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घरेलू हिंसा के केस के दौरान महिला को नहीं कर सकते घर से बाहर: दिल्ली हाई कोर्टदिल्ली हाई कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करत...
30/12/2019

घरेलू हिंसा के केस के दौरान महिला को नहीं कर सकते घर से बाहर: दिल्ली हाई कोर्ट

दिल्ली हाई कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि महिला को वैकल्पिक आवास की व्यवस्था होने तक केस चलने के बाद भी घर से बाहर नहीं किया जा सकता। जस्टिस रेखा पल्ली की बेंच ने 18 दिसंबर को घरेलू हिंसा की शिकार छह महिलाओं की अपील पर सुनवाई को मंजूरी देते हुए यह बात कही।

यदि कोई महिला ससुराल वालों के खिलाफ घरेलू हिंसा का केस लड़ रही है तो उसे घर से बाहर नहीं किया जा सकता। भले ही घर का मालिकाना हक ससुराल के किसी सदस्य का हो, लेकिन केस के दौरान महिला को बाहर नहीं किया जा सकता। दिल्ली हाई कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि महिला को वैकल्पिक आवास की व्यवस्था होने तक केस चलने के बाद भी घर से बाहर नहीं किया जा सकता।जस्टिस रेखा पल्ली की बेंच ने 18 दिसंबर को घरेलू हिंसा की शिकार छह महिलाओं की अपील पर सुनवाई को मंजूरी देते हुए यह बात कही। महिलाओं ने अपनी अर्जी में कहा था कि घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत वे घर में रह सकती हैं, लेकिन इसके बाद भी ट्रायल कोर्ट ने उन्हें घर से बाहर करने के पक्ष में फैसला दिया।

हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट्स की महिलाओं को बाहर किए जाने के फैसले को रद्द करते हुए कहा कि ऐसे किसी भी केस को घरेलू हिंसा अधिनियम के प्रावधानों के तहत ही निपटाना चाहिए। अदालत ने कहा कि जब तक महिला वैवाहिक संबंधों में है, तब तक सिविल कोर्ट की ओर से उसे घर से बाहर किए जाने का आदेश नहीं दिया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि घरेलू हिंसा अधिनियम में पीड़िता के संरक्षण की बात कही गई है, लेकिन इसमें मालिकाना हक जैसी बात नहीं है। जस्टिस पल्ली ने कहा कि घर के मालिकाना हक से परे पीड़िता को संबंध जारी रहने तक रहने का अधिकार है।

Source : navbharat-times

क्या होता है ब्लैक वॉरंट या डेथ वॉरंट ......फांसी देने से पहले जारी होता है ब्लैक वॉरंट जिसे डेथ वॉरंट भी कहते हैं..जब त...
14/12/2019

क्या होता है ब्लैक वॉरंट या डेथ वॉरंट ......

फांसी देने से पहले जारी होता है ब्लैक वॉरंट जिसे डेथ वॉरंट भी कहते हैं..
जब तक जेल प्रशासन के पास डेथ वॉरंट नहीं आ जाता है तब तक जेल प्रशासन किसी दोषी को फांसी पर नहीं लटका सकता है.
नई दिल्ली: निर्भया केस (nirbhaya case) के दोषियों की फांसी का मामला एक बार पिर सुर्खियों में है. यह बात बहुत कम लोगों को पता है कि जब तक जेल प्रशासन के पास डेथ वॉरंट (Death warrant) नहीं आ जाता है तब तक जेल प्रशासन किसी दोषी को फांसी पर नहीं लटका सकता है..

डेथ वॉरंट जारी होने के बाद फांसी पर लटकाने की प्रकिया शुरू होती है. डेथ वाॉरेंट पर 'Ex*****on Of A Sentence Of Death' लिखा होता है. इसके बाद पहले खाली कालम में उस जेल का नंबर लिखा होता है जिस जेल में फांसी दी जानी है

इसके बाद अगले कॉलम में फांसी पर चढ़ने वाले सभी दोषियों के नाम लिखे जाते है. अगले खाली कॉलम में केस का FIR नंबर लिखा जाता है. उसके बाद के कॉलम में किस दिन ब्लैक वारंट जारी हो रहा है वो तारीख पहले लिखी जाती है.

इसके बाद के कॉलम में फांसी देने वाले दिन यानी मौत के दिन की तारीख लिखी जाती है और किस जगह फांसी दी जाएगी यह लिखा जाता है. इसके बाद अगले खाली कॉलम में फांसी पर चढ़ने वाले दोषियों के नाम के साथ बकायदा यह साफ- साफ लिखा होता है की जिस- जिस को फांसी दी जा रही है उनके गले मे फांसी का फंदा जब तक लटकाया जाए जब तक की उनकी मौत न हो जाए और फांसी होने के बाद मौत से जुड़े सर्टिफिकेट और फांसी हो गई है ये लिखित में वापस कोर्ट को अवगत कराया जाए.

सबसे नीचे समय दिन और ब्लेक वारंट जारी करने वाले जज के साइन होते हैं|

Source : zeenews.india.com

क्या नशे में कोई अपराध करने पर सजा नहीं मिलेगी | क्या नशे में अपराध किया तो सजा में कमी हो सकती है......क्या नशे में कोई...
09/12/2019

क्या नशे में कोई अपराध करने पर सजा नहीं मिलेगी | क्या नशे में अपराध किया तो सजा में कमी हो सकती है......

