25/12/2025
Philosophy of Science/विज्ञान का दर्शन
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अज्ञान सीमा है और इसलिए अज्ञान पीड़ा है।
ज्ञान असीम है और इसलिए ज्ञान मुक्ति है।।
ज्ञान प्राप्त करने की दो आयाम हो सकती हैं। पहला आयाम समग्रता का है इसकी बिश्लेषण यहाँ नहीं करेंगे दूसरा एक आयाम तो है कि जो भी हमारे चारों ओर विस्तार है, उस विस्तार के एक-एक अंश को हम जान ले । यह जो एक-एक अंश को, एक-एक कण को जानने की चेष्टा है, वही विज्ञान है। विज्ञान का अर्थ है: विश्लेषण से पाया हुआ ज्ञान। एक तो रास्ता है चीजों को जानने का कि हम उन्हें तोड़ें और उनके मौलिक घटक को खोज लें।
उदाहरण के लिए अगर पानी को जानना है तो पानी को तोड़ें और उन मौलिक उपकरणों को खोज लें, जिनसे पानी निर्मित हुआ है। तो जिस दिन हम पानी के मौलिक परमाणु को खोज लेंगे, उस दिन हमने पानी को जान लिया। तो विज्ञान पानी को तोड़ेगा, ऑक्सीजन, हाइड्रोजन की आखिरी इकाई को खोजेगा, लेकिन फिर भी उसका ज्ञान पानी का तो पूरा हो गया, फिर हाइड्रोजन और ऑक्सीजन को जानना जरूरी हो जाएगा। अज्ञान एक कदम आगे हटाया गया, मिट नहीं गया। हमने एक धक्का दिया अंधेरे को, एक कदम अंधेरा पीछे हट गया, लेकिन अंधेरा वहीं खड़ा है।
तो ऑक्सीजन को तोड़ना पड़ेगा। तो विज्ञान ऑक्सीजन को तोड़ेगा, हाइड्रोजन को तोड़ेगा। और ऑक्सीजन और हाइड्रोजन के परमाणु जिनसे निर्मित हैं, उनको खोजेगा। इलेक्ट्रांस को खोज लेगा। एक कदम और अज्ञान को धक्का दिया गया। अब हम हाइड्रोजन को भी निर्मित कर सकते हैं, लेकिन इलेक्ट्रान फिर हमारे अज्ञान की सीमा बन गई। तब जो शेष रह जाएगा वह मुझे घेर लेगा, और यह अंतहीन है।
विज्ञान ने अज्ञान को धक्का दे-दे कर बड़े दूर हटाया, ऐसा लगता रहा है। लेकिन अज्ञान मिटता नहीं है। दूसरे कदम पर पुनः खड़ा हो जाता है। क्योंकि जिस चीज को भी हम तोड़ कर जानेंगे, जो टूट कर बचेगा, उसे फिर जानना पड़ेगा लेकिन अज्ञान सदा ही शेष रह जाएगा, क्योंकि तब हम एक चीज को नहीं जानते थे, अब हम दो चीजों को नहीं जानते।
तोड़ने की प्रक्रिया एक अर्थ में अज्ञान को तोड़ती हुई मालूम पड़ती है, दूसरे अर्थ में बढ़ाती हुई मालूम पड़ती है। यह मजे की बात है कि विज्ञान ने जितना जाना है, उतना ही हमारा अज्ञान बड़ा भी हो गया है।