Advocate Rahul Dwivedi

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01/09/2023

हापुड़ उत्तर प्रदेश प्रकरण..अधिवक्ताओं का सम्मान जरूरी..
जब अपने दुश्मनी निभाते है तब वकील ही साथ देता है..🙏❤️🙏

18/03/2021

All criminal,civil,revenue cassese

21/09/2019

परिवर्तन किसी व्यक्ति की देन नहीं वरन आप चलने वाली प्रक्रिया है जिसका एहसास वक्त पर होता है

14/05/2019
10/02/2019

कुछ भी हो हर पल अनुभव कुछ नया सिखा कर जाता है

06/01/2019

जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है चोट लगती है अपने पराए का एहसास होने लगता है अनुभव सब सिखा देता है🙏🙏🙏🙏🙏

08/09/2018

बांटते जाइए बढ़ाते जाइए जातीय संघर्ष वर्ग संघर्ष
डकैती चोरी बलात्कार जैसी घटनाएं अब अपराध की श्रेणी में नहीं वर्तमान में सबसे महत्वपूर्ण अपराध हरिजन एक्ट के दायरे में किसी अन्य अपराध को रोकने के लिए किसी भी प्रकार का सतत प्रयास आवश्यक नहीं पर हरिजन एक्ट के दुरुपयोग को बढ़ाने के लिए लगातार मेहनत जारी
सामाजिक ताने-बाने का नए सिरे से निर्माण शुरू
समाज के लोगों ने भी कहना शुरू कर दिया कि अब हम सिर्फ अपनी जाति के मौत मिट्टी शादी विवाह में ही जाएंगे गैर जाति-धर्म के यहां जाना अपराध😀🙏

