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Legal services for All civil Case, Divorce and Family matter case, Specific Relief Act, commercial Case, Consumer complaint cases, Cyber Law, Real Estate, Cheque Dishonor Case, Criminal Case, Writ case under Article 226 of Constitutions of India. Services provided by the firms:-
**Constitutional matter including Writ Petition under Article 226 and 227 of the Constitution before the High Court.
**All civil suits at Trial Court and Appellate Court including High Court & Supreme Court.
**Divorce and Family matter case.
**Prosecuting or defending Criminal Case at Trial Court and Appellate court including High Court & Supreme Court.
**Specific Relief Act, cases in all commercial agreement and contract.
**Dishonor of negotiable instrument under section 138 of N.I Act.
**Consumer complaint cases under Consumer protection Act.
**Cyber Authorities and Cyber Tribunals under Information Technology Act.
** Banking Case at DRT (Debt Recovery Tribunal).
** Real Estate Case at RERA. and other various legal issued involved under Civil Law, Corporate & Commercial, Criminal Law, Arbitration, Family Law, Banking & Finance, Real Estate, E-commerce , Cyber Law.

12/09/2026

Unlike a merchant who sells physical goods and can restock their shelves, a lawyer's inventory is 'time'. Once an hour is spent in legal research, client consultation or in the Court, it is gone forever.

👉Important judgment on Pension Law by Hon'ble Patna High Court vide Judgment dated 07-09-2026 in case of Bhawani Devi vs...
11/09/2026

👉Important judgment on Pension Law by Hon'ble Patna High Court vide Judgment dated 07-09-2026 in case of Bhawani Devi vs. State of Bihar CWJC No. 2462/2024 conducted by me as a Petitioner Advocate.
“Family Pension is a Legal Right: Patna High Court Bars Unauthorized Reduction of Widow’s Pension.
✅The Patna High Court held that family pension is a statutory/pensionary entitlement of the person in whose favour it has been sanctioned. It cannot be treated as the collective income of the family and cannot be pooled with the salary of another family member and then divided among family members.

The Key Rule Laid Down by the Court:-
✅An administrative authority cannot reduce, withhold, adjust or redistribute a sanctioned family pension unless such power is specifically conferred by the applicable statute or pension rules and exercised by the competent authority.
✅A widow's family pension is not a charity or discretionary family income.
Once pension has been sanctioned under the applicable pension rules, an authority cannot say:“Your son is earning, therefore his salary and your pension should be combined and the amount divided among the family.”
✅Where the law gives an authority a power, it may exercise that power. ✅Where the law gives no such power, the authority cannot create one merely because it considers the course equitable, reasonable or beneficial for the family.
✅“Entitlement must be determined by law—not by an administrative officer's arithmetic.”

✍️44 वर्ष पुराने भूमि विवाद का अंतिम अंतन्यायालय में मुकदमा जीतना और विवाद का वास्तव में समाप्त होना—दो अलग बातें हो सकत...
06/09/2026

