07/11/2018
फिर दिवाली आ गई
रचियता-सतपाल पथिक
यह आ गई आ गई फिर दिवाली आ गई, दिल पर ऋषि की याद फिर बनकर घटा सी छा गई।
जिस दिन हुए संसार में दर्शन ऋषि के आखिरी,सुन लो कथा उस दिन की ओ पत्थर को भी पिंघला गई।
अजमेर की भूमि थी वह और वक्त था शाम का, इक जोत जब बुझने लगी हर जिंदगी घबरा गई।
पिए दूध में कांचों-जहर पूरा महीना हो गया, सारा जिस्म जख़्मी हुआ नस-नस चुभन तड़पा गई।
अंदर से जिसकी नाड़ियां उस कांच ने थी काट दी, और झर की तासीर भी अपना असर दिखला गई।
वेदों में जितने मंत्र हैं उतने ही छाले देह पर, प्यारे ऋषि की यह दशा भक्तों के दिल दहला गई।
सारे बदन में दर्द था दुःखता था चाहे रोम रोम, पर मुस्कराहट अंत तक चेहरे का साथ निभा गई।
यह तो वही काया है जो रखती थी ताकत शेर की, पर अब पड़ी मजबूर है गुल की तरह कुम्हला गई।
उसने कहा अब खोल दो दरवाजे और सब खिड़कियां, यह बात ही अब कुछ का बस वक्त है समझा गई।
और फिर कहा आकर मेरे पीछे खड़े होवो सभी, खुद ही समाधी की दशा जो अपूर्व दृश्य बन गई।
मन्त्रों का उच्चारण किया और प्रेम की संध्या करी, फिर लेट गए आराम से जिव्हा यह बोल सुना गई।
अच्छी करी लीला प्रभु इच्छा तुम्हारी पूर्ण हो, यह कह के ऑंखें मूंद लीं बिजली सी इकलहरा गई।
फिर श्वास खिंचा जोर से और तन से बाहर कर दिया, बस यह हवा जाती हुई परलोक में पंहुचा गई।
लो देखते ही देखते पिंजरे का पंछी उड़ गया, हर दिल की धड़कन रुक गई हर एक नजर पथरा गई।
यह आ गई आ गई फिर दिवाली आ गई, दिल पर ऋषि की याद फिर बनकर घटा सी छा गई।