16/09/2026
न्यायालय में मुकदमा लंबित है तो क्या केवल इसी आधार पर #चरित्र_प्रमाण_पत्र रोका जा सकता है?
किसी व्यक्ति के विरुद्ध FIR दर्ज होना और न्यायालय में मुकदमा लंबित होना, अपने-आप में यह साबित नहीं करता कि वह व्यक्ति दोषी है।
इसी महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वर्ष 2025-26 में कई महत्वपूर्ण आदेश पारित किए हैं।
इलाहाबाद हाईकोर्ट का स्पष्ट दृष्टिकोण यह है कि केवल आपराधिक मामले की लंबित होने को आधार बनाकर चरित्र प्रमाण पत्र जारी करने से इंकार नहीं किया जा सकता।
1. FIR दर्ज होना = दोष सिद्ध होना नहीं
किसी व्यक्ति के विरुद्ध FIR दर्ज हो सकती है, आरोपपत्र दाखिल हो सकता है और मुकदमा न्यायालय में लंबित हो सकता है।
लेकिन जब तक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि नहीं होती, केवल FIR या लंबित मुकदमे के आधार पर व्यक्ति को अपराधी मान लेना उचित नहीं है।
इसी संदर्भ में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि लंबित आपराधिक मामले की जानकारी छिपाई नहीं जानी चाहिए, लेकिन उसका अस्तित्व मात्र चरित्र प्रमाण पत्र रोकने का स्वतः आधार भी नहीं बन सकता।
2. Anil Kumar Case — 2025 का महत्वपूर्ण निर्णय
Anil Kumar v. State of U.P. & Others, Neutral Citation 2025:AHC-LKO:32272-DB, दिनांक 28 मई 2025 में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने चरित्र प्रमाण पत्र जारी करने के संबंध में महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश दिए।
कोर्ट ने मूलतः यह व्यवस्था दी कि यदि किसी व्यक्ति के विरुद्ध आपराधिक मामला लंबित है तो प्रमाण पत्र में उस मामले की तथ्यात्मक जानकारी दी जा सकती है।
लेकिन प्रमाण पत्र जारी करने वाली अथॉरिटी को स्वयं यह निष्कर्ष नहीं देना चाहिए कि केवल मुकदमा लंबित होने के कारण व्यक्ति का चरित्र खराब है।
उसके बाद संबंधित नियोक्ता, विभाग, संस्था या लाइसेंस देने वाली अथॉरिटी कानून के अनुसार अपनी स्वतंत्र राय बना सकती है।
3. इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि लंबित मुकदमे का कोई महत्व नहीं
यह अंतर समझना बहुत जरूरी है।
चरित्र प्रमाण पत्र जारी होना और नौकरी/लाइसेंस/ठेका मिलना दो अलग-अलग प्रश्न हैं।
प्रमाण पत्र में यह बताया जा सकता है कि—
मामला किस थाने में दर्ज है,
कौन-सी धाराएं हैं,
मामला जांच में है या न्यायालय में लंबित है,
चार्जशीट दाखिल हुई है या नहीं,
Final Report/Closure Report का क्या स्टेटस है आदि।
इसके बाद जिस विभाग या संस्था को व्यक्ति की suitability तय करनी है, वह उपलब्ध तथ्यों के आधार पर अपना निर्णय ले सकती है।
4. बाद के मामलों में भी हाईकोर्ट ने यही सिद्धांत दोहराया
सितंबर-अक्टूबर 2025 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के विभिन्न आदेशों में इसी सिद्धांत को दोहराया गया।
मसलन, Rajni Kant Shukla, Shailendra Kumar Sharma, Satyendra Kumar, Sachin Gupta और अन्य मामलों में न्यायालय ने निर्देश दिए कि केवल FIR लंबित होने के आधार पर चरित्र प्रमाण पत्र रोकने के बजाय FIR/आपराधिक मामले का विवरण प्रमाण पत्र में अंकित किया जाए।
5. 2026 में Bharat Lal Gupta मामले ने स्थिति को और स्पष्ट किया
Bharat Lal Gupta v. State of U.P. & Another, Neutral Citation 2026:AHC:156387-DB, निर्णय दिनांक 28 जुलाई 2026, में इलाहाबाद हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने कहा कि IPC की धारा 323, 504 और 506 के अंतर्गत लंबित मामले के कारण मात्र चरित्र प्रमाण पत्र का आवेदन अस्वीकार नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने जिला मजिस्ट्रेट द्वारा किया गया rejection order quash करते हुए निर्धारित प्रारूप में प्रमाण पत्र जारी करने का निर्देश दिया।
6. सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण सिद्धांत
सुप्रीम कोर्ट के Avtar Singh v. Union of India, (2016) 8 SCC 471 के सिद्धांतों का भी इस क्षेत्र में महत्व है।
इसमें विशेष रूप से यह बात महत्वपूर्ण है कि अभ्यर्थी द्वारा गिरफ्तारी, आपराधिक मामला, conviction, acquittal अथवा pending case से संबंधित मांगी गई जानकारी सत्य होनी चाहिए और उसे छिपाया नहीं जाना चाहिए।
अर्थात कानून का संदेश दो तरफा है—मुकदमा लंबित है इसलिए व्यक्ति को दोषी मत मानिए।
लेकिन—मुकदमा लंबित है तो उसे छिपाइए भी मत।
निष्कर्ष
चरित्र प्रमाण पत्र का उद्देश्य यह नहीं है कि प्रमाण पत्र जारी करने वाला अधिकारी लंबित मुकदमे में व्यक्ति को दोषी या निर्दोष घोषित कर दे।
उसका काम उपलब्ध तथ्यात्मक जानकारी को प्रमाण पत्र में सही रूप में रखना है।
दोष सिद्ध करना न्यायालय का काम है।
चरित्र संबंधी उपलब्ध तथ्यों की रिपोर्ट करना संबंधित प्राधिकारी का काम है।
और—नौकरी, लाइसेंस, ठेका अथवा अन्य लाभ के लिए व्यक्ति की suitability तय करना संबंधित विभाग/संस्था का वैधानिक निर्णय हो सकता है।
इसलिए केवल यह कहना कि—
“इसके विरुद्ध मुकदमा चल रहा है, इसलिए चरित्र प्रमाण पत्र नहीं दिया जाएगा”
इलाहाबाद हाईकोर्ट के उपर्युक्त निर्णयों के प्रकाश में कानूनी रूप से टिकाऊ आधार नहीं माना जा सकता, हालांकि प्रत्येक मामले में लागू सेवा नियम, सरकारी आदेश, अपराध की प्रकृति और संबंधित पद/लाइसेंस की वैधानिक शर्तें अलग से देखना आवश्यक होगा।
कानून का मूल सिद्धांत यही है:
“लंबित मुकदमा सूचना हो सकता है, दोषसिद्धि नहीं।”
और यही अंतर आरोप और अपराध सिद्ध होने के बीच कानून की सबसे महत्वपूर्ण रेखा है।