Yog Amrit

Yog Amrit सहज योग, आसन, ध्यान और प्राणायाम

वृक्षासन - Tree Poseवृक्षासन - यह नाम संस्कृत के शब्द वृक्ष से लिया गया है जिसका अर्थ है "वृक्ष", "पेड़" और आसन जिसका अर्...
20/07/2021

वृक्षासन - Tree Pose
वृक्षासन - यह नाम संस्कृत के शब्द वृक्ष से लिया गया है जिसका अर्थ है "वृक्ष", "पेड़" और आसन जिसका अर्थ है "मुद्रा"। वृक्षासन मध्यवर्ती स्तर योग मुद्रा है। वृक्षासन को अंग्रेजी मे ‘Tree Pose’ के नाम से भी जाना जाता है। ऐसा इसलिए क्‍योंकि इस योग को करने पर आपके शरीर की आकृति एकदम पेड़ की तरह दिखाई देती है। एक पेड़ की तरह लंबाई और मजबूती में खड़े होने वाली यह मुद्रा ढीली मांसपेशियों को मजबूत करने और उन्हें आकार में लाने में मदद कर सकती है। आपको बस इतना करना है कि इसे एक अच्छे खिंचाव के साथ जितनी देर हो सके इस मुद्रा में रहें। वृक्षासन योगासन को खली पेट करना चाहिए, कम से कम 4-5 घंटे का अंतर होना चाहिए । सुबह के समय वृक्षासन करने के लिए आदर्श है।


वृक्षासन योग करने की विधि
1. इस योगासन को करने के लिए सबसे पहले जमीन पर सीधी खड़ी हो जाएं।
2. फिर दाहिने पैर को मोड़ें और अपने बाएं पैर के अंदरूनी जांघ पर रखें, ध्‍यान रखें कि आपकी अंगुलियां नीचे की ओर होनी चाहिए।
3. साथ ही दाहिना पैर बाएं पैर की सीध में होना चाहिए।
4. बाएं पैर को सीधा रखते हुए संतुलन (बैलेंस) बनाए रखें।
5. अच्छा संतुलन बनाने के बाद गहरी सांस अंदर लें।
6. फिर धीरे-धीरे अपनी हाथों को नमस्कार की मुद्रा में ऊपर की ओर लेकर जाएं।
7. रीढ़ की हड्डी और शरीर को तना हुआ रखें। कुछ देर इस अवस्था (पोजिशन) में रहें।
8. धीरे-धीरे सामान्य अवस्था (नॉर्मल पोजिशन) में आ जाएंगे।
9. इसी तरह इस आसन को दूसरी पैर से भी इस को दोहराएंगे ।
10. इस अवस्था मे रहते हुए 30-30 सेकंड की गहरी सांस लें और धीरे-धीरे छोड़ें।
11. दोनों पैरों से इस योगासन के 3-3 आवर्तन (सेट) करेंगे।
वृक्षासन करने के लाभ -
1. रोजाना इस आसन को करने से शरीर के वजन को कम किया जा सकता है। यह शरीर की चर्बी को कम करने में मदद करता है।
2. अगर छोटे बच्‍चे इस आसन को रोजाना करते हैं, तो उनकी हाइट तेजी से बढ़ती है।
3. घुटने के दर्द से हमेशा के लिए छुटकारा पाने के लिए इस आसन को रोजाना करें।
4. एड़ियों का दर्द कम होता है और उसमें लचीलपन बढ़ता है।
5. पैरों के मसल्‍स में मजबूती आती है।
6. इस करने से तनाव और चिंता को कम किया जा सकता है, और डिप्रेशन दूर होता है।
7. इसे करने से शरीर में संतुलन बढ़ता है।
8. यह रीढ़ की हड्डी को मजबूत और हेल्‍दी बनाने में मदद करता है।
9. वृक्षासन करने से मस्तिस्क (ब्रेन) की सजगता बढ़ती है और काम मे ध्‍यान लगता है।
10. स्टैमिना बढ़ाने के साथ-साथ ये योगासन आपको बैलेंस बनाने, शारीरिक रूप से स्वस्थ रहने, तनाव और चिंता को दूर करने में भी मददगार है।
महत्‍वपूर्ण बात -
भुजाओं को ऊपर उठाते समय श्‍वास लें, तनी हुई अवस्‍था में श्‍वास रोकें या सामान्‍य रूप से सांस लें। इसके बाद पूर्व की मुद्रा में आते समय श्‍वास छोड़ें।
वृक्षासन के संबंध मे सावधानीया - इस योग मुद्रा के कुछ महत्वपूर्ण सावधानी और दुष्प्रभाव नीचे दिए जा रहे हैं। इन मामले में इसका अभ्यास नहीं किया जाना चाहिए ।
1. अगर उच्च रक्त और कम रक्त चाप है तो इस आसन को ना करे।
2. माइग्रेन और नींद की समस्या से पीड़त है इसका अभ्यास नही करे।
3. घुटने की समस्या, कूल्हे की चोट यह सर्जरी हो तो डॉक्टर की सलाह ले।

किसी प्रकार की कठिनाई के समय आसान में बदलाव कर सकते है –
1. यदि एक पैर पर संतुलन चुनौतीपूर्ण लगता है, तो इस आसन का अभ्यास करते समय किसी दीवार के साथ पीढ़ लग कर सकते हैं।
2. यदि पैर को जांघ के हिस्से में नहीं रख सकते हैं, तो इसे घुटने के नीचे भी रख सकते हैं।

ग्रीवासन - Cervical Poseग्रीवासन - ग्रीवासन संस्कृत के दो शब्दो के मेल से बना है। ग्रीवा और आसन। 'ग्रीवा' का अर्थ होता ह...
16/07/2021

ग्रीवासन - Cervical Pose

ग्रीवासन - ग्रीवासन संस्कृत के दो शब्दो के मेल से बना है। ग्रीवा और आसन। 'ग्रीवा' का अर्थ होता है 'गर्दन या गला' तथा आसन का अर्थ होता है 'स्थिति या अवस्था'। इस आसन में शरीर को एक सेतु की मुद्रा बनाकर पूरा भर गर्दन पर रखते है। जिस कारण इस मुद्रा का नाम ग्रीवासन पड़ा है। जिससे शरीर की रीढ़ की हडडी मजबूत होती है तथा छाती,कमर कंधे में खिचाव आता है और गर्दन की शिराओं को मजबूत करता है। ग्रीवासन को अंग्रेजी मे Cervical Pose (Collar ) कहा जाता है।

ग्रीवासन करने की विधि

1. इस आसन को करने के लिए सबसे पहले साफ़ सुथरी जगह का चयन करके योग मैट पर लेटकर आसन लगाए।

2. अब आसन पर पीठ के बल सीधा लेट जाए और दोनों हाथों को कमर के सीध मे रखें।

3. अब घुटनों को मोड़ते हुए दोनों टांगों को कुहले की तरफ पीछे लाए।

4. फिर दोनों हाथों को स्वास्तिक मुद्रा बना कर सिर के ऊपर रख लेगें।

5. दोनों हाथों और कंधों पर वजन डालते हुए कमर और कुहले को ऊपर की तरफ उठाएगे।

6. ध्यान रखना है कुह्ले को ऊपर की तरफ उठाते समय स्वास अंदर की तरफ लेना है।

7. स्वास्तिक मुद्रा की स्थिति मे रहते हुए कुह्ले को अपनी क्षमता के अनुसार जितना उठा सकते है उठाएगे।

