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28/01/2026

मेमो में गिरफ्तारी के खास 'कारण' न बताना ड्यूटी में लापरवाही, गलती करने वाले पुलिसकर्मियों को सस्पेंड किया जाना चाहिए: इलाहाबाद हाईकोर्ट

https://hindi.livelaw.in/allahabad-highcourt/failure-to-disclose-specific-grounds-of-arrest-in-memo-is-dereliction-of-duty-errant-cops-must-be-suspended-allahabad-high-court-520557

क्या वकील को कानून नहीं पता था या जानबूझकर किया गया न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग?क्लाइंट का पैसा डूबा, वकील की फीस सुरक...
23/01/2026

क्या वकील को कानून नहीं पता था या जानबूझकर किया गया न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग?

क्लाइंट का पैसा डूबा, वकील की फीस सुरक्षित—सुप्रीम कोर्ट की फटकार ने खोली पेशेवर अनैतिकता की परतें

नई दिल्ली

यह मानना कठिन ही नहीं, बल्कि लगभग असंभव है कि कोई भी प्रैक्टिसिंग अधिवक्ता यह नहीं जानता होगा कि हाई कोर्ट के किसी निर्णय के खिलाफ सीधे सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दाखिल करना कानूनन अमान्य है। यह एक ऐसा बुनियादी सिद्धांत है, जिसे बार में बैठा एक जूनियर वकील तक जानता है। इसके बावजूद हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दाखिल की गई—और यही सवाल अब पूरे कानूनी तंत्र के सामने खड़ा है कि यह अज्ञानता थी या सुनियोजित लापरवाही?

सुप्रीम कोर्ट ने UNITED VOICE FOR EDUCATION FORUM बनाम UNION OF INDIA & अन्य मामले में इस तरह की याचिका को न केवल खारिज किया, बल्कि ₹1 लाख का जुर्माना लगाते हुए इसे कानून और न्यायिक प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग करार दिया। लेकिन असली प्रश्न यह है कि इस पूरे घटनाक्रम में नुकसान किसका हुआ?
उत्तर स्पष्ट है—क्लाइंट का।
और लाभ किसे मिला?—वकील को, जिसकी फीस सुरक्षित रही।

कानूनी जानकारों का कहना है कि यह मानना भोलेपन से कम नहीं होगा कि संबंधित अधिवक्ता को यह नहीं पता था कि हाई कोर्ट के जजमेंट के खिलाफ रिट याचिका मेंटेनेबल नहीं है। जब हर अधिवक्ता यह जानता है कि ऐसे मामलों में केवल अपील, रिव्यू, SLP या अन्य वैधानिक उपाय ही उपलब्ध हैं, तो फिर ऐसी याचिका दाखिल करने का औचित्य क्या था?

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना की टिप्पणी ने इस पेशेवर गैर-जिम्मेदारी को बेनकाब कर दिया। उन्होंने तीखे शब्दों में सवाल उठाया—

> “वकील किस तरह की सलाह दे रहे हैं? हम गलत सलाह के लिए वकीलों को सजा देना शुरू करेंगे। यह कानून और कोर्ट की प्रक्रिया का बहुत ही ज्यादा गलत इस्तेमाल है।”

यह टिप्पणी केवल एक केस तक सीमित नहीं है, बल्कि उस मानसिकता पर चोट है जिसमें कुछ वकील यह मानकर चलते हैं कि गलत याचिका का खामियाजा क्लाइंट भुगतेगा—जुर्माना, खर्च और समय की बर्बादी—जबकि वकील को उसकी फीस मिल ही जाएगी।

यही वह खतरनाक प्रवृत्ति है जो न्याय व्यवस्था को अंदर से खोखला कर रही है। न तो क्लाइंट को सही कानूनी सलाह दी जाती है, न ही उसे यह बताया जाता है कि उसका मामला कानूनन टिकेगा भी या नहीं। परिणामस्वरूप, अदालतों का समय बर्बाद होता है, याचिकाकर्ता आर्थिक और मानसिक रूप से टूटता है और जिम्मेदारी तय करने वाला कोई नहीं होता।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अब समय आ गया है कि ऐसे फैसलों में गलत सलाह देने वाले अधिवक्ताओं की जवाबदेही भी स्पष्ट रूप से तय की जाए, ताकि न्यायालय की फटकार केवल कागजों तक सीमित न रहे, बल्कि पेशेवर आचरण में सुधार भी सुनिश्चित हो।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगाया गया जुर्माना न केवल याचिकाकर्ताओं के लिए चेतावनी है, बल्कि उन अधिवक्ताओं के लिए भी एक कड़ा संदेश है जो यह समझते हैं कि कानून की अनदेखी कर भी उनकी फीस सुरक्षित रहेगी। अब अदालत ने साफ कर दिया है—न्यायिक प्रक्रिया के साथ खिलवाड़ की कीमत चुकानी पड़ेगी।

