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01/01/2026

आप सभी मित्रों को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ

नववर्ष जीवन में नई आशाओं, नए संकल्पों और नए अवसरों का प्रतीक होता है। जब पुराना वर्ष समाप्त होता है, तो वह अपने साथ अनेक अनुभव, सीख और स्मृतियाँ छोड़ जाता है। नया वर्ष हमें आगे बढ़ने, स्वयं को सुधारने और एक बेहतर भविष्य के निर्माण का अवसर प्रदान करता है।

नववर्ष के शुभ अवसर पर लोग एक-दूसरे को “नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ” देकर प्रेम, सद्भाव और सकारात्मक भावना व्यक्त करते हैं। यह शुभकामनाएँ हमें यह प्रेरणा देती हैं कि जीवन में चाहे कितनी भी कठिनाइयाँ क्यों न हों, आशा और विश्वास के साथ आगे बढ़ा जा सकता है। बीते वर्ष की गलतियों से सीख लेकर नए वर्ष में अच्छे लक्ष्य निर्धारित करना ही नववर्ष का सच्चा उद्देश्य है।

यह समय आत्मचिंतन और आत्ममूल्यांकन का होता है। छात्र शिक्षा में प्रगति का संकल्प लेते हैं, कर्मचारी अपने कार्य में ईमानदारी और निष्ठा बढ़ाने का, तथा समाज के प्रत्येक नागरिक अपने कर्तव्यों के प्रति अधिक जागरूक होने का निश्चय करते हैं। नववर्ष हमें नकारात्मक विचारों को त्यागकर सकारात्मक सोच अपनाने की प्रेरणा देता है।

नववर्ष आपसी भाईचारे, शांति और सौहार्द का संदेश देता है। यदि हम नए वर्ष में परस्पर सहयोग, सहिष्णुता और मानवता के मूल्यों को अपनाएँ, तो समाज और राष्ट्र दोनों का सर्वांगीण विकास संभव है। यह अवसर हमें अपने व्यक्तिगत हितों से ऊपर उठकर समाज और देश के कल्याण के लिए कार्य करने की प्रेरणा देता है।

अंततः नववर्ष हमें यह संदेश देता है कि निरंतर प्रयास, अनुशासन और सकारात्मक दृष्टिकोण से ही सफलता प्राप्त की जा सकती है। ईश्वर करे यह नया वर्ष सभी के जीवन में सुख, स्वास्थ्य, शांति और समृद्धि लेकर आए—यही नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ हैं।
एडवोकेट समसुद्दीन शेख
सिविल कोर्ट, बहराइच।

⚖️ POCSO मामलों पर एक महत्वपूर्ण सीख — सुप्रीम कोर्ट का K. Kirubakaran फैसला और पब्लिक की जिम्मेदारीहाल ही में सुप्रीम क...
23/11/2025

⚖️ POCSO मामलों पर एक महत्वपूर्ण सीख — सुप्रीम कोर्ट का K. Kirubakaran फैसला और पब्लिक की जिम्मेदारी

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने K. Kirubakaran v. State of Tamil Nadu (2025) में एक ऐसा निर्णय दिया, जिसने यह स्पष्ट किया कि POCSO कानून कठोर है, परंतु कभी-कभी परिस्थितियों के आधार पर न्यायालय अपवादस्वरूप राहत दे सकता है।
अपराध क्या बना था?

इस मामले में अभियुक्त पर निम्न गंभीर धाराएँ लगाई गई थीं:

IPC 366 – बहला-फुसलाकर ले जाना / विवाह के लिए प्रेरित करना

POCSO Act की धारा 6 – Aggravated Penetrative Sexual Assault

POCSO का ढांचा ऐसा है कि यदि लड़की नाबालिग है, तो किसी भी प्रकार का यौन संबंध “अपराध” माना जाता है — चाहे सहमति का दावा हो या नहीं।
इसी आधार पर ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट ने सज़ा भी दी थी।

फिर कोर्ट ने सज़ा रद्द क्यों की?