8. दोनों हाथों को कैचीनुमा आकृति बनाए और सीने के ऊपर रख लें ।

9. इसी मुद्रा में 10 से 15 सेकण्ड रहे। फिर कुह्ले को वापिस जमीन पर टिकाए। और स्वास को छोड़े।

10. इस आसन को आप अपनी समता के अनुसार 4 या 5 बार कर सकते है।

विशेष -

1. लेटी हुई अवस्था मे श्वास अंदर तथा लौटते हुए श्वास बाहर करना है।

2. जब शरीर की उठी हुई स्थिति मे हो तो उस समय श्वास अंदर रोक कर रखें।

3. आध्यात्मिक एकाग्रता - मणिपुर या विशुद्धि चक्र पर होता है।

4. शारीरिक एकाग्रता गर्दन या श्रोणि प्रदेश पर होता है।

ग्रीवासन के लाभ

1. इस आसन को करने से रीढ़ की हडडी मजबूत होती है।

2. इसे करने से पाचन शक्ति में सुधार आता है

3. इसे करने से छाती, गर्दन,कंधे में खिचाव आता है और गर्दन की शिराओं व तंतुओं को मजबूत करता है।

4. पीठ की मासपेशियों को आराम देता हैं।

5. उच्च रक्त चाप, अस्थमा, ऑस्टियोपोरोसिस व साइनस के लिए लाभदायक।

6. फेफड़ों को खोलता है और रक्त का शुद्धिकरण करता है।

ग्रीवासन करते समय सावधानियाँ :-

1. अगर किसी व्यक्ति को कमर की चोट या गर्दन की चोट हो तो उसे यह आसन नहीं करना चाहिए।

2. अगर किसी की रीढ़ की हडडी का ताज़ा ताज़ा ऑपरेशन हुआ हो तो इस आसन से परहेज़ रखें।

2 धनुरासन - Bow Poseधनुरासन - धनुरासन पेट के बल लेट कर किये जाने वाले आसनों में एक महत्वपूर्ण आसान है जो अनेकों स्वास्थ्...
12/07/2021

2 धनुरासन - Bow Pose
धनुरासन - धनुरासन पेट के बल लेट कर किये जाने वाले आसनों में एक महत्वपूर्ण आसान है जो अनेकों स्वास्थ्य फायदे के लिए जाना जाता है। चूँकि इसका आकर धनुष के सामान लगता है इसलिए इसको धनुरासन के नाम से जाना जाता है। धनुरासन को अंग्रेजी मे Bow Pose के नाम से भी जाना जाता है। इस आसन का नाम उसे अपनी धनुषी आकार की वजह से मिला है। धनुरासन, पद्म साधना की श्रेणी में से एक आसन है। इसे सही तौर पर धनु-आसन के नाम से जाना जाता है। धनुरासन = धनुष +आसन
इस आसन को करने के दौरान शरीर धनुष के जैसा आकार बनाता है। धनुरासन को हठ योग के 12 मूल आसनों में से एक माना जाता है। ये आसन योग विज्ञान में पीठ में खिंचाव पैदा करने के लिए बताए गए प्रमुख तीन आसनों में एक है। इस आसन के अभ्यास से पूरी पीठ को बढ़िया खिंचाव मिलता है। इस आसन के अभ्यास से कमर में लचीलापन बढ़ता है और कमर मजबूत होती है। समस्त शरीर का बोझ केवल नाभिप्रदेश के ऊपर ही रहेगा। इस आसन में शरीर की आकृति खींचे हुए धनुष जैसी बनती है। इस आसन में भुजंगासन और शलभासन का समावेश होने से इन दोनों आसनों के सभी लाभ इससे प्राप्त होते हैं।



धनुरासन योग की विधि
1. जमीन पर योग मैट बिछाकर पेट के बल लेट जाएं।
2. इसके बाद सांस छोड़ते हुए घुटनों को मोड़ लें।
3. दोनों हाथों से दोनों टखनों को कसकर पकड़ लें।
4. अब सांस लेते हुए सिर, छाती और जांघ को ऊपर उठाने की कोशिश करें।
5. जितना संभव हो सके शरीर को उतना ही ऊपर उठाएं।
6. ऐसा करते समय अपनी दोनों टांगों के बीच कुछ दूरी आ जाएगी, जिसे इस अवस्था में पहुंचने के बाद थोड़ा कम करने का प्रयास करें।
7. कुछ देर इसी मुद्रा में रहते हुए आराम से सांस लेते और छोड़ते रहें।
8. 15-20 सेकेंड बाद सांस छोड़ते हुए अपने पैर और छाती को धीरे-धीरे जमीन की ओर लाएं।
9. इस आसन का अभ्यास धीरे-धीरे बढ़ाए गे और 2 से 3 मिनट तक करने का प्रयास करेगे।
धनुरासन के अभ्यास से लाभ –
1. धनुरासन मोटापा घटाने के लिए एक उत्तम योगाभ्यास है। इसके नियमित अभ्यास से पेट की चर्बी कम होती है और आपके पेट को चुस्त-दुरुस्त बनाता है।
2. डायबिटीज - यह आसन मधुमेह के रोगियों के लिए अति लाभदायक है। इसके अभ्यास से पैंक्रियास उत्तेजित होता है और इन्सुलिन के स्राव में मदद मिलती है जो शुगर के संतुलन सहायक है। इसके अभ्यास से डायबिटीज टाइप1 और डायबिटीज टाइप 2 दोनों में फायदा पहुँचता है।
3. कमर दर्द एवम् पीठ दर्द के लिए यह आसन रामबाण योगआसन है । अगर इसका प्रतिदिन अभ्यास करते हैं तो हमेशा के लिए कमर दर्द की परेशानी से मुक्ति मिल सकती है। यह पीठ के लिगामेंट्स, मांसपेशियों एवं तंत्रिकाओं में खिंचाव ले कर आता है और पुरे स्पाइनल कॉलम में एक नई जान फूंकता है।
4. अस्थमा के लिए यह आसन बहुत लाभदायी है। इसके अभ्यास से सीने में अच्छा खासा खिंचाव आता है और फेफड़ों की क्षमता को बढ़ाता है जो अस्थमा रोगियों के लिए बहुत जरूरी है ।
5. स्लीप डिस्क के लिए इस आसन के अभ्यास से बहुत हद तक राहत मिल सकता है।
6. कब्ज एवम् अपच के लिए इसका नियमित अभ्यास से कम किया जा सकता है। यह आसान सही तरीके से एंजाइम के स्राव में मदद करता है और पाचन तंत्र को मजबूत बनाता है।
7. विस्थापित नाभि के लिए यह योगाभ्यास जगह पर लाने के लिए लाभदायक है।
8. यह योगासन थाइरोइड एवं अधिवृक्क ग्रंथियों को उत्तेजित करता है तथा इसके हॉर्मोन के स्राव में मदद करता है।
धनुरासन की सावधानियाँ -
1. धनुरासन उन्हें नहीं करनी चाहिए जिन्हें तीव्र कमर दर्द हो।
2. हर्निया के रोगीओं को इस आसन के करने से बचना चाहिए।
3. अगर अल्सर या पेप्टिक अल्सर से प्रभावित हैं तो इस आसन के अभ्यास से बचें।
4. कोलाइटिस से पीड़ित व्यक्ति इसे मत करें।
5. उक्त रक्त चाप वाले व्यक्ति इस आसान को विशेषज्ञ के परामर्श से करें।
6. अगर पथरी की शिकायत हो तो इसे न करें।
7. साइटिका से ग्रस्त व्यक्ति इसको करने से पहले विशेषज्ञ का परामर्श लें।

