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  वकीलों के लिए बीमा जरूरी: इलाहाबाद हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला! ⚖️🏥​इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के अधिवक्ताओं के ...
08/04/2026


वकीलों के लिए बीमा जरूरी: इलाहाबाद हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला! ⚖️🏥
​इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के अधिवक्ताओं के कल्याण की दिशा में एक बहुत ही सराहनीय और बड़ा कदम उठाया है। माननीय न्यायालय ने स्वतः संज्ञान (Suo Motu PIL) लेते हुए पूरे प्रदेश में प्रैक्टिस करने वाले वकीलों के लिए एक 'व्यापक चिकित्सा और स्वास्थ्य बीमा योजना' (Comprehensive Medical Insurance) बनाने का निर्देश दिया है।
​न्यायालय ने स्पष्ट किया कि गंभीर बीमारियों के दौरान वकीलों को होने वाली आर्थिक तंगी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
​मुख्य बिंदु:
✅ माननीय न्यायमूर्ति: न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ द्वारा आदेश पारित।
✅ न्याय मित्र (Amicus Curiae): वरिष्ठ अधिवक्ता श्री राघवेंद्र सिंह (पूर्व महाधिवक्ता, यूपी) को योजना की रूपरेखा तैयार करने में सहयोग के लिए नियुक्त किया गया।
✅ उद्देश्य: वकीलों को गंभीर बीमारियों में आर्थिक सुरक्षा और बेहतर इलाज की सुविधा प्रदान करना।
​"न्याय के प्रहरियों की सुरक्षा, अब कोर्ट की प्राथमिकता।
जय हिंद! जय भारत! 🇮🇳
By: Adv Pawan Kumar Rana
Muzaffarnagar UP
8899167288

आजकल एक नया “कानूनी ज्ञान” बड़े आत्मविश्वास के साथ बांटा जाता है— “ #जमीन का मामला है,  #सिविल_नेचर का है… पुलिस कुछ नही...
06/04/2026

आजकल एक नया “कानूनी ज्ञान” बड़े आत्मविश्वास के साथ बांटा जाता है— “ #जमीन का मामला है, #सिविल_नेचर का है… पुलिस कुछ नहीं कर सकती।”
सुनने में बड़ा सुकून देता है, खासकर उन लोगों को जिन्होंने
फर्जी दस्तावेज बनाए,
फर्जी क्रेता-विक्रेता खड़े किए,
या गलत अनुमति लेकर आराम से रजिस्ट्री करवा ली।
अब जरा सीधी बात समझ लीजिए।
#जमीन का हर मामला #सिविल नहीं होता।
जहां सिर्फ कब्जे या बंटवारे का विवाद है, वहां सिविल कोर्ट ठीक है।
लेकिन जहां #जालसाजी, #धोखाधड़ी और #फर्जीवाड़ा घुस गया, वहां मामला सीधे-सीधे अपराध बन जाता है।
फर्जी रजिस्ट्री करवाना कोई “कागजी गलती” नहीं है, यह BNS की गंभीर धाराओं का मामला है। और ऐसे मामलों में FIR दर्ज होगी ही—यह कोई मेहरबानी नहीं, कानून की मजबूरी है।
Lalita Kumari vs State of Uttar Pradesh ने साफ कर दिया है कि संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर FIR दर्ज करना पुलिस का कर्तव्य है, विकल्प नहीं।
और जो लोग हर केस में “सिविल-सिविल” का जाप करते हैं, उनके लिए #सुप्रीम_कोर्ट पहले ही कह चुका है:
Mohd. Ibrahim vs State of Bihar में कहा गया कि यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर #फर्जी_दस्तावेज बनाकर संपत्ति का सौदा करता है, तो यह आपराधिक कृत्य है।
Indian Oil Corporation vs NEPC India Ltd में सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि केवल इसलिए कि सिविल remedy उपलब्ध है, आपराधिक कार्यवाही को रोका नहीं जा सकता, अगर अपराध के तत्व मौजूद हैं।
Devendra vs State of Uttar Pradesh में भी कोर्ट ने कहा कि धोखाधड़ी और फर्जीवाड़े के मामलों को सिर्फ सिविल विवाद कहकर खत्म नहीं किया जा सकता।
तो अगली बार जब कोई बहुत ज्ञान के साथ कहे—
“ #ये_तो_सिविल_मामला_है…”
तो बस मुस्कुराइए और पूछिए—
“ #फर्जीवाड़ा_भी_सिविल_में_ही_आता_है_क्या?”
ऐसी स्थिति में FIR दर्ज होना सिर्फ एक विकल्प नहीं, बल्कि कानूनी अनिवार्यता है।
Lalita Kumari vs State of Uttar Pradesh में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि यदि संज्ञेय अपराध की सूचना मिलती है, तो पुलिस FIR दर्ज करने से मना नहीं कर सकती।
इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने कई बार यह भी स्पष्ट किया है कि केवल यह कहकर कि मामला “सिविल नेचर” का है, आपराधिक कार्रवाई से बचा नहीं जा सकता।
और अगर ऐसे मामलों में पुलिस प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने से बचाती है तो यदि रिपोर्ट में संज्ञेय अपराध बन गया तो
Lalita Kumari vs State of Uttar Pradesh के पर नंबर 111(iv) के अंतर्गत कहां गया है की संज्ञेय अपराध पर अगर प्रथम सूचना रिपोर्ट पंजीकृत नहीं होती है तो तो थाना प्रभारी के खिलाफ #डिसीप्लिनरी_एक्शन की कार्रवाई होगी.

