Aditya Garg-Lawyer

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16/08/2023

*चिर अमृत* नाम से ख्यात राजस्थान की सबसे बड़ी लॉ फर्म की ओर से *वरिष्ठ अधिवक्ता संजय झँवर* के नेतृत्व में सूर्योदय की पहली किरण के साथ प्रातः 5.58 पर 77वें स्वाधीनता दिवस का झंडारोहण किया गया ।विशिष्ट अतिथि थे अनुसूचित जाति एवं जनजाति के पाँच आदिवासी बच्चे जो आर्ष विद्या तीर्थ नामक संस्था में गुरुकुल पद्दती से शिक्षा ग्रहण कर रहें हैं ! राष्ट्र गीत एवं राष्ट्र गान का मनमोहक गायन प्रसिद्ध गायिका सीमा साबू एवं सोनिया बिरला की मधुर स्वरों से हुआ !

कार्यक्रम में राजस्थान हाउसिंग बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष सरदार अजयपाल सिंह जी, आर्ष विद्या तीर्थ के न्यासी एवं महात्मा गांधी हॉस्पिटल के उपाध्यक्ष अनिल बाफ़ना, अपैक्स हॉस्पिटल के निदेशक डॉक्टर शैलेश झँवर, मेवाड़ शुगर के चेयरमैन श्री अरुण धनधानिया इत्यादि गणमान्य नागरिक सम्मिलित हुए ।

15/09/2022

🛑🛑सादे कागज पर साइन कर के आपसे कोई 10 लाख रुपये उधार ले और वापस करने से मना कर दे तो क्या करना चाहिए?❓❓

👉खासकर दोस्त, रिश्तेदार, जान-पहचान वाले लोग वगैरह को तो भरोसे पर ही कर्ज दे दिया जाता है. वहीं बहुत सारे मामलों में स्टाम्प पेपर (Stamp Paper) पर और कई मामलों में तो केवल सादे कागज (Plain Paper) पर सिग्नेचर करवा कर उधार दे दिया जाता है.

👉लेकिन यह भरोसा तब टूट जाता है, जब सामनेवाला उधार ली गई रकम वापस करने से मुकर जाता है.

👉अब सवाल ये ​है कि अगर सादे कागज पर हस्ताक्षर कर के कोई आपसे पैसे उधार ले और फिर वापस करने से मुकर जाए तो क्या इसका कोई उपाय है ❓❓

🛑सादे कागज पर साइन भी माना जाएगा सबूत❓❓

✅इस सादा कागज हो या फिर स्टाम्प पेपर ,
अगर आपने उसपे कर्जदार की साइन करवा लेने के बाद आप सोच रहे हैं कि आपके पैसे बहुत आसानी से मिल जाएंगे और नहीं मिलने पर आप कानूनी तौर पर वसूल लेंगे, तो इतना भी आसान नहीं है. पैसे वसूल करने में आपको दिक्कतें आ सकती हैं.

✅हालांकि आपने अपने कर्जदार से सिग्नेचर (Signature) करवाकर सबूत बना लिया है तो इसका मतलब यह हुआ कि आप दोनों यानी कर्जदार और देनदार के बीच एक लिखित समझौता हुआ है और यह एक तरह से आपके दिए गए पैसों की रसीद है.

🛑सिविल कोर्ट में करना होगा केस‼️

✅लिखित समझौते के बावजूद आपका कर्जदार यदि इस एग्रीमेंट को मानने से इनकार कर देता है तो आप उसके खिलाफ सिविल कोर्ट में मुकदमा कर सकते हैं या उस एग्रीमेंट (Loan Agreement) को मानने के लिए याचिका दायर करेंगे या फिर उसी के बेस पर अपने पैसों की रिकवरी का केस दाखिल करेंगे. नइ कार्यवाहियों को सिविल या दीवानी कार्यवाही कहा जाता है.

✅सिविल कोर्ट (Civil Court) में सिविल केस ही दर्ज होते हैं और फिर सुनवाई (Case Hearing) के लिए लंबी-लंबी तारीखें भी पड़ सकती हैं.

✅यह अदालत पर निर्भर करता है कि कितने दिन में आपके केस में फैसला सुनाए.