उष्ट्रासन - Cammel Pose      उष्ट्रासन - उष्ट्रासन दो शब्द मिलकर बना है। ‘उष्‍ट्र’ का अर्थ ऊंट होता है। इस मुद्रा में शर...
11/07/2021

उष्ट्रासन - Cammel Pose
उष्ट्रासन - उष्ट्रासन दो शब्द मिलकर बना है। ‘उष्‍ट्र’ का अर्थ ऊंट होता है। इस मुद्रा में शरीर ऊंट के समान लगता है इसीलिए इसको इस नाम से पुकारा जाता है। स्वस्थ लाभ के हिसाब से उष्ट्रासन बैठ कर करने वाले आसन में एक महत्वपूर्ण योगाभ्यास है। उष्ट्रासन एक ऐसी योग अभ्यास है जो क्रोध एवं शारीरक विकारों को दूर करने में अहम भूमिका निभाता है।यह आसन श्वसन में सुधार करता है जो बदले में पूरे शरीर में प्राणवायु (ऑक्सीजन) युक्त रक्त (ब्‍लड) को प्रसारित करने में मदद करता है।




उष्ट्रासन योग करने की विधि
1. सबसे पहले फर्श कोई आसन बिछाकर पर घुटनों के बल बैठ जाएं।
2. फिर वज्रासन की स्थिति में आएगे।
3. ध्यान रहे जांघों तथा पैरों को एक साथ रखें, पंजे पीछे की ओर हों तथा फर्श पर जमे हों। और घुटनों तथा पैरों के बीच करीब एक फुट की दूरी रखें और अब घुटनों पर खड़े हो जाएंगे।
4. सांस लेते हुए पीछे की ओर झुकें और अब दाईं हथेली को दाईं एड़ी पर तथा बाईं हथेली को बाईं एड़ी पर रखें।
5. ध्‍यान रहे कि पीछे झुकते समय गर्दन को झटका न लगे और सांस धीरे- धीरे लेते हुए पीछे जयगए।
6. अंतिम मुद्रा में जांघें फर्श से समकोण बनाती हुई होंगी और सिर पीछे की ओर झुका होगा।
7. शरीर का वजन बांहों तथा पांवों पर समान रूप से होना चाहिए।
8. स्थिति पूर्ण और धीरे धीरे सांस ले और धीरे धीरे सांस छोड़े। इसी अवस्था मे कुछ समय रुकेगे।
9. लंबी गहरी सांस छोड़ते अपनी आरंभिक अवस्था में आएं।
10. यह एक चक्र हुआ। इस तरह से इसको 2 से 3 बार कर सकते हैं।
उष्ट्रासन योग के लाभ
1. इस योग का अभ्यास से पेट की चर्बी को कम कर होता है। यदि इसको सही ढंग से किया जाए तो बहुत हद तक पेट की चर्बी को कम किया जा सकता है।
2. इसका अभ्यास करके डायबिटीज को नियंत्रित किया जा सकते हैं क्योंकि यह पैंक्रियास को उत्तेजित करता है और इन्सुलिन के स्राव में मदद करता है।
3. उष्ट्रासन फेफड़े के स्वस्थ के लिए एक अच्छा आसन है और फेफड़े से सम्बंधित परेशानियों से बचाता है।
4. यह योगाभ्यास क्रोध को कम करते हुए शांत करने में मदद करता है।
5. दृष्टि विकार वाले व्‍यक्तियों के लिए उष्‍ट्रासन अत्‍यधिक उपयोगी होता है।
6. पाचन संबंधी समस्‍याओं में यह लाभकारी होता है।
7. पतली कमर और खूबसूरत चेहरा के लिए उष्ट्रासन का अभ्यास करनी चाहिए।
8. स्लिप डिस्क और कमर दर्द में लाभ पहुचाता है एवं साइटिका को दूर करने में मददगार है
9. यह आसन महिलाओं में मासिक जैसी परेशानियों को दूर करने में लाभदायक है।
उष्ट्रासन योग के सावधानी
1. हर्निया से ग्रस्‍त व्‍यक्तियों को यह आसन नहीं करना चाहिए।
2. अधिक कमर दर्द में इसका अभ्यास न करें।
3. साइटिका एवं स्लिप डिस्क वाले मरीज इसको किसी विशेषज्ञ के सामने करनी चाहिए।

10/06/2021
सर्वांगासन – Sarvangasanaसर्वांगासन - सर्वांगासन का नाम (सर्व+अंग+आसन) ही अपने गुणों का वर्णन स्वयं कर देता है। इस आसन क...
27/05/2021

सर्वांगासन – Sarvangasana
सर्वांगासन - सर्वांगासन का नाम (सर्व+अंग+आसन) ही अपने गुणों का वर्णन स्वयं कर देता है। इस आसन के द्वारा शरीर के सभी अंगों को व्यायाम मिल जाता है। इसी कारण इसे सर्वांग आसन नाम दिया गया है। कई योगी,ज्ञानी सर्वांग आसन को दूसरे अन्य योग आसनों का “जनेता” कह कर भी पुकारते हैं। समस्त योग आसनों में सर्वांग आसन को सबसे अधिक लाभकारी बताया गया है। सर्वांग आसन के नित्य प्रयोग से व्यक्ति शक्तिशाली और स्वस्थ बना रहता है। सर्वांगासन को सभी योग आसन का राजा कहा जाता है क्यों यह शरीर के सभी अंग पर प्रभाव डालता है। इस आसन का उल्लेख हठ योग में भी किया जाता है । यह जठराग्नि को प्रदीप्त करने वाला है। ढीली चमड़ी ठीक हो जाती है। बालों का श्वेत होकर झड़ना रुक जाता है।
शास्त्रकार का कथन है - रसायनरूपी इस आसन के अभ्यास से शरीर के सामर्थ्य में वृद्धि होती है। तीनों दोषों का शमन होता है। वीर्य की वृद्धि होती है और अन्त:करण की शुद्धि होती है।मेधा-शक्ति बढ़ती है। चिर-यौवन की प्राप्ति होती है। आयुष्य बढ़ता है।