✍️44 वर्ष पुराने भूमि विवाद का अंतिम अंत
न्यायालय में मुकदमा जीतना और विवाद का वास्तव में समाप्त होना—दो अलग बातें हो सकती हैं।
👉माननीय पटना उच्च न्यायालय के न्यामूर्ति खातिम रज़ा के द्वारा Misc. Appeal No. 962/2024 में दिनांक 09-07-2026 को पारित एक महत्वपूर्ण निर्णय जिससे 44 वर्ष से अर्थात् 1982 में शुरू हुआ विवाद लगभग 44 वर्ष बाद 2026 में इस महत्वपूर्ण निर्णय से विवाद का सदा के लिए समाप्त हो गया। इस दीवानी मुकदमे में मैं, प्रतिवादी के वकील के रूप में नियुक्त था।
✅मेरे क्लाइंट का एक पुस्तैनी जमीन जिसपर कुछ दबंग किस्म के आदमी जबरदस्ती कब्ज़ा जमा कर अपने को उस जमीन का मालिक घोषित कर लिए। उस विवादित भूमि को लेकर मेरे क्लाइंट के द्वारा 1982 में Title Suit No. 346/1982 गोपालगंज सिविल कोर्ट में दायर हुआ, जिसमें title, possession और mesne profits की मांग की गई।
✅पूरी केस के सुनबाई के बाद Trial Court ने 12.06.1997 को वाद के plaintiffs के पक्ष में decree कर दिया अर्थात केस का अंतिम निर्णय मेरे क्लाइंट के पक्ष में आया।
✅इस केस के Defendants ने 1997 में Title Appeal No. 70/1997 कोर्ट में दायर कर दिया। अपील के दौरान एक appellant Vijay Kumar की 28.06.2000 को मृत्यु हो गई, लेकिन उनके legal representatives को समय पर रिकॉर्ड पर नहीं लाया गया। लगभग 16 वर्ष बाद, 2016 में substitution, setting aside abatement और delay condonation के लिए आवेदन किए गए। First Appellate Court ने दिनांक 28.10.2024 के आदेश से substitution, setting aside abatement और delay condonation के लिए आवेदन को ख़ारिज कर दिया।
✅इसके विरुद्ध Miscellaneous Appeal No. 962/2024 माननीय पटना उच्च न्यायालय में दायर किया गया, इस केस में प्रतिवादी के वकील के रूप में नियुक्त किया गया।
👉मैं अपने क्लाइंट के तरफ से इस मुक़दमे में अपना क़ानूनी पक्ष रखा। माननीय पटना उच्च न्यायालय के सामने Proposition of Law इस प्रकार से रेखांकित किया गया।
✅यदि कोई डिक्री संयुक्त (Joint) एवं अविभाज्य (Inseverable) है तथा उसके विरुद्ध कई अपीलार्थियों द्वारा अपील दायर की गई है, और अपील के लंबित रहने के दौरान किसी एक अपीलार्थी की मृत्यु हो जाती है तथा निर्धारित अवधि के भीतर उसके विधिक प्रतिनिधियों को प्रतिस्थापित नहीं किया जाता है, जिसके कारण अपील उसके विरुद्ध उपशमित (abate) हो जाती है, तो ऐसी संयुक्त एवं अविभाज्य डिक्री की स्थिति में संपूर्ण अपील भी उपशमित हो सकती है। विशेष रूप से तब, जब विधिक प्रतिनिधियों को रिकॉर्ड पर लाने में लगभग 16 वर्षों की असाधारण देरी हुई हो और उस देरी के लिए कोई विश्वसनीय एवं पर्याप्त कारण प्रस्तुत न किया गया हो,