सनसनीखेज: जज पर ही लगा साथी जज के घर चोरी का आरोप!मुख्य विवरण (Key Details) - बुलेट पॉइंट्स में:आरोपी जज पर साथी महिला ज...
06/04/2026

सनसनीखेज: जज पर ही लगा साथी जज के घर चोरी का आरोप!
मुख्य विवरण (Key Details) - बुलेट पॉइंट्स में:
आरोपी जज पर साथी महिला जज के घर से गहने चुराने का है आरोप.
बस्ती (UP) जिला अदालत ने आरोपी जज की अग्रिम जमानत याचिका को किया 'खारिज'.
'कानून सबके लिए बराबर', कोर्ट ने हिरासत में पूछताछ को बताया जरूरी.

एक भी थाना, तहसील, जिला और सरकारी विभाग भ्रष्टाचार मुक्त नहीं है।भ्रष्टाचारियों का नार्को पॉलीग्राफ ब्रेनमैपिंग टेस्ट कर...
11/03/2026

एक भी थाना, तहसील, जिला और सरकारी विभाग भ्रष्टाचार मुक्त नहीं है।
भ्रष्टाचारियों का नार्को पॉलीग्राफ ब्रेनमैपिंग टेस्ट करने, 100% संपत्ति जब्त करने, नागरिकता समाप्त करने और 01 वर्ष में फांसी देने के लिए कानून कब बनेगा?
👉 आइए, भ्रष्टाचार-मुक्त भारत के लिए एक साथ खड़े हों।

(Article 20 of the Constitution of India
05/03/2026

(Article 20 of the Constitution of India

02/03/2026
15/02/2026

जब भी किसी #सड़क_दुर्घटना में दुर्भाग्यवश मृत्यु होती है, तो FIR दर्ज होते ही चालक की गिरफ्तारी और उसके बाद शीघ्र जमानत मिल जाने पर सोशल मीडिया पर अक्सर न्यायपालिका और सिस्टम पर आरोप लगाने लगते हैं। परंतु वास्तविकता को कानून की दृष्टि से समझना आवश्यक है।

सबसे पहले यह समझना चाहिए कि FIR में दर्ज धाराएं ही आगे की प्रक्रिया की दिशा काफी हद तक तय कर देती हैं। अधिकांश सड़क दुर्घटना मृत्यु मामलों में FIR सामान्यत: लापरवाही आधारित धाराओं में दर्ज होती है, जैसे:

IPC 279 (लापरवाही से वाहन चलाना) / BNS धारा 281
IPC 304A (लापरवाही से मृत्यु कारित करना) / BNS धारा 106(1)
IPC 337 / 338 (चोट / गंभीर चोट) / BNS धारा 125(a), 125(b)

इन अपराधों में #हत्या_का_इरादा_नहीं माना जाता। 304A एक Negligence आधारित अपराध है, जिसमें Mens Rea अर्थात दोषपूर्ण आपराधिक मानसिकता का तत्व नहीं होता। व्यवहार में ये #जमानत_के_अनुकूल श्रेणी में आते हैं, इसलिए न्यायालय का दृष्टिकोण उतना कठोर नहीं होता जैसा हत्या या Culpable Homicide जैसे मामलों में होता है।