क्या नशे में कोई अपराध करने पर सजा नहीं मिलेगी, इसके लिए हमारा IPC क्या प्रोविसन करता है | नशा करना एक सामाजिक बुराई माना जाता है। इसे ना केवल बुराइयों वरन् अपराध के में वृद्धि करने वाला एक अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण काम समझा जाता है। शराब के नशे में होने वाला अपराध एक सामाजिक बुराई है। इसलिए विकृत मानसिकता के मामले में सहानुभूति पूर्वक विचार प्रस्तुत किया जा सकता है। परंतु शराब के मामले में व्यक्ति को निश्चित रूप से उत्तरदाई ठहराया जाएगा।
शराब पीने के कारण किये गए अपराध के लिए यह कथन प्रसिद्ध है कि, नशे में किए गए अपराध कार्य का फल नशा उतर जाने के बाद भोगना पड़ता है। यानी कि नशे में किए हुए अपराध की सजा जरूर भुगतनी पड़ती है । लेकिन समय के साथ परिस्थितियां बदली और उपरोक्त विधि में भी परिवर्तन आया।

इसी बदली हुई स्थित को दंड संहिता की धारा 8 में उपबंधित किया गया है, जिसके अनुसार-

कोई बात अपराध नहीं है जो ऐसे व्यक्ति द्वारा की जाती है जो उसे करते समय शराब (मत्तता) के कारण उस कार्य की प्रकृति या यह कि जो कुछ वह कर रहा है, वह दोषपूर्ण है, या विधि के प्रतिकूल है,जानने में असमर्थ है । यानी कि वो व्यक्ति इतना शराब के नशे में था कि सोचने समझने की शक्ति नहीं थी कि को वो जो भी कर रहा है वह एक अपराध है ।
परंतु यह तब होगा जबकि वह चीज जिससे उसको नशा हुआ है, उसके अपने ज्ञान के बिना या इच्छा के विरुद्ध दी गई थी।

धारा 85 नशे में अपराध-

कार्य करने वाले व्यक्ति को आपराधिक उत्तरदायित्व से मुक्ति दिलाती है। यदि अपराध कार्य करते समय नशे के कारण वह –
1- कार्य की प्रकृति जानने में असमर्थ था या
2- वह यह जानने में असमर्थ था, कि जो कुछ वह कर रहा है, वह दोषपूर्ण है, या विधि कानून के प्रतिकूल था तथा।
3- वह चीज वहां जिससे उसको नशा हुआ है। उसके बिना ज्ञान या इच्छा के विरुद्ध दी गई थी।

इसी प्रकार धारा 86 के उपबंध के अनुसार-

उन दशाओं में जहां की कोई किया गया कार्य अपराध नहीं होता । जब तक कि वह किसी विशिष्ट ज्ञान या आशय से ना किया गया हो। कोई व्यक्ति जो वह कार्य शराब (मत्तता) के नशे की हालत में करता है। इस प्रकार बरते जाने वाले दायित्व के अधीन होगा। मानो उसे पता ही नही था वह काया कर रहा है, जब तक कि वह चीज जिससे नशा हुआ है। उसे उसके इनके बिना या उसकी इच्छा के विरुद्ध ना दी गयी हो।

डाइरेक्टर ऑफ पब्लिक प्रॉसिक्यूटर बनाम बीयर्ड- का वाद इस धारा पर आधारित एक महत्वपूर्ण वाद है। इसमें 13 वर्ष की एक लड़की बाजार जाते समय एक मिल के गेट से निकल रही थी। जहां अभियुक्त बीयर्ड पहरेदार के रूप में ड्यूटी पर तैनात था। अभियुक्त ने बलात्कार करने का प्रयास किया लड़की ने इसका प्रतिरोध किया।
इस पर अभियुक्त ने अपना हाथ लड़की के मुंह पर रख दिया, तथा दूसरे हाथ का अंगूठा उसके गले पर रखकर दबाया था। कि लड़की शोर न मचा सके। पर लड़की की अनजाने में मृत्यु हो गई।

हाउस ऑफ लार्डस ने अभियुक्त को मृत्यु दंड से दंडित किया।
इस वाद में (शराब) मन्दोन्मत्तता के संबंध में तीन सिद्धांत प्रतिपादित किए गए थे।

1- अभियोग के विरुद्ध नशे मे होने को प्रतिरक्षा के हितार्थ प्रयुक्त किया जा रहा है।
2-यह कि केवल इतना कहना कि अभियुक्त के दिमाग पर नशे का प्रभाव होने के कारण उसका दिमाग अपराध की ओर अधिक तेजी से झुक गया। इस मान्यता का उल्लंघन नहीं कर सकता कि प्रत्येक मनुष्य किए गए कार्य के प्रभाव को जानता है।
3- यह की (शराब) मन्दोन्मत्तता का प्रभाव क्या अभियुक्त पर इस सीमा तक था कि वह विचार या इच्छा करने की स्थिति में नहीं था। साथ ही घटना के समय की परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।
अथवा अप्रत्यक्ष दोनों भी प्रकार की हो सकती हैं। किंतु एक परिपक्व बुद्धि वाले व्यक्ति ही सहमति देने में सक्षम होगी।

Source: legalhelpdesk.co.in

क्या होता है जब आप खा लेते हैं एक्सपायर हो चुकी दवा? क्या होता है जब आप खा लेते हैं एक्सपायर हो चुकी दवा? असल में किसी द...
02/12/2019

क्या होता है जब आप खा लेते हैं एक्सपायर हो चुकी दवा?


क्या होता है जब आप खा लेते हैं एक्सपायर हो चुकी दवा? असल में किसी दवा के एक्सपायर होने का क्या मतलब होता है
सबसे पहले तो यही जानना जरूरी है कि असल में किसी दवा के एक्सपायर (expired medicine) होने का क्या मतलब होता है.