अपील लंबित रहने के दौरान परिस्थितियाँ पूरी तरह बदल गईं:

पीड़िता बालिग हो गई,

दोनों ने वैधानिक विवाह कर लिया,

एक बच्चा भी जन्म ले चुका था,

और पीड़िता ने स्वयं कहा कि वह अपने पति के साथ शांति से रहना चाहती है।

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि:

यहाँ “अपराध का सामाजिक प्रभाव” और

“वर्तमान पारिवारिक स्थिति”
एक-दूसरे के विपरीत दिशा में खड़े हैं।

अगर अभियुक्त को फिर जेल भेजा जाता, तो:

विवाह टूट जाता,

बच्चे का भविष्य प्रभावित होता,

और स्वयं पीड़िता की इच्छा के विरुद्ध स्थिति बनती।

इन असाधारण परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने Article 142 का प्रयोग करते हुए सज़ा रद्द कर दी।

लेकिन आवाम को यह बात स्पष्ट रूप से समझनी चाहिए

इस फैसले का गलत फायदा नहीं उठाया जा सकता।

POCSO बहुत सख्त कानून है।
नाबालिग के साथ किसी भी प्रकार का संबंध — चाहे “सहमति” दिखाई जाए — कानून में अपराध ही माना जाएगा।
यह केस एक सामान्य मिसाल (precedent) नहीं है।
केवल बहुत ही दुर्लभ परिस्थितियों में अदालत ऐसा निर्णय ले सकती है।
“भागकर शादी कर लेना” या “बाद में शादी कर लेना” — अपने-आप में कभी भी राहत का आधार नहीं बनता।
अदालतें अपराध को व्यक्तिगत मामला नहीं मानती —
POCSO अपराध “समाज के विरुद्ध अपराध” माना जाता है।

19/11/2025

बिहार की राजनीति इस बार जिस दौर से गुज़र रही है, उसने पूरे देश में लोकतंत्र पर गहरी बहस छेड़ दी है।
यह चुनाव सिर्फ कई दलों का मुकाबला नहीं था—यह लड़ाई एक अकेले युवा नेता के साथ थी, जिसके खिलाफ कई विपक्षी पार्टियाँ मैदान में उतरीं।
एक तरफ एक युवा चेहरा, उसका संघर्ष, उसकी सरल राजनीति और जनता में उसकी पकड़… के साथ कई विपक्ष के नेता एक जुट होकर उसके समर्थन में उतरे ।
और दूसरी तरफ एक राष्ट्रीय स्तर की विशाल पार्टी, जिसके पास कई राज्यों की सत्ता, संसाधन और सहयोगी दलों की पूरी ताकत थी।

लेकिन असली प्रश्न तब खड़ा हुआ जब वोट चोरी के आरोप उन्हीं राष्ट्रीय पार्टियों पर लगे, जो खुद को लोकतंत्र का संरक्षक बताती हैं।
एक संसाधन–समृद्ध, पूरे देश में फैली पार्टी पर जब चुनावी हेराफेरी के आरोप लगते हैं—तो यह मामला सिर्फ बिहार का नहीं, बल्कि पूरा संविधान हिलाने वाला सवाल बन जाता है।

क्या लोकतंत्र वास्तव में खतरे में है?

लोकतंत्र सिर्फ वोट डाल देने का नाम नहीं—लोकतंत्र जनता के भरोसे पर खड़ा होता है।
आज बिहार की जनता कह रही है कि

वोटों में धांधली हुई,

नतीजों में गड़बड़ी हुई,

प्रशासन और चुनावी तंत्र पर एक खास पार्टी का दबाव दिखा।

जब जनता का भरोसा टूटता है, तब लोकतंत्र की नींव हिलती है—यही हमारे संविधान की मूल भावना है।

चुनाव आयोग — अनुच्छेद 324 के दायरों में सवाल ?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग को स्वतंत्र, निष्पक्ष और शक्तिशाली संवैधानिक संस्था के रूप में स्थापित करता है।
इसी अनुच्छेद के तहत आयोग को पूरे देश में चुनाव की देखरेख, नियंत्रण और संचालन का अधिकार दिया गया है।