इन धाराओं में जमानत जल्दी होने के मुख्य कारण हैं:
• अधिकतम सजा अपेक्षाकृत कम होना (304A में अधिकतम 2 वर्ष तक)
• लंबी न्यायिक हिरासत का औचित्य कम माना जाना
• जांच में हिरासत की सीमित आवश्यकता (मौके से साक्ष्य उपलब्ध)
• आरोपी के भागने या साक्ष्य से छेड़छाड़ का जोखिम कम होना (यदि वह स्थानीय और सहयोगी हो)

इसके साथ ही आपराधिक न्यायशास्त्र का एक मूल सिद्धांत है:
“Bail is the rule, jail is the exception”
विशेषकर तब जब अपराध गैर-इरादतन हो और जांच में निरंतर हिरासत आवश्यक न हो।

लेकिन स्थिति पूरी तरह बदल जाती है यदि FIR में यह आरोप दर्ज हो कि "अभियुक्त ने जान से मारने के उद्देश्य से जानबूझकर वाहन से टक्कर मारी और पूर्व में भी ऐसा प्रयास किया था" .ऐसी दशा में मामला लापरवाही का नहीं रह जाता और हत्या (302), Culpable Homicide (304) या BNS के समकक्ष गंभीर प्रावधान लागू हो सकते हैं। यहां Mens Rea स्पष्ट रूप से आरोपित होती है और जमानत का दृष्टिकोण कठोर हो जाता है। प्रारंभिक स्तर पर तत्काल जमानत मिलना अत्यंत कठिन माना जाता है।

व्यवहारिक स्तर पर समझें:
• थाने स्तर पर जमानत लगभग #असंभव
• मजिस्ट्रेट स्तर पर सामान्यत: #अस्वीकृत
• सेशन कोर्ट तथ्यों पर निर्भर
• उच्च न्यायालय में ही मजबूत आधार पर संभावना बनती है

इस पूरी चर्चा का सार यही है कि सड़क दुर्घटना मामलों में तुरंत जमानत का मूल कारण प्रायः FIR में आरोपों की प्रकृति होती है, न कि न्यायपालिका या सिस्टम की कोई कथित कमजोरी। आरोप लगाना आसान है, परंतु न्यायालय के समक्ष तथ्यों और कानून की कसौटी पर ही सब कुछ परखा जाता है।

— पवन कुमार राणा अधिवक्ता जिला एवं सत्र न्यायालय मुजफ्फरनगर

नोट - यह विवरण हमारे लीगल ब्लॉग का ब्रीफ है लीगल ब्लॉग में रोड एक्सीडेंट से संबंधित केस लॉ व ट्रायल से संबंधित जानकारियां दी गई हैं.

23/12/2020

*मोटर वाहन दुर्घटना दावा दाखिल करने के लिए कोई समय सीमा नहीं, 6 महीने की सीमा तय करने वाला संशोधन अधिसूचित नहीं : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया।*✍

मोटर वाहन दुर्घटना दावा दाखिल करने के लिए कोई समय सीमा नहीं, 6 महीने की सीमा तय करने वाला संशोधन अधिसूचित नहीं : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया
"2019 अधिनियम की धारा 166 के प्रावधानों के कई निहितार्थ हैं जिन्हें ध्वजांकित किया जा सकता है, अर्थात्, समय सीमा, जो वहां नहीं थी, को पेश किया गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि केंद्र सरकार ने एक उद्देश्य के साथ इसे लाने की तारीख तय नहीं की है। संशोधित धारा 52 से 57 के प्रावधानों को लाया गया जो अध्याय X, XI & XII में पूर्ण परिवर्तन से संबंधित है और इसलिए, ये स्पष्ट है कि संशोधित अधिनियम को क़ानून की किताब में नहीं लाया गया है।"

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को स्पष्ट किया कि मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 166 (मुआवजे के लिए आवेदन) में प्रस्तावित संशोधनों को अभी अधिसूचित नहीं किया गया है। इस प्रकार, मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण के समक्ष दावा याचिका दायर करने के लिए छह महीने की प्रस्तावित सीमा अवधि अभी तक लागू नहीं हुई है।

न्यायमूर्ति डॉ कौशल जयेंद्र ठाकेर की पीठ ने कहा है,

"मैंने श्री ओझा, स्टेट लॉ ऑफिसर से पूछताछ की है और स्थिति यह है कि 166 (3) को क़ानून की किताब पर नहीं लाया गया है। स्थिति यह है कि 1998 का ​​166 का अधिनियम आज भी मुकदमेबाजी का संचालन करेगा।"

