20/07/2023
शबरी की राम भक्ति।।
एक बार की बात है।।शबरी जल लेने के लिए तालाब पर गई। जहां एक ऋषि पहले से ही तपस्या कर रहे थे।
ऋषि शबरी को देखते ही उसे अछूत कहते हैं ।।और उस पर एक पत्थर फेंक कर मारते हैं।।पत्थर के लगने से शबरी घायल हो गई ।।और उनके शरीर से रक्त बहने लगा। उनके शरीर से बहती रक्त की एक बूंद, तालाब में गिर जाती है।
जिससे पूरे तालाब का जल रक्त में परिवर्तित हो गया । इसके बाद,, तालाब के अपवित्र होने का सारा दोष।।शबरी
पर लगाते हुए ऋषि मुनि, उसे भला-बुरा कहते हैं। उस वक्त शबरी वहां से चली गई, और ऋषि फिर से अपनी तपस्या करने लगे ।लेकिन उनके कई प्रयास करने के बाद भी,, तालाब के रक्त को पुनः जल में परिवर्तित करने में
सफल नहीं हुए। यहां तक कि उन्होंने सभी बड़ी नदी जैसे गंगा, यमुना का पानी भी, उस तालाब में मिलाया।
लेकिन सभी प्रयास विफल रहे।भगवान श्रीराम सीता का हरण हो जाने के पश्चात,, उन्हें खोजते हुए उस गांव में
पहुंचे।।तो वहां के लोगों ने उनसे आग्रह किया कि हे प्रभु! आप अपने चरणों से इस तालाब को स्पर्श कर दें ।ताकि
इसका रक्त पुनः जल में परिवर्तित हो जाएं।। लेकिन श्रीराम के स्पर्श करने से भी ,,वह रक्त जल में परिवर्तित नहीं हो
सका। और ऋषि मुनि ने भी श्री राम से ,,कई तरह के उपाय करवाएं ।। लेकिन इस सब का कुछ असर नहीं हुआ।
अंततः श्रीराम को, जब इस तालाब के इतिहास के बारे में पता चला।।तो उनका हृदय बहुत दुःखी हुआ। और
उन्होंने कहा कि ऋषिवर तालाब शबरी के कारण नहीं,, अपितु आपके कठोर शब्दों के कारण,, रक्त में परिवर्तित हुआ है ।क्योंकि यह तालाब नहीं मेरा हृदय है। यह कहते
हुए श्री राम प्रभु ,, शबरी से मिलने की इच्छा व्यक्त की। जब शबरी को बुलाया गया, तो वह राम का नाम सुनते ही,, हे प्रभु! मेरे प्रभु, कहते हुए दौड़ी चली आई। जब वह दौड़ रही थी ,,तो उनके चरणों की धूल तालाब में जा गिरी। जिससे तालाब पुनः जल में परिवर्तित हो गया l। इस पर श्री राम
मुनिवर को समझाते हैं कि, हे मुनिवर!!! मैंने तो आपके कहे अनुसार ,,सभी प्रयास किए। लेकिन यह रक्त मेरी भक्त शबरी के पांव की धूल से ही ,,पुनः जल में परिवर्तित हो सका है।
क्योकि शबरी ने निष्काम भाव से ,मेरी भक्ति की है।उसके मन मे जरा सा भी ,अहंकार नही है।जबकि आपके मन मे जप तप का, अभिमान है।यही कारण है कि ,इस तालाब का पानी ,,उसकी चरण धूल मात्र से पुनः जल
में पवित्र हो गया।और वही आपके कई बार ,,जप तप और गंगा,यमुना जैसी पवित्र नदियों का पानी मिला
देने के बाद भी, नही हुआ।भगवान श्री राम प्रभु के मुख से भक्ति की,, सच्ची बाते सुनकर ,,उन तपस्वी को
अपनी भूल का अहसास हुआ ।और उन्होंने प्रभु राम और माता शबरी से क्षमा याचना की।