22/03/2021
चला गगन में उड़ने को मैं,
ढूंड रहा था पंख मैं ऐसे,
जो ले चले जहाँ से ऊँचे।
मैं था तब नन्हा बच्चा,
नहीं जानता था तेज हवा के झोके वो,
ढंूड रहा था पंख मै ऐसे।
पहुच चुका था खुले क्ष्तििज में,
जहाँ रूका मैं, था बहुत थका मैं,
लगा मुझे न रूक पाउंगा इस,
इस धरा के ऊँचे,
ढंूड रहा था पंख मै ऐसे।
पंहुचा था क्षितिज में ऊँचा,
जाना था अभी और भी ऊँचा,
हुये थे मेरे पंख भी भारी,
रूकना थ अब यहाँ पर भारी,
ढंूड रहा था पंख मै ऐसे,
जो ले जाते और भी ऊँचे।
लगा के ताकत रोके था मैं,
नहीं हटूगां नहीं गिरूगा,
संशय मन में अभी था कुछ भाारी,
क्या रूक पाऊंगा, क्या टिक पाऊंगा,
ये विषमताये थी मुझ पर भारी।
ढंूड रहा था पंख मै ऐसे।
अब नहीं उठा पा रहा था बोझ इन पंखो का,
कन्धे हुये थे मेरे भारी,
क्यो की पंख भी हो चले थे भारी,
ढंूड रहा था पंख मै ऐसे।
तब लगा मुझे की अब तो स्वयम ही उडना है।
नहीं तो लो चला मैं इस क्षितिज के नीचे,
क्यो उडू मैं पंखो मैं, हटा दिये तब उन पंखो को,
हो गया था मैं स्वावलम्बी, भार हटा था मेरे कंधे से,
अब क्षितिज में उड़ने को, स्वतंत्र हुआ था इन पंखो से,
अभ्यस्त हुआ था आज मैं बिना पंखो के उड़ने में । ...............भारत सिंह तोमर।