✅फैसला आपके पक्ष में आया तो आपके कर्जदार को आपका पैसा वापस लौटाना होगा. हालांकि इसमें उसे जेल या कोई बड़ी सजा नहीं होती है.

🛑🛑अगर ​बिना लिखा-पढ़ी किए कर्ज दे दिया तो…

✅बहुत सारे लोग किसी अपने के कहने पर ​भरोसा करते हुए सामनेवाले को कर्ज दे देते हैं.

✅यानी समझ लीजिए कि आपने सादे कागज पर साइन तक नहीं करवाया और बिना लिखा-पढ़ी किए ही कर्ज दे दिया और अब वह पैसे वापस नहीं कर रहा तो क्या करना होगा?

✅इस स्थिति में आप कर्ज देने के समय वहां मौजूद रहे 2 गवाह पेश कर सकते हैं.

✅आप अपने नजदीकी पुलिस स्टेशन यानी थाना जाएंगे और आवेदन देंगे कि इनके सामने कर्ज लेने के बावजूद कर्जदार पैसा वापस नहीं दे रहा. एग्रीमेंट तो कोई है नहीं, ऐसे में मामला आपराधिक हो जाएगा.

🛑थाने में क्रिमिनल केस या कोर्ट में कंप्लेंट केस!

अधिवक्ता शुभम भारती बताती हैं कि पुलिस थाने में आपकी रिपोर्ट पर गौर कर, चीटिंग या धोखाधड़ी का केस दर्ज कर सकती है और फिर क्रिमिनल केस की तरह जांच-पड़ताल, चार्जशीट और फिर कोर्ट में केस चलेगा और फिर फैसला सुनाया जाएगा. आप चाहें तो सीधे कोर्ट में कंप्लेंट केस भी दर्ज करवा सकते हैं.

🛑कैसे वापस मिलेंगे पैसे?

✅कोर्ट में चल रहे इस आपराधिक मामले में कर्जदार की गिरफ्तारी हो सकती है और यदि कोर्ट में जुर्म साबित हो गया तो उसे सजा भी मिलेगी.

✅कोर्ट ने आपके पक्ष में फैसला सुनाया तो आपका पैसा भी वापस होगा और उसे सजा भी मिलेगी. हालांकि फैसला आने से पहले ही कर्जदार के मन में जेल जाने के भय से वह आपका पैसा लौटाने के बारे में सोच सकता है.

✅ऐसे कई मामलों में देखा गया है कि बात कोर्ट से फिर समझौते पर आकर ही बनी है.

✅यानी जेल जाने से बचने के लिए कर्जदार चाहेगा कि दोनों के बीच समझौता हो जाए. अगर वह आपका पैसा लौटाने की बात कहता है तो या तो पूरा पैसा ले लें या फिर पूछ लें कि कितने दिन में वह पैसे लौटाएगा और लिखवाकर गारंटी के रूप में इस बार जरूर कुछ गिरवी रख लें.

✅आप यह भी तय कर सकते हैं कि आपके पूरे पैसे वापस होने के बाद ही आप केस वापस लें. केस कंपरमाइज कके लिए कोर्ट में फिर से कंपरमाइज पेटीशन देना होगा.

✅कोर्ट दोनों पक्ष से आपत्ति नहीं होने पर केस खारिज कर सकता है.

✅आपको आपके पैसे वापस मिल जाएं, इससे अच्छा और क्या होगा ‼️

07/01/2022

🛑क्या पावर ओफ़ अटर्नी पे ज़मीन या मकान ख़रीदा जाए ❓
👉पॉवर ऑफ अटॉर्नी सेल डीड होती है या नहीं ❓

✅अक्सर लोग पॉवर ऑफ अटॉर्नी लिखवा लेते हैं जिस पर बहुत सारे राज्य में स्टांप ड्यूटी नहीं लगती है। ऐसी पावर ऑफ अटॉर्नी से वह लोग सेल का सौदा कर लेते हैं जबकि यह ठीक नहीं है।

✅पॉवर ऑफ अटॉर्नी का इस्तेमाल दूसरी तरह से किया जाता है। किसी प्रॉपर्टी को खरीदते समय उसकी पॉवर ऑफ अटॉर्नी नहीं लिखवाई जाती है बल्कि सेल डीड बनवाई जाती है और उस सेल डीड का रजिस्ट्रेशन कराना होता है।