हम सभी ने बचपन से यही सुना है कि जैसे ही किसी दावा की एक्सपायरी डेट निकल जाती है, उसे तुरंत फेंक देना चाहिए. कहा जाता है कि एक्सपायरी डेट वो तारीख होती है जिसके बाद से कोई भी दवा असर करना बंद कर देती है. कुछ ऐसे भी लोग कहते हैं कि ये एक्सपायरी डेट सिर्फ एक वहम है और दो-तीन साल पुरानी दवाएं भी खा लेते हैं. दरअसल हममें से बहुतों को यह भी ठीक से पता नहीं है कि किसी भी दवा की एक्सपायरी का मतलब क्या होता है और एक्सपायरी के बाद उसे इस्तेमाल करना सही है या बिलकुल गलत.

दवा की एक्सपायरी डेट का क्या मतलब होता है?

सबसे पहले तो यही जानना जरूरी है कि असल में किसी दवा के एक्सपायर होने का क्या मतलब होता है. आप कोई भी दवा खरीदें या स्वास्थ्य से जुड़ा कोई भी पदार्थ, आपको उसमें दो तारीखें स्पष्ट नजर आएंगी. पहली उसकी मैन्युफैक्चारिंग डेट यानी वह तारिख जिस दिन यह दवा बनी थी और एक्सपायरी डेट यानी वह तारिख जिसके बाद से इस दवा के प्रभाव की गारंटी उसे बनाने वाली कंपनी नहीं लेगी.

अक्सर दवाएं किसी किस्म का केमिकल होती हैं. सभी केमिकल पदार्थों की यह विशेषता है कि समय बीतने के साथ उनका असर बदलता जाता है. ऐसा ही दवाओं के साथ भी होता है. हवा, नमी, गर्मी इत्यादि की वजह से कई बार समय बीतने के साथ दवाओं की प्रभावशीलता धीरे-धीरे घटने लगती है. इसी वजह से इसके साइड-इफेक्ट यानी दुष्परिणाम भी हो सकते हैं. इसीलिए दवा बनाने वाली सभी कंपनियां किसी भी कानूनी पचड़े से बचने के लिए अपने उत्पादों पर उनकी उपयोगिता खत्म होने की एक निर्धारित तारिख डाल देती हैं.
समय बीतने के साथ उनका असर बदलता जाता है

क्या एक्सपायर होते ही खराब हो जाती हैं दवाएं?

अमेरिका के मेडिकल संगठन AMA ने 2001 में एक जांच की. उन्होंने 122 अलग-अलग दवाइयों के 3000 बैच लिए और उनकी स्थिरता को जांचा. इस स्थिरता के आधार पर AMA ने करीब 88% दवाइयों की एक्सपायरी डेट करीब 66 महीने तक आगे बढ़ा दी. इसका मतलब साफ है कि अधिकतर दवाओं के कार्य करने की क्षमता उनपर छपी हुई एक्सपायरी डेट से बहुत अधिक होती है. जिन दवाओं की एक्सपायरी डेट AMA ने आगे बढ़ाई थी उनमें एमोक्सिसिलिन, सिप्रोफलोक्सेसिन, मोर्फिन सलफेट आदि शामिल थीं. हालांकि 18% दवाओं को उनकी एक्सपायरी के साथ ही फेंक दिया गया था.

क्या एक्सपायरी के बाद भी खाई जा सकती हैं दवाएं?

हालांकि इस बारे में बहुत अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है. लेकिन तथ्यों से यह समझ में आता है कि अगर कोई दवा टेबलेट या कैप्सूल के रूप में है तो उसका प्रभाव उसकी एक्सपायरी डेट के बाद अधिक दिनों तक रहेगा. लेकिन सिरप, आंख, कान में डालने वाले ड्रॉप और इंजेक्शन उनके एक्सपायर होने के बाद प्रयोग नहीं करने चाहिए.

एक्सपायर होते ही कौन सी दवाएं जहर हो जाती हैं?

मेडिकल एसोसिएशन द्वारा ऐसी कुछ दवाएं सुझाई गई हैं जिन्हें उनकी एक्सपायरी डेट के बाद बिलकुल भी इस्तेमाल नहीं करना चाहिए. ये दवाएं हैं:

इंसुलिन: डायबिटीज के मरीजों के लिए बेहद जरूरी यह दवा अपनी एक्सपायरी डेट के बाद खराब होने लगती है.

नाइट्रोग्लिसरीन: यह दवाई दिल के मरीजों को सीने में दर्द होने पर दी जाती है. जैसे ही इसे एक बार खोला गया, इसका प्रभाव बहुत जल्दी खत्म होने लगता है.

खून, वैक्सीन जैसी दवाइयां कभी भी निर्धारित समयावधि के बाद प्रयोग नहीं करनी चाहिए.

आंखों में डालने वाले ड्रॉप्स, या किसी अन्य दवा की बोतल में अगर आपको सफेद रुई जैसा तत्व नजर आए तो बेहतर है कि उसे फेंक ही दें.

जब ना समझ आए तो बेहतर है फेंक ही दें:

कई बार हम इंटरनेट पर पढ़कर खुद को डॉक्टर के बराबर समझने लगते हैं और बीमारी से जुड़े फैसले भी खुद ही लेने लगते हैं. लेकिन अगर आपको किसी भी दवा हो लेकर थोड़ा भी शक हो रहा हो, तो बेहतर होगा उसे फेंक ही दें. इससे पैसों का नुकसान भले ही होगा लेकिन आपकी और आपसे जुड़े लोगों की तबियत दुरुस्त रहेगी.

Source: news18hindi

Single-use plastic ban: सिंगल यूज प्लास्टिक क्या है और इसे बैन क्यों किया जा रहा है?सिंगल-यूज प्लास्टिक क्या है?सिंगल-यू...
02/12/2019

Single-use plastic ban: सिंगल यूज प्लास्टिक क्या है और इसे बैन क्यों किया जा रहा है?

