10/04/2026
_____ राष्ट्र चिन्ह में बौद्ध चिन्ह ?
!! सम्राट अशोक !!
भारत के सनातन इतिहास के साथ वैसे तो बहुत तोड़ फोड़ हुई और दफन करने का प्रयास हुआ ।
झूठ को सत्य एवं सत्य को भ्रम बनाकर प्रस्तुत किया है। जब हम इतिहास पढ़ना शुरू करते हैं, तो प्रागैतिहासिक काल, के बाद मौर्यवंश में प्रवेश करते ही तो हमारे सामने कलिंग युद्ध एवं उसके उपरान्त के विनाश के चित्र तथा अशोक के" हिन्दू धर्म" का त्याग करने तथा महान बनने की एक कहानी आती है।
अशोक के जीवन काल मे सनातन का कोई प्रभाव नही बताया गया कहीं भी लेकिन बौद्ध होते ही इनके सारे स्तंभ, चक्र कृति लिपि बौद्ध धर्म का इतिहास में ठूंस दिया गया ।
कलिंग युद्ध होने की घटना पूर्णतया सत्य है, कलिंग युद्ध में हुआ भीषण रक्तपात भी पूर्णतया सत्य है ।
परन्तु सम्राट अशोक ने जब यह रक्तपात किया, उसके बाद वह बौद्ध बने यह झूठ है उससे पूर्व ही वह बौद्ध धर्म अंगीकार कर चुके थे।
लेकिन बच्चों को अपने इतिहास में यही पढ़ाया जाता है कि कलिंग युद्ध के भीषण रक्तपात से दुखी होकर अशोक ने बौद्ध धर्म अपना लिया था और वह अहिंसक हो गए ।
रोमिला थापर अपने एक लेख में लिखती हैं कि ऐसा प्रतीत नहीं होता है कि अशोक कलिंग युद्ध में हुए रक्तपात के बाद नाटकीय रूप से बौद्ध धर्म में दीक्षित हो गए थे। इस शिलालेख में अशोक लिखते हैं
“I have been an upāsaka for more than two and a half years, but for a year I did not make much progress। Now for more than a year I have drawn closer to the Saṅgha (sangham upagate) and have become more ardent।
पुस्तक- [King Asoka and Buddhism, Historical & Literary Studies, Buddha Dharma Education Association Inc, लेख रोमिला थापर – पृष्ठ 31)
इसके आगे वह लिखती हैं कि बौद्ध परम्परा में यह उल्लेख नहीं प्राप्त होता है कि कलिंग युद्ध के बाद अशोक ने बौद्ध धर्म ग्रहण किया था।
वह लिखती हैं कि
अशोक ने अचानक से ही बौद्ध धर्म स्वीकार नहीं किया था अपितु वह बौद्ध धर्म के साथ काफी समय तक साथ रहे थे।
इस लेख से एक बात स्पष्ट होती है, कि वह कलिंग युद्ध के समय भी बौद्ध धर्म के उपासक थे और यह बात पूर्णतया मिथ्या है कि सनातन के रक्तपात के कारण उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाया
मैकमिलन एंड कंपनी, लन्दन द्वारा प्रकाशित पुस्तक अशोक ASOKA [GJEKWJD LECTURES] में राधाकुमुद मुखर्जी ने भी इसी ओर संकेत करते हुए लिखा है “(पृष्ठ 37)
अशोक के राज्याभिषेक के उपरान्त की घटनाएँ इस प्रकार हैं:
274 ईसापूर्व – (उत्तराधिकार)
270 ईसापूर्व – (राज्याभिषेक)
265 ईसापूर्व —उपासक के रूप में बौद्ध धर्म अपनाना
265-262 ईसापूर्व -बौद्ध धर्म का पालन ढाई वर्ष तक करना
262 ईसापूर्व —कलिंग का युद्ध और उसके बाद अशोक द्वारा एक नए धर्म की स्थापना करना !
अर्थात जब रक्तपात हुआ तब वह पूरी तरह से हिन्दू नहीं थे बल्कि वह बौद्ध हो चुके थे, एवं उस रक्तपात के बाद वह अपने उस नए धर्म के और नज़दीक आ गए थे।
परन्तु हमारे इतिहास में से यह तथ्य गायब हैं।
हमारे सम्मुख यह तथ्य नहीं लाया जाता है कि अशोक का झुकाव बौद्ध धर्म के प्रति पहले से ही था।
बल्कि यही बार बार कहा जाता है कि अशोक सनातन के रक्तपात से दुखी हो गए थे और कलिंग युद्ध के बाद उन्होंने बौद्ध धर्म को अपनाया।
आखिर इतिहासकारों ने सनातन को नीचा दिखाने के लिए सम्राट अशोक का प्रयोग क्यों किया?
यह मान्यता हमारे नन्हें बच्चों के हृदय में बचपन से ही पुस्तकों के माध्यम से स्थापित कर दी गयी कि सनातन तो हिंसा, रक्तपात एवं क्रूरता से भरा हुआ धर्म है, और इसका पालन करने वाला व्यक्ति “कलिंग के युद्ध” जैसा युद्ध करा सकता है !
हमारी आस्था पर सबसे पहला प्रहार इतिहासकारों द्वारा शायद यही है और सनातन से ऐतिहासिक रूप से विमुख करने का प्रथम कदम यही था और नैरेटिव युद्ध में प्रथम प्रहार यही है! जब बच्चों के मस्तिष्क में यह भर दिया गया ।
फिर अशोक का "धम्म " नही चला लेकिन" धर्म चक्र " हमारे झंडों में लिया गया । "तीन शेर" को सरकारी चिन्ह घोषित कर दी ।
कांग्रेस ने भी इसी बहाने सनातन के इतिहास को दफन करने में कोई कसर नही छोड़ा ।
समय आ गया अब इसे बदल देने में सनातन की संस्कृति सम्मान ही है !!
अरविन्द✍️