सर्वांगासन करने की विधि –
1. अनुकूल एवम् खुले वातावरण मे आसन या चटाई को समतल जमीन पर बिछा लें।
2. सर्वप्रथम चटाई पर बैठ कर, पीठ के बल लेट जाएं। मुख आकाश की ओर होना चाहिए। दोनों हाथ सीधे पैरों की दिशा में ज़मीन पर लगे होने चाहिए। दोनों पैर सीधे जमीन एक दूसरे से सटे हुए होने चाहिए।
3. दोनों आँखें बंद करके सम्पूर्ण शरीर को ढीला छोड़ कर मुक्त कर लें,अर्थात एक दम शिथिल कर दें।
4. अभी गहरा श्वास शरीर के अंदर लेते हुए साथ साथ दोनों पैरों को सामान्य गति से ऊपर आकाश की ओर ऊपर उठाना है। ध्यान रखेंगे की दोनों घुटनें मोड़े “बिना” दोनों पैर हवा में ऊपर उठाना हैं।
5. पैरों को ऊपर उठाते समय कमर को भी धीरे धीरे ऊपर उठाना प्रारंभ कर दें। जब पैर खड़ी सीधी रेखा मे आकाश की ओर 90 डिग्री पर आ जाएं तब पीठ को थोड़ा और ऊपर उठाएँ।
6. अब कमर और पीठ को ऊपर की ओर उठाने के लिए दोनों हाथों का सहारा लेना है। दोनों हाथों की कुंहनिया (Elbow) ज़मीन से लगा कर रखें और हथेलियों से कमर को सहारा दें।
7. सर्वांगासन करते वक्त पैरों को,कमर को, और पीठ को इतना ऊपर ले जाए की ज़मीन पर सिर, गर्दन का पिछला हिस्सा, कंधे, और कुंहनिया ही रहें। बाकी का सारा शरीर आकाश की और समकोण अवस्था में सीधा हो जाना चाहिए।
8. पीठ को सहारा देते वक्त जब हथेलियों का उपयोग करें तब यह सुनिश्चित कर लें की दोनों हाथ के अंगूठे पेट की ओर होने चाहिए और दोनों हाथों की चार चार उँगलियाँ पीठ की ओर आमने-सामने होनी चाहिए। ध्यान रखे की एक हाथ से पीठ के जिस हिस्से को पकड़ रखा हो, ठीक दूसरी तरफ भी उसी समान हिस्से की पकड़ के रखना होता है – दोनों हाथ ऊपर नीचे या आगे पीछे नहीं होने चाहिए।
9. सर्वांग आसन करते वक्त ठुड्डी (mandible) को गले (कंठ) से लगा कर रखें। और मुख को आकाश की ओर या पैरों के अँगूठों की ओर रखें।
10. क्षमता अनुसार इस स्थिति में थोड़ी देर तक बने रहें। उसके बाद धीरे धीरे हाथों और कंधों के सहारा (support) को हटाते हुए कमर को नीचे की ओर सामान्य अवस्था में लाना शुरू करें। कमर ज़मीन पर ले आने के बाद दोनों पैरों को धीरे धीरे ज़मीन की ओर ले जाएं।
11. आसन शुरू किया था उस अवस्था में हाथों, पैरों, और गर्दन की स्थिति ला देने के बाद शवासन में विश्राम करना है। ध्यान रहे की जितनी देर सर्वांग आसन किया गया हों, कम से कम उतनी देर तक शवासन में विश्राम करना चाहिए।
सर्वांगासन समय सीमा –
सर्वांग आसन अपनी शक्ति अनुसार एक से पांच मिनट तक कर सकते है। इस आसन प्रक्रिया को दो से तीन बार दोहराएँ।
सर्वांगासन के लाभ –
योग में सर्वांगासन को सबसे बेहतर आसन बताया गया है| सर्वांगासन के दौरान रक्त का प्रवाह मस्तिष्क की दिशा में होता है। इसलिए इसके फायदे अद्भुत है:-
1. सर्वांगासन प्रतिदिन सुबह में करने से सभी तरह के मनोविकार दूर हो जाते हैं।
2. मोटापे से त्रस्त व्यक्ति सर्वांगासन कर के अपना अतिरिक्त वज़न कम Weight Loss कर सकता है।
3. यह आसन करने से कब्ज़ की समस्या दूर होती है। तथा अन्य सभी प्रकार की पाचन समस्या दूर हो जाती हैं। इस आसन को करने से सिरदर्द की समस्या दूर होती है।
4. इस आसन की सहायता से थाइरोइड ग्रंथि क्रियाशील बनती है, और गले से जुड़े अन्य रोगों को समाप्त करनें में मदद मिलती है।
5. स्त्रियों में मासिक धर्म से जुड़ी समस्याओं को दूर करने के लिए सर्वांगासन परम लाभदायक है। इस आसन से गर्भाशय से जुड़ी तकलीफ़ें भी दूर हो जाती हैं।
6. नित्य सुबह में सर्वांग आसन करने से हाथ, पीठ और कंधे शक्तिशाली बनते हैं। अगर किसी को पैरों में सूजन, या दर्द की समस्या रहती हों तो इस आसन को करने से दूर हो जाती हैं। और कमर के निचले भाग से जुड़ी समस्याएं भी दूर होती हैं।
7. दमे के रोगी को सर्वांग आसन प्रति दिन करना चाहिए। उनके लिए यह आसन अत्यंत लाभकारक ।
8. सर्वांगासन करने से बुद्धि का विकास जल्दी होने लगता है। व्यक्ति की एकाग्रता शक्ति भी बढ़ जाती जाती है।
9. इस आसन से ब्‍लड सर्कुलेशन सही रहता है और एनर्जी का लेवल भी बना रहता है।
10. यह आसन बालों और चेहरे की सुंदरता को भी कई गुणा बढ़ा देता है।
11. इसे रोजाना करने से पेट के रोग दूर होते हैं और यह कब्ज की समस्या या रामबाण इलाज है ।
12. दिन भर एक्टिव महसूस होता है।
सर्वांगासन मे क्या सावधानीया -
1. गर्दन में दर्द की समस्या रहती हों, उनके लिए सर्वांगासन हानिकारक हो सकता है।
2. उच्च रक्तचाप की समस्या वाले व्यक्ति को यह आसन हानिकारक हो सकता है।
3. हृदय रोग की समस्या वाले व्यक्ति को भी सर्वांग आसन नुकसानदेह हो सकता है।
4. कमर दर्द की समस्या वाले व्यक्ति को भी सर्वांग आसन नहीं करना चाहिए।
5. घेंघा रोग (Goitre Disease) के रोगी को भी यह आसन हानिकारक होता है।
6. गर्भावस्था के दौरान सर्वांग आसन बिलकुल वर्जित है, इस समय यह आसन नहीं करना चाहिए।
7. मासिक चक्र के दौरान भी महिलाओं को सर्वांग आसन नहीं करना चाहिए।
8. जिन्हें चक्कर आने की समस्या रहती हों, उस व्यक्ति को भी सर्वांग आसन नहीं करना चाहिए।
9. घुटनों को मोड़कर सर्वांग आसन करने पर इस आसन का कोई लाभ नहीं होता है। यह आसन करते वक्त सिर को हवा में उठनें “नहीं” देना है।
10. सर्वांग आसन हमेशा खाली पेट ही करना है। यह आसन सुबह में करने पर अधिक लाभ मिलता है।
11. इस आसन का सम्पूर्ण लाभ लेने के लिए इसके बाद शवासन में विश्राम लेने के बाद, मत्स्यासन करना चाहिए।
12. इस आसन को करने में शरीर की मर्यादा से बाहर जा कर अत्याधिक ज़ोर नहीं करना चाहिए।
13. सर्वांगासन की अवधि धीरे धीरे बढ़ाएँ। इस आसन को करते वक्त किसी भी प्रकार की समस्या के चिन्ह दिखें या महसूस हों, तो तुरंत रुक जाना चाहिए|
सर्वांगासन मे क्या विशेष -
इस आसन में शरीर के सारे अंगों की व्यायाम एक साथ हो जाती है, इसलिए इसे सर्वांगासन के नाम से जाना जाता है।मानसिक श्रम करने वाले वकील, डॉक्टर, प्राध्यापक, विद्यार्थी व्यापारी एवं साहियतकर आदि-आदि के लिए यह आसन अत्ययन्त लाभकारी है। रक्त के दोषों को दूर करता है। दुर्बल को यह आसन सबल बनाता है।