सिंगल-यूज प्लास्टिक क्या है?

सिंगल-यूज प्लास्टिक एक ऐसा प्लास्टिक जिसका उपयोग हम केवल एक बार करते हैं. एक इस्तेमाल करके फेंक दी जाने वाली प्लास्टिक ही सिंगल-यूज प्लास्टिक कहलाता है. हमलोग इसे डिस्पोजेबल प्‍लास्टिक भी कहते हैं.

हालांकि, इसकी रीसाइक्लिंग (recycling) की जा सकती है. इसका उपयोग हम अपने रोजमर्रा के काम में करते हैं.

बैन क्यों होने जा रहा है?

जलवायु परिवर्तन के कारण बिगड़ता पर्यावरण विश्व के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय है. ऐसे में प्लास्टिक से पैदा होने वाले प्रदूषण को रोकना एक बहुत बड़ी समस्या बनकर उभरी है. प्रत्येक साल कई लाख टन प्लास्टिक उत्पादन (produce) हो रहा है, जो कि मिट्टी में नहीं घुलता-मिलता (Biodegradable) है. इसलिए विश्व भर के देश सिंगल-यूज प्लास्टिक के इस्तेमाल को समाप्त करने हेतु कठोर रणनीति बना रहे हैं.

सिंगल यूज प्‍लास्टिक करीब 7.5 प्रतिशत की ही रीसाइक्लिंग हो पाती है. बाकी प्लास्टिक मिट्टी में मिल जाती है, जो पानी की सहायता से समुद्र में पहुंचता है और वहां के जीवों को काफी नुकसान पहुंचाता है. अधिकांश प्लास्टिक कुछ समय में टूटकर जहरीले रसायन भी छोड़ते हैं. ये रसायन पानी और खाद्य सामग्रियों के द्वारा हमारे शरीर में पहुंचते हैं और काफी नुकसान पहुंचाते हैं.

देश को पूरी तरह से प्लास्टिक मुक्त बनाने की योजना...

प्रधानमंत्री मोदी ने साल 2022 तक देश को पूरी तरह से प्लास्टिक मुक्त बनाने की योजना रखा है. इसकी शुरुआत 2 अक्टूबर 2019 से होगी. इस बैन से प्लास्टिक बैग, कप, प्लेट्स, छोटे बोतल और प्लास्टिक से बने दूसरे सामान का इस्तेमाल बंद हो जाएगा. पीएम मोदी ने स्वतंत्रता दिवस को दिए गए भाषण में लोगों और सरकारी एजेंसियों से देश को प्लास्टिक मुक्त बनाने की अपील की थी.

FASTag in India:  1 दिसंबर से सभी वाहन मालिकों के लिए फास्टैग अनिवार्य........फास्टैग एक इलेक्ट्रॉनिक टोल कलेक्शन तकनीक ...
02/12/2019

FASTag in India: 1 दिसंबर से सभी वाहन मालिकों के लिए फास्टैग अनिवार्य........

फास्टैग एक इलेक्ट्रॉनिक टोल कलेक्शन तकनीक है जो नेशनल हाईवे के टोल प्लाजा पर उपलब्ध है. यह तकनीक रेडिया ​फ्रिक्वेंसी आइडेन्टिफिकेशन (आरएफआईडी) के प्रिंसिपल पर काम करता है.


राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक टोल संग्रह (फास्टैग) कार्यक्रम, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय और भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) की एक बड़ी पहल, टोल प्लाजा पर बाधाओं को खत्म करने तथा यातायात की बेरोकटोक आवाजाही सुनिश्चित करने हेतु अखिल भारतीय स्‍तर पर लागू किया गया है. फास्टैग का उद्देश्य रेडियो फ्रीक्‍वेंसी आइडेंटिफिकेशन (आरएफआईडी) टेक्‍नोलॉजी का इस्‍तेमाल करते हुए अधिसूचित दरों के अनुसार उपयोग शुल्‍क एकत्र किया जा सके.

समय सीमा: मंत्रालय ने डिजीटल भुगतान को प्रोत्‍साहन देने तथा पारदर्शिता बढ़ाने हेतु राष्‍ट्रीय राजमार्गों पर शुल्‍क प्‍लाजा की सभी लेनों को 01 दिसंबर 2019 से ‘फास्‍टैग लेनों’ के रुप में घोषित करने का आदेश दिया है. मंत्रालय ने एक लेन को हाइब्रिड लेन के रूप में रखने का प्रावधान किया है ताकि फास्‍टैग और अन्‍य तरीकों से अदायगी की जा सके.

01 दिसंबर 2019 से फास्टैग के लिए ऑनलाइन भुगतान करना अनिवार्य कर दिया गया है. 01 नवम्‍बर 2019 से कुछ पहचाने गए राष्‍ट्रीय राजमार्ग शुल्‍क प्‍लाजाओं पर ‘फास्‍टैग’ आदेश का ट्रायल शुरू करने का फैसला किया गया तथा यह धीरे-धीरे सभी शुल्‍क प्‍लाजाओं की ओर बढ़ रहा है.

जुर्माना: सरकार के राजपत्र की अधिसूचना के मुताबिक, राष्‍ट्रीय राजमार्ग शुल्‍क प्‍लाजा पर ‘फास्‍टैग’ के बिना अगर कोई भी वाहन ‘फास्‍टैग लेन’ में प्रवेश कर रहा है, तो उसे वाहन की उस श्रेणी हेतु लागू शुल्‍क के दोगुना शुल्‍क का भुगतान करना पड़ेगा.

फास्टैग कैसे खरीदें?

