How To become best Criminal Lawyer

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02/10/2025

आज का दिन हमारे राष्ट्र के लिए अत्यंत पावन है।
महात्मा गांधी जी ने हमें सत्य और अहिंसा का मार्ग दिखाया,
लाल बहादुर शास्त्री जी ने सादगी और ‘जय जवान-जय किसान’ का संदेश दिया,
और विजयादशमी हमें सिखाती है कि असत्य पर सदैव सत्य की विजय होती है।

आइए, इस पावन अवसर पर हम सब मिलकर
सत्य, त्याग और कर्तव्यनिष्ठा का संकल्प लें।

आपको गांधी जयंती, लाल बहादुर शास्त्री जयंती
एवं विजयादशमी (दशहरा) की हार्दिक शुभकामनाएँ 🙏🇮🇳✨

— अंचल शुक्ल

आज का दिन मेरे लिए अत्यंत गौरव का विषय रहा कि मुझे इलाहाबाद उच्च न्यायालय में माननीय न्यायमूर्ति लक्ष्मी कांत शुक्ला जी ...
27/09/2025

आज का दिन मेरे लिए अत्यंत गौरव का विषय रहा कि मुझे इलाहाबाद उच्च न्यायालय में माननीय न्यायमूर्ति लक्ष्मी कांत शुक्ला जी के शपथ ग्रहण समारोह में उपस्थित होकर उस ऐतिहासिक क्षण का प्रत्यक्ष साक्षी बनने का अवसर मिला।

माननीय न्यायमूर्ति महोदय के ज्ञान, अनुभव और निष्पक्ष दृष्टिकोण से निश्चय ही न्यायिक व्यवस्था और अधिक सशक्त होगी।माननीय न्यायमूर्ति लक्ष्मी कांत शुक्ला जी को उनके नए दायित्व हेतु हृदय से बधाई एवं न्यायिक कार्यकाल की सफल और गरिमामयी यात्रा के लिए शुभकामनाएँ। ⚖️🙏

#इलाहाबाद_उच्च_न्यायालय ्रहण_समारोह #गौरवपूर्ण_क्षण

25/09/2025

A Talk With Raj On the Topic of Corruption in Indian Judiciary.

सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम द्वारा माननीय श्री लक्ष्मीकांत शुक्ला जी (पूर्व जिला जज, लखीमपुर खीरी) का नाम हाईकोर्ट जज के लिए ...
02/09/2025

सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम द्वारा माननीय श्री लक्ष्मीकांत शुक्ला जी (पूर्व जिला जज, लखीमपुर खीरी) का नाम हाईकोर्ट जज के लिए अनुमोदित किया गया है। यह समाचार हम सबके लिए अत्यंत गर्व और प्रसन्नता का विषय है।

श्री लक्ष्मीकांत शुक्ला जी केवल एक न्यायप्रिय और मेहनती अधिकारी ही नहीं, बल्कि ईमानदारी, सरलता और गहन आध्यात्मिक ज्ञान से युक्त ऐसे व्यक्तित्व हैं जिनकी छवि सदैव स्वच्छ और प्रेरणादायक रही है।

मैंने उन्हें सदैव अपने गुरु के रूप में माना और उनसे शिष्य की भाँति बहुत कुछ सीखा।
उनका यह उत्थान न केवल उनके परिश्रम और तपस्या का फल है, बल्कि न्यायपालिका के लिए एक अमूल्य संपत्ति भी है।

🙏 ईश्वर से यही प्रार्थना है कि श्री लक्ष्मीकांत शुक्ला जी यूँ ही नई ऊँचाइयों को स्पर्श करते रहें और समाज तथा न्याय की सेवा में सदैव मार्गदर्शक बने रहें।

✨ हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ ✨

03/08/2025

बीएनएसएस की धारा 35 के तहत नोटिस अब केवल भौतिक(Physical) रूप से ही वैध – सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय”

सुप्रीम कोर्ट ने 16 जुलाई 2025 को एक महत्वपूर्ण आदेश में यह स्पष्ट किया है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 35 के अंतर्गत जारी किए जाने वाले नोटिस की सेवा (service) केवल वही विधियां मान्य होंगी जो कानून द्वारा निर्धारित हैं। व्हाट्सएप या अन्य इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से नोटिस भेजना अब वैध नहीं होगा।

🔹 प्रकरण की पृष्ठभूमि:

हरियाणा राज्य द्वारा सुप्रीम कोर्ट के 21-01-2025 के आदेश में संशोधन हेतु आवेदन प्रस्तुत किया गया था, जिसमें सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को यह निर्देश दिया गया था कि धारा 41-A CrPC या धारा 35 BNSS के तहत नोटिस केवल वैधानिक विधियों से ही भेजे जाएं।