✅और इस तरह से माननीय पटना उच्च न्यायालय के न्यामूर्ति खातिम रज़ा ने दिनांक 09-07-2026 को पारित निर्णय द्वारा Miscellaneous Appeal No. 962/2024 को ख़ारिज कर दिया गया।
👉इस निर्णय से निकलने वाले मुख्य कानूनी सिद्धांत
✅1. Joint एवं Inseverable Decree का प्रभाव
यदि decree संयुक्त और अविभाज्य है, तो किसी एक appellant के विरुद्ध appeal के abatement का प्रभाव परिस्थितियों के अनुसार पूरी appeal पर पड़ सकता है।
✅2. Legal Representatives को समय पर रिकॉर्ड पर लाना आवश्यक है
किसी appellant की मृत्यु के बाद उसके legal representatives को निर्धारित अवधि में रिकॉर्ड पर लाना केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि appeal को विधि के अनुसार जीवित रखने के लिए आवश्यक प्रक्रिया है।
✅3. 16 वर्षों की असाधारण देरी स्वतः क्षम्य नहीं है
कानून में limitation और procedural discipline का महत्व है। लगभग 16 वर्षों की असाधारण देरी को केवल सामान्य, अस्पष्ट अथवा अविश्वसनीय कारण बताकर condone नहीं कराया जा सकता।
✅4. Litigation को अनिश्चित काल तक जीवित नहीं रखा जा सकता
किसी मुकदमे को केवल इसलिए दशकों तक लंबित नहीं रखा जा सकता कि पक्षकार समय पर आवश्यक कानूनी कदम उठाने में विफल रहा।
✅5. Finality of litigation भी न्याय का महत्वपूर्ण हिस्सा है
न्याय का उद्देश्य केवल यह तय करना नहीं है कि सही कौन है; बल्कि यह भी सुनिश्चित करना है कि एक समय के बाद विवाद अंतिम रूप से समाप्त हो, ताकि पक्षकार अपने जीवन और संपत्ति के संबंध में निश्चितता के साथ आगे बढ़ सकें।
👉“मुकदमा जीतने के बाद भी यदि अपील को दशकों तक लंबित रखा जाए, तो न्याय का उद्देश्य अधूरा रह जाता है। कानून हर पक्षकार को अपील का अधिकार देता है, लेकिन उस अधिकार के साथ समय-सीमा और प्रक्रिया का पालन करने की जिम्मेदारी भी देता है। जो पक्षकार वर्षों तक आवश्यक कानूनी कदम नहीं उठाता, वह केवल लंबे विलंब के आधार पर बंद हो चुके विवाद को अनिश्चित काल तक जीवित नहीं रख सकता।”
इस मामले में वर्ष 1982 से शुरू हुआ भूमि विवाद, Trial Court की वर्ष 1997 की decree, उसके बाद चली लगभग तीन दशक की appellate proceedings और अंततः 09.07.2026 के पटना उच्च न्यायालय के निर्णय के साथ एक निर्णायक कानूनी निष्कर्ष तक पहुंचा।