22/01/2026

हाईकोर्ट ने कहा- झूठी FIR कराने वालों पर पुलिस को करना होगा केस

हाईकोर्ट ने कहा जांच-अधिकारी के लिए यह अनिवार्य होगा कि वह सूचना देने वाले के खिलाफ झूठी गवाही और गुमराह करने पर FIR दर्ज कराए.

प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने झूठे मुकदमों और पुलिस तंत्र के दुरुपयोग पर सख्त रुख अपनाते हुए निर्देश दिया है कि पुलिस जांच में पाया जाता है कि एफआईआर झूठी सूचना के आधार पर दर्ज कराई गई थी, तो विवेचना अधिकारी के लिए यह अनिवार्य होगा कि वह सूचना देने वाले के खिलाफ झूठी गवाही और गुमराह करने का लिखित परिवाद दर्ज कराए. यह आदेश न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरि ने दिया है.

यह इलाहाबाद उच्च न्यायालय (High Court of Judicature at Allahabad) का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक आदेश है, जिसे न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरी (Hon'ble Praveen Kumar Giri, J.) ने 14 जनवरी, 2026 को पारित किया है।

यह आदेश 'उम्मे फरवा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य' (Umme Farva vs. State of U.P. and Another) के मामले में आया है, जो फर्जी मुकदमों (Fake Cases) और पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़ा प्रहार करता है।

इस आदेश के मुख्य बिंदु और विस्तृत जानकारी नीचे दी गई है:
1. मामले का संदर्भ (Context)
यह याचिका BNSS की धारा 528 (जो पुरानी Cr.P.C. की धारा 482 के समान है) के तहत दायर की गई थी। इसमें आवेदक ने अपने खिलाफ दर्ज फर्जी मुकदमे और मजिस्ट्रेट द्वारा लिए गए संज्ञान (Cognizance) को चुनौती दी थी।
2. पुलिस और जांच अधिकारियों के लिए सख्त निर्देश
न्यायालय ने पाया कि कई मामलों में पुलिस बिना उचित जांच के या गलत तथ्यों के आधार पर चार्जशीट दाखिल कर देती है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि:

• धारा 212 और 217 BNS (पुरानी IPC की धारा 177 और 182): यदि कोई व्यक्ति पुलिस को झूठी सूचना देता है, तो पुलिस अधिकारी की यह कानूनी जिम्मेदारी है कि वह उस व्यक्ति के खिलाफ लिखित शिकायत दर्ज करे।

• अधिकारियों की जवाबदेही: यदि जांच अधिकारी (IO), थाना प्रभारी (SHO) या क्षेत्राधिकारी (CO) और लोक अभियोजक (Public Prosecutor) नियमों का पालन नहीं करते हैं, तो उनके खिलाफ धारा 199(b) BNS (पुरानी IPC की धारा 166A(b)) के तहत कार्रवाई की जा सकती है।

3. अदालती अवमानना (Contempt of Court) की चेतावनी
आदेश के पैरा 50 में कोर्ट ने बहुत सख्त रुख अपनाया है:
• यदि पुलिस अधिकारी या न्यायिक अधिकारी इस आदेश का अक्षरश: पालन नहीं करते हैं, तो इसे 'अवमानना' (Contempt of Court) माना जाएगा।
• पीड़ित व्यक्ति अवमानना की कार्यवाही के लिए सीधे उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है।

4. 60 दिनों की समय सीमा
अदालत ने पुलिस अधिकारियों और न्यायिक अधिकारियों को अपनी कार्यप्रणाली में सुधार करने और कानूनी प्रक्रियाओं को विनियमित करने के लिए इस आदेश की तारीख (14 जनवरी 2026) से 60 दिनों का समय दिया है।