फास्‍टैग को विभिन्‍न बैंकों और आईएचएमसीएल/एनएचएआई द्वारा स्‍थापित 28,500 बिक्री केन्‍द्रों से खरीदा जा सकता है. इनमें राष्‍ट्रीय राजमार्ग के सभी शुल्‍क प्‍लाजा, आरटीओ, साझा सेवा केन्‍द्र, परिवहन केन्‍द्र, बैंक की शाखाएं और कुछ चुने हुए पेट्रोल पम्‍प आदि शामिल हैं.

खुदरा खंड (कार/जीप/वैन) हेतु फास्‍टैग एमेजोन और भिन्न-भिन्न सदस्‍य बैंकों जैसे एसबीआई, आईसीआईसीआई बैंक, एक्सिस बैंक, पैटीएम पेमेंट बैंक, एचडीएफसी बैंक, आईडीएफसी फर्स्ट बैंक आदि की वेबसाइट पर जाकर ऑनलाइन खरीदे जा सकते हैं. फास्‍टैग कुछ प्रमुख निजी बैंक जैसे आईसीआईसीआई बैंक, एक्सिस बैंक, एचडीएफसी बैंक की शाखाओं पर भी उपलब्‍ध हैं.

फास्‍टैग के फायदे

फास्टैग का उपयोग करने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि टोल प्लाजा पर रुकने की कोई आवश्यकता नहीं होगी. भुगतान की सुविधा के कारण किसी को भी नकदी रखने की आवश्यकता नहीं है. यदि फास्टैग का उपयोग किया जाता है, तो टोल प्लाजा पर कागज का उपयोग भी कम होता है. लेन में वाहनों की लंबी लाइने कम होने के कारण से प्रदूषण भी कम होता है. फास्टैग के उपयोग पर कई तरह का कैशबैक और अन्य ऑफर भी मिलता है.

My FASTag App

एनएचएआई के अनुसार, नजदीकी बिक्री केन्‍द्र का पता लगाने हेतु कोई भी My FASTag App डाउनलोड कर सकता है, www.ihmcl.com वेबसाइट पर जा सकता है अथवा राष्‍ट्रीय राजमार्ग हेल्‍पलाइन नम्‍बर 1033 पर फोन कर सकता है.

भारतीय राष्‍ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण/आईएचएमसीएल ने रीचार्ज सुविधा हेतु My FASTag App के जरिए यूपीआई रीचार्ज सुविधा विकसित की है. फास्‍टैग को नेटबैंकिंग, क्रेडिट/डेबिट कार्ड, यूपीआई तथा अदायगी के अन्‍य लोकप्रिय तरीकों के जरिए सम्‍बद्ध बैंक के पोर्टल पर जाकर भी रीचार्ज कराया जा सकता है.

Source : m.jagranjosh

तलाक के मामलों में कैसे होता है धन का बंटवारा?..........अगर कोई महिला अपनी शादी से खुश नहीं है और वह पति से तलाक लेना चा...
29/11/2019

तलाक के मामलों में कैसे होता है धन का बंटवारा?..........

अगर कोई महिला अपनी शादी से खुश नहीं है और वह पति से तलाक लेना चाहती है तो उसे कानूनी लड़ाई लड़नी होगी लेकिन प्रक्रिया पूरी होने तक महिला को गुजारा भत्ता के रूप में क्या मिलेगा और प्रक्रिया पूरी होने के बाद उसके पति की संपत्ति से कितना हिस्सा मिलेगा, यह बड़ा सवाल है। इस आर्टिकल में जानेंगे कि तलाक के मामलों में धन का बंटवारा किस तरह होता है और महिलाओं के वित्तीय अधिकार क्या-क्या हैं।

1.हिन्दू मैरेज ऐक्ट के मुताबिक, जब तक तलाक की प्रक्रिया पूरी नहीं होती है, पति को गुजारा भत्ता देना होगा।��2. तलाक की प्रक्रिया पूरी होने के बाद पति तो एकमुश्त रकम देनी होगी। पत्नी चाहे तो हर महीने, तीन महीने और सालाना भी यह रकम ले सकती है।��3. पत्नी के नाम से जितनी संपत्ति होगी, उसपर उसका एकल अधिकार होता है। जूलरी भी उसी के हिस्से में आएगी। अगर उसे गिफ्ट में कैश मिला होगा, उसपर भी उसी का अधिकार होगा।��4. जॉइंट असेट में उसे बराबर हिस्सेदारी मिलेगी। महिला के पास अधिकार है कि वह अपने हिस्से को बेचना चाहती है या उसके साथ क्या करना है।��5. जब इस मामले में कोर्ट फैसला करता है तो पति की कुल संपत्ति में पत्नी का हक एक तिहाई या पांचवां हिस्सा होता है। अगर पति सैलरी से हर महीने देता है तो यह 25 फीसदी से ज्यादा नहीं होगा।��6. अगर पति की नौकरी चली जाए तो किश्त में देरी स्वीकार्य है। अगर उसकी मौत हो जाती है तो किश्त बंद जाएगी। अगर पत्नी एकमुश्त रकम लेती है तो वह टैक्सेबल नहीं होगा।��7. यदि बच्चा है: अगर दोनों का बच्चा है तो पति और पत्नी, दोनों को अपनी कमाई से बच्चे के लिए अलग से देना पड़ता है।��8. पुरुष का क्या हक है? पत्नी के माता-पिता की तरफ से मिले उपहार पर सिर्फ पति का हक होता है।��9. अगर पुरुष ने पत्नी के नाम पर चल या अचल संपत्ति ली हो, लेकिन उसे गिफ्ट नहीं किया है।��10. महिला अगर कमा रही हो और उसने घर में कुछ भी खर्च किया हो तो वह उसे वापस नहीं मांग सकती है।

Source: https://navbharattimes.indiatimes.com

आजीवन कारावास की सज़ा कितने साल की होती है? जानिए कानून क्या कहता है.... आजीवन कारावास याने उम्रकैद (life imprisonment) क...
22/11/2019

आजीवन कारावास की सज़ा कितने साल की होती है? जानिए कानून क्या कहता है....

