17/03/2026
लखनऊ के मशहूर टुंडे कबाब : स्वाद, इतिहास और पारदर्शिता की कहानी ll
लखनऊ की नवाबी तहज़ीब केवल अदब, नज़ाकत और मेहमाननवाज़ी तक सीमित नहीं है; यह शहर अपनी अद्वितीय पाक-परंपरा के कारण भी दुनिया भर में पहचाना जाता है। इसी समृद्ध परंपरा की सबसे प्रसिद्ध पहचान है टुंडे कबाब, ऐसे कबाब जिनके बारे में कहा जाता है कि “ये दाँतों से नहीं, ज़ुबान से खाए जाते हैं।”
लखनऊ आने वाला शायद ही कोई स्वाद-प्रेमी होगा जो इन मशहूर कबाबों का नाम न जानता हो। अपने अनोखे स्वाद और मुलायम बनावट के कारण ये कबाब आज भी लखनऊ की पहचान बने हुए हैं।
शुरुआत की कहानी, टुंडे कबाब की कहानी लगभग एक सदी से भी अधिक पुरानी है। इसकी शुरुआत वर्ष 1905 में हुई, जब हाजी मुराद अली ने लखनऊ के चौक इलाके में अपनी छोटी-सी दुकान पर इन खास कबाबों को बनाना शुरू किया। धीरे-धीरे उनका बनाया हुआ स्वाद इतना लोकप्रिय हुआ कि यह दुकान लखनऊ की खानपान संस्कृति का प्रतीक बन गई। आज भी देश-विदेश से लोग सिर्फ इन कबाबों का स्वाद लेने के लिए यहाँ आते हैं।
नाम के पीछे की कहानी “टुंडे कबाब” नाम के पीछे भी एक दिलचस्प इतिहास जुड़ा है। कहा जाता है कि हाजी मुराद अली का एक हाथ किसी दुर्घटना में कट गया था।
लखनऊ की स्थानीय बोली में एक हाथ वाले व्यक्ति को “टुंडा” कहा जाता है। लेकिन उन्होंने अपनी कमी को कभी अपनी कला पर हावी नहीं होने दिया और एक ही हाथ से कबाब बनाते रहे।
उनकी इसी पहचान के कारण उनके बनाए कबाब “टुंडे कबाब” के नाम से प्रसिद्ध हो गए।
स्वाद का रहस्य टुंडे कबाब की सबसे बड़ी विशेषता उनकी अद्भुत मुलायमियत है। माना जाता है कि इन्हें बनाने में लगभग 120 से 160 प्रकार के गुप्त मसालों का मिश्रण प्रयोग किया जाता है। इसके साथ कच्चे पपीते का पेस्ट मिलाया जाता है, जो मांस को इतना कोमल बना देता है कि कबाब सचमुच मुंह में रखते ही घुल जाते हैं।
इसी कारण इन्हें अक्सर गलौटी कबाब का उत्कृष्ट रूप भी कहा जाता है।
मांस के प्रकार के बारे में स्पष्ट जानकारी:- टुंडे कबाब की जो पारंपरिक “मटन वाली” किस्म सबसे अधिक प्रसिद्ध है, उसके बारे में एक महत्वपूर्ण तथ्य समझना भी आवश्यक है।
कई स्थानों पर इस “मटन” में भैंस या गाय के मांस का उपयोग किया जाता है। इसलिए उपभोक्ताओं के लिए यह जानना महत्वपूर्ण है कि वे जो भोजन कर रहे हैं, उसमें किस प्रकार का मांस प्रयुक्त हुआ है।
विशेष रूप से हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध समुदाय के लोगों को यदि धार्मिक या सांस्कृतिक कारणों से ऐसे मांस से परहेज़ हो, तो उन्हें खाने से पहले दुकानदार से स्पष्ट जानकारी अवश्य लेनी चाहिए कि कबाब में किस प्रकार का मांस इस्तेमाल किया गया है।
इसी प्रकार पारदर्शिता और उपभोक्ताओं की भावनाओं के सम्मान के लिए यह भी उचित माना जाता है कि दुकानदार अपने दुकान के बोर्ड या मेनू पर स्पष्ट रूप से लिखें कि “मटन कबाब” में भैंस का मांस प्रयोग किया जाता है या नहीं। इससे ग्राहक अपनी आस्था और पसंद के अनुसार निर्णय ले सकेंगे।
कहाँ मिलते हैं:- टुंडे कबाब की सबसे पुरानी और प्रसिद्ध दुकान आज भी लखनऊ के चौक स्थित अकबरी गेट इलाके में है।
समय के साथ इसकी लोकप्रियता इतनी बढ़ी कि अब शहर के अन्य क्षेत्रों, जैसे अमीनाबाद, में भी इसके प्रसिद्ध आउटलेट खुल चुके हैं, जहाँ रोज़ाना बड़ी संख्या में लोग इन कबाबों का स्वाद लेने आते हैं।
कबाब के प्रकार
आज टुंडे कबाब की दुकानों पर कई प्रकार के कबाब उपलब्ध हैं, ताकि अलग-अलग पसंद के लोग भी इसका आनंद ले सकें, जैसे..
मटन गलौटी कबाब
चिकन कबाब
वेज कबाब
परोसने का पारंपरिक तरीका:- टुंडे कबाब को आमतौर पर गरमा-गरम मुग़लई पराठों के साथ परोसा जाता है, जिन्हें खास उल्टे तवे पर बनाया जाता है। साथ में कटी हुई प्याज़, नींबू और हल्की चटनी इसका स्वाद और भी बढ़ा देती है।
लेखक : ©® गौरव नारायण भारती ✍️
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