Pooja Vishwakarma

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Pooja Vishwakarma Advocate at District Courts || High Courts || Supreme Court of India. Love Advocacy

AOR Examination December 2026
27/09/2026

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24/09/2026

23/09/2026

7 साल तक की सजा के अपराध मे अब कस्टडी नही ली जाएगी
22/09/2026

7 साल तक की सजा के अपराध मे अब कस्टडी नही ली जाएगी

उत्तर प्रदेश में न्याय व्यवस्था को मिलेगी नई रफ्तार900 नए न्यायालयों का होगा शुभारंभ9,084 पदों के सृजन को मिली स्वीकृति6...
19/09/2026

उत्तर प्रदेश में न्याय व्यवस्था को मिलेगी नई रफ्तार

900 नए न्यायालयों का होगा शुभारंभ
9,084 पदों के सृजन को मिली स्वीकृति

6,656 नियमित पद — आशुलिपिक, कनिष्ठ लिपिक एवं ग्रुप-D
2,428 आउटसोर्सिंग पद

न्यायिक ढांचे के विस्तार से बढ़ेंगी सुविधाएं और रोजगार के अवसर।

16/09/2026

न्यायालय में मुकदमा लंबित है तो क्या केवल इसी आधार पर #चरित्र_प्रमाण_पत्र रोका जा सकता है?

किसी व्यक्ति के विरुद्ध FIR दर्ज होना और न्यायालय में मुकदमा लंबित होना, अपने-आप में यह साबित नहीं करता कि वह व्यक्ति दोषी है।

इसी महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वर्ष 2025-26 में कई महत्वपूर्ण आदेश पारित किए हैं।

इलाहाबाद हाईकोर्ट का स्पष्ट दृष्टिकोण यह है कि केवल आपराधिक मामले की लंबित होने को आधार बनाकर चरित्र प्रमाण पत्र जारी करने से इंकार नहीं किया जा सकता।

1. FIR दर्ज होना = दोष सिद्ध होना नहीं

किसी व्यक्ति के विरुद्ध FIR दर्ज हो सकती है, आरोपपत्र दाखिल हो सकता है और मुकदमा न्यायालय में लंबित हो सकता है।

लेकिन जब तक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि नहीं होती, केवल FIR या लंबित मुकदमे के आधार पर व्यक्ति को अपराधी मान लेना उचित नहीं है।

इसी संदर्भ में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि लंबित आपराधिक मामले की जानकारी छिपाई नहीं जानी चाहिए, लेकिन उसका अस्तित्व मात्र चरित्र प्रमाण पत्र रोकने का स्वतः आधार भी नहीं बन सकता।

2. Anil Kumar Case — 2025 का महत्वपूर्ण निर्णय

Anil Kumar v. State of U.P. & Others, Neutral Citation 2025:AHC-LKO:32272-DB, दिनांक 28 मई 2025 में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने चरित्र प्रमाण पत्र जारी करने के संबंध में महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश दिए।

कोर्ट ने मूलतः यह व्यवस्था दी कि यदि किसी व्यक्ति के विरुद्ध आपराधिक मामला लंबित है तो प्रमाण पत्र में उस मामले की तथ्यात्मक जानकारी दी जा सकती है।

लेकिन प्रमाण पत्र जारी करने वाली अथॉरिटी को स्वयं यह निष्कर्ष नहीं देना चाहिए कि केवल मुकदमा लंबित होने के कारण व्यक्ति का चरित्र खराब है।

उसके बाद संबंधित नियोक्ता, विभाग, संस्था या लाइसेंस देने वाली अथॉरिटी कानून के अनुसार अपनी स्वतंत्र राय बना सकती है।

3. इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि लंबित मुकदमे का कोई महत्व नहीं

यह अंतर समझना बहुत जरूरी है।

चरित्र प्रमाण पत्र जारी होना और नौकरी/लाइसेंस/ठेका मिलना दो अलग-अलग प्रश्न हैं।

प्रमाण पत्र में यह बताया जा सकता है कि—

मामला किस थाने में दर्ज है,
कौन-सी धाराएं हैं,
मामला जांच में है या न्यायालय में लंबित है,
चार्जशीट दाखिल हुई है या नहीं,
Final Report/Closure Report का क्या स्टेटस है आदि।

इसके बाद जिस विभाग या संस्था को व्यक्ति की suitability तय करनी है, वह उपलब्ध तथ्यों के आधार पर अपना निर्णय ले सकती है।

4. बाद के मामलों में भी हाईकोर्ट ने यही सिद्धांत दोहराया

सितंबर-अक्टूबर 2025 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के विभिन्न आदेशों में इसी सिद्धांत को दोहराया गया।