आजीवन कारावास याने उम्रकैद (life imprisonment) की सज़ा गंभीर अपराधों के लिए दी जाती है। भारतीय दंड संहिता (IPC) 1860 में अपराधों के दंड के विषय में विस्तार से बताया गया है। भारतीय दंड संहिता की धारा 53 में बताया गया है कि दंड कितने प्रकार के होते हैं।
भारतीय दंड संहिता कुल पांच तरह के दंड का प्रावधान करती है।
1. मृत्यु दंड
2. आजीवन कारावास
3. कारावास : यह कारावास दो प्रकार का है, पहला सश्रम कारावास और दूसरा सादा कारावास (किसी श्रम के बिना‌)
4. संपत्ति का समपहरण
5. जुर्माना

आजीवन कारावास की अवधि :

यह देखा गया है कि आजीवन कारावास की अवधि के संबंध में कुछ भ्रांतियां हैं जैसे कि आजीवन कारावास 14 साल का होता है या 20 साल का? लेकिन यह सब गलतफहमी है, क्योंकि आजीवन कारावास का अर्थ है कि सज़ा पाने वाला व्यक्ति अपने बचे हुए जीवनकाल तक जेल में रहेगा। जब कोई अदालत किसी अपराध के लिए किसी को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाती है तो विधि के समक्ष इस सज़ा की अवधि का अर्थ सज़ा पाने वाले व्यक्ति की अंतिम सांस तक होता है। अर्थात वह व्यक्ति अपने शेष जीवन के लिए जेल में रहेगा। यही आजीवन कारावास का अर्थ है जिसकी व्याख्या सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने फैसलों में की है।

सरकार को सज़ा कम करने का अधिकार :

कई बार यह देखने में आया है कि आजीवन कारावास पाए गए व्यक्ति को 14 साल या 20 साल की सज़ा काटने के बाद रिहा कर दिया जाता है। हालांकि उसे आजीवन कारावास के रूप में अपना पूरा जीवन कारावास में बिताने की सज़ा मिली थी, लेकिन समुचित सरकार निश्चित मापदंडों पर किसी व्यक्ति की सज़ा कम करने की शक्ति रखती है। यही कारण है कि हम सुनते हैं कि आजीवन कारावास की सज़ा काट रहा व्यक्ति 14 साल या 20 साल बाद रिहा हुआ।
भारतीय दंड संहिता की धारा 55 और 57 में सरकारों को दंडादेश में कमी करने का अधिकार दिया गया है।

इस अधिनियम की धारा 55 कहती है, "हर मामले में, जिसमें आजीवन का दंडादेश दिया गया हो, अपराधी की सम्मति के बिना भी समुचित सरकार उस दंड को ऐसी अवधि के लिए, जो चौदह वर्ष से अधिक न हो, दोनों में से किसी भांति के कारावास में लघुकॄत कर सकेगी।"

यहां समुचित सरकार से तात्पर्य ऐसी सरकार से है जिसके अंतर्गत मामला आता है। जैसे केंद्र सरकार या राज्य सरकार। इसी प्रकार भारतीय दंड संहिता की धारा 57 किसी प्रयोजन हेतु आजीवन कारावास की गणना के संबंध में है। धारा 57 कहती है, दंडाविधियों की भिन्नों की गणना करने में, आजीवन कारावास को बीस वर्ष के कारावास के तुल्य गिना जाएगा। इसका अर्थ है कि जब कभी किसी प्रयोजन हेतु आजीवन कारावास की गणना करने की आवश्यकता होगी तो उसे 20 वर्ष के समान माना जाएगा। इसका यह अर्थ बिलकुल नहीं है कि आजीवन कारावास 20 साल का होता है, बल्कि यदि कोई गणना करनी हो तो आजीवन कारावास को 20 साल के बराबर माना जाएगा। गणना करने की आवश्यकता उस स्थिति में होती है जबकि किसी को दोहरी सज़ा हुई हो या किसी को जुर्माना न भरने की स्थिति में अतिरिक्त समय के लिए कारावास में रखा जाता है।

सरकार कर सकती है सज़ा में कमी, यह है प्रावधान :

दंड प्रक्रिया संहिता 1973 (Crpc) की धारा 433 में समुचित सरकार द्वारा दंडादेश के लघुकरण का प्रावधान किया गया है। दंड प्रक्रिया संहिता 1973 (Crpc) की धारा 433 कहती है, "दंडादेश के लघुकरण की शक्ति —समुचित सरकार दंडादिष्ट व्यक्ति की सम्मित के बिना

(क) मृत्युदंडादेश का भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) द्वारा उपबिन्धत किसी अन्य दंड के रूप में लघुकरण कर सकती है।

(ख) आजीवन कारावास के दंडादेश का, चौदह वर्ष से अनिधक अविध के कारावास में या जुमाने के रूप में लघुकरण कर सकती है।

(ग) कठिन कारावास के दंडादेश का किसी ऐसी अवधि के सादा कारावास में जिसके लिए वह व्यक्ति दंडादिष्ट किया जा सकता है, या जुर्माने के रूप में लघुकरण कर सकती है।

(घ) सादा कारावास के दंडादेश का जुर्माने के रूप में लघुकरण कर सकती है। उक्त प्रावधान के तहत सरकार को सज़ा का लघुकरण करने की शक्ति प्राप्त है। अच्छे आचरण के आधार पर आजीवन कारावास की सज़ा पाने वाले कई ऐसे लोगों को कई साल की सज़ा के बाद सरकार उनकी सज़ा का लघुकरण करते हुए उन्हें रिहा करती है।

Source:
http://hindi.livelaw.in

क्या होता है साइबर अपराध ?जिस गति से तकनीक ने उन्नति की है, उसी गति से मनुष्य की इंटरनेट पर निर्भरता भी बढ़ी है। एक ही जग...
21/11/2019

क्या होता है साइबर अपराध ?