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि मोटर वाहन (संशोधन) अधिनियम, 2019 की धारा 53 जो कि अधिनियम की धारा 166 में संशोधन करने और दावा याचिका दायर करने के लिए छह महीने की सीमा अवधि पेश करने का प्रस्ताव करती है, को 9 अगस्त 2019 (तारीख जब संशोधन अधिनियम के प्रमुख प्रावधानों को अधिसूचित किया गया था) को केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित नहीं किया गया था।

पीठ ने यह कहा,

"यह स्पष्ट रूप से प्रतीत होता है कि संशोधन अधिनियम के धारा 50 से 57 को अभी तक अधिसूचित किया जाना है ...अधिनियम की धारा 166 के तहत, कानूनी प्रतिनिधि मूल अधिनियम की धारा 140, 163-ए के रूप में मुआवजे के लिए यहां उल्लेखित किसी भी आवेदन को प्राथमिकता देना जारी रख सकते हैं जब तक कि मूल अधिनियम के 166 के आधिकारिक संशोधन में अधिसूचित अधिनियम की धारा 51 से 57 सरकारी गजट में प्रकाशित ना की जाएं।"

न्यायालय मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण के आदेश के खिलाफ एक अपील पर सुनवाई कर रहा था जिसने याचिकाकर्ता के दावे की याचिका को समय अवधि के अनुसार खारिज कर दिया था।

मामले के तथ्यों के अनुसार, याचिकाकर्ताओं ने 24.12.2019 को एक दुर्घटना में अपने बेटे की मौत के लिए मुआवजे की मांग की। दावा याचिका 20.8.2020 को दायर की गई थी, और ट्रिब्यूनल द्वारा छह महीने से परे दायर करने के लिए इसे खारिज कर दिया गया था।

ट्रिब्यूनल के आदेश को रद्द करते हुए, उच्च न्यायालय ने कहा,

"यह याद किया जाना चाहिए कि 14 नवंबर, 1994 से मूल अधिनियम की धारा 166 (3) में, जिसमें देरी के संबंध में प्रावधान किया गया था, को छोड़ दिया गया है। अब से, कोई प्रावधान नहीं है जिसमें देरी माफ करने के लिए प्रार्थना की जाए, यदि दुर्घटना की तारीख से छह महीने की अवधि से परे मुआवजे के लिए आवेदन दायर किया जाता है (धारा 166 की उप-धारा 3, जैसा कि संशोधन अधिनियम के माध्यम से किया जाना प्रस्तावित है),संशोधन अधिनियम की धारा 53 को अधिसूचित किए जाने तक, दावेदार /ओं को देरी की माफी के लिए आवेदन दाखिल करने की आवश्यकता नहीं है। "

इसने पीठासीन अधिकारी को लाभकारी कानून- मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के तहत आदेश पारित करते हुए "अधिक सतर्क" रहने के लिए आगाह किया।

साथ ही, कोर्ट ने पाया कि ट्रिब्यूनल ने सुप्रीम कोर्ट के इन री : कॉग्निजेंस फॉर एक्सटेंशन ऑफ लिमिटेशन के सर्वव्यापी आदेश का लाभ दिया है, जिसके तहत सीमा की अवधि, चाहे वह उचित हो या नहीं, लॉकडाउन के कारण बढ़ा दी गई थी।

अपीलार्थी ने दावा किया था कि मार्च 2020 में महामारी और एक सर्वव्यापी आदेश द्वारा शीर्ष न्यायालय ने सीमा अवधि बढ़ा दी थी। इस पहलू को ट्रिब्यूनल द्वारा भी देखा जाना चाहिए था।

इस सबमिशन को लेकर हाईकोर्ट ने कहा,

"इसका विकल्प ट्रिब्यूनल के पास भी उपलब्ध था, लेकिन मामले के निपटान की जल्दबाजी में, उसने सीमा की अवधि को बढ़ाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के सर्वव्यापी आदेश की दृष्टि खो दी। दूसरा पहलू यह था कि परिवार युवा बेटे की मौत से शोक संतप्त था और अपीलकर्ताओं में से एक की मां का कोविड के कारण निधन हो गया। इन सभी पहलुओं पर न्यायाधीश द्वारा ध्यान नहीं दिया गया।"