5. न्यायिक अधिकारियों के लिए संदेश
अदालत ने संबंधित मजिस्ट्रेट के स्पष्टीकरण को कुछ हद तक संतोषजनक पाया और कहा कि इस आदेश की टिप्पणियों का उनके करियर या सेवा रिकॉर्ड पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा, लेकिन भविष्य में सतर्क रहने का संकेत दिया।
निष्कर्ष और महत्व:
यह आदेश उन लोगों के लिए एक बड़ी राहत है जिन्हें झूठे मुकदमों में फंसाया जाता है। अब पुलिस केवल चार्जशीट दाखिल करके अपना पल्ला नहीं झाड़ सकती; यदि शिकायत झूठी पाई जाती है, तो पुलिस को शिकायतकर्ता के खिलाफ कार्रवाई करनी ही होगी, अन्यथा पुलिस अधिकारी खुद अपराधी माने जाएंगे।
संक्षेप में: यह आदेश 'फर्जी केस' कल्चर को खत्म करने और जांच प्रक्रिया में पारदर्शिता व जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

पुलिस अफसरों पर हो सकती है कार्रवाई: कोर्ट ने कहा कि यदि विवेचक जांच के बाद यह पाता है कि आरोप झूठे थे और क्लोजर रिपोर्ट लगाता है, तो उसे सूचना देने वाले के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 212 और 217 (आईपीसी की धारा 177 और 182 के समतुल्य) के तहत लिखित शिकायत दर्ज करानी होगी. कोर्ट ने चेतावनी दी कि ऐसा न करने पर संबंधित पुलिस अधिकारियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 199 (बी) के तहत कार्रवाई की जा सकती है.

60 दिन में आदेश का पालन करना है: कोर्ट ने स्टेट ऑफ पंजाब बनाम राज सिंह (1998) में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि झूठी सूचना के अपराधों में कोर्ट लोक सेवक की लिखित शिकायत के बिना संज्ञान नहीं ले सकता, इसलिए पुलिस द्वारा शिकायत दर्ज करना अनिवार्य है. कोर्ट ने प्रदेश के पुलिस महानिदेशक और न्यायिक अधिकारियों को 60 दिन के भीतर जिन निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने का आदेश दिया है, उनमें

झूठी सूचना पर कार्रवाई अनिवार्यः जब भी पुलिस किसी मामले में यह कहते हुए अंतिम रिपोर्ट लगाती है कि आरोप झूठे या भ्रामक थे, तो पुलिस को अनिवार्य रूप से सूचना देने वाले और गवाहों के खिलाफ बीएनएसएस की धारा 215 (1) के तहत लिखित शिकायत दर्ज करानी होगी.
मजिस्ट्रेट की भूमिकाः मजिस्ट्रेट ऐसी अंतिम रिपोर्ट को तब तक स्वीकार न करें जब तक उसके साथ झूठी सूचना देने वाले के खिलाफ लिखित शिकायत न हो. यदि प्रोटेस्ट पिटीशन दाखिल की जाती है, तो पुलिस की शिकायत पर कार्यवाही तब तक रुकी रहेगी जब तक प्रोटेस्ट पिटीशन पर निर्णय नहीं हो जाता.

अवमानना की चेतावनी: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इन निर्देशों का पालन न करना अदालत की अवमानना माना जाएगा.

इस मामले में न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरि ने यह भी साफ किया कि असंज्ञेय अपराधों में पुलिस की रिपोर्ट को स्टेट केस नहीं, बल्कि परिवाद माना जाना चाहिए. इसी के साथ कोर्ट ने अलीगढ़ के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें असंज्ञेय मामले में पुलिस रिपोर्ट पर संज्ञेय अपराध की तरह संज्ञान लिया गया था.

मामला वैवाहिक विवाद का है: पति ने अपनी पत्नी (याची) के खिलाफ क्वार्सी थाने में आईपीसी की धारा 504 और 507 के तहत एफआईआर दर्ज कराई थी. पति का आरोप था कि उसकी पत्नी, जो कोरिया में किसी अन्य व्यक्ति के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रह रही है. फेसबुक के जरिए उसे और उसकी बेटी को बदनाम कर रही है और भारत लौटने पर जान से मारने की धमकी दी है.