27/08/2026

My son Harshvardhan Sharma student of Law (BA, LLB) expressed his view on the fundamental right given under the Constitution of India. **Fundamental Right in the Constitution of India are the basic human freedoms guaranteed to all citizens, serving as bedrock of the nation's democracy and individual dignity.

एक बुजुर्ग पूर्व पुलिस अधिकारी की न्याय की लड़ाई।**************************पटना के 79 वर्षीय सेवानिवृत्त डिप्टी सुपरिंटे...
25/08/2026

एक बुजुर्ग पूर्व पुलिस अधिकारी की न्याय की लड़ाई।
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पटना के 79 वर्षीय सेवानिवृत्त डिप्टी सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस (Dy. SP) श्री राजेंद्र प्रसाद मिश्रा के साथ वर्ष 2019 में घटित घटना इस बात का गंभीर उदाहरण है कि जब कानून लागू करने वाली संस्था की शक्ति का ही दुरुपयोग होने लगे, तब एक नागरिक के लिए न्याय की लड़ाई कितनी कठिन हो सकती है।
उनके पारिवारिक संपत्ति विवाद के संदर्भ में उनके विरुद्ध S.K. Puri थाना, पटना में दहेज संबंधी एक आपराधिक मामला दर्ज कराया गया। आरोप है कि इसके बाद थाना पुलिस के कर्मियों द्वारा उनके आवास में जबरन प्रवेश किया गया, उनके साथ मारपीट की गई तथा उन्हें और उनके पुत्र को गलत तरीके से गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।
घटना उस समय समाचार माध्यमों में भी व्यापक रूप से प्रकाशित हुई थी।
👉लेकिन कहानी यहीं समाप्त नहीं हुई। जब पुलिस के विरुद्ध कानून का दरवाजा खटखटाया गया।
✅घटना के बाद श्री राजेंद्र प्रसाद मिश्रा ने संबंधित पुलिसकर्मियों के विरुद्ध आपराधिक शिकायत दर्ज कराई। प्रारंभिक स्तर पर IPC की धारा 76 तथा Cr.P.C. की धारा 197 के आधार पर पुलिसकर्मियों के विरुद्ध Court ने cognizance लेने से इनकार कर दिया गया।
✅यहीं से न्याय की एक दूसरी लड़ाई शुरू हुई।
मामला मेरे पास आया। मैंने उपलब्ध विधिक तथ्यों और आदेश का अध्ययन करने के बाद उन्हें Criminal Revision दायर करने की सलाह दी और उनके पक्ष से Criminal Revision No. 23/2022 Court में दायर किया गया।
इस Criminal रिवीजन की सुनवाई Additional District & Sessions Judge-V, Patna के कोर्ट में हुई जिसके में श्री राजेंद्र प्रसाद मिश्रा की ओर से कानूनी बहस किया।
✅06 अगस्त 2025 — एक महत्वपूर्ण न्यायिक मोड़
दिनांक 06.08.2025 को माननीय न्यायालय द्वारा महत्वपूर्ण आदेश पारित किया गया, जिसमें निचली अदालत को पुलिसकर्मियों के विरुद्ध cognizance लेने की दिशा में आगे बढ़ने का निर्देश दिया गया।
यह आदेश केवल एक व्यक्ति की व्यक्तिगत लड़ाई में सफलता नहीं थी।
👉यह उस सिद्धांत की पुनर्पुष्टि थी कि—
पुलिस की वर्दी कानून के प्रति जवाबदेही से मुक्ति का प्रमाणपत्र नहीं है।
✅27 जुलाई 2026 — जवाबदेही की दिशा में निर्णायक कदम
माननीय Criminal रिवीजन न्यायालय के आदेश के अनुपालन में
✌️मजिस्ट्रेट न्यायालय द्वारा दिनांक 27.07.2026 को आदेश पारित किया गया। इस आदेश के माध्यम से S.K. Puri, Patna थाना के संबंधित पुलिसकर्मियों के विरुद्ध IPC की धाराओं 448, 323, 341, 354, 427, 504, 506, 120-B एवं 34 के अंतर्गत cognizance लिया गया।
✅अर्थात् पुलिसकर्मियों के विरुद्ध अब आपराधिक न्यायिक कार्यवाही आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त हुआ।
✌️यह केवल एक मुकदमे की जीत नहीं है। एक अधिवक्ता के रूप में मेरे लिए इस मामले का महत्व केवल इस बात में नहीं है कि एक आदेश हमारे पक्ष में आया।
👉इसका वास्तविक महत्व यह है कि—
एक 79 वर्षीय व्यक्ति, जो स्वयं पुलिस विभाग में उच्च पद पर सेवा दे चुका था, जब पुलिस शक्ति के कथित दुरुपयोग का शिकार हुआ, तब कानून के माध्यम से उसी पुलिस व्यवस्था की जवाबदेही सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया।
मैंने इस मामले में केवल एक मुकदमा नहीं लड़ा; मैंने उस नागरिक के उस अधिकार की रक्षा के लिए कानूनी संघर्ष किया कि—
“राज्य की शक्ति नागरिक के अधिकारों को कुचलने के लिए नहीं, बल्कि उनकी रक्षा करने के लिए है।”
मेरी अधिवक्ता के रूप में भूमिका
✅इस प्रकरण में मेरी भूमिका :-
जब प्रारंभिक स्तर पर शिकायत का रास्ता बंद हुआ, तब मैंने वैकल्पिक न्यायिक उपाय के रूप में Criminal Revision का रास्ता अपनाने की सलाह दी। पुनरीक्षण न्यायालय के समक्ष मामले को प्रभावी ढंग से रखा गया और अंततः ऐसा न्यायिक आदेश प्राप्त हुआ जिसके परिणामस्वरूप पुलिसकर्मियों के विरुद्ध cognizance की कार्यवाही आगे बढ़ी।