हरियाणा सरकार की यह दलील थी कि आधुनिक समय में इलेक्ट्रॉनिक माध्यम जैसे व्हाट्सएप, ईमेल आदि को भी सेवा के वैध माध्यमों में शामिल किया जाना चाहिए, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे अस्वीकार कर दिया।

🔹 मुख्य निर्देश:

1. इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से नोटिस की सेवा BNSS की धारा 35 के तहत मान्य नहीं है।
2. विधान द्वारा जानबूझकर इस तरह की इलेक्ट्रॉनिक सेवा को शामिल न करना विधायी मंशा (Legislative Intent) को दर्शाता है।
3. व्यक्ति की स्वतंत्रता (Liberty) से संबंधित मामलों में केवल निर्धारित प्रक्रिया का पालन ही वैध होगा।
4. नोटिस की सेवा यदि वैध ढंग से नहीं हुई है, तो व्यक्ति की गिरफ्तारी अवैध मानी जा सकती है।

🔹 धारा 35 BNSS का उद्देश्य:

• बिना गिरफ्तारी के नोटिस जारी करने की प्रक्रिया को विनियमित करता है।
• यह न्यायिक नियंत्रण के अभाव में पुलिस की मनमानी को रोकता है।
• इसमें उल्लेख है कि यदि गिरफ्तारी आवश्यक नहीं है, तो पुलिस को व्यक्ति को उपस्थिति हेतु लिखित नोटिस देना होगा।
• यदि व्यक्ति नोटिस का पालन करता है, तो उसकी गिरफ्तारी नहीं की जा सकती।

✔️सुप्रीम कोर्ट के तर्क:

• धारा 530 BNSS में जिन परिस्थितियों में इलेक्ट्रॉनिक माध्यम की अनुमति दी गई है, वे विशेष और सीमित हैं।
• नोटिस की सेवा, जो व्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकती है, को सिर्फ भौतिक माध्यम से ही किया जाना चाहिए।
• इलेक्ट्रॉनिक सेवा की अनुमति केवल उन्हीं मामलों में है जहां वह व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर प्रभाव नहीं डालती।

🔹 अदालत द्वारा अन्य प्रावधानों का विश्लेषण:

• कोर्ट ने धारा 63, 64, और 71 BNSS का उल्लेख करते हुए कहा कि:
• न्यायालय द्वारा जारी समन में डिजिटल माध्यम की अनुमति है, बशर्ते उस पर कोर्ट की मुहर या डिजिटल हस्ताक्षर हो।
• परंतु, धारा 35 का नोटिस पुलिस (कार्यपालिका) द्वारा जारी किया जाता है, जो न्यायिक प्रक्रिया से भिन्न है।

🔹 निष्कर्ष:

• सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सरकार का संशोधन आवेदन खारिज कर दिया।
• अब पुलिस द्वारा BNSS की धारा 35 के अंतर्गत नोटिस की सेवा केवल भौतिक रूप से ही की जाएगी।
• यह आदेश देशभर की पुलिस के लिए बाध्यकारी है, और सभी राज्यों को स्थायी आदेश (Standing Orders) जारी करने होंगे।

📌 सम्बंधित केस:

Satender Kumar Antil v. Central Bureau of Investigation, Misc. Appl. No. 2034/2022 in MA 1849/2021 in SLP(Crl.) No. 5191/2021, दिनांक 16-07-2025

28/07/2025

📰 अब विवेचना में धाराएं घटाने-बढ़ाने का खेल नहीं चलेगा: तकनीकी निगरानी से दरोगाओं पर लगाम

⚖️ क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम में सबसे महत्वपूर्ण कड़ी होती है विवेचना — यानी किसी आपराधिक मामले की जांच। मगर वर्षों से यह देखा जा रहा है कि कुछ विवेचक अधिकारी (विशेषकर दरोगा स्तर पर) मामले की गंभीरता को कम या अधिक दिखाने के लिए धाराएं (Sections) मनमर्जी से घटा-बढ़ा देते हैं। इसका सीधा असर अभियोजन (Prosecution), न्यायिक प्रक्रिया और आरोपी व पीड़ित — दोनों के अधिकारों पर पड़ता है।

📌 अब होगा टेक्नोलॉजी से नियंत्रण:

उत्तर प्रदेश में अब इस खेल पर लगाम लगाने के लिए एक अहम कदम उठाया गया है। अब विवेचना के दौरान कोई भी दरोगा यदि किसी मामले की धाराएं हटाता या बढ़ाता है, तो उसकी पूरी जानकारी सीसीटीएनएस (Crime and Criminal Tracking Network & Systems) के माध्यम से सीधे उच्च अधिकारियों तक पहुंचेगी।

🔍 कैसे काम करेगा यह सिस्टम?