बालासन - Child Poseबालासन - इस आसन का नाम संस्कृत के शब्द "बाल" से लिया गया है जिसका अर्थ है बच्चा और "आसन" जिसका अर्थ ह...
19/05/2021

बालासन - Child Pose

बालासन - इस आसन का नाम संस्कृत के शब्द "बाल" से लिया गया है जिसका अर्थ है बच्चा और "आसन" जिसका अर्थ है मुद्रा । यह आसन भ्रूण की स्थिति जैसा दिखता है। यह एक आराम करने वाली मुद्रा है जो पीठ के दर्द को कम करने में भी मदद करता है। इस मुद्रा से मन को शांती, तनाव से राहत और कूल्हों, जांघों,पैरों मे खिचाव पैदा करता है। बालासन जिसे अंग्रेजी मे Child Pose के नाम से भी जाना जाता है ।
इसके अभ्यास के दौरान, अपनी श्वास पर ध्यान बनाए रखना सुनिश्चित किया जाता है। अक्सर अपने श्वास पर ध्यान केंद्रित करना भूल जाते हैं, पूरे अभ्यास में पूरी श्वास लेते हैं।


बालासन करने की विधि -
1. सर्वप्रथम साफ स्थान पर आसन बिछा कर पैरों को मोडकर घुटनो के बल बैठना है जैसे ब्रजासन मे बैठते है।
2. दोनों हाथ की हथेलियों को जमीन पर घुटनों के सिध मे और घुटनों से दूर रखे देंगे।
3. इसके बाद दोनों हाथों को तब तक आगे बढ़ाएं जब तक माथा जमीन पर न आ जाएं।
4. इसी अवस्था में 3 से 5 बार गहरी सांस लें।
5. आपकी हथेलियां आकाश की ओर होनी चाहिए और छाती से जांघों पर दबाव पड़ना चाहिए।
6. अब 20 -30 सेकंड तक इस अवस्था मे बने रहना है।
7. इस आसन से बाहर आने के लिए सांस लेते हुए धीरे से उठकर एड़ी पर ब्रजासन स्थिती आना है।
8. ब्रजासन मे बैठ कर रीढ़ की हड्डी को सीधा कर लेंना है।
9. इस प्रकार धीरे धीरे क्षमता अनुसार इस आसन को तीन या उससे अधिक बार कर सकते है।

बालासन करने के लाभ -
1. यह आसन छाती,पीठ और कंधों के दर्द से राहत दिलाता है।
2. बालासन तनाव और चिंता को कम करने में मदद करता है।
3. इस आसन के नियमित अभ्यास से रीढ़ को लंबा करने में मदद करता है।
4. इससे पूरे शरीर में रक्त परिसंचरण को बढ़ावा देता है।
5. यह आसन धूम्रपान की लत को छोड़ने मे सहायता करता है।
6. इसका नियमित अभ्यास करने से चेहरे पर निखार आता है।
बालासन के लिए सावधानियां
1. अगर सिर को फर्श पर रखना मुश्किल या असहज लगता है,तो आराम के लिए तकिया का उपयोग कर सकते हैं।
2. यदि दस्त या टखने की समस्या से पीड़ित हैं तो इस आसन को करने से बचे।
3. उच्च रक्तचाप वाले रोगियों को इस आसन का अभ्यास नहीं करना चाहिए।
4. इस आसन को गर्भावस्था की स्थिति मे न करने की सलाह दी जाती है।

18/05/2021

वज्रासन - Diamond Pose
वज्रासन - यह नाम संस्कृत के शब्द "वज्र" से लिया गया है, जो की हिन्दू देवता इंद्र का शास्त्र है जिसका अर्थ "बिजली", "हीरा" होता है और "आसन" जिसका अर्थ है "योग करते समय बैठने की मुद्रा"। वज्रासन एक जादुई योगिक मुद्रा है जो आपके शरीर को बेहतर पाचन और मजबूत पैरों को पाने मे मदद करता है। ध्यान करने के लिए भी यह आसन एकदम सही माना जाता है। वज्रासन को अंग्रेज़ी में Diamond Pose कहा जाता है।
समस्त योगआसनों में वज्रासन ही एक ऐसा आसन है, जिसे भोजन या नाश्ता करने के उपरांत तुरंत भी किया जा सकता है। स्वास्थ्य के लिए वज्रासन का अभ्यास अति लाभदायक होता है। वज्रासन को हर उम्र का व्यक्ति सरलता से कर सकता है। यह बहुत कल्याणकारी आसन है।

वज्रासन को करने की विधि -
1. सर्वप्रथम समतल व साफ स्थान पर आसन बिछा कर पैरों को मोडकर घुटनो के बल बैठ जाएं।
2. पैरों के पंजों को पीछे की तरफ खीचें और पैर के अंगूठों को एक-दूसरे पर क्रॉस कर लें।
3. अब इस तरह बैठें कि नितंब (हिप्स ) एड़ियों पर जाकर टिक जाएं और ध्यान रहे की जांघें पिंडलियों पर टिकी रहेगी ।
4. अब दोनों हाथों को घुटनों पर रखकर रीढ़ की हड्डी सीधी करके रखेंगे । तथा सिर सीधा रखते हुए एकदम सामने की ओर देखेंगे ।
5. अब धीरे – धीरे आती-जाती सांसों का अवलोकन करते रहेंगे। और आंखें बंद करके सिर्फ सांसों की गति पर ध्यान केंद्रित करें।
6. इस आसन को शुरू में कम से कम 5 मिनट और बाद में 10 मिनट तक करें।
7. इस योग का अभ्यास खाली पेट किया जाना चाहिए, लेकिन भोजन के बाद भी इस आसन को सुरक्षित रूप से कर सकते हैं। यह मुद्रा पाचन को बढ़ावा देती है।