तदनुसार, दिए गए आदेश को रद्द किया गया था और मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 168 को पढ़ते हुए धारा 166 के अनुसार आगे बढ़ने के निर्देश के साथ ट्रिब्यूनल में दाखिल करने के लिए दावा याचिका बहाल की गई थी क्योंकि अधिनियम के अध्याय X, XI XII के साथ संशोधित अनुभाग के अनुसार प्रावधान को क़ानून पुस्तिका पर नहीं लाया गया है।

उच्च न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला,

"2019 अधिनियम की धारा 166 के प्रावधानों के कई निहितार्थ हैं जिन्हें ध्वजांकित किया जा सकता है, अर्थात्, समय सीमा, जो वहां नहीं थी, को पेश किया गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि केंद्र सरकार ने एक उद्देश्य के साथ इसे लाने की तारीख तय नहीं की है। संशोधित धारा 52 से 57 के प्रावधानों को लाया गया जो अध्याय X, XI और XII में पूर्ण परिवर्तन से संबंधित है और इसलिए, संशोधित अधिनियम को क़ानून की किताब पर नहीं लाया गया है। यह स्पष्ट है कि नए शासन की योजना उन्हें तब दिखाएगी जब तक अध्याय X, XI & XII के पहले के प्रावधानों में संशोधन या निरस्त करके क़ानून की किताब में नहीं लाया गया है।"

केस का शीर्षक: शैलेंद्र त्रिपाठी और अन्य बनाम धर्मेंद्र यादव और अन्य।

क्या थी पहली एफआईआर?---------------------------------1858 में दिल्ली पर पूरी तरह कब्जे के बाद अंग्रेजों को कानून लागुकरन...
29/08/2020

क्या थी पहली एफआईआर?
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1858 में दिल्ली पर पूरी तरह कब्जे के बाद अंग्रेजों को कानून लागुकरने में तकरीबन तीन साल लग गए।

1860 में यह कानून बना और नाम दिया गया ताज-ए-रात-ए हिंद यानी इंडियन पीनल कोड(आईपीसी)

अंग्रेजों ने आईपीसी बनाने के साथ ही दिल्ली में पांच थाने बनाये।

कोतवाली, सदर बाजार, सब्जीमंडी, महरौल और मुंडका इस सिस्टम के तहत पहली एफआईआर 18 अक्टूबर 1861 में सब्जीमंडी थाने में दर्ज हुई।

जो कि कटरा शीशमहल निवासी मयुद्दीन पुत्र मुहम्मद यार खान ने दर्ज कराई।

जिसके मुताबिक 17 अक्टूबर को इनके घर से तीन डेगचे, तीन डेगची, एक कटोरा, एक हुक्का और औरतों के 45 आने कीमत के कपडे चोरी हो गये थे।

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सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला, सेवानिवृत्त कर्मचारी की गरिमा कायम रखने के लिए पेंशन जरूरी**********************************...
29/08/2020

सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला, सेवानिवृत्त कर्मचारी की गरिमा कायम रखने के लिए पेंशन जरूरी

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सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा, सेवानिवृत्त कर्मचारी की गरिमा कायम रखने के लिए पेंशन बहुत जरूरी है। यह इच्छा के आधार पर दी गई कोई राशि नहीं है बल्कि सामाजिक कल्याण का कदम है और संकट की घड़ी में जरूरी मदद है। इसलिए इसे देने से मना नहीं किया जा सकता।

जस्टिस एसके कौल, जस्टिस अजय रस्तोगी और जस्टिस अनिरुद्ध बोस की पीठ ने केरल सरकार से सेवानिवृत्त एक पूर्व कर्मचारी को राहत देते हुए राज्य सरकार को उसे अस्थायी कर्मचारी के तौर पर देखते हुए उसके 32 वर्ष के कार्यकाल के आधार पर पेंशन लाभ देने का आदेश दिया।
पीठ ने कहा, पेंशन मदद के लिए दी जाने वाली राशि है। इसे इच्छानुसार तय नहीं कर सकते। कर्मचारी सेवानिवृत्त होने के बाद पेंशन की मदद से ही गरिमापूर्ण जीवन जीता है। इसे देने से इनकार नहीं किया जा सकता।
याचिकाकर्ता 13 साल से अपनी पेंशन के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहा था। वह अलग अलग सरकारी विभागों में 32 वर्ष सेवा दे चुका है। पीठ ने केरल सरकार को अगले आठ हफ्तों के अंदर याचिकाकर्ता को पेंशन का 13 साल का एरियर ब्याज समेत देने का आदेश दिया।

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