• प्रत्येक धारा के बदलाव की सूचना डीआईजी स्तर तक प्रतिदिन भेजी जाएगी।
• कोई भी विवेचक अधिकारी अब मनमर्जी से धारायें नहीं घटा या बढ़ा सकेगा।
• तकनीकी निगरानी की वजह से अब हर परिवर्तन की जवाबदेही तय होगी।

पृष्ठभूमि में भ्रष्टाचार की घटनाएं:

हाल ही में कई ऐसे मामले सामने आए हैं जहाँ विवेचक अधिकारी ने रिश्वत लेकर धाराएं हटा दीं या कम कर दीं। एक केस में मझगवां में एक दरोगा को रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ पकड़ा गया। यही नहीं, एक और मामले में धारा हटाने के नाम पर रिश्वत मांगने वाले दरोगा की वीडियो वायरल हो गई थी। इन घटनाओं ने पूरे तंत्र की साख को नुकसान पहुँचाया।

⚠️ अब गड़बड़ी पर होगी सख्ती:

अब विवेचना की निगरानी सीसीटीएनएस से की जाएगी और गड़बड़ी करने वालों पर सख्त कार्रवाई होगी। अब न केवल आरोपी, बल्कि विवेचक भी जवाबदेह होंगे।

🔎 नये वकीलों के लिए सीख:

एक क्रिमिनल लॉयर के तौर पर यह जानना जरूरी है कि पुलिस विवेचना में किये गये परिवर्तन कैसे और किन प्रावधानों के अंतर्गत होते हैं। धाराओं में बदलाव का प्रभाव कोर्ट की प्रक्रिया, ज़मानत, सजा, और ट्रायल की दिशा पर पड़ता है।

📝 महत्वपूर्ण सुझाव:

• अपने केस डायरी का गहराई से अध्ययन करें।
• अगर धाराएं घटाई गई हों और आपको संदेह हो तो उसकी जांच की मांग करें।
• अदालत से अग्रिम विवेचना की मांग की जा सकती है।
• हाई कोर्ट की निगरानी या रिट याचिका भी एक उपाय हो सकता है।

अब पुलिस विवेचना पहले की तरह मनमर्जी से नहीं चल सकेगी। यह पहल न्याय व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ाएगी। उत्तर प्रदेश पुलिस की यह व्यवस्था हर क्रिमिनल लॉयर के लिए महत्वपूर्ण है ताकि वे अपने मुवक्किल को सही सलाह दे सकें और विवेचना में धांधली की संभावनाओं पर समय रहते कार्रवाई करा सकें।

🟩 Follow करें हमारा पेज “How to Become Best Criminal Lawyer” — ताकि आप हर जरूरी कानूनी अपडेट, कोर्ट की प्रक्रिया, और वकालत की व्यावहारिक जानकारी सबसे पहले पा सकें।

#विवेचना #धारा

27/07/2025

📘 धारा 164 BNS/183 BNSS के अन्तर्गत इकबालिया बयान व उसका विधिक महत्व (भाग 2)

पिछले भाग में हमने जाना कि धारा 164 के अन्तर्गत मजिस्ट्रेट के समक्ष बयान क्यों आवश्यक है और उसकी प्रक्रिया क्या है। अब हम जानेंगे:

🔷 इकबालिया बयान (Confession Statement) क्या है?

इकबालिया बयान वह होता है जब आरोपी स्वयं अपने अपराध को स्वीकार करता है और मजिस्ट्रेट के समक्ष बयान देता है। लेकिन इस बयान को स्वीकार करने से पहले न्यायिक मजिस्ट्रेट को विशेष सावधानी बरतनी होती है।

⚖️ इकबालिया बयान दर्ज करते समय न्यायिक प्रक्रिया:

1. मजिस्ट्रेट यह स्पष्ट करता है कि आरोपी को:
• कोई दबाव, प्रलोभन या डर नहीं है।
• वह स्वेच्छा से बयान दे रहा है।
2. आरोपी को पर्याप्त समय और सोचने का अवसर दिया जाता है।
3. मजिस्ट्रेट यह भी बताता है कि यह बयान उसके विरुद्ध साक्ष्य के रूप में प्रयुक्त हो सकता है।
4. यदि मजिस्ट्रेट को संदेह हो कि बयान दबाव में दिया गया है, तो बयान दर्ज नहीं किया जाता।

📌 इकबालिया बयान का कानूनी महत्व:
• यदि सभी प्रक्रिया का पालन सही तरीके से हुआ है, तो धारा 164 के तहत दिया गया इकबालिया बयान अदालत में साक्ष्य के रूप में मान्य होता है।
• यह FIR, जांच या ट्रायल में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

👨‍⚖️ गवाह hostile हो जाए तो क्या होगा?

