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पत्नी की व्हाट्सएप चैट और कॉल रिकॉर्डिंग को साक्ष्य माना जा सकता है:-हाईकोर्टछत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़...
14/02/2026

पत्नी की व्हाट्सएप चैट और कॉल रिकॉर्डिंग को साक्ष्य माना जा सकता है:-हाईकोर्ट

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि पत्नी की व्हाट्सएप चैट और कॉल रिकॉर्डिंग को पारिवारिक न्यायालय साक्ष्य के रूप में स्वीकार कर सकता है।

मामले में पति ने विवाह विवाद के दौरान पत्नी की कुछ व्हाट्सएप चैट और कॉल रिकॉर्डिंग को रिकॉर्ड पर लेने की मांग की थी। पत्नी की ओर से इसे निजता का उल्लंघन बताया गया। पारिवारिक न्यायालय द्वारा साक्ष्य स्वीकार किए जाने के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी।

हाईकोर्ट ने पारिवारिक न्यायालय के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा कि न्यायालय के पास यह अधिकार है कि वह विवाद के उचित निपटारे के लिए आवश्यक साक्ष्य स्वीकार करे। अदालत ने स्पष्ट किया कि निजता का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन यह पूर्ण रूप से निरपेक्ष नहीं है। यदि किसी मामले के न्यायपूर्ण निर्णय के लिए इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य प्रासंगिक हैं, तो उन्हें केवल निजता के आधार पर अस्वीकार नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने यह भी कहा कि पारिवारिक न्यायालयों को साक्ष्य के मामले में लचीला दृष्टिकोण अपनाने का अधिकार है, ताकि मामले के वास्तविक तथ्यों तक पहुंचा जा सके।

07/02/2026
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07/02/2026
07/02/2026
07/02/2026

👉क्या किसी भी कोर्ट केस(सिविल/ क्रिमिनल) का समझौता किसी भी स्टेज पर किया जा सकता है?

✍️हाँ, कोर्ट केस (दीवानी या कुछ आपराधिक) का समझौता किसी भी स्टेज पर हो सकता है ‘

* दीवानी मामले में समझौता सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश XXIII नियम 3 के तहत कभी भी हो सकता है, चाहे वह संपत्ति का मामला हो या परिवार का।

* आपराधिक मामले में समझौते योग्य (Compoundable) अपराधों में कभी भी समझौता हो सकता है। गंभीर या गैर-समझौता योग्य (Non-compoundable) मामलों में, उच्च न्यायालय (High Court) के माध्यम से समझौता (FIR रद्द हो सकता है ).

* कहने का मतलब यह है कि कभी भी कोर्ट केस का समझौता करके खत्म किया जा सकता है जैसे कि केस फाइल करने से पहले, ट्रायल के दौरान, या फैसले (Judgement/Appeal) के बाद भी। आपसी सहमति होने पर पक्षकार कभी भी सुलह कर सकते हैं।

तरीका :- आपसी समझौता अदालत के बाहर कोर्ट केस करने से पहले , समझौता अदालत में, लोक अदालत के माध्यम से, या मध्यस्थता (Mediation/Conciliation) द्वारा किया जा सकता है।

विवाह पूर्व संबंधों से जन्मी संतान के भरण-पोषण की जिम्मेदारी पिता की:-छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह ...
07/02/2026

विवाह पूर्व संबंधों से जन्मी संतान के भरण-पोषण की जिम्मेदारी पिता की:-

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह स्पष्ट किया है कि विवाह से पहले बने संबंधों से जन्मी संतान के भरण-पोषण की जिम्मेदारी पिता से समाप्त नहीं होती।

अदालत ने कहा कि कानून का उद्देश्य केवल वैवाहिक रिश्तों को मान्यता देना नहीं,बल्कि संतान को बेसहारा होने से बचाना और उसके सम्मानजनक जीवन को सुनिश्चित करना है।

मामले में पिता की ओर से यह तर्क दिया गया कि
विवाह के समय बच्चा उसका जैविक संतान नहीं था,
इसलिए उस पर भरण-पोषण की जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती।