वज्रासन करने के लाभ
1. यह आसन पाचन में सुधार करता है और नियमित अभ्यास से यह कब्ज को खत्म करने मे सहायक होता है।
2. यह पीठ को मजबूत बनाता है और पीठ के निचले हिस्से की समस्याओं से राहत देता है।
3. यह आसन मांसपेशियों को भी मजबूत बनाता है।
4. प्रसव पीड़ा को कम करने में मदद करता है और मासिक धर्म की ऐंठन को भी कम करता है।
5. वज्रासन के नियमित अभ्यास से वजन कम किया जा सकता है ।और कुछ हफ्तों के अभ्यास के बाद पेट की चर्बी में अंतर देखा जा सकता है।

विशेष - वज्रासन सुबह मेँ खाली पेट भी किया जा सकता है और भोजन के बाद भी किया जा सकता है। शुरुआत मेँ वज्रासन तीन से पाँच मिनट तक करना चाहिए। अभ्यास बढ़ जाने पर इसे अधिक समय तक या क्षमता अनुसार दस मिनट तक भी किया जा सकता है

ब्रजासन करने मे सावधानियां
1. अगर घुटने की समस्या है या हाल ही में आपके घुटनों की सर्जरी हुई है तो इस आसन से बचें ।
2. गर्भवती महिलाओं को इस आसन का अभ्यास करते समय अपने घुटनों को थोड़ा अलग रखना चाहिए ताकि पेट पर दबाव ना आये ।
3. आंतों के अल्सर, हर्निया या बड़ी या छोटी आंत से संबंधित किसी अन्य समस्या से पीड़ित लोगों को योग प्रशिक्षक के मार्गदर्शन में इस मुद्रा का अभ्यास करना चाहिए।
4. रीढ़ की गंभरी समस्या से पीड़ित इसे न करे।

17/05/2021

आसन
चित्त को स्थिर रखने वाले तथा सुख देने वाले बैठने के प्रकार को आसन कहते हैं। आसन अनेक प्रकार के माने गए हैं। योग में यम और नियम के बाद आसन का तीसरा स्थान है।
आसन का उद्‍येश्य
आसनों का मुख्य उद्देश्य शरीर के मल का नाश करना है। शरीर से मल या दूषित विकारों के नष्ट हो जाने से शरीर व मन में स्थिरता का अविर्भाव होता है। शांति और स्वास्थ्य लाभ मिलता है। अत: शरीर के स्वस्थ रहने पर मन और आत्मा में संतोष मिलता है।

आसन और व्यायाम
आसन एक वैज्ञानिक पद्धति है। आसन और अन्य तरह के व्यायामों में फर्क है। आसन जहां हमारे शरीर की प्रकृति को बनाए रखते हैं वहीं अन्य तरह के व्यायाम इसे बिगाड़ देते हैं।
''आसनानि समस्तानियावन्तों जीवजन्तव: । चतुरशीत लक्षणिशिवेनाभिहितानी च। ‘’
अर्थात संसार के समस्त जीव जन्तुओं के बराबर ही आसनों की संख्या बताई गई है।

आसनों का आविष्कार –
1. प्रकृति आधारित आसन -
पहले प्रकार के आसन वनस्पति और वृक्षों आदि पर आधारित हैं जैसे- वृक्षासन, पद्मासन, लतासन, ताड़ासन, पर्वतासन आदि।
2. पशु-पक्षी आधारित आसन -
दूसरी प्रकार के वे आसन जो पशु-पक्षियों के उठने-बैठने, चलने-फिरने या उनकी आकृति के आधार पर बनाए गए हैं जैसे- वृश्चिक, भुंग, मयूर, शलभ, मत्स्य, गरुढ़, सिंह, बक, कुक्कुट, मकर, हंस, काक, मार्जाय आदि।
3. अंग संबंधित आसन -
तीसरी तरह के आसन विशेष अंगों को पुष्ट करने वाले तथा अंगों के नाम से सं‍बंधित होते हैं-जैसे शीर्षासन, एकपाद ग्रीवासन, हस्तपादासन, सर्वांगासन, कंधरासन, कटि चक्रासन, पादांगुष्ठासन आदि।
4. योगी नामित आसन :-
चौथी तरह के वे आसन हैं जो किसी योगी या भगवान के नाम पर आधारित हैं- जैसे महावीरासन, ध्रुवासन, मत्स्येंद्रासन, अर्धमत्स्येंद्रासन, हनुमानासन, भैरवासन आदि।
5. वस्तु संबंधित आसन :-
पांचवीं तरह के आसन जो विशेष वस्तुओं के अंतर्गत आते हैं जैसे- हल, धनुष, चक्र, वज्र, शिला, नौका आदि।
6. अन्य आसन :-
इसके अलावा कुछ आसन ऐसे हैं- जैसे चंद्रासन, सूर्यनमस्कार, कल्याण आसन आदि। इन्हें अन्य आसनों के अंतर्गत रखा गया है।
आसन करने के पूर्व :-
सूक्ष्म व्यायाम अर्थात अंग संचालन के बाद ही योग के आसनों को किया जाता है। योग प्रारम्भ करने के पूर्व अंग-संचालन करना आवश्यक है। इससे अंगों की जकड़न समाप्त होती है तथा आसनों के लिए शरीर तैयार होता है।
आसनों को सीखना प्रारम्भ करने से पूर्व कुछ आवश्यक सावधानियों पर ध्‍यान देना जरूरी है। आसन प्रभावकारी तथा लाभदायक तभी हो सकते हैं, जबकि उसको उचित रीति से किया जाए। आसनों को किसी योग्य योग चिकित्सक की देख-रेख में करें तो ज्यादा अच्छा होगा।