पुलिस ने फाइनल रिपोर्ट लगायी: पुलिस ने मामले की जांच की और आरोपों को झूठा पाते हुए अंतिम रिपोर्ट लगा दी. इसके बाद पति ने प्रोटेस्ट पिटीशन दाखिल की तो अलीगढ़ के सीजेएम ने प्रोटेस्ट पिटीशन स्वीकार करते हुए अंतिम रिपोर्ट खारिज कर दी और सीआरपीसी की धारा 190 (1)(बी) के तहत मामले का संज्ञान लेते हुए इसे स्टेट केस के रूप में चलाने का आदेश दिया.

स्टेट केस के रूप में दर्ज करना कानूनन गलत: पत्नी ने याची (पत्नी) के वकील ने तर्क दिया कि वैवाहिक कलह के कारण याची को दुर्भावनापूर्ण तरीके से फंसाया गया है. उन्होंने कहा कि पुलिस ने अंतिम रिपोर्ट लगाई थी और अपराध असंज्ञेय प्रकृति के थे इसलिए मजिस्ट्रेट का इसे स्टेट केस के रूप में दर्ज करना कानूनन गलत था. पति और सरकारी वकील ने तर्क दिया कि मजिस्ट्रेट ने जांच के दौरान एकत्र सबूतों का सही मूल्यांकन किया है और आदेश में कोई अवैधता नहीं है.

पुलिस अधिकारी की रिपोर्ट को परिवाद माना जाएगा: कोर्ट ने पाया कि आईपीसी की धारा 504 और 507 असंज्ञेय और जमानती अपराध हैं. कोर्ट ने सीआरपीसी की धारा 2(डी) के स्पष्टीकरण का हवाला देते हुए कहा कि असंज्ञेय अपराध में पुलिस अधिकारी की रिपोर्ट को परिवाद माना जाएगा और पुलिस अधिकारी को परिवादी समझा जाएगा. कोर्ट ने कहा कि इस मामले में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अलीगढ़ ने कानून के प्रावधानों का पालन नहीं किया.

HC ने मामले को पुनर्विचार के लिए वापस भेजा: असंज्ञेय अपराध को संज्ञेय अपराध की तरह माना. सीजेएम को इस मामले को परिवाद के रूप में आगे बढ़ाना चाहिए था. इसी के साथ कोर्ट ने अलीगढ़ सीजेएम के संजान आदेश को रद्द कर दिया और मामले को पुनर्विचार के लिए वापस भेज दिया. कोर्ट ने निर्देश दिया कि मजिस्ट्रेट अब कानून के अनुसार और आरोपी को सुनवाई का मौका देते हुए तीन महीने के भीतर नया आदेश करें.

एडवोकेट एस0 के0 चौबे

मँझे हुए नेता अक्सर सभी को नहीं, बल्कि केवल खास लोगों को ही महत्व देते हैं, साथ बिठाते हैं, राम राम करते हैं, वो जिनके प...
22/01/2026

मँझे हुए नेता अक्सर सभी को नहीं, बल्कि केवल खास लोगों को ही महत्व देते हैं, साथ बिठाते हैं, राम राम करते हैं, वो जिनके पास वोटर्स हैं, मजबूत हैं।
लेकिन एक सच्चा नेता वह होता है, जो सबकी ज़रूरत, परेशानी और आवाज़ को समझे।
वो भले ही आपकी जाति-बिरादरी का न हो,
हो सकता है आपके क्षेत्र या प्रदेश का भी न हो,
लेकिन हमारे पेशे में हम सब पहले वकील हैं।
मेरे लिए इससे बड़ा कोई रिश्ता, कोई जाति या कोई बिरादरी नहीं है।
मैं हर जगह, हर समय सही के साथ खड़ा मिलूंगा
यह मैं इसलिए कह सकता हूँ क्योंकि यही मेरा सामान्य जीवन भी है।
मैं, ऐसे ही चलता हूँ। और ऐसे ही समझता हूँ कि
ज़रूरतमंद और इंसानियत की कोई जाति, धर्म, प्रदेश या बिरादरी नहीं होती।
आइए चले।।।

 #चार्जशीट  दाखिल करने के बाद भी    लेने से नहीं रोका जा सकता:- #सुप्रीम_कोर्ट
07/04/2025

#चार्जशीट दाखिल करने के बाद भी लेने से नहीं रोका जा सकता:- #सुप्रीम_कोर्ट

https://www.facebook.com/share/18rU3kzQ8b/
23/02/2025

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हमारी ताकत ने केंद्र सरकार की रातों की नींद हराम कर दी और इसी के साथ अधिवक्ता संशोधन बिल वापिस 💪💪💪

अधिवक्ता शक्ति ज़िंदाबाद 💪💪

27/11/2023

without is .
And
without is .