👉यदि आपके साथ कोई पुलिसकर्मी अन्याय करता है, तो केवल इसलिए चुप मत रहिए कि सामने वाला व्यक्ति वर्दी में है।
कानून आपके अधिकारों की रक्षा करता है।
पुलिस को शक्ति प्राप्त है — लेकिन वह शक्ति कानून से आती है और कानून की सीमाओं में ही प्रयोग की जा सकती है।
अवैध गिरफ्तारी, जबरन प्रवेश, मारपीट, धमकी, दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई अथवा निजी विवाद में पुलिस शक्ति के दुरुपयोग के विरुद्ध न्यायिक उपचार उपलब्ध हैं।
कानून का शासन तभी सार्थक है जब कानून पुलिस पर भी उतना ही लागू हो जितना एक सामान्य नागरिक पर।
“वर्दी कानून की शक्ति है, कानून से ऊपर होने का अधिकार नहीं।

Happy Independence Day to all my friends.🇮🇳🇮🇳
14/08/2026

Happy Independence Day to all my friends.🇮🇳🇮🇳

सभी मित्रों को इस नई सुबह का नमस्कार 🙏🙏सच यह है कि हमलोग जीते है अनुभव में,लेकिन उसको जाहिर करते है शब्दों में, और बहुत ...
09/08/2026

सभी मित्रों को इस नई सुबह का नमस्कार 🙏🙏
सच यह है कि हमलोग जीते है अनुभव में,
लेकिन उसको जाहिर करते है शब्दों में,
और बहुत फासला है दोनों में।

Sunday is like oxygen for an Advocate, providing the essential time to conduct legal research and prepare arguments for ...
19/07/2026

Sunday is like oxygen for an Advocate, providing the essential time to conduct legal research and prepare arguments for the case schedule in the week ahead.
to all my friends.🙏🙏

✍️मित्रता और शत्रुता का सम्बन्ध पर एक हास्य अभिव्यक्ति। बड़ा गहरा वक्तव्य जो एक मजाक जैसा लगता है -शत्रु भी दुःख  देते है...
28/06/2026

✍️मित्रता और शत्रुता का सम्बन्ध पर एक हास्य अभिव्यक्ति।
बड़ा गहरा वक्तव्य जो एक मजाक जैसा लगता है -शत्रु भी दुःख देते हैं, मित्र भी दुख देते हैं।
👉 मित्र जब दूर जाते है /छूटते हैं तब दुख देते हैं, 👉शत्रु जब मिलते हैं तब दुख देते हैं।
इसके उल्टा शत्रु भी सुख देते हैं, मित्र भी सुख देते हैं।
👉 मित्र जब मिलते हैं तब सुख देते हैं,
👉 शत्रु जब जब दूर जाते है /छूटते हैं तब सुख देते हैं।
फर्क क्या है?
**मित्र और शत्रु दोनों ही मन को बाँधते हैं। शत्रु से भी हमारा लगाव रहता है; मित्र से भी लगाव रहता है। शत्रु मर जाए/ नष्ट हो जाये तो भी हमारे भीतर कुछ टूट जाता है; खाली हो जाती है जगह। कई बार तो मित्र से भी ज्यादा खाली जगह हो जाता है शत्रु के मरने से, क्योंकि उससे भी एक राग था--उलटा राग था; उसके होने से भी हम जुड़े रहते थे। मित्र से भी जुड़े हैं, शत्रु से भी जुड़े हैं। तो जिन चीजों से हमारा विरोध हो जाता है , उनसे भी संबंध निर्मित हो जाता है।
चाहे संबंध सकारात्मक हो या नकारात्मक, विरोध और समर्थन दोनों ही हमें सामने वाले से गहराई से बांध देते हैं।
** बंधन सिर्फ प्रेम का नहीं, बल्कि नफरत का भी होता है।

आज 21 June 2026 अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस है, योग विषय पर मेरा एक संक्षिप्त लेख जिसका शीर्षक है👇योग सत्य को प्रकट करने की ...
21/06/2026