आसन के प्रकार
1. बैठकर किए जाने वाले आसन
2. पीठ के बल लेटकर किए जाने वाले आसन
3. पेट के बल लेटकर किए जाने वाले आसन
4. खड़े होकर किए जाने वाले आसन
उक्त चार प्रकार के आसनों में से कुछ आसन ऐसे हैं जिन्हें बैठकर, पीठ के बल लेटकर, पेट के बल लेट कर और खड़े रहकर चारों तरीके से किया जाता है। इनमें से कुछ आसन ऐसे भी हैं जिन्हें हाथ के पंजों के बल या पैर के घुटनों के बल पर किया जाता है।
1. बैठकर किए जाने वाले आसन
पद्मासन, वज्रासन, सिद्धासन, मत्स्यासन, वक्रासन, अर्ध-मत्स्येन्द्रासन, पूर्ण मत्स्येन्द्रासन, गोमुखासन, पश्चिमोत्तनासन, ब्राह्म मुद्रा, उष्ट्रासन, योगमुद्रा, उत्थीत पद्म आसन, पाद प्रसारन आसन, द्विहस्त उत्थीत आसन, बकासन, कुर्म आसन, पाद ग्रीवा पश्चिमोत्तनासन, बध्दपद्मासन, सिंहासन,ध्रुवासन,जानुशिरासन,आकर्णधनुष्टंकारासन, बालासन, गोरक्षासन, पशुविश्रामासन, ब्रह्मचर्यासन, उल्लुक आसन, कुक्कुटासन, उत्तान कुक्कुटासन, चातक आसन, पर्वतासन, काकाआसन, वातायनासन, पृष्ठ व्यायाम आसन, भैरवआसन, भरद्वाजआसन, बुद्धपद्मासन, कूर्मासन, भूनमनासन, शशकासन, गर्भासन, मंडूकासन, सुप्त गर्भासन, योगमुद्रासन आदि।
2. पीठ के बल लेटकर किए जाने वाले आसन
अर्धहलासन, हलासन, सर्वांगासन, विपरीतकर्णी आसन, पवनमुक्तासन, नौकासन, दीर्घ नौकासन, शवासन, पूर्ण सुप्त वज्रासन, सेतुबंध आसन, तोलांगुलासन, प्राणमुक्त आसन, कर्ण पीड़ासन, उत्तानपादासन, चक्रासन, कंधरासन, स्कन्धपादासन, मर्कटासन, ग्रीवासन, एकपादग्रीवासन, द्विपादग्रीवासन, कटी व्यायाम आसन, पृष्ठ व्यायाम आसन-2 आदि।
3. पेट के बल लेटकर किए जाने वाले आसन
मकरासन, धनुरासन, भुजंगासन, शलभासन, विपरीत नौकासन, खग आसन, चतुरंग दंडासन, कोनासन आदि।
4. खड़े होकर किए जाने वाले आसन
ताड़ासन, वृक्षासन, अर्धचंद्रमासन, अर्धचक्रासन, दो भुज कटिचक्रासन, चक्रासन, पाद्पश्चिमोत्तनासन, गरुढ़ासन, चंद्रनमस्कार, चंद्रासन, उर्ध्व उत्थान आसन, पाद संतुलन आसन, मेरुदंड वक्का आसन, अष्टावक्र आसन, बैठक आसन, उत्थान बैठक आसन, त्रिकोणासन, नटराज आसन, एक पाद विराम आसन, एकपाद आकर्षण आसन, उत्कटासन, उत्तानासन, कटी उत्तानासन, जानु आसन, उत्थान जानु आसन, हस्तपादांगुष्ठासन, पादांगुष्ठासन, ऊर्ध्वताड़ासन, पादांगुष्ठानासास्पर्शासन, कल्याण आसन आदि।
5. अन्य तरीके से किए जाने वाले आसन
शीर्षासन, मयुरासन, सूर्य नमस्कार, वृश्चिकासन, चंद्र नमस्कार, लोलासन, अधोमुखश्वानासन, मोक्ष आसन, अदवासन, अग्नीस्तंभासन, अनंतासन, अंजनेयासन, योगनिद्रा, मार्जारासन, अनुवित्तासन, अश्व संचालन आसन, भुजपीड़ासन, बिदालासन, बंधासन, चक्र बंधासन, चक्र वज्रासन, चकोरआसन, द्रधासन, द्विपाद परिवर्त्ता कोंडियासन उपधानासन, द्विचक्रिकासन, पादवृत्तासन, पॄष्ठतानासन, प्रसृतहस्त शंखासन, पक्ष्यासन आदि।
योगासन के लिए कुछ विशेष जरूरी नियम
1. योग को सूर्योदय से पहले और सूर्यास्त के बाद करना चाहिए। सुबह जल्दी उठकर योग करना अधिक फायदेमंद होता है।
2. योगासन से पहले हल्का वॉर्मअप करना जरूरी है, ताकि शरीर खुल जाए।
3. योग की शुरुआत हमेशा ताड़ासन से ही करनी चाहिए।
4. योगासन खाली पेट करना चाहिए
5. अगर आप शाम को योग कर रहे हैं, तो भोजन करने के करीब तीन-चार घंटे बाद ही करें। साथ ही योग करने के आधे घंटे बाद ही कुछ खाएं।
6. योग करने के तुरंत बाद नहाना नहीं चाहिए, बल्कि कुछ देर इंतजार करना चाहिए।
7. हमेशा आरामदायक कपड़े पहनकर ही योग करना चाहिए।
8. जहां आप योग कर रहे हैं, वो जगह साफ-सुथरी और शांत होनी चाहिए।
9. योग करते समय नकारात्मक विचारों को अपने मन से निकालने का प्रयास करें।

16/05/2021

अष्टांग योग
हमारे ऋषि-मुनियों ने योग के द्वारा शरीर, मन और प्राण की शुद्धि तथा परमात्मा की प्राप्ति के लिए आठ प्रकार के साधन बताये हैं, जिसे अष्टांग योग कहते हैं। योग के ये आठ अंग हैं - यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान, धारणा और समाधि। इनमें पहले पांच साधनों का संबंध मुख्य रूप से स्थूल शरीर से है। ये सूक्ष्म से स्पर्श मात्र करते हैं, जबकि बाद के तीनों साधन सूक्ष्म और कारण शरीर का गहरे तक स्पर्श करते हुए उसमें परिष्कार करते हैं। इसीलिए पहले साधनों - यम, नियम, आसन, प्राणायाम व प्रत्याहार को बहिरंग साधन और धारणा, ध्यान तथा समाधि को अंतरंग साधन कहा गया है। अब हम यहां इन्हीं की एक-एक करके चर्चा करेंगे, कुछ की सामान्य और कुछ की विशेष रूप में।