मसलन, Rajni Kant Shukla, Shailendra Kumar Sharma, Satyendra Kumar, Sachin Gupta और अन्य मामलों में न्यायालय ने निर्देश दिए कि केवल FIR लंबित होने के आधार पर चरित्र प्रमाण पत्र रोकने के बजाय FIR/आपराधिक मामले का विवरण प्रमाण पत्र में अंकित किया जाए।

5. 2026 में Bharat Lal Gupta मामले ने स्थिति को और स्पष्ट किया

Bharat Lal Gupta v. State of U.P. & Another, Neutral Citation 2026:AHC:156387-DB, निर्णय दिनांक 28 जुलाई 2026, में इलाहाबाद हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने कहा कि IPC की धारा 323, 504 और 506 के अंतर्गत लंबित मामले के कारण मात्र चरित्र प्रमाण पत्र का आवेदन अस्वीकार नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने जिला मजिस्ट्रेट द्वारा किया गया rejection order quash करते हुए निर्धारित प्रारूप में प्रमाण पत्र जारी करने का निर्देश दिया।

6. सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण सिद्धांत

सुप्रीम कोर्ट के Avtar Singh v. Union of India, (2016) 8 SCC 471 के सिद्धांतों का भी इस क्षेत्र में महत्व है।

इसमें विशेष रूप से यह बात महत्वपूर्ण है कि अभ्यर्थी द्वारा गिरफ्तारी, आपराधिक मामला, conviction, acquittal अथवा pending case से संबंधित मांगी गई जानकारी सत्य होनी चाहिए और उसे छिपाया नहीं जाना चाहिए।

अर्थात कानून का संदेश दो तरफा है—मुकदमा लंबित है इसलिए व्यक्ति को दोषी मत मानिए।

लेकिन—मुकदमा लंबित है तो उसे छिपाइए भी मत।

निष्कर्ष

चरित्र प्रमाण पत्र का उद्देश्य यह नहीं है कि प्रमाण पत्र जारी करने वाला अधिकारी लंबित मुकदमे में व्यक्ति को दोषी या निर्दोष घोषित कर दे।

उसका काम उपलब्ध तथ्यात्मक जानकारी को प्रमाण पत्र में सही रूप में रखना है।

दोष सिद्ध करना न्यायालय का काम है।

चरित्र संबंधी उपलब्ध तथ्यों की रिपोर्ट करना संबंधित प्राधिकारी का काम है।

और—नौकरी, लाइसेंस, ठेका अथवा अन्य लाभ के लिए व्यक्ति की suitability तय करना संबंधित विभाग/संस्था का वैधानिक निर्णय हो सकता है।

इसलिए केवल यह कहना कि—
“इसके विरुद्ध मुकदमा चल रहा है, इसलिए चरित्र प्रमाण पत्र नहीं दिया जाएगा”

इलाहाबाद हाईकोर्ट के उपर्युक्त निर्णयों के प्रकाश में कानूनी रूप से टिकाऊ आधार नहीं माना जा सकता, हालांकि प्रत्येक मामले में लागू सेवा नियम, सरकारी आदेश, अपराध की प्रकृति और संबंधित पद/लाइसेंस की वैधानिक शर्तें अलग से देखना आवश्यक होगा।

कानून का मूल सिद्धांत यही है:

“लंबित मुकदमा सूचना हो सकता है, दोषसिद्धि नहीं।”

और यही अंतर आरोप और अपराध सिद्ध होने के बीच कानून की सबसे महत्वपूर्ण रेखा है।

Same Role Same Mission
14/09/2026

Same Role Same Mission

13/09/2026

⚖️ Domestic Violence Act, 2005 की Section 12 | क्या पति और पत्नी दोनों DV Case कर सकते हैं? सच्चाई जानिए!

बहुत लोगों को लगता है कि Domestic Violence Act में पति और पत्नी दोनों एक-दूसरे के खिलाफ Section 12 का Case कर सकते हैं।

❌ लेकिन कानून की सही स्थिति कुछ अलग है।

📌 Protection of Women from Domestic Violence Act, 2005 की Section 12 के तहत application वही “aggrieved person” महिला या उसकी ओर से Protection Officer/अन्य व्यक्ति Magistrate के सामने प्रस्तुत कर सकता है।

👉 इसलिए पत्नी इस Act के तहत अपने पति/ससुराल पक्ष के खिलाफ DV proceedings शुरू कर सकती है।

