर रहा है।
"इस्राइल बनाम इस्लामी कट्टरता: अब चुप रहना पाप है"
लेखक : ©® गौरव नारायण भारती ✍️