कई बार गवाह अदालत में अपने पुराने बयान से मुकर जाता है (Hostile Witness), तब:

• यदि उसका बयान मजिस्ट्रेट के सामने 164 में दर्ज है, तो अभियोजन पक्ष उस बयान को भरोसेमंद साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत कर सकता है।

• गवाह से उस बयान को पढ़कर क्रॉस-एग्जामिनेशन में सवाल किए जा सकते हैं।

• यदि मजिस्ट्रेट के समक्ष दिया गया बयान स्पष्ट, स्वतंत्र और सुसंगत है, तो अदालत उसे स्वीकार कर सकती है।

2️⃣ Ram Kishan Singh v. Harmit Kaur, AIR 1972 SC 468

“मजिस्ट्रेट के समक्ष दिया गया इकबालिया बयान तब तक मान्य है जब तक कि वह दबाव या बलपूर्वक प्राप्त न किया गया हो।”

🔸 गवाह hostile हो जाए तो भी उसका मजिस्ट्रेट के समक्ष बयान अभियोजन के लिए सहारा बन सकता है।

📋 बयान दर्ज करने की प्रक्रिया (Recording of Confession)
• मजिस्ट्रेट को पूरा बयान प्रश्न-उत्तर के रूप में दर्ज करना होता है।
• बयान को हिंदी या उस भाषा में दर्ज किया जाना चाहिए जो व्यक्ति समझता है।
• मजिस्ट्रेट स्वयं अपने हाथ से लिखे या उसकी निगरानी में क्लर्क लिखे।
• बयान के अंत में यह स्पष्ट लिखना चाहिए कि बयान स्वेच्छा से दिया गया है।
• बयान के अंत में मजिस्ट्रेट और अभियुक्त/गवाह दोनों के हस्ताक्षर/अंगूठे का निशान होना आवश्यक है।

🔐 गोपनीयता और पुलिस की अनुपस्थिति
• इस प्रक्रिया के दौरान पुलिस या जांच अधिकारी की उपस्थिति पूरी तरह वर्जित है।
• यह गोपनीयता बयान की स्वतंत्रता और निष्पक्षता सुनिश्चित करती है।
• बयान को दर्ज करने के बाद सील बंद लिफ़ाफ़े में रखा जाता है और यह लिफाफा बिना न्यायालय की अनुमति के नहीं खोला जा सकता है ।

यदि प्रक्रिया में कोई त्रुटि या दबाव पाया जाता है तो बयान अमान्य (Invalid) माना जा सकता है।

• बयान को ट्रायल के दौरान मूल रूप से कोर्ट में लाना आवश्यक होता है, अन्यथा उसका कोई कानूनी मूल्य नहीं होगा।
• जांच अधिकारी द्वारा तैयार की गई केस डायरी में इसका ज़िक्र हो, साथ ही कोर्ट रिकॉर्ड में उसका ऑरिजिनल या प्रमाणित प्रतिलिपि होनी चाहिए।

धारा 164 CR.P.C/183 बीएनएसएस के अन्तर्गत मजिस्ट्रेट के समक्ष दिए गए इकबालिया बयान को अदालत में अत्यधिक महत्व दिया जाता है, लेकिन यह सख्त कानूनी प्रक्रिया और सतर्कता के अधीन ही प्रभावी बनता है। यह केवल एक औपचारिकता नहीं बल्कि मूल्यवान साक्ष्य का स्रोत है, जिसे ध्यानपूर्वक और नियमों के तहत दर्ज किया जाना चाहिए।

✅ इस जानकारी को अपने वकील साथियों, लॉ स्टूडेंट्स और न्यायिक सेवा के अभ्यर्थियों के साथ जरूर साझा करें।

✍️ Anchal Shukla Advocate
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26/07/2025

📘 धारा 183 बी.एन.एस./164 सीआर.पी.सी के अंतर्गत मजिस्ट्रेट के समक्ष बयान: महत्व और प्रक्रिया (भाग 1)

भारत में आपराधिक मामलों की विवेचना में धारा 164 दं० प्र० सं० का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। यह वह प्रावधान है जिसके अन्तर्गत किसी गवाह या पीड़ित का बयान मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज किया जाता है, ताकि आगे चलकर मुकदमे में यदि वह पक्षद्रोही (Hostile) हो जाये तो अदालत के पास एक प्रमाणिक बयान मौजूद हो।

🔷 धारा 183 BNSS/164 CrPC क्या कहती है?

भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता (अब बी.एन.एस.एस. 2023 में शामिल) की धारा 164 के अनुसार:

“कोई भी न्यायिक मजिस्ट्रेट किसी भी व्यक्ति का, स्वेच्छा से दिया गया बयान या इकबालिया बयान अपने समक्ष दर्ज कर सकता है।”

🔍 इस धारा का उद्देश्य क्या है?

1. साक्ष्यों को प्रारंभिक स्तर पर सुरक्षित करना

2. यह सुनिश्चित करना कि बयान स्वतंत्र, स्वेच्छा से और बिना दबाव के दिया गया हो

3. भविष्य में गवाह hostile न हो, या hostile होने पर कोर्ट के पास रिकॉर्ड उपलब्ध हो

किन मामलों में 164 Cr.PC या 183 BNSS का प्रयोग आवश्यक है?
• POCSO Act के मामले में पीड़िता का बयान (अनिवार्य)
• बलात्कार, हत्या या घरेलू हिंसा जैसे गंभीर अपराध
• जब पीड़िता/गवाह पुलिस के सामने बार-बार अपने बयान बदल रहा हो और जांच अधिकारी यह बयान मजिस्ट्रेट से दर्ज कराना चाहे

📝 कौन दर्ज करता है और कैसेः-
• केवल न्यायिक मजिस्ट्रेट ही धारा 164 दं० प्र० सं० के अन्तर्गत बयान दर्ज कर सकता है।
• मजिस्ट्रेट पहले यह सुनिश्चित करता है कि:
• व्यक्ति पुलिस दबाव में नहीं है
• वह अपनी मर्जी से बयान देना चाहता है
• मजिस्ट्रेट उसे ये भी समझाता है कि उसका बयान उसके खिलाफ साक्ष्य के रूप में उपयोग किया जा सकता है।

⚖️ सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी:

👉 Case: State of Karnataka v. Shivanna @ Tarkari Shivanna (2014)
निर्णय: “POCSO एवं बलात्कार जैसे गंभीर मामलों में पीड़िता का 164 CrPC के तहत बयान तुरंत और बिना विलम्ब के मजिस्ट्रेट से कराया जाना अनिवार्य है।”

📌 विशेष ध्यान देने योग्य बातें:
• 164 दं०प्र०सं० में दर्ज बयान को पुलिस डायरी का हिस्सा नहीं माना जाता।
• यदि आरोपी का इकबालिया बयान है, तो मजिस्ट्रेट को विशेष सावधानी रखनी होती है कि वह बयान स्वेच्छा से दिया गया हो।
• यह बयान ट्रायल के समय एक मजबूत साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

👉 भाग 2 में हम जानेंगे – धारा 164 के अन्तर्गत इकबालिया बयान (Confession), गवाह hostile होने पर इसका क्या महत्व होता है, और कुछ महत्वपूर्ण न्यायिक उदाहरण।

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Anchal Shukla Advocate

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23/07/2025

🔴 पति-पत्नी के विवाद में सुप्रीम कोर्ट की ऐतिहासिक पहल — 30 से अधिक केस खत्म और 498A पर सख्त दिशानिर्देश

🏛️ “जहां न्यायिक प्रक्रिया रिश्तों को और विषाक्त बना दे, वहां समझौता ही सर्वोच्च समाधान है।” – सुप्रीम कोर्ट (2025)

विवाह संबंधी आपराधिक मामलों में झूठे मुकदमों की संख्या लगातार बढ़ रही है। धारा 498A IPC जैसे कानून, जो महिलाओं को सशक्त बनाने हेतु बनाए गए थे, अब कई बार बदले की भावना से दोषरहित पति और उनके परिवारजनों के खिलाफ दुरुपयोग किए जा रहे हैं।

ऐसे ही एक चर्चित केस — शिवांगी बंसल बनाम साहिब बंसल में — सुप्रीम कोर्ट ने दिनांक 22 जुलाई 2025 को ऐतिहासिक निर्णय दिया, जिसमें 30 से अधिक केसों को खत्म करते हुए गिरफ्तारी पर रोक लगाई, और 498A के दुरुपयोग को रोकने हेतु इलाहाबाद हाईकोर्ट की गाइडलाइंस को लागू करने का आदेश दिया।

⚖️ सुप्रीम कोर्ट द्वारा पारित मुख्य आदेश

✔️I. आपराधिक केसों का निस्तारण
• Article 142 के अंतर्गत सभी केस — FIRs, D.V. Act मामले, ट्रांसफर याचिकाएं, कस्टडी विवाद — समाप्त (quashed) कर दिए गए।

✔️II. तलाक एवं अभिरक्षा
• शादी को आपसी सहमति से समाप्त किया गया।
• बच्ची की कस्टडी का साझा निर्णय दिया गया जिसमें दोनों माता-पिता की सहभागिता सुनिश्चित की गई।