जिस गति से तकनीक ने उन्नति की है, उसी गति से मनुष्य की इंटरनेट पर निर्भरता भी बढ़ी है। एक ही जगह पर बैठकर, इंटरनेट के जरिये मनुष्य की पहुँच, विश्व के हर कोने तक आसान हुई है। आज के समय में हर वो चीज़ जिसके विषय में इंसान सोच सकता है, उस तक उसकी पहुँच इंटरनेट के माध्यम से हो सकती है, जैसे कि सोशल नेटवर्किंग, ऑनलाइन शॉपिंग, डेटा स्टोर करना, गेमिंग, ऑनलाइन स्टडी, ऑनलाइन जॉब इत्यादि। आज के समय में इंटरनेट का उपयोग लगभग हर क्षेत्र में किया जाता है। इंटरनेट के विकास और इसके संबंधित लाभों के साथ साइबर अपराधों की अवधारणा भी विकसित हुई है।

साइबर अपराध क्या है?

साइबर अपराध विभिन्न रूपों में किए जाते हैं। कुछ साल पहले, इंटरनेट के माध्यम से होने वाले अपराधों के बारे में जागरूकता का अभाव था। साइबर अपराधों के मामलों में भारत भी उन देशों से पीछे नहीं है, जहां साइबर अपराधों की घटनाओं की दर भी दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। साइबर अपराध के मामलों में एक साइबर क्रिमिनल, किसी उपकरण का उपयोग, उपयोगकर्ता की व्यक्तिगत जानकारी, गोपनीय व्यावसायिक जानकारी, सरकारी जानकारी या किसी डिवाइस को अक्षम करने के लिए कर सकता है।
उपरोक्त सूचनाओं को ऑनलाइन बेचना या खरीदना भी एक साइबर अपराध है। इसमें कोई संशय नहीं है कि साइबर अपराध एक आपराधिक गतिविधि है, जिसे कंप्यूटर और इंटरनेट के उपयोग द्वारा अंजाम दिया जाता है। साइबर अपराध, जिसे 'इलेक्ट्रॉनिक अपराध' के रूप में भी जाना जाता है, एक ऐसा अपराध है जिसमें किसी भी अपराध को करने के लिए, कंप्यूटर, नेटवर्क डिवाइस या नेटवर्क का उपयोग, एक वस्तु या उपकरण के रूप में किया जाता है. जहाँ इनके (कंप्यूटर, नेटवर्क डिवाइस या नेटवर्क) जरिये ऐसे अपराधों को अंजाम दिया जाता है वहीँ इन्हें लक्ष्य बनाते हुए इनके विरुद्ध अपराध भी किया जाता है। ऐसे अपराध में साइबर जबरन वसूली, पहचान की चोरी, क्रेडिट कार्ड धोखाधड़ी, कंप्यूटर से व्यक्तिगत डेटा हैक करना, फ़िशिंग, अवैध डाउनलोडिंग, साइबर स्टॉकिंग, वायरस प्रसार, सहित कई प्रकार की गतिविधियाँ शामिल हैं। गौरतलब है कि सॉफ्टवेयर चोरी भी साइबर अपराध का ही एक रूप है, जिसमें यह जरूरी नहीं है कि साइबर अपराधी, ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से ही अपराध करे।

जैसा कि हमने समझा, साइबर अपराध को दो तरीकों से वर्गीकृत किया जा सकता है:-

1. वे अपराध जिनमें कंप्यूटर पर हमला किया जाता है। इस तरह के अपराधों के उदाहरण हैकिंग, वायरस हमले, डॉस हमले आदि हैं।

2. वे अपराध जिनमे कंप्यूटर को एक हथियार/उपकरण/ के रूप में उपयोग किया जाता है। इस प्रकार के अपराधों में साइबर आतंकवाद, आईपीआर उल्लंघन, क्रेडिट कार्ड धोखाधड़ी, ईएफटी धोखाधड़ी, पोर्नोग्राफी आदि शामिल हैं।

बिना वजह पति को छोड़ने पर पत्नी को गुजरा भत्ता नहीं मिलेगा... (No Maintenance For Wife Who Left Husband Without Reason)बॉ...
07/11/2019

बिना वजह पति को छोड़ने पर पत्नी को गुजरा भत्ता नहीं मिलेगा... (No Maintenance For Wife Who Left Husband Without Reason)

बॉम्बे हाईकोर्ट का मानना ​​है कि जो पत्नी बिना किसी या पर्याप्त कारण के अपने पति को निर्वासित या छोड़ देती है, वह भरण-पोषण की हकदार नहीं है। एक जोड़े के बीच शादी के विवाद से जुड़े एक मामले में अदालत का अवलोकन आया

अप्रैल 2003 में ये केस अदालत में आया । इस केस में पति का प्रतिनिधित्व करने वाले अधिवक्ता व् वकील, के अनुसार, महिला ने शादी के डेढ़ साल बाद अपने पति को बिना किसी वजह के थोड़े समय के लिए छोड़ दिया था। उसने पति द्वारा घर लौटने का आग्रह करने वाले कानूनी नोटिसों का जवाब भी नहीं दिया। पत्नी की तरफ से कोई प्रतिक्रिया न पाने के बाद, उन्होंने एक पारिवारिक अदालत में एक याचिका दायर की जिसमें वैवाहिक अधिकारों को बहाल करने की मांग की गई। हालांकि, उसके बाद पत्नी ने तब एक याचिका दायर की जिसमें रखरखाव की मांग की गई थी।