07/02/2018

🚩जय श्री कृष्णा🚩

जीवन निर्वाह के नियमों को संतुलन में रखने वाली निर्धारित सीमा रेखा को मर्यादा कहा जाता है, जीवन निर्वाह के सभी विषयों एवं सम्बन्धों के नियम निर्धारित होते हैं, ताकि इन्सान का जीवन सुचारू रूप से गतिमान रहे, तथा उन नियमों के द्वारा जीवन का संतुलन बनाए रखने के लिये सीमा तय होती है, ताकि जीवन में किसी प्रकार का असंतुलन ना हो ऐसे नियमों की निर्धारित रेखा को ही मर्यादा कहा गया है।
मर्यादा पालन करना इन्सान के लिए अनिवार्य है, क्योंकि मर्यादा भंग होने अर्थात सीमा रेखा को लांघकर नियमों की अनदेखी करने से इन्सान के जीवन में अनेकों प्रकार की समस्यायें उत्पन्न हो जाती हैं, जिसके कारण जीवन निर्वाह अत्यंत कठिन हो जाता है, जो इन्सान मर्यादा को भलीभांति समझते हैं, तथा पालन करते हैं, उनके जीवन से समस्यायें हमेशा दूर रहती हैं, तथा उनका जीवन आनन्द पूर्वक निर्वाह होता है।
सज्जनों! इन्सान को सर्वप्रथम अपनी मर्यादाएं समझना आवश्यक है, क्योंकि एक पूर्ण मर्यादित इन्सान ही परिवार एवं समाज में सम्मानित जीवन निर्वाह कर सकता है, इन्सान की मर्यादा स्वभाव, व्यवहार एवं आचरण पर निर्भर करती है, इन्सान का स्वभाव भाषा, शब्दों एवं वाणी द्वारा समझा जाता है, सरल भाषा, कर्ण प्रिय शब्द तथा मधुर वाणी इन्सान के स्वभाव की मर्यादा है, जिसे लांघने से इन्सान कटु स्वभाविक समझा जाता है।
दूसरों का सम्मान करने वाला समाज में व्यवहारिक माना जाता है, अधिक बहस करना, आलोचनायें या चापलूसी करना, प्रताड़ित करना, बकवास करना अथवा बात-बात पर टोकना व्यवहार की मर्यादा भंग करना है, जो समाज में इन्सान को अव्यवहारिक प्रमाणित करती है, आचरण की मर्यादा इन्सान के अपराधी होने से ही भंग नहीं होती, अपितु झूट बोलने, बुराई का साथ देने, उधार लेकर ना चुकाने, बहाने बनाने, आवश्यकता पड़ने पर गायब होने, नशा करने, जुआ, सट्टा जैसे अनुचित कार्य करने जैसे अनेकों कारण भी खराब आचरण प्रस्तुत करते हैं।
इन्सान के जीवन में परिवार की मर्यादा बनायें रखना भी अत्यंत आवश्यक होता है, परिवार से जितना अधिकार प्राप्ति का होता है उतना ही कर्तव्य परिवार को प्रदान करने का भी होता है, परिवार द्वारा शिक्षा, परवरिश, गृहस्थ जीवन एवं सुरक्षा प्राप्त होती है तो परिवार की सेवा तथा सुखों का ध्यान रखना भी इन्सान का कर्तव्य है, कोई भी ऐसा कार्य जिससे परिवार के सम्मान में हानि पहुँचे परिवार की मर्यादा भंग करना होता है, जिसके कारण परिवार उसे दोषी समझता है।
इन्सान की परिवार के प्रति कर्तव्य परायणता एवं सम्मान में वृद्धि आवश्यक मर्यादा है, जिसे पूर्ण करने पर ही परिवार में सम्मान प्राप्त होता है, रिश्तों एवं सम्बन्धों की मर्यादा निभाने पर ही रिश्ते कायम रहते हैं, रिश्तों को समय ना देना अथवा रिश्तों पर आवश्यकता से अधिक समय बर्बाद करना रिश्तों को खोखला करना है, इसलिये रिश्तों की मर्यादा बनाए रखना आवश्यक होता है, रिश्ता कितना भी प्रिय हो निजी कार्यों में दखल देना रिश्ते की मर्यादा भंग करना है।
क्योंकि इन्सान के निजी एवं गुप्त कार्यों में बिना अनुमति किर्याशील होना दखल समझा जाता है, तथा समाज ने किसी को भी किसी के जीवन में अनुचित दखल देने की अनुमति नहीं दी है, रिश्ते बुरे समय में सर्वाधिक सहायक होते हैं, परन्तु नित्य रिश्तों से सहायता की आशा रखना भी रिश्तों की मर्यादा भंग करना है, क्योंकि रिश्ते सहायक अवश्य हैं उन्हें व्यापार बनाने से उनका अंत निश्चित होता है।
सज्जनों! इन्सान के परिवारिक सम्बन्धों के अतिरिक्त समाज में सबसे प्रिय सम्बन्ध मित्रता का होता है, जो कभी-कभी परिवारिक रिश्तों से भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है, मित्रता वैचारिक सम्बन्ध है, अर्थात जिससे विचार मिलते हैं इन्सान उसे मित्र बना लेता है, मित्र कितना भी प्रिय हो यदि वह मर्यादा लांघने की धृष्टता करता है तो सम्बन्ध विच्छेद हो जाते हैं, मित्रता में आयु, शिक्षा एवं धन की समानता आवश्यक नहीं होती सिर्फ विचार समान होने पर ही मित्रता कायम रह सकती है।
मित्र का अधिक समय नष्ट करना, बार-बार व असमय घर जाना, निजी जीवन में दखल देना, नित्य सहायता की अपेक्षा करना, अनावश्यक खर्च करवाना, अनुचित शब्दों का उपयोग करना, अधिक परिहास करना जैसे कार्य मित्रता की मर्यादा भंग करते हैं जिसके कारण मित्रता में कटुता उत्पन्न हो जाती है, सम्बन्ध कितना भी प्रिय हो मर्यादाओं का पालन ही उसे सुरक्षित रख सकता है।
इंसानों की तरह विषयों की भी अपनी मर्यादायें होती हैं, जिनका पालन करने से जीवन निर्वाह सरल एवं आनन्दमय हो जाता है, इन्सान के जीवन में सबसे अधिक प्रभाव विश्वास का होता है, क्योंकि विश्वास के बगैर किसी भी इन्सान से सम्बन्ध या कार्य असंभव हो जाता है, विश्वास के कारण ही धोखे का आरम्भ है, तथा अन्धविश्वास हो तो धोखा निश्चित होता है, इसलिये विश्वास की मर्यादा सावधानी पूर्वक विश्वास करना है सावधानी की मर्यादा लांघते ही विश्वास का विश्वासघात बन जाता है।
इन्सान का शक करना जब तक मर्यादा में होता है वह इन्सान को सतर्क रखता है परन्तु मर्यादा लांघते ही शक सनक बन जाता है जो प्रेम, विश्वास, श्रद्धा का अंत कर देता है, मोह, लोभ, काम, क्रोध, अहंकार, ईर्षा, घृणा, कुंठा, निराशा, आक्रोश, प्रेम, श्रद्धा, शक, विश्वास, ईमानदारी, परोपकार, दान, भीख, चंदा, स्वार्थ, चापलूसी, आलोचना, बहस, तर्क, कोई भी विषय हो जब तक मर्यादा में रहता है कभी हानिप्रद नहीं होता, परन्तु मर्यादा भंग होते ही समस्या अथवा मुसीबत बन जाता है।
अग्नि, जल एवं वायु संसार को जीवन प्रदान करते हैं, परन्तु अपनी मर्यादा लांघते ही प्रलयंकारी बन जाते हैं, जिसका परिणाम सिर्फ तबाही होता है, इन्सान जब तक मर्यादाओं का पालन करता है वह सुखी एवं संतुलित जीवन निर्वाह करता है, भाई-बहनों! किसी भी प्रकार की मर्यादा भंग करने से किसी ना किसी इन्सान से द्वेष आरम्भ हो जाता है तथा समस्यायें उत्पन्न होना आरम्भ हो जाती है