लेकिन जब हर गली–मोहल्ले में यह चर्चा होने लगे कि
“चुनाव आयोग राष्ट्रीय पार्टी के दबाव में है”,
या यह कहा जाए कि
“चुनाव आयोग का ईमान बिक चुका है”,
तो ये आरोप सिर्फ बयानबाज़ी नहीं—यह संविधानिक विश्वास पर गंभीर चोट है।
अनुच्छेद 329 — चुनावी प्रक्रिया को न्यायसंगत रखने की गारंटी

अनुच्छेद 329 कहता है कि चुनाव परिणामों से जुड़े विवाद अदालत में केवल चुनाव याचिका के रूप में ही उठाए जा सकते हैं।
लेकिन इस सुरक्षा का उद्देश्य यह था कि चुनाव निष्पक्ष हों।
यदि प्रक्रिया पर ही संदेह हो जाए, तो यह अनुच्छेद भी लोकतंत्र को सुरक्षा देने में असफल हो जाता है।

अनुच्छेद 14 और 19 — समानता और अभिव्यक्ति का अधिकार

अनुच्छेद 14: सभी नागरिकों को समानता का अधिकार देता है। यदि चुनावी तंत्र किसी पार्टी के पक्ष में झुका लगे, तो यह समानता का उल्लंघन है।

अनुच्छेद 19(1)(a): अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुनिश्चित करता है, जिसमें चुनाव पर सवाल उठाना, विरोध करना और असंतोष जाहिर करना जनता का लोकतांत्रिक अधिकार है।

बिहार की जनता जब अपनी आवाज़ उठा रही है—वह संवैधानिक अधिकार का प्रयोग कर रही है।

लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, (RPA 1951)

इस कानून के तहत:

चुनावी भ्रष्टाचार,

वोटों में हेराफेरी,

अनुचित प्रभाव,

प्रशासनिक दुरुपयोग

सब गंभीर अपराध माने जाते हैं।
और जब जनता आरोप लगा रही है कि राष्ट्रीय स्तर की पार्टी ने वोटों में गड़बड़ी की, तो यह आरोप सीधे RPA 1951 के प्रावधानों को चुनौती देता है।
ग़ुलाम मीडिया — चौथे स्तंभ की विफलता जो वहां हो रहे आंदोलन को दिखा नहीं रही है।

मीडिया लोकतंत्र का प्रहरी है, लेकिन बिहार के माहौल में जनता खुलकर कह रही है कि
गोडी मीडिया ने सच्चाई दबाई और सत्ता की स्क्रिप्ट पढ़ी।
विपक्ष की आवाज़ कमज़ोर की गई, मुद्दों को गायब कर दिया गया।
यह स्थिति मीडिया की संवैधानिक और नैतिक जिम्मेदारियों पर सवाल उठाती है।
कई विपक्षी दल एक युवा नेता के खिलाफ चुनाव लड़े —यह बिहार की राजनीति में बड़ा मोड़ था।
लेकिन जब परिणाम आए और गंभीर आरोप लगे,
विपक्ष ने एक स्वर में कहा कि यह जनादेश नहीं, बल्कि व्यवस्थापित परिणाम लगता है

निष्कर्ष: बिहार का चुनाव एक चेतावनी है — लोकतंत्र को बचाइए

जब ,एक अकेला युवा नेता जनता की आवाज़ उठाए,

फिर भी नतीजों पर संदेह उठे,

राष्ट्रीय पार्टी पर “वोट चोरी” जैसे गंभीर आरोप लगे,

चुनाव आयोग पर अनुच्छेद 324 के बावजूद सवाल उठें,

अनुच्छेद 329 की गरिमा पर संकट आए,

अनुच्छेद 14 और 19 के अधिकार दांव पर लगें,

RPA 1951 की आत्मा कमजोर पड़े,

और मीडिया सत्ता का प्रचारक बन जाए—

तो फिर यह चुनाव नहीं, लोकतंत्र की लड़ाई बन जाती है।

बिहार देश को याद दिला रहा है—
लोकतंत्र मतपत्र से नहीं, बल्कि पारदर्शिता, न्याय और स्वतंत्र संस्थाओं पर टिका है।

💔 दिल्ली ब्लास्ट: एक दर्द, एक सवाल और एक ज़िम्मेदारी...कल शाम दिल्ली के लालकिला मेट्रो स्टेशन के पास हुए भयानक धमाके ने ...
11/11/2025

💔 दिल्ली ब्लास्ट: एक दर्द, एक सवाल और एक ज़िम्मेदारी...

