25/08/2026
एक बुजुर्ग पूर्व पुलिस अधिकारी की न्याय की लड़ाई।
**************************
पटना के 79 वर्षीय सेवानिवृत्त डिप्टी सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस (Dy. SP) श्री राजेंद्र प्रसाद मिश्रा के साथ वर्ष 2019 में घटित घटना इस बात का गंभीर उदाहरण है कि जब कानून लागू करने वाली संस्था की शक्ति का ही दुरुपयोग होने लगे, तब एक नागरिक के लिए न्याय की लड़ाई कितनी कठिन हो सकती है।
उनके पारिवारिक संपत्ति विवाद के संदर्भ में उनके विरुद्ध S.K. Puri थाना, पटना में दहेज संबंधी एक आपराधिक मामला दर्ज कराया गया। आरोप है कि इसके बाद थाना पुलिस के कर्मियों द्वारा उनके आवास में जबरन प्रवेश किया गया, उनके साथ मारपीट की गई तथा उन्हें और उनके पुत्र को गलत तरीके से गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।
घटना उस समय समाचार माध्यमों में भी व्यापक रूप से प्रकाशित हुई थी।
👉लेकिन कहानी यहीं समाप्त नहीं हुई। जब पुलिस के विरुद्ध कानून का दरवाजा खटखटाया गया।
✅घटना के बाद श्री राजेंद्र प्रसाद मिश्रा ने संबंधित पुलिसकर्मियों के विरुद्ध आपराधिक शिकायत दर्ज कराई। प्रारंभिक स्तर पर IPC की धारा 76 तथा Cr.P.C. की धारा 197 के आधार पर पुलिसकर्मियों के विरुद्ध Court ने cognizance लेने से इनकार कर दिया गया।
✅यहीं से न्याय की एक दूसरी लड़ाई शुरू हुई।
मामला मेरे पास आया। मैंने उपलब्ध विधिक तथ्यों और आदेश का अध्ययन करने के बाद उन्हें Criminal Revision दायर करने की सलाह दी और उनके पक्ष से Criminal Revision No. 23/2022 Court में दायर किया गया।
इस Criminal रिवीजन की सुनवाई Additional District & Sessions Judge-V, Patna के कोर्ट में हुई जिसके में श्री राजेंद्र प्रसाद मिश्रा की ओर से कानूनी बहस किया।
✅06 अगस्त 2025 — एक महत्वपूर्ण न्यायिक मोड़
दिनांक 06.08.2025 को माननीय न्यायालय द्वारा महत्वपूर्ण आदेश पारित किया गया, जिसमें निचली अदालत को पुलिसकर्मियों के विरुद्ध cognizance लेने की दिशा में आगे बढ़ने का निर्देश दिया गया।
यह आदेश केवल एक व्यक्ति की व्यक्तिगत लड़ाई में सफलता नहीं थी।
👉यह उस सिद्धांत की पुनर्पुष्टि थी कि—
पुलिस की वर्दी कानून के प्रति जवाबदेही से मुक्ति का प्रमाणपत्र नहीं है।
✅27 जुलाई 2026 — जवाबदेही की दिशा में निर्णायक कदम
माननीय Criminal रिवीजन न्यायालय के आदेश के अनुपालन में
✌️मजिस्ट्रेट न्यायालय द्वारा दिनांक 27.07.2026 को आदेश पारित किया गया। इस आदेश के माध्यम से S.K. Puri, Patna थाना के संबंधित पुलिसकर्मियों के विरुद्ध IPC की धाराओं 448, 323, 341, 354, 427, 504, 506, 120-B एवं 34 के अंतर्गत cognizance लिया गया।
✅अर्थात् पुलिसकर्मियों के विरुद्ध अब आपराधिक न्यायिक कार्यवाही आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त हुआ।
✌️यह केवल एक मुकदमे की जीत नहीं है। एक अधिवक्ता के रूप में मेरे लिए इस मामले का महत्व केवल इस बात में नहीं है कि एक आदेश हमारे पक्ष में आया।
👉इसका वास्तविक महत्व यह है कि—
एक 79 वर्षीय व्यक्ति, जो स्वयं पुलिस विभाग में उच्च पद पर सेवा दे चुका था, जब पुलिस शक्ति के कथित दुरुपयोग का शिकार हुआ, तब कानून के माध्यम से उसी पुलिस व्यवस्था की जवाबदेही सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया।
मैंने इस मामले में केवल एक मुकदमा नहीं लड़ा; मैंने उस नागरिक के उस अधिकार की रक्षा के लिए कानूनी संघर्ष किया कि—
“राज्य की शक्ति नागरिक के अधिकारों को कुचलने के लिए नहीं, बल्कि उनकी रक्षा करने के लिए है।”
मेरी अधिवक्ता के रूप में भूमिका
✅इस प्रकरण में मेरी भूमिका :-
जब प्रारंभिक स्तर पर शिकायत का रास्ता बंद हुआ, तब मैंने वैकल्पिक न्यायिक उपाय के रूप में Criminal Revision का रास्ता अपनाने की सलाह दी। पुनरीक्षण न्यायालय के समक्ष मामले को प्रभावी ढंग से रखा गया और अंततः ऐसा न्यायिक आदेश प्राप्त हुआ जिसके परिणामस्वरूप पुलिसकर्मियों के विरुद्ध cognizance की कार्यवाही आगे बढ़ी।
👉यदि आपके साथ कोई पुलिसकर्मी अन्याय करता है, तो केवल इसलिए चुप मत रहिए कि सामने वाला व्यक्ति वर्दी में है।
कानून आपके अधिकारों की रक्षा करता है।
पुलिस को शक्ति प्राप्त है — लेकिन वह शक्ति कानून से आती है और कानून की सीमाओं में ही प्रयोग की जा सकती है।
अवैध गिरफ्तारी, जबरन प्रवेश, मारपीट, धमकी, दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई अथवा निजी विवाद में पुलिस शक्ति के दुरुपयोग के विरुद्ध न्यायिक उपचार उपलब्ध हैं।
कानून का शासन तभी सार्थक है जब कानून पुलिस पर भी उतना ही लागू हो जितना एक सामान्य नागरिक पर।
“वर्दी कानून की शक्ति है, कानून से ऊपर होने का अधिकार नहीं।