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20/12/2025
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: क्या ट्रायल कोर्ट 'मरते दम तक' जेल की सजा सुना सकता है?हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने 2025 INSC...
20/12/2025

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: क्या ट्रायल कोर्ट 'मरते दम तक' जेल की सजा सुना सकता है?
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने 2025 INSC 1453 के मामले में एक ऐतिहासिक स्पष्टीकरण दिया है। अदालत ने साफ कर दिया है कि उम्रकैद की सजा और कैदियों की माफी (Remission) को लेकर सत्र न्यायालय (Sessions Court) के पास कितनी शक्तियां हैं।
मामला क्या था?
यह मामला एक जघन्य अपराध से जुड़ा था, जहाँ आरोपी ने एक महिला पर मिट्टी का तेल डालकर उसे आग लगा दी थी। ट्रायल कोर्ट (Sessions Court) ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए उसे "मरते दम तक जेल" (Imprisonment for the remainder of natural life) की सजा सुनाई थी और कहा था कि उसे सजा माफी या जेल में बिताए गए समय की कटौती (Set-off) का लाभ नहीं मिलेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला सुनाया?
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने इस सजा में बदलाव करते हुए कुछ महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत बताए:
1. सजा माफी (Remission) छीनने का अधिकार किसके पास?
अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट के पास यह अधिकार नहीं है कि वह किसी अपराधी को मिलने वाली 'सजा माफी' के अधिकार को पूरी तरह खत्म कर दे।
* संवैधानिक न्यायालय: केवल सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट ही "विशेष श्रेणी" की सजा (जैसे 20, 25 या 30 साल बिना माफी के) दे सकते हैं।
* ट्रायल कोर्ट: सत्र न्यायालय केवल कानून के तहत 'उम्रकैद' दे सकता है, वह राज्य सरकार की माफी देने वाली शक्तियों (अनुच्छेद 72 और 161) में दखल नहीं दे सकता।
2. जेल में बिताए समय की कटौती (Section 428)
ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को 'सेट-ऑफ' (Set-off) देने से मना कर दिया था। कोर्ट ने इसे गलत ठहराया। कानून (CrPC की धारा 428) के तहत, अगर कोई व्यक्ति ट्रायल के दौरान जेल में रहा है, तो वह समय उसकी अंतिम सजा से घटाया जाना चाहिए। यह एक कानूनी अधिकार है जिसे कोई अदालत नहीं छीन सकती।
3. सजा में बदलाव, पर दोष बरकरार
सुप्रीम कोर्ट ने अपराधी की दोषसिद्धि (Conviction) को बरकरार रखा क्योंकि सबूत और 'मृत्युपूर्व बयान' (Dying Declaration) से जुर्म साबित हो गया था। हालांकि, सजा को बदलकर "साधारण उम्रकैद" कर दिया गया .
निष्कर्ष (Key Takeaway)
इस फैसले का मुख्य सार यह है कि ट्रायल कोर्ट "कानून का निर्माता" नहीं बल्कि "कानून का पालन कराने वाला" है। वह अपनी तरफ से ऐसी शर्तें नहीं जोड़ सकता जो विधायिका द्वारा दी गई शक्तियों (जैसे माफी की नीति) को खत्म करती हों। अब इस मामले का दोषी भविष्य में राज्य सरकार की नीति के अनुसार सजा माफी के लिए आवेदन कर सकेगा।

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19/12/2025

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अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य एवं अन्य का मामला भारत के सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया गया एक ऐतिहासिक निर्णय है, जो भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 498-ए (भारतीय न्याय संहिता की धारा 85 के समान) के दुरुपयोग को संबोधित करता है, जो पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा पत्नी के प्रति क्रूरता से संबंधित है। यह निर्णय पुलिस और न्यायिक अधिकारियों को इस प्रावधान के तहत गिरफ्तारी करने में सावधानी बरतने की आवश्यकता पर प्रकाश डालता है और इसका उद्देश्य घरेलू हिंसा के वास्तविक मामलों को संबोधित करने की आवश्यकता के साथ अभियुक्तों के अधिकारों को संतुलित करना है। केस के तथ्य याचिकाकर्ता अर्नेश कुमार पर उनकी पत्नी स्वेता किरण ने दहेज मांगने और उनके साथ क्रूरता करने का आरोप लगाया था। आरोपों में आठ लाख रुपये, एक कार और विभिन्न घरेलू सामान की मांग शामिल थी। जब ये मांगें पूरी नहीं हुईं, तो स्वेता किरण ने आरोप लगाया कि उन्हें उनके वैवाहिक घर से निकाल दिया गया। अर्नेश कुमार ने अग्रिम जमानत मांगी, जिसे सत्र न्यायालय और उच्च न्यायालय दोनों ने खारिज कर दिया, जिसके कारण उन्हें सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ा।