कल शाम दिल्ली के लालकिला मेट्रो स्टेशन के पास हुए भयानक धमाके ने पूरे देश को हिला दिया।
एक कार के अचानक फटने से 8 निर्दोष लोगों की जान चली गई, और कई ज़िंदगियाँ हमेशा के लिए बदल गईं।
इस दर्दनाक हादसे पर मैं उन सभी परिवारों के प्रति अपनी गहरी संवेदना और श्रद्धांजलि व्यक्त करता हूँ जिन्होंने अपने प्रियजनों को खो दिया।

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⚖️ संविधान हमें जीवन का अधिकार देता है — Article 21

हमारा संविधान कहता है कि हर नागरिक को “जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता” का अधिकार है।
लेकिन जब राजधानी की सड़कों पर ही धमाके होने लगें, तो यह अधिकार कागज़ पर ही क्यों रह जाए?
क्या हमारी सुरक्षा व्यवस्था इतनी कमजोर हो चुकी है?
क्या खुफिया एजेंसियाँ सतर्क नहीं थीं?
और कब तक निर्दोष नागरिक ऐसे हादसों का शिकार बनते रहेंगे?

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🔍 सरकार से अपील — पारदर्शी जांच हो

यह हादसा सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि जवाबदेही का सवाल है।
सरकार और सुरक्षा एजेंसियों से अनुरोध है कि
👉 जांच पूरी तरह निष्पक्ष और पारदर्शी हो।
👉 पीड़ित परिवारों को न्याय और सम्मान मिले।
👉 भविष्य में ऐसी घटनाएँ दोबारा न हों, इसके लिए ठोस कदम उठाए जाएँ।

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🕊️ संवेदना ही नहीं, जिम्मेदारी भी जरूरी है

यह समय राजनीति का नहीं, इंसानियत का है।
देश को एकजुट होकर इन परिवारों के साथ खड़ा होना चाहिए।
सरकार को चाहिए कि वह केवल आर्थिक मदद नहीं, बल्कि पुनर्वास और मानसिक सहयोग भी दे।

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हमारा कर्तव्य — सवाल करना, जागरूक रहना

लोकतंत्र में सवाल पूछना विरोध नहीं, जिम्मेदारी है।
हम सबको मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि सुरक्षा व्यवस्था सिर्फ कागज़ों पर नहीं, ज़मीन पर मज़बूत हो।

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ईश्वर उन सभी दिवंगत आत्माओं को शांति दे।
और हमें शक्ति दे कि हम अपने संविधान और नागरिक कर्तव्यों के प्रति हमेशा सजग रहें।

> 🇮🇳 “जीवन की सुरक्षा ही लोकतंत्र की पहली शर्त है।”

08/11/2025

चर्चा संक्षिप्त में पॉस्को अधिनियम पर इसका पूरा नाम (POCSO) Act — Protection of Children from Sexual Offences Act, 2012
(बच्चों को लैंगिक अपराधों से संरक्षण अधिनियम, 2012)

यह भारत सरकार का एक विशेष कानून (Special Law) है, जो 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा देने के लिए बनाया गया है।
18 वर्ष से कम आयु का हर व्यक्ति “बच्चा” माना जाएगा।
यह कानून लड़के और लड़की दोनों को समान सुरक्षा देता है।
– हर जिले में POCSO Court होती है जो इन मामलों की सुनवाई करती है ताकि बच्चे को शीघ्र न्याय मिले।
आलोचना कई बार इस एक्ट के अंतर्गत सुनवाई करते समय उच्च न्यायालय एवं उच्चतम न्यायालय ने कहा है की अभिभावकों के द्वारा कभी कभी इस कानून का दुरूपयोग किया जाता है।
व्यक्तिगत राय इसलिए अभिभावकों को इस कानून के तहत प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करवाते समय यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जो भी वह सूचना सम्बंधित पुलिस थाना में दर्ज करवा रहे है पूर्ण रूप से सच्चाई पर आधारित हो क्योंकि झूठी सूचना दर्ज करवाने पर कानून में दर्ज करवाने वाले के खिलाफ दण्डवात्मक करवाही करने का प्रावधान है ।