फॅमिली कोर्ट में अदालत ने जुलाई 2006 में पत्नी द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए पति द्वारा दायर याचिका की अनुमति दी थी। उसने फिर वैवाहिक अधिकारों के खिलाफ अपील की, कोर्ट द्वारा उसे भी खारिज कर दिया गया।

जब पत्नी ने फिर भी घर लौटने से इनकार कर दिया, तो पति ने क्रूरता के आधार पर तलाक के लिए एक और याचिका दायर की। 16 मार्च 2009 को, फॅमिली कोर्ट ने तलाक के लिए पति के बुलावे के पक्ष में फैसला सुनाया। इसके बाद, पत्नी ने रखरखाव व् गुजरे भत्ते के लिए एक नई याचिका दायर की।

अपने बचाव में पत्नी ने आग्रह किया कि चूंकि तलाक पहले ही मंजूर हो चुका था, इसलिए वह अब भरण-पोषण की हकदार थी। पत्नी के वकील ने तर्क दिया कि वह पहले अपने पति से बिना किसी कारण के अलग रहने के फैसले के कारण रखरखाव का हकदार नहीं थी, लेकिन अब चूंकि वे कानूनी रूप से तलाकशुदा थे, इसलिए पति कानूनी रूप से रखरखाव के लिए भुगतान करने के लिए उत्तरदायी था। पति को अब तलाक के बाद पत्नी को गुजरबट्टा देना चाहिए |

हालाँकि, बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ के न्यायमूर्ति अभय थिप्से ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी: की “हालांकि यह तर्क सही तो है, पर वास्तव में इसमें कोई योग्यता नहीं है।” या पत्नी ने पति को छोड़ने का वैध कारण नहीं बताया। इसलिए जब यह स्थिति होती है, तो सिर्फ इसलिए कि शादी को तोड़ दिया गया है, पत्नी अपने आप रखरखाव की हकदार नहीं हो जाती है ”

Ref: https://legalhelpdesk.co.in

Maintenance For Wife Who Left Husband Without Reason - , हमारा कानून क्या कहता है जब पत्नी अपने पति को बिना कारण के छोड़ देती है |

07/11/2019

पति के खिलाफ झूठी शिकायत भी मानसिक क्रूरता है – False Complaints Filed by Wife is Mental Cruelty IPC 498A False Case:-

तलाक केस झूठी शिकायत दर्ज करके किसी परिवार को तंग करना होता है केरला हाईकोर्ट ने हाल ही में फैसला सुनाया की झूठी शिकायत दर्ज करके किसी परिवार को तंग करना भी मानसिक क्रूरता ही माना जाएगा इस केस में

पति ने तलाक की अर्जी दायर की थी और कोर्ट ने यह पाया कि पत्नी ने झूठी शिकायत दर्ज करवाकर पति और उसके परिवार वालों को लंबे समय तक परेशान किया था इसलिए कोर्ट ने पति की तलाक की अर्जी मंजूर कर ली हाईकोर्ट ने यह पाया कि पत्नी ने मजिस्ट्रेट कोर्ट में यह शिकायत की थी कि उसके साथ ससुर ने उसकी ज्वेलरी जबरदस्ती छीन ली थी और उसके बाकी के जेवर भी चुरा लिए थे उसके बाद वह लगातार दहेज की मांग रहे थे लेकिन पत्नी के इस शिकायत को इस आधार पर खारिज कर दिया था कि शिकायत झूठी थी और फैमिली कोर्ट ने यह भी कहा था कि तलाक के मामले में पत्नी के पास कोई आधार नहीं था जिसकी वजह से तलाक को नामंजूर कर दिया था हाईकोर्ट में न्यायमूर्ति एएम शॉपिंग और न्यायमूर्ति अनिल कुमार की पीठ ने जांच की और कहा कि रेस्पोंडेंट पत्नी याचिकाकर्ता पति के मां-बाप को परेशान कर रही थी और उनके खिलाफ झूठी शिकायतें भी दर्ज करा रही थी कोर्ट ने पाया कि पूरा मामला सास-ससुर को परेशान करने के लिए रचा गया था

07/11/2019

आपसी सहमति से तलाक...

म्युचुअल कंसेंट द्वारा तलाक (Mutual Consent Divorce) हाल के दिनों में तलाक प्राप्त करने का सबसे अधिक मांग वाले तरीकों में से एक है। हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 बी में आपसी सहमति से तलाक से संबंधित कानून को लागू किया गया है। पारस्परिक सहमति (म्युचुअल कंसेंट) के माध्यम से तलाक प्राप्त करने के लिए यह जरुरी है कि दोनों पक्ष यानी पति और पत्नी पारस्परिक रूप से तलाक प्राप्त करने के लिए सहमत हों।

अधिनियम की धारा 13B की आवश्यक तत्व : – (Judgments on Mutual Consent Divorce)

जिला न्यायालय के समक्ष दोनों पक्षों द्वारा तलाक की याचिका प्रस्तुत की जाती है।
यह प्रावधान विवाह कानून (संशोधन) अधिनियम, 1976 के प्रारंभ होने से पहले या बाद में होने वाले विवाह पर लागू होता है।
विवाह के पक्षकारों को एक वर्ष या उससे अधिक की अवधि के लिए अलग-अलग रहना चाहिए ।
पार्टियों को कोर्ट को संतुष्ट करना चाहिए कि वे एक साथ नहीं रह पाएंगे और वे परस्पर सहमत हैं कि शादी को तोड़ देना चाहिए।

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