💕जय श्री कृष्णा💕

🙏🙏🙏🙏

04/02/2018

🙏🏻🚩🌹 👁❗👁 🌹🚩🙏🏻

*भगवान रक्षा करते है पर कोई उनके श्री चरणों में भरोसा तो रखे.......🙏🙏🙏*

चमत्कार उसी को दिखाई देंगे जिसका भरोसा बड़ा पक्का होगा, जिसकी आस्था में कमी नहीं होगी उसको चमत्कार दिखाई देंगे ।
*आपने शायद कभी सुना होगा ये प्रसंग -*
जब महाभारत का युद्ध प्रारम्भ हो रहा था, इधर से पांड़वो की सेना तैयार थी उधर से कौरवो की सेना तैयार थी।

दोनों सेनाएं आपस में टकराने के लिए बिल्कुल तैयार थी तो उस समय युद्ध क्षेत्र बीच में एक चिड़िया के अंडे पड़े हुए थे।

उस चिड़िया ने अभी-अभी वो अंडे दिए थे और उसकी आँखों में आंसू थे, वो रो रही थी कि दोनों तरफ से सेनाएं आपस मे टकराएगी और मेरे ये बच्चे तो संसार में आने से पहले ही खत्म हो जाएंगे। उस चिडिया ने इस दुख की घडी मे भगवान से विनती की "हे ! प्रभु जिसकी कोई नहीं सुनता उसकी तो आप सुनते हो।"

"तुझसे ना सुलझे तेरे उलझे हुए धंधे
तो मेरे *बांके बिहारी* पे छोड़ दे बन्दे"
वो ही तेरी मुश्किल आसान करेंगे
और जो तू ना कर सका वो मेरे भगवान करेंगे।