18/09/2023

जहां अभियोजन पक्ष प्रारंभिक या अपूर्ण आरोप पत्र दाखिल करता है, वहां आरोपी को डिफ़ॉल्ट जमानत का अधिकार है: दिल्ली हाईकोर्ट

“सीआरपीसी की धारा 167 (2) के तहत किसी आरोपी को डिफ़ॉल्ट जमानत का अधिकार उस मामले में उत्पन्न होगा, जहां निर्धारित अवधि के भीतर आरोप पत्र दायर नहीं किया गया। डिफॉल्ट जमानत के अधिकार को जन्म देने वाली दूसरी परिस्थिति वह होगी, जहां अभियोजन पक्ष प्रारंभिक या अपूर्ण आरोप पत्र दाखिल करता है, उसमें उल्लिखित अपराधों के लिए निर्धारित अवधि के भीतर और उस प्रक्रिया में आरोपी के वैधानिक जमानत के अधिकार को पराजित किया जाता है।

अदालत ने हत्या के मामले में आरोपी को डिफ़ॉल्ट जमानत देने से इनकार करते हुए ये टिप्पणियां कीं। भारतीय दंड संहिता, 1860 की (आईपीसी) धारा 302 और 34 और शस्त्र अधिनियम की धारा 25 और 27 के तहत अपराध के लिए 2021 में एफआईआर दर्ज की गई थी।
आरोपी को 08 सितंबर, 2021 को गिरफ्तार किया गया था। उसे दो दिनों की पॉलिसी हिरासत में भेज दिया गया था, जिसके बाद उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया था। जांच पूरी होने पर 02 दिसंबर 2021 को आरोप पत्र दाखिल किया गया।
14 मार्च को पहला पूरक आरोप पत्र दायर किया गया था, जिसमें सह-अभियुक्त के पास से बरामद पिस्तौल के संबंध में एफएसएल रिपोर्ट शामिल थी। 18 अप्रैल को दूसरा पूरक आरोप पत्र दायर किया गया था, जिसमें ब्लड सैंपल के डीएनए विश्लेषण के संबंध में एफएसएल रिपोर्ट को रिकॉर्ड पर रखा गया।
जून में सत्र अदालत ने सीआरपीसी की धारा 167 के तहत डिफ़ॉल्ट जमानत की मांग करने वाले आरोपी के आवेदन को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि चूंकि पूरी चार्जशीट पहले ही दायर की जा चुकी है। इसलिए आरोपी की वैधानिक जमानत का अधिकार समाप्त हो गया। ट्रायल कोर्ट ने कहा कि जो एकमात्र जांच लंबित है वह आईओ के नियंत्रण में नहीं है और बाहरी एजेंसियों की रिपोर्ट जैसे बाहरी कारकों पर निर्भर है।
अभियुक्त का मामला यह है कि यद्यपि आरोपपत्र निर्धारित समय के भीतर दायर किया गया, लेकिन यह अधूरा है। इसलिए वह डिफ़ॉल्ट जमानत का हकदार है। उन्होंने कहा कि मुख्य आरोप पत्र और पूरक आरोप पत्र कुछ दस्तावेजों के दाखिल न होने के कारण अधूरे है।
दूसरी ओर, अभियोजन पक्ष ने तर्क दिया कि आरोपी के खिलाफ जांच पूरी हो चुकी है। उसके खिलाफ पर्याप्त सबूत है, जिन्हें मुख्य आरोप पत्र के साथ रिकॉर्ड पर रखा गया था। इसमें चश्मदीद गवाहों के बयान भी शामिल थे।
याचिका खारिज करते हुए अदालत ने कहा कि पहली चार्जशीट दाखिल होने तक आरोपी के खिलाफ जांच पूरी हो चुकी है और उसके खिलाफ रिकॉर्ड पर पर्याप्त सामग्री है।

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