आज 21 June 2026 अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस है, योग विषय पर मेरा एक संक्षिप्त लेख जिसका शीर्षक है👇
योग सत्य को प्रकट करने की एक वैज्ञानिक विधि है।
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✍️मन लगातार विचारों, इच्छाओं और कल्पनाओं का जाल बुनता रहता है, जिससे सत्य का प्रत्यक्ष अनुभव नहीं हो पाता।
पतंजलि के अनुसार योग कोई धर्म, दर्शन या विश्वास नहीं, बल्कि आत्म-परिवर्तन का वैज्ञानिक अनुशासन है। योग का मूल सूत्र है—
“योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः” (समाधि पाद का सूत्र 1.2) महर्षि पतंजलि 'योग सूत्र' अर्थात् चित्त (मन) की वृत्तियों का निरोध ही योग है।
जब मन के विचार, इच्छाएँ, आशाएँ और कल्पनाएँ शांत हो जाती हैं, तब मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को साक्षी भाव में अनुभव करता है। यही योग की अवस्था है।
मन और शरीर अलग-अलग नहीं हैं, बल्कि एक ही वास्तविकता के दो पहलू हैं। मन शरीर का सबसे सूक्ष्म और परिष्कृत रूप है। दोनों एक-दूसरे को निरंतर प्रभावित करते हैं। शरीर में होने वाले परिवर्तन मन को प्रभावित करते हैं और मन में होने वाले परिवर्तन शरीर पर प्रभाव डालते हैं। पतंजलि के अनुसार मन और शरीर मिलकर एक मनो-शारीरिक (Psychosomatic) इकाई बनाते हैं। इसलिए व्यक्ति के आंतरिक परिवर्तन की प्रक्रिया मन या शरीर, किसी भी पक्ष से प्रारम्भ की जा सकती है। मन और शरीर एक ही तंत्र के दो पहलू हैं; एक में परिवर्तन करने से दूसरे में स्वतः परिवर्तन होता है।
योग हमें वर्तमान क्षण (यहाँ और अभी) में जीना सिखाता है तथा वास्तविकता का सामना उसी रूप में करने की कला प्रदान करता है जैसी वह वास्तव में है।
योग कोई धर्म नहीं है। यह न हिन्दू है, न मुस्लिम, न किसी विशेष मत या सम्प्रदाय से संबंधित। योग गणित, भौतिकी और रसायन विज्ञान की भाँति एक शुद्ध विज्ञान है।
पतंजलि के अनुसार योग आत्म-परिवर्तन का एक वैज्ञानिक अनुशासन है। योग किसी विश्वास या आस्था की मांग नहीं करता, बल्कि अनुभव पर बल देता है। जिस प्रकार विज्ञान प्रयोग (Experiment) पर आधारित है, उसी प्रकार योग अनुभव (Experience) पर आधारित है। विज्ञान बाहरी जगत में प्रयोग करता है, जबकि योग आंतरिक जगत में अनुभव का प्रयोग करता है।
योग अस्तित्व, अनुभव और प्रयोग का मार्ग है। इसमें किसी विश्वास या अंधश्रद्धा की आवश्यकता नहीं होती; केवल सत्य को स्वयं अनुभव करने का साहस चाहिए।
योग दर्शन या बौद्धिक चिंतन मात्र नहीं है। यह मनुष्य के संपूर्ण अस्तित्व, उसके मूल स्वरूप और आंतरिक चेतना से संबंधित है। इसका उद्देश्य व्यक्ति को उसके वास्तविक स्वरूप, सत्य और आत्मबोध तक पहुँचाना है।
योग किसी मत या विश्वास का विषय नहीं, बल्कि आत्म-अनुभूति का विज्ञान है। यह हमें वर्तमान में जागरूक होकर सत्य का प्रत्यक्ष अनुभव करने और अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने का मार्ग प्रदान करता है। योग का उद्देश्य मन को शांत करके व्यक्ति को उसके वास्तविक स्वरूप—शुद्ध चेतना और साक्षीभाव—का अनुभव कराना है।

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