उस छोटी सी चिड़िया ने भगवान से प्रार्थना की प्रभु अब तो आप ही कुछ कर सकते है और उसी समय युद्ध प्रारम्भ हुआ।

दोनों सेनाएं परस्पर टकराई, महा भयंकर युद्ध हुआ। बडे-बडे महारथी युद्ध मे मारे गये। चारो तरफ सैनिको के लाशो के ढेर थे। महाभारत युद्ध के उपरांत अर्जुन के रथ को लेकर श्रीकृष्ण कुरुक्षेत्र की भूमि से निकलकर जा रहे है, पांडव युद्ध जीत चुके है।

भगवान अर्जुन के रथ को लेकर जा रहे है तो नीचे भूमी पर एक रथ का घंटा पड़ा हुआ है। भगवान के हाथ में घोड़ो को हांकने वाला चाबुक है।

भगवान ने उस पड़े हुए घंटे पे‌ जोर से चाबुक को मारा तो वो घंटा पलट गया और जैसे ही वो घंटा पलटा तो उसके अंदर से चिड़िया के नन्हे बच्चे फुदकते हुए बाहर निकले और उड़कर वहां से चले गए।

ये सत्य घटना है, महाभारत में ये प्रसंग आया है। ये देखकर अर्जुन को बड़ा आश्चर्य हुआ और अर्जुन भगवान से बोले "केशव ! ये मैं क्या देख रहा हूँ? इतना भीषण युद्ध जो ना पहले कभी हुआ और ना आगे शायद होगा। ऐसा ये भीषण महाभारत युद्ध जिसमे भीष्म पितामह, कर्ण और गुरु द्रौण, जैसे योद्धा नहीं बचे। जिस युद्ध में दुर्योधन जैसे बलशाली नहीं बचे। ऐसे भीषण संग्राम में इन चिड़िया के बच्चों की रक्षा किसने की ?"

तो भगवान मुस्कुराने लगे और बोले "अर्जुन ! अभी भी नहीं समझा ? अरे पगले जिसने तुझे बचाया है, उसने ही तो इनको बचाया है।
राहुल कुमार द्विवेदी अधिवक्ता मौदहा हमीरपुर उत्तर प्रदेश

25/01/2018

राधे राधे ॥ भगवद चिन्तन ॥

प्रश्न सत्य के मिलने या ना मिलने का नहीं है। सवाल तुम्हारे सत्य होने का है, तुम अभी सत्य को उपलब्ध हुए या नहीं। बिना सत्य को जीये परमात्मा मिलेगा भी नहीं।

जैसे पानी-पानी चिल्लाने से किसी की प्यास नहीं बुझ सकती। बैसे ही सत्य-सत्य कहने से कोई सत्य को अनुभव नहीं कर सकता। ""प्रकाशे क्वापि पात्रे " नारद भक्ति सूत्र में वर्णन आया है कि वह प्रकाश किसी विरले ( पात्र ) को ही प्राप्त होता है।

तुम केवल अपने जीवन के असत्य को, गंदगी को , तमस को छोड़ने का चिंतन करो बस। सत्य खोजना नहीं है, तुम्हें सत्य होना है। तुम सत्य लेकर पैदा हुए हो, तुम उसे लिए बैठे हो। ईस्वर कोई दृश्य, वस्तु, या पदार्थ नहीं है जो तुरंत मिल जायेगा। ईश्वर अनुभूति का विषय है। वह उन्हीं को मिलता है जो जिन्दगी दांव पर लगाने का तैयार होते हैं।