⚠️ लेकिन पति स्वयं इस Act की Section 12 के तहत “aggrieved person” बनकर अपनी पत्नी के खिलाफ DV Case नहीं कर सकता, क्योंकि इस कानून का उद्देश्य domestic violence से महिलाओं की protection है।

⚖️ एक और महत्वपूर्ण बात:
DV Act में respondent केवल पुरुष ही हो, ऐसा भी जरूरी नहीं है।

Hiral P. Harsora v. Kusum Narottamdas Harsora (2016) में Supreme Court ने Section 2(q) में “adult male” वाली limitation को unconstitutional माना। यानी परिस्थितियों के अनुसार महिला relative भी respondent हो सकती है।

⚖️ Krishna Bhattacharjee v. Sarathi Choudhury (2015) में Supreme Court ने Section 12 के proceedings में Stridhan और economic abuse से जुड़े महत्वपूर्ण principles को भी स्पष्ट किया।

💡 आम लोगों के लिए सबसे जरूरी बात:
अगर पति के साथ पत्नी द्वारा हिंसा, धमकी, harassment या अन्य matrimonial abuse हो रहा है, तो इसका मतलब यह नहीं कि पति के पास कोई कानूनी remedy नहीं है। लेकिन उस remedy को DV Act Section 12 कहना सही नहीं होगा। पति को facts के अनुसार दूसरे उपलब्ध कानूनी remedies का सहारा लेना होगा।

कानून को सही समझना जरूरी है—गलत Section में Case करने से बेहतर है सही legal remedy चुनना। ⚖️

20/06/2026

सभी बार कौंसिल, सभी बार एसोसिएशन और समस्त अधिवक्ताओं को गंभीर होने की जरूरत......
⚖️ सुप्रीम कोर्ट में एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका पर सुनवाई हुई, जिसमें पूरे देश में वकीलों के लिए एक राष्ट्रीय डिजिटल रजिस्ट्री बनाने और उनके पेशेवर आचरण को लेकर सोशल मीडिया कोड लागू करने की मांग उठाई गई है। यह मामला W.P.(C) No. 727/2026, Bar Association of India & Anr. बनाम Union of India & Ors. के तहत सुना गया, जिसकी सुनवाई Supreme Court of India में हुई। इस पीठ में मुख्य न्यायाधीश CJI सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल रहे।

याचिका में मांग की गई है कि पूरे देश के अधिवक्ताओं का एक केंद्रीकृत डिजिटल डेटाबेस बनाया जाए, जिसे National Digital Registry for the Legal Profession of India (NDRLP) कहा गया है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि फर्जी या अप्रमाणित वकीलों की पहचान हो सके और कानूनी व्यवस्था में पारदर्शिता बढ़े। इसके साथ ही यह भी सुझाव दिया गया है कि हर वकील के लिए एक यूनिक नेशनल एडवोकेट आइडेंटिफायर और QR-आधारित वेरिफ़ायबल प्रोफाइल सिस्टम लागू किया जाए, जिससे उनकी योग्यता और स्टेटस तुरंत जांचा जा सके।

सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि न्याय व्यवस्था की मजबूती के लिए सबसे जरूरी है युवा वकीलों को सशक्त बनाना और उन्हें पर्याप्त अवसर तथा प्रशिक्षण देना, ताकि वे मुख्यधारा में आ सकें। उन्होंने यह भी कहा कि सोशल मीडिया पर कुछ ऐसे उदाहरण देखने को मिलते हैं जिनका कानून या पेशेवर आचरण से कोई संबंध नहीं होता, हालांकि यह भी जरूरी है कि सभी को एक ही दृष्टि से न देखा जाए क्योंकि अधिकतर अधिवक्ता अपने पेशे के प्रति जिम्मेदार होते हैं।

याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर वकीलों के आचरण को लेकर एक स्पष्ट गाइडलाइन होनी चाहिए, क्योंकि जब कोई अधिवक्ता सार्वजनिक रूप से बोलता है तो उसकी बात को लोग अधिक गंभीरता से लेते हैं। वहीं Bar Council of India की भूमिका को भी इस पूरे मुद्दे में महत्वपूर्ण माना गया है, क्योंकि यही संस्था देश में वकालत के पेशेवर मानकों और नैतिकता को नियंत्रित करती है।

सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इस मामले में सभी संबंधित पक्षों को नोटिस जारी करते हुए कहा है कि पहले एक व्यावहारिक और तकनीकी रूप से मजबूत मॉडल तैयार किया जाए, जिसके बाद आगे की कार्यवाही पर विचार होगा। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि जरूरत पड़ने पर एक नई समिति का गठन भी किया जा सकता है।

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