अष्टांग योग की परिभाषा -
अष्टांग का अर्थ है "आठ अंग" यह योग के आठ अंग या शाखाएँ है। जो की पतंजलि के योग सूत्र में वर्णित है, जिनमें से आसन या शारीरिक योग मुद्रा एक शाखा है और प्राणायाम अलग शाखा है। हर अंगों में से प्रत्येक का अभ्यास करके शरीर और दिमाग में सभी अशुद्धियों को नष्ट किया जा सकता है। पतंजलि के अनुसार, आंतरिक शुद्धिकरण में निम्नलिखित आठ आध्यात्मिक प्रथाएं शामिल हैं:
1. यम (नैतिकता ) – शपथ लेना
2. नियम (आत्म-शुद्धिकरण और अध्ययन) – आत्म अनुशासन
3. आसन (मुद्रा) – आसनों का अभ्यास
4. प्राणायाम (सांस नियंत्रण)
5. प्रतिहार (भावना नियंत्रण) – इंद्रियों पर नियंत्रण
6. धारण (एकाग्रता)
7. ध्यान (मेडिटेशन)
8. समाधि (सार्वभौमिक में अवशोषण) – बंधनों से मुक्ति या परमात्मा से मिलन।
पहले चार बाहरी रूप से सम्बन्धित हैं और हम कैसे दुनिया से जुड़ा है, इसमें विभिन्न तरीकों अर्थात यम और नियम,शरीर के नियंत्रण को आसन के माध्यम से और प्राणायाम के माध्यम से सांस के नियंत्रण में करना शामिल हैं।
पिछले चार अंग अभ्यास के कई वर्षों के बाद स्वचालित रूप से पालन करने होता हैं: प्रतिहार, धारणा, ध्यान और समाधि (मुक्ति)।
अष्टांग योग का महत्व
अष्टांग योग के दैनिक अभ्यास के माध्यम से शरीर और दिमाग को शांति और स्थिरता की स्थिति में लाया जा सकता है जो अंततः आध्यात्मिक जागरूकता और मुक्ति है।
अष्टांग योग के लाभ
अष्टांग योग का अभ्यास आपको फिर से जीवंत होते है और आपके शरीर, दिमाग और आत्मा को संतुलिन मिलता है।
1. शारीरिक शक्ति
अष्टांग योग शारीरिक शक्ति और मांसपेशियों के प्रशिक्षण पर केंद्रित है। अष्टांग न केवल आपके दिमाग को शांत और आत्मा को शांतिपूर्ण बनाता है, यह शरीर की शक्ति पर भी काम करता है। योग की इस शैली का अभ्यास करने से आप का शरीर मजबूत और नियंत्रित होता है। यह वजन कम करने में मदद भी करता है, शरीर को लचीला और सहनशक्ति को बढ़ता है।
2. मानसिक उपचार
हम सभी जानते हैं कि योग केवल शारीरिक फिटनेस के बारे में नहीं है, यह आपके दिमाग और आत्मा पर भी काम करता है। अष्टांग का अभ्यास आपको तनाव, तनाव इत्यादि जैसे विभिन्न मानसिक बीमार से बच सकते है । यह आपके विचार को बढ़ता है और ज्ञान समझने मे आपकी मदद करता है । अष्टांग उन लोगों के लिए बहुत बढ़िया है जो किसी मस्तिष्क बीमार से पीड़ित हैं। उदाहरण के लिए, तनाव या सिरदर्द से पीड़ित।
3. आध्यात्मिक कल्याण
अष्टांग आध्यात्मिक उपचार पर भी काम करता है। अष्टांग आत्मा की खुलेपन को बढ़ावा देता है, यह आपके आत्मा से जुड़ने का एक शानदार तरीका है। यह आपको स्वयं को समझ ने भी सहायता करेगा । अष्टांग का अभ्यास करने से आप आसपास सकारात्मकता और खुश महसूस करेंगे ।
4. भावनात्मक लाभ
भावनात्मक लाभ में भावनाओं को नियंत्रित और संतुलित करना शामिल है। ऐसा कहा जाता है कि अधिकांश पीड़ा भावनाओं के कारण होती है। उदाहरण के लिए, उदास भावनाएं मानसिक बीमारी का कारण बन सकती हैं यह आपके शरीर को बहुत प्रभावित करते है ।

15/05/2021

योग का परिचय
योग सही तरह से जीने का विज्ञान है और इसलिए इसे दैनिक जीवन में शामिल किया जाना चाहिए। यह हमारे जीवन से जुड़े भौतिक,मानसिक,भावनात्मक,आत्मिक और आध्यात्मिक,आदि सभी पहलुओं पर काम करता है। योग का अर्थ एकता या बांधना है। इस शब्द की जड़ है संस्कृत शब्द युज, जिसका मतलब है जुड़ना। आध्यात्मिक स्तर पर इस जुड़ने का अर्थ है सार्वभौमिक चेतना के साथ व्यक्तिगत चेतना का एक होना। व्यावहारिक स्तर पर, योग शरीर, मन और भावनाओं को संतुलित करने और तालमेल बनाने का एक साधन है। योग आसन,प्राणायाम,मुद्रा,बँध,षट्कर्म और ध्यान अभ्यास के माध्यम से प्राप्त होती है। इस प्रकार योग जीने का एक तरीका भी है और अपने आप में परम उद्देश्य भी है।
योग सबसे पहले लाभ पहुँचाता है बाहरी शरीर अर्थात फिज़िकल बॉडी को,जो ज्यादातर लोगों के लिए एक व्यावहारिक और परिचित शुरुआती जगह है। जब इस स्तर पर असंतुलन का अनुभव होता है,तो अंग,मांसपेशियां और नसें सद्भाव में काम नहीं करते हैं,बल्कि वे एक-दूसरे के विरोध में कार्य करते हैं।
बाहरी शरीर के बाद योग मानसिक और भावनात्मक स्तरों पर काम करता है। रोज़मर्रा की जिंदगी के तनाव और बातचीत के परिणामस्वरूप बहुत से लोग अनेक मानसिक परेशानियों से पीड़ित रहते हैं। योग इनका इलाज शायद तुरंत नहीं प्रदान करता लेकिन इनसे मुकाबला करने के लिए यह सिद्ध विधि है। हठयोग,जो की योग का सिर्फ़ एक प्रकार है बहुत प्रसिद्ध और प्रचलित हो गया था। लेकिन योग के सही मतलब और संपूर्ण ज्ञान के बारे में जागरूकता अब लगातार बढ़ रही है।

योग का संक्षिप्त इतिहास एवम् विकास -
योग भारतीय ज्ञान की पांच हजार वर्ष से भी अधिक पुरानी शैली है। हालांकि कई लोग योग को केवल शारीरिक व्यायाम ही मानते हैं,लेकिन योग सिर्फ व्यायाम और आसन नहीं है। योग दस हजार साल से भी अधिक समय से प्रचलन में है। इस परंपरा का उल्लेख सबसे पुराने जीवन्त साहित्य ऋग्वेद में पाया जाता है। पतंजलि को योग के पिता के रूप में माना जाता है और उनके योग सूत्र पूरी तरह योग के ज्ञान के लिए समर्पित रहे हैं। योग हमारे लिए कभी भी अनजाना नहीं रहा है अर्थात यह प्रतक्ष्य एवम अप्रतक्षय रूप से हर एक भारतीयों के रगों मे बसा हुया है। हम यह तब से जानते है,जब से दुनिया में भारतीय संस्कृति का विस्तार भी नहीं हुआ था।

योग सिर्फ एक शारीरिक व्यायाम नहीं
योग के बारे में बात करते ही ज्यादातर लोगों को यही मालूम होता है कि ये सिर्फ आसान और सांस से जुड़े व्यायाम हैं,जो कई प्रकारों से किए जाते हैं। अगर आप भी ऐसा ही सोच रहे हैं,तो आप गतल हैं क्योंकि योग इससे कई ऊपर है। ये न सिर्फ वास्तविक है, बल्कि आध्यात्मिक और सिद्धी से भी जुड़ा हुआ है। योग केवल शरीर ही नहीं मन और आत्मा का शुद्धिकरण करके हमें प्रकृति, ईश्वर और स्वयं अपने नजदीक भी लाता है,बल्कि सही मायनों में ये हमें खुद से मिलवाता है। इसी कड़ी में ये जानना भी जरूरी है कि हम जो 'योगासन' करते हैं, वो "अष्टांग योग" का एक अंग मात्र ही है।
योग के प्रकार -
योग के कई अलग-अलग प्रकार हैं, वास्तव में छह प्रकार के योग परंपरागत रूप से अभ्यास किए जाता हैं ।
योग के छह पारंपरिक प्रकार हैं ।
1. राज योग
2. ज्ञान योग
3. कर्म योग
4. भक्ति योग
5. हठ योग
6. कुंडलिनी योग

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