✔️III. सार्वजनिक माफीनामा
• पत्नी और उसके माता-पिता को आदेशित किया गया कि वे दो राष्ट्रीय अखबारों में पब्लिकली माफी मांगें, यह स्पष्ट करते हुए कि उन्होंने भावनात्मक रूप से प्रेरित होकर आरोप लगाए जो अनुचित और अपमानजनक थे।

✔️ IV. इलाहाबाद हाईकोर्ट की गाइडलाइंस की पुष्टि

सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से इस निर्णय में इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा पारित दिशा-निर्देशों को लागू बनाए रखने का आदेश दिया जो Criminal Revision No. 1126 of 2022 में 13.06.2022 को पारित किए गए थे।

⚖️ इन दिशा-निर्देशों का उद्देश्य:

• परिवार कल्याण समितियों (Family Welfare Committees) का गठन
• झूठे मामलों में तत्काल गिरफ्तारी से बचाव
• पुलिस को सीधे गिरफ्तारी से पूर्व पारिवारिक समिति की रिपोर्ट का इंतजार करना होगा
• 498A IPC के दुरुपयोग को रोकने हेतु निगरानी व्यवस्था का निर्माण

📖 इससे यह स्पष्ट होता है कि सुप्रीम कोर्ट अब 498A के दुरुपयोग को लेकर अत्यंत गंभीर है और राज्यों में पहले से मौजूद दिशा-निर्देशों को लागू करने की आवश्यकता पर जोर देता है।

🔹 युवा वकीलों के लिए शिक्षाप्रद बिंदु

1. 498A IPC में गिरफ्तारी से पूर्व दिशानिर्देशों का पालन कैसे जरूरी है
2. Article 142 का प्रभावी प्रयोग
3. झूठे आरोपों में गिरफ्तारी से संरक्षण के उपाय
4. पब्लिक माफीनामा का कानूनी महत्व
5. परिवार कल्याण समिति का रोल
6. कई केसों का एक साथ निस्तारण कैसे संभव होता है

✍️ यह फैसला कानून और मानवीयता दोनों का अद्भुत संगम है। सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि जहां रिश्ते सुधारने की संभावना हो, वहाँ अदालतों को दंड नहीं बल्कि समाधान पर जोर देना चाहिए।

साथ ही, इस निर्णय ने उन निर्दोष पतियों और उनके परिवारों को बड़ी राहत दी है जो झूठे आपराधिक मामलों का शिकार होते हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट की गाइडलाइंस को लागू करना पूरे देश के लिए एक दिशा बन सकता है|
आप सभी से अनुरोध है कि माननीय उच्चतम न्यायालय इस निर्णय और माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायलय के निर्णय को अवश्य पढ़ें ।
इस लेख पर अपनी प्रतिक्रिया ज़रूर दें ।

✒️ लेखक:
अंचल शुक्ला
एडवोकेट, लखीमपुर खीरी
How to Become Best Criminal Lawyer


20/07/2025

दहेज़ कानूनों का दुरुपयोग: न्यायपालिका की चुनौती और समाधान

भारतीय दंड संहिता की धारा 498A (85 BNS) और Dowry Prohibition Act, 1961 की धारा 3/4 जैसी कानूनी व्यवस्थाएँ दहेज़ उत्पीड़न को रोकने के लिए बनाई गई थीं। लेकिन जैसे-जैसे अभ्यास में आयी, वैसे ‑वैसे इनका दुरुपयोग भी बढ़ा—खासकर झूठे आरोपों, व्यक्तिगत द्वेष, छोटे-मोटे मनमुटाव या संपत्ति के लिये ।

🔍 दुरपयोग के प्रमुख स्वरूप:

• झूठे आरोप दर्ज कराना सिर्फ बदले की भावना से
• संपत्ति हासिल करने के लिए आरोप का प्रयोग
• बिना पर्याप्त साक्ष्य के, रिश्तेदारों को फंसाना

हालांकि हर शिकायत झूठी नहीं होती, लेकिन बहुत सारे ऐसे मामले भी सामने आ रहे हैं जहाँ:

• बिना ठोस सबूतों के पति और उसके परिवार को गिरफ्तार कर लिया जाता है।
• लंबी कानूनी लड़ाई में निर्दोष व्यक्ति मानसिक और आर्थिक रूप से टूट जाता है।
• सुलह या तलाक के वक्त FIR को दबाव के औजार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

498A IPC (85 BNS) में अपराध गंभीर और गैर-जमानती माना जाता है, जिससे पुलिस के पास गिरफ्तारी का सीधा अधिकार होता है। इसी प्रावधान का लाभ उठाकर कई बार महिलाएं झूठे आरोप लगाकर पति और उसके परिवार को कानूनी संकट में डाल देती हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने दहेज़ कानूनों के दुरुपयोग को रोकने के लिए कई बार मार्गदर्शन दिया है। नीचे प्रमुख फैसलों का संक्षिप्त विवरण दिया जा रहा है।