11/01/2018

अदृश्य खुशियाँ :-✍
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एक आदमी के पास बहुत सारा धन था। इतना कि अब और धन पाने से कुछ सार नहीं था। जितना था, उसका भी उपयोग नहीं हो रहा था। मौत करीब आने लगी थी। न बेटे थे, न बेटियां थीं, कोई आगे पीछे न था। और जीवन धन बटोरने में बीत गया था।।
वह तथाकथित महात्माओं के पास पहुँचा,और बोला मुझे कुछ आनंद का सूत्र दो। उसने तथाकथित महात्मा, पंडित, पुरोहित, सब के द्वार खटखटाया और आनंद प्राप्त करने की इच्छा प्रकट की लेकिन खाली हाथ ही लौटा। फिर किसी ने कहा कि एक साधु महात्मा को हम जानते हैं, शायद वही कुछ कर सके।
अगर कोई समस्या का समाधान न मिले तो, जिनका कोई इलाज ना हो तब हम उस साधु महात्मा के वहां भेज देते हैं। उनके पास सुनिश्चित कोई ना कोई उपाय जरूर मिलता है।।
उस धनी ने एक बड़ी झोली भरी हीरे—जवाहरातों की और उन साधु महात्मा के पास चल दिये। साधु महात्मा एक बड़े से झाड़ के निचे आराम कर रहे थे। उस धनी ने झोली उसके सामने रखकर कहा कि महाराज इतने हीरे—जवाहरात मेरे पास हैं, मगर सुख का कण भी मेरे पास नहीं। मैं कैसे सुखी होऊं?
साधु महात्मा ने आव देखा न ताव, झोली उठाई और भागा! वह आदमी तो एक क्षण समझ ही नहीं पाया कि यह क्या हो रहा है। महात्मागण ऐसा नहीं करते! एक क्षण तो ठिठका रहा, अवाक! फिर उसे होश आया कि इस साधु महात्माने तो लूट लिया, मारे गए, सारी जिंदगी भर की कमाई ले भागा। हम सुख की तलाश में आए थे, और दुःखी हो गए। भागा, चिल्लाया कि लुट गया, बचाओ! चोर है, बेईमान है, भागा जा रहा है!
पूरे गांव में उस साधु महात्मा ने चक्कर लगवाया। साधु महात्मा को गांव का हर गली—कूंचे से पहचान थी, इधर से निकले, उधर से निकल जाए। भीड़ भी पीछे हो ली-भीड़ तो साधु महात्मा को जानती थी! कि जरूर कोई विधि होगी ! गांव तो साधु महात्मा से परिचित था, उसके ढंगों से परिचित था।
धीरे—धीरे सब आश्वस्त हो गया था कि वह जो भी करे, वह चाहे कितना बेबूझ मालूम पड़े, भीतर कुछ राज जरूर होता है।
लेकिन उस आदमी को तो कुछ पता नहीं था। वह पसीना—पसीना, कभी भागा भी नहीं था जिंदगी में इतना, साधु महात्मा वहीं जगह वापस आये जहां पर वह धनी इन्सान उसे मिला था, वह धनी व्यक्ति भी भागता हुआ, दौड़ाता हुआ, पसीने से लथपथ करता हुआ वापिस अपने झाड़ के पास लौट आया।
साधु महात्मा ने थैली वहीं रख दी और झाड़ के पीछे छिप कर खड़ा हो गया। वह आदमी लौटा; झोला पड़ा था, उसने झोला उठा कर छाती से लगा लिया और कहा कि हे परवरदिगार! हे परमात्मा! तेरा शुक्र है! तेरा धन्यवाद!
आज मुझ जैसा प्रसन्न इस दुनिया में कोई भी नहीं! साधु महात्मा वृक्ष के उस तरफ से और बोला, कहा : कुछ सुख मिला?
हम सब लोग ऐसे ही हैं। हम जिसे गंवाते हैं, उसका मूल्य बाद में पता चलता है। जब तक गंवाते नहीं तब तक मूल्य पता नहीं चलता। जो हम को मिला है उसकी हम सब को दो कौड़ी भी कीमत नहीं है। जो खो गया, उसके लिए हम सब रोते हो। जो खो गया, उसका अभाव खलता है।यही हम सब के साथ भी है मित्रों।।✍
जय श्री हरि

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