07/11/2025

लेख पोर्न वीडियो देखने के संबंध में ,
हाल ही में एड. बी एल जैन के द्वारा माननीय सुप्रीम कोर्ट मे याचिका दायर किया गया है, जिसमें यह कहा गया है की भारत में पोर्न वीडियो देखने वाली वेबसाइट को बंद कर दिया जाएं चुकी कोविड के बाद से नाबालिग बच्चों के द्वारा ऐसे कंटेंट को ज्यादा देखा जा रहा है, इसमें 14 वर्ष से 18 वर्ष के बच्चे शामिल है। क्योंकि उन्हें ऑनलाइन पढ़ाई करने के हेतु मोबाइल लैपटॉप आदि सामग्री उपलब्ध है ।
इस केस की सुनाई मुख्य न्यायाधीश बी आर गवाई और न्यायाधीश के विनोद चन्द्र कर रहे है ।
जवाब में न्यायाधीश बी आर गवाई द्वारा यह कहा गया कि कानून बनाने का अधिकार सरकार को है ।
क्या आप नहीं जानते नेपाल में इस तरह के कंटेंट को बंद करने पर विरोध इतना व्यापक हुआ कि वहां की सरकार गिर गई ,क्या भारत में ऐसा नहीं हो सकता है ?
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने इस वाद में सुनाई अगले चार सप्ताह के बाद करने को कहा है ।
कानून क्या कहता है ?
अगर कोई व्यक्ति पर्सनल पोर्न वीडियो देखता है तो यह किसी प्रकार से अपराध नहीं क्योंकि व्यक्ति को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त जीवन जीने के अधिकार में निजता का अधिकार भी शामिल है
और यह व्यक्ति का मौलिक अधिकार है । लेकिन चाइल्ड पोर्नोग्राफी कंटेंट देखने पर पॉक्सो एक्ट 2012 के तहत अपराध है।
और इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट 2000 के तहत चाइल्ड पोर्नोग्राफी का प्रोडक्शन सेल डिस्ट्रीब्यूशन वाचिंग डाउनलोड करने पर सजा का प्रावधान है ।
एड बी एल जैन का कोर्ट के समकक्ष तर्क।
1 प्रत्येक सेकंड 2005 से 5000 पोर्न साइट को भारत में देखा जाता है ।
2 प्रत्येक वर्ष 2 करोड़ वीडियो भारत में जारी होता है ।
3 अनुमानित 20 करोड़ पोर्नोग्राफी कंटेंट वीडियो भारत में उपलब्ध है ।
4 इस लिए न्यायालय सरकार को निर्देश दे कि इन्फोर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट 2000 के तहत सेक्शन 69 के अंतर्गत नाबालिग बच्चों के 18 वर्ष से कम उम्र के देखने पर पूर्णतया बैन करदे
क्योंकि चीन यूरोप ऑस्ट्रेलिया आदि देशों में नाबालिग बच्चे ऐसी साइट को एक्सिस नहीं कर पाते उनके देखने पर पूर्ण रूप से बैन है
आप लोगों की क्या राय है कमेंट में जरूर बताए
किसी भी लीगल जानकारी के लिए संपर्क करे
एड समसुद्दीन शेख ।
मो.9455973666

06/11/2025

मैं अधिवक्ता. समसुद्दीन शेख एक अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता हूं।
इस पेज के माध्यम से मेरा उद्देश्य है कि आम नागरिकों को कानून की जानकारी, अधिकारों की समझ और नागरिक कर्तव्यों के बारे में सरल भाषा में बताया जाए।

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