⚖️ सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय

Arnesh Kumar vs State of Bihar (2014)

गिरफ्तारी, मजिस्ट्रेट की मंजूरी के बिना नहीं होनी चाहिये ।

Rajesh Sharma vs State of UP (2017)

हर जिले में Legal Services Authority द्वारा Family Welfare Committee गठित की जानी चाहिये। समिति की रिपोर्ट के बाद ही FIR या गिरफ्तारी होनी चाहिये। साथ ही कोशिश होनी चाहिये कि विभिन्न न्यायालयों में चल रहे पति-पत्नी के मुकदमों को एक ही न्यायालय में स्थानांतरित किया जाना चाहिए।

Preeti Gupta vs State of Jharkhand (2010)

आरोप स्थापित होने के बाद ही समन जारी किए जाने चाहिए , बिना जांच के कार्रवाई नहीं की जानी चाहिये ।

Suman Mishra vs State of UP (2025)

FIR को रद्द किया गया क्योंकि आरोप बेबुनियाद थे, ulterior motive थे, और कोई ठोस तथ्य नहीं थे ।

इनके अतिरिक्त और भी विधि व्यवस्थाएँ माननीय उच्चतम व उच्च न्यायालयों द्वारा दी गयी हैं जो आगे के लेखों में संदर्भ के साथ दी जायेंगी।

एक क्रिमिनल वकील के लिए महत्वपूर्ण बातें

यदि आप एक नवीन क्रिमिनल वकील हैं, तो आपको निम्नलिखित कानूनी सावधानियों का पालन करना चाहिए:

1. धारा 41 CrPC (35 BNSS) का पालन: गिरफ्तारी से पूर्व पुलिस को यह देखना चाहिए कि क्या वास्तव में गिरफ्तारी आवश्यक है।

2. साक्ष्यों की जाँच करें: FIR दर्ज होने के बाद समुचित दस्तावेज़, मेडिकल रिपोर्ट, कॉल रिकॉर्ड आदि की जाँच अनिवार्य है।

3. बिना आधार के समन जारी न हो — न्यायिक मजिस्ट्रेट को भी विवेकपूर्वक काम करना चाहिए।

4. फैमिली वेलफेयर कमेटी की रिपोर्ट (जहां लागू हो) महत्वपूर्ण हो सकती है।

5. झूठे मामलों में अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) की प्रक्रिया तुरंत शुरू करें।

6. तथ्यों पर आधारित ड्राफ्टिंग करें — आत्म समर्पण आवेदन या अग्रिम जमानत के साथ साक्ष्य प्रस्तुत करें।

दहेज़ कानूनों का उद्देश्य महिला सुरक्षा है — लेकिन इनका दुरुपयोग न केवल पुरुष पक्ष को, बल्कि संपूर्ण न्यायिक व्यवस्था को भी कमजोर करता है।

हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि:
• सच्चे मामलों में त्वरित न्याय हो।
• झूठे मामलों में निर्दोषों की रक्षा हो।
• कानून को हथियार नहीं बल्कि संरक्षण के रूप में प्रयोग किया जाए।

📘 यह लेख विशेष रूप से नए वकीलों, विधि छात्रों, और न्यायिक अभ्यर्थियों के लिए उपयोगी है।
आप से अनुरोध है कि इस लेख को सेव करें और पेज को फॉलो करके जुड़े रहें।

✍️ Adv. Anchal Shukla
📘 How to Become Best Criminal Lawyer
📍 Lakhimpur Kheri

#दहेज़

16/07/2025

📘 भाग-2: ग़ैर-जमानती अपराधों में जमानत प्रार्थना पत्र (Non-Bailable Offence Bail Draft)

जिनमें सजा 7 वर्ष तक है और गिरफ्तारी नहीं हुई है (Section 41A CrPC/35 BNSS)

पिछले लेख में हमने जमानतीय अपराध में जमानत प्रार्थना पत्र के विषय में चर्चा की। इस लेख में हम ग़ैर जमानती अपराध में जमानत प्रार्थना पत्र पर चर्चा करेंगे, जिसमें सजा का प्रावधान 7 वर्ष तक है और अभियुक्त को दौरान विवेचना गिरफ्तार नहीं किया गया है ।