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्राथमिक मुद्दा धारा 498-ए आईपीसी का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग था, जिसके कारण अक्सर मनमाने और अनुचित गिरफ्तारियां होती थीं, जिससे अभियुक्तों और उनके परिवारों को अनुचित उत्पीड़न का सामना करना पड़ता था। न्यायालय को दुरुपयोग को रोकने और व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा के लिए गिरफ्तारी प्रक्रिया के लिए दिशा-निर्देश निर्धारित करने थे। तर्क याचिकाकर्ता (अर्नेश कुमार): अर्नेश कुमार ने तर्क दिया कि उनकी पत्नी द्वारा लगाए गए आरोप झूठे थे और उन्हें और उनके परिवार को परेशान करने के इरादे से प्रेरित थे। उन्होंने तर्क दिया कि पुलिस उचित जांच के बिना गिरफ्तारी करके धारा 498-ए आईपीसी का दुरुपयोग कर रही थी, और उन्होंने ऐसी मनमानी गिरफ्तारियों को रोकने के लिए दिशा-निर्देश मांगे। Also Read - चुनावी सुधारों पर हो रही बहस को किस प्रकार समझा जाना चाहिए? प्रतिवादी (बिहार राज्य और श्वेता किरण): प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि श्वेता किरण द्वारा लगाए गए आरोप गंभीर थे और जांच की आवश्यकता थी। उन्होंने तर्क दिया कि न्याय सुनिश्चित करने और शिकायतकर्ता को और अधिक परेशान होने से रोकने के लिए अभियुक्त की गिरफ्तारी आवश्यक थी। विश्लेषण सुप्रीम कोर्ट ने धारा 498-ए आईपीसी और दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 41 के प्रावधानों का विश्लेषण किया, जो पुलिस अधिकारियों को बिना वारंट के गिरफ्तार करने का अधिकार देता है। कोर्ट ने असंतुष्ट पत्नियों द्वारा धारा 498-ए के बढ़ते दुरुपयोग को स्वीकार किया और व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक व्यवस्था के बीच संतुलन की आवश्यकता पर जोर दिया

कोर्ट ने कहा कि गिरफ्तारी की शक्ति का इस्तेमाल नियमित तरीके से नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि उचित जांच के बाद उचित संतुष्टि के आधार पर किया जाना चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि पुलिस और न्यायपालिका अक्सर अपनी शक्तियों का उचित सावधानी और सतर्कता के साथ इस्तेमाल करने में विफल रही हैं, जिससे व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन होता है। निर्णय सुप्रीम कोर्ट ने धारा 498-ए आईपीसी के दुरुपयोग और मनमानी गिरफ्तारी को रोकने के लिए व्यापक दिशा-निर्देश जारी किए। मुख्य दिशा-निर्देश हैं: 1. बिना औचित्य के गिरफ्तारी नहीं: पुलिस अधिकारियों को धारा 498-ए आईपीसी के तहत शिकायत मिलने पर आरोपी को स्वचालित रूप से गिरफ्तार नहीं करना चाहिए। उन्हें पहले यह संतुष्ट होना चाहिए कि धारा 41 सीआरपीसी में उल्लिखित कारणों के लिए गिरफ्तारी आवश्यक है। 2. गिरफ्तारी के कारणों को दर्ज करना: गिरफ्तारी करने से पहले, पुलिस अधिकारियों को लिखित रूप में अपने कारणों को दर्ज करना चाहिए, जिससे उनकी संतुष्टि प्रदर्शित हो कि गिरफ्तारी आवश्यक है। 3. मजिस्ट्रेट की भूमिका: जब किसी आरोपी को मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाता है, तो पुलिस अधिकारी को गिरफ्तारी के तथ्य, कारण और निष्कर्ष प्रस्तुत करने चाहिए। मजिस्ट्रेट को आगे की हिरासत को अधिकृत करने से पहले संतुष्ट होना चाहिए कि गिरफ्तारी धारा 41 सीआरपीसी का अनुपालन करती है। 4. उपस्थिति का नोटिस: ऐसे मामलों में जहां गिरफ्तारी आवश्यक नहीं है, आरोपी को मामले की शुरुआत से दो सप्ताह के भीतर धारा 41ए सीआरपीसी के तहत उपस्थिति का नोटिस दिया जाना चाहिए। 5. उत्तरदायित्व: इन दिशानिर्देशों का पालन न करने पर संबंधित पुलिस अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जाएगी और अधिकारियों को अदालत की अवमानना के लिए भी उत्तरदायी ठहराया जा सकता है। अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य और अन्य में निर्णय का उद्देश्य धारा 498-ए आईपीसी के दुरुपयोग को रोकना और मनमानी गिरफ्तारी से व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा करना है। स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करके, सुप्रीम कोर्ट ने यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया है कि गिरफ्तारी की शक्ति का प्रयोग विवेकपूर्ण तरीके से और प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर उचित विचार करके किया जाए। यह निर्णय घरेलू हिंसा के गंभीर मुद्दे को संबोधित करते हुए व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

18/12/2025
17/12/2025
17/12/2025

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