हालांकि अदालत ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 का मूल उद्देश्य संतान और पत्नी को तात्कालिक सहायता प्रदान करना है,ताकि वे अभाव और भटकाव की स्थिति में न पहुँचें।

अदालत ने यह भी कहा कि यदि संतान पति के संरक्षण में रही है,उसे सामाजिक रूप से स्वीकार किया गया है
और परिवारिक ढांचे के भीतर उसका पालन-पोषण हुआ है,
तो केवल जैविक संबंधों पर विवाद उठाकर भरण-पोषण की जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता।

इस आधार पर हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को सही ठहराते हुए संतान के पक्ष में भरण-पोषण जारी रखने का निर्देश दिया।

यह फैसला यह स्पष्ट संदेश देता है कि
बच्चे की पहचान, सुरक्षा और भविष्य
माता-पिता के आपसी विवादों से ऊपर हैं।
कानून का फोकस विवाद नहीं,
बल्कि संतान का कल्याण है।

पति द्वारा जबरन अप्राकृतिक यौन संबंध क्रूरता है, बलात्कार नहीं:-हाई कोर्टमध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा ह...
07/02/2026

पति द्वारा जबरन अप्राकृतिक यौन संबंध क्रूरता है, बलात्कार नहीं:-हाई कोर्ट

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि
पति द्वारा अपनी पत्नी के साथ जबरन अप्राकृतिक यौन संबंध बनाना कानून की दृष्टि में क्रूरता की श्रेणी में आता है,
लेकिन इसे बलात्कार नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने यह टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई करते हुए की,
जिसमें पति ने अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग की थी।

मामले में आरोप था कि पति ने पत्नी के साथ उसकी इच्छा के विरुद्ध अप्राकृतिक यौन संबंध बनाए।

हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वर्तमान आपराधिक कानून के तहत पति द्वारा पत्नी के साथ किए गए ऐसे कृत्य धारा 498A के अंतर्गत क्रूरता माने जा सकते हैं,लेकिन वैवाहिक अपवाद के कारण इन्हें बलात्कार के अपराध के रूप में नहीं देखा जा सकता।

कोर्ट ने यह भी कहा कि भले ही ऐसा आचरण नैतिक और सामाजिक रूप से निंदनीय हो,लेकिन जब तक कानून में स्पष्ट प्रावधान नहीं है,तब तक पति पर बलात्कार का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।

हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ किया कि इस तरह के कृत्य को सामान्य व्यवहार नहीं माना जा सकता और यह वैवाहिक जीवन में गंभीर मानसिक व शारीरिक उत्पीड़न की श्रेणी में आता है,जिसके लिए कानून में अलग दंडात्मक प्रावधान मौजूद हैं।

पंजाब एंड हरियाणा हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि भरण-पोषण (Maintenance) पाने के लिए आय या रोजगार छिपाना कानून का दुरुपयो...
07/02/2026

पंजाब एंड हरियाणा हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि भरण-पोषण (Maintenance) पाने के लिए आय या रोजगार छिपाना कानून का दुरुपयोग है।कोर्ट ने माना है कि अगर याची (पत्नी) अपनी वित्तीय स्थिति के बारे में झूठ बोलती है या अपनी नौकरी छिपाती है, तो वह भरण-पोषण की हकदार नहीं है !!

न्यायालय का यह निर्णय न्यायिक विवेक के उचित प्रयोग का उत्कृष्ट उदाहरण है।

“धारा 125 CrPC का संरक्षण केवल वास्तविक जरूरतमंदों के लिए है, यह बात इस निर्णय से स्पष्ट होती है।”

यह फैसला भरण-पोषण कानून के दुरुपयोग पर एक आवश्यक न्यायिक रोक है। सत्य और पारदर्शिता के बिना भरण-पोषण का दावा स्वीकार्य नहीं, यह निर्णय यही स्थापित करता है।

Case Details:

Anu Aggarwal Vs Sushant Aggarwal
CRR(F)-1195-2025
Date of decision: 13.01.2026

Good judgement 👍

03/02/2026

Address

570/128 'kha', Pakri, Sector-H, Near Vansh Clinic & Test Tube Baby Centre
Lucknow
226012

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