🔹 ड्राफ्टिंग करते समय ध्यान देने योग्य विशेष बातें:
1. FIR में अभियुक्त का नाम है या नहीं तथा उसकी गिरफ्तारी नहीं हुई है ।
2. आरोपों का स्वरूप 7 वर्ष तक की सजा वाला हो
3. आरोपी ने विवेचना में सहयोग किया हो
4. कोई आपराधिक इतिहास नहीं हो
5. Satender Kumar Antil बनाम CBI व अन्य जैसे सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों का हवाला
6. धारा 41A CrPC / धारा 35 BNSS के अनुपालन का ज़िक्र



📝 जमानत प्रार्थना पत्र का औपचारिक प्रारूप

न्यायालय श्रीमान —————महोदय,जिला———

विषय: जमानत प्रार्थना पत्र प्रथम

सरकार
बनाम
—————आदि
मुकदमा संख्या: ———/2025
मु0अ0सं0: ————/2025
अं० धारा: ——-IPC/BNSS
थाना: ——-, जनपद: ______
तारीख पेशी: —-/—/2025

श्रीमान जी,
प्रार्थी/ प्रार्थीगण का जमानत प्रार्थना पत्र निम्नवत है;-
धारा 1- यह कि प्रार्थी/प्रार्थीगण सर्वथा निर्दोष हैं एवं उनके विरुद्ध लगाए गए आरोप मिथ्या, असत्य एवं राजनीतिक दुर्भावना से प्रेरित हैं।

धारा 2. यह कि प्रार्थी/ प्रार्थीगण प्रथम सूचना रिपोर्ट में नामजद नहीं है और उन्हें बाद में ग्राम स्तर की पार्टीबंदी के कारण आरोपित किया गया है। (यदि FIR में नामजद हो तो लिखें कि ग्राम में पार्टी बन्दी या रंजिश के चलते झूठा आरोपित किया गया है )।

धारा 3. यह कि FIR और विवेचना में संकलित साक्ष्यों में घोर विरोधाभास है, जो अभियोजन की मंशा पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है।

धारा 4. यह कि प्रार्थी/ प्रार्थीगण के ऊपर आरोपित अपराध में अधिकतम सात वर्ष तक की सजा का प्रावधान है।प्रार्थी/ प्रार्थीगण को विवेचक द्वारा दौरान विवेचना गिरफ्तार नही किया गया है तथा धारा **41A CrPC / धारा 35 BNSS** के तहत नोटिस देकर आबद्ध किया गया था और उन्होंने उसका पूर्ण अनुपालन किया है।

धारा 5. यह कि प्रार्थी/ प्रार्थीगण का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है और वह कभी सजायाफ्ता नहीं रहे हैं।

धारा 6. यह कि **माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा Satender Kumar Antil बनाम CBI व अन्य में यह स्पष्ट किया गया है कि:
- यदि अभियुक्त को विवेचना के दौरान गिरफ़्तार नहीं किया गया है
- उसने विवेचना में सहयोग किया है
- उस पर आरोपित अपराध की अधिकतम सजा 7 वर्ष से कम है
तो उसे केवल आरोप पत्र दाखिल होने के आधार पर जेल नहीं भेजा जाना चाहिए।

धारा 7. यह कि प्रार्थी/ प्रार्थीगण जमानत मिलने पर अपनी जमानत की सुविधा का कभी दुरुपयोग नहीं करेंगे तथा न्यायालय के निर्देशों का अक्षरश: पालन करेंगे, किसी गवाह को प्रभावित नहीं करेंगे और विचारण में पूर्ण सहयोग करेंगे।

अतः श्रीमान जी से विनम्र अनुरोध है कि प्रार्थी/ प्रार्थीगण को उपयुक्त जमानत धनराशि पर रिहा किये जाने का आदेश पारित करने की कृपा करें।

प्रार्थी/ प्रार्थीगण

दिनांक: ____________
स्थान: द्वारा श्री —————एडवोकेट

महत्वपूर्ण केस लॉ:
• Satender Kumar Antil vs CBI, 2022 (10) SCC 51
• Arnesh Kumar vs State of Bihar, (2014) 8 SCC 273
• Lal Kamalendra Pratap Singh vs State of UP, AIR 2009 SC 26
• Sanjay Chandra vs CBI, (2012) 1 SCC 40

(आवश्यकता पड़ने पर इन महत्वपूर्ण निर्णयो का भी हवाला दिया जा सकता है )

🔔 अगले भाग में आएगा:

ग़ैर-जमानती अपराधों में जमानत — जिनमें सजा 7 वर्ष से अधिक है
(जैसे: IPC 307, 376, 302 आदि मामलों में ड्राफ्टिंग रणनीति)

📘 यह लेख विशेष रूप से नए वकीलों, विधि छात्रों, और न्यायिक अभ्यर्थियों के लिए उपयोगी है।

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✍️ Adv. Anchal Shukla
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