✅पॉवर ऑफ अटॉर्नी एक तरह से किसी आदमी को अपनी संपत्ति के सारे अधिकार सौंपना होता है पर फिर भी टाइटल तो उसी व्यक्ति के पास होता है जिस व्यक्ति के नाम पर वह संपत्ति रजिस्टर्ड होती है।

✅पॉवर ऑफ अटॉर्नी से टाइटल में परिवर्तन नहीं होता है बल्कि पॉवर ऑफ अटॉर्नी तो एक संपत्ति को किसी दूसरे व्यक्ति को बेचने के लिए काम में लाई जा सकती है पर पॉवर ऑफ अटॉर्नी किसी भी सूरत में संपत्ति पर स्वतंत्र स्वामित्व को स्थापित नहीं करती है।

✅किसी भी संपत्ति को जब खरीदा जाए तब उसे पॉवर ऑफ अटॉर्नी के जरिए नहीं खरीदा जाए क्योंकि ऐसी स्थिति में जब पॉवर ऑफ अटॉर्नी लिखने वाले संपत्ति के स्वामी की मृत्यु हो जाती है तब पॉवर ऑफ अटॉर्नी स्वतः निरस्त हो जाती है और संपत्ति उसके मालिक के वारिसों को नियस्त जाती है।

✅यह भी देखने में आता है कि ऐसी पॉवर ऑफ अटॉर्नी लिखने वाले साथ में एक वसीयत भी लिख देते हैं क्योंकि वसीयत को भी रजिस्ट्रेशन से छूट है तथा वहां भी स्टांप ड्यूटी बच जाती है।

✅पॉवर ऑफ अटॉर्नी लिखने वाला वसीयत भी उसी व्यक्ति के नाम लिख देता है जिस व्यक्ति के नाम पॉवर ऑफ अटॉर्नी लिखी जाती है। यह तरीका भी ठीक नहीं है क्योंकि ऐसी वसीयत को संपत्ति के स्वामी के वारिस कभी भी चुनौती दे सकते हैं और जिस दिन ऐसी चुनौती देते हैं तब संपत्ति को खरीदने वाला संपत्ति को खरीद कर भी कानूनी पचड़े में फंस जाता है। इतनी सारी धनराशि अदा करने के बाद भी कानूनी पचड़े को झेलना पड़ता है।

02/01/2022

🛑क्या आप मकान या ज़मीन ख़रीदने जा रहे हैं ❓
🛑मकान या जमीन खरीदते समय कौन सी कानूनी बातों की जांच करें❓

🛑उपभोग की जा रही संपत्ति के संबंध में क्या जांच करें❓

संपत्ति दो प्रकार की हो सकती है। पहली वह संपत्ति जो किसी व्यक्ति द्वारा उपभोग की जा रही है और उसके उपभोग की जाने में एक लंबी यात्रा है। एक लंबे समय से वह संपत्ति को उपयोग किया जाता रहा है। दूसरी वह संपत्ति होती है जो किसी बिल्डर या डेवलेपर द्वारा डेवलप की जाती है। इस संपत्ति को बिल्डर डेवलप करते हैं। फिर लोगों में प्लॉट या फ्लैट के माध्यम से उन्हें बेचा जाता है। यहाँ हम आपको एक एक करके हर पहलू के बारे में बताएँगे

✅पहली संपत्ति वह है जिसे पहले से उपयोग किया जाता है और उसके पहले से भी उसे उपभोग किया जाता है। उस संपत्ति को किसी व्यक्ति द्वारा खरीदा जाता है। ऐसी संपत्ति को पट्टाशुदा संपत्ति कहते हैं।
✅इस संपत्ति को खरीदते समय बेहद सावधानी रखी जाती है। ऐसी संपत्ति को खरीदते समय सबसे पहले यह देखा जाना चाहिए कि उस संपत्ति को बेच कौन व्यक्ति रहा है। वह जो व्यक्ति उस संपत्ति को बेच रहा है उसे वह संपत्ति किस मार्फत मिली है। उसे वह संपत्ति कैसे मिली है, इस बात की जांच होनी चाहिए।

✅किसी भी व्यक्ति को संपत्ति विक्रय के माध्यम से दान के माध्यम से वसीयत के माध्यम से या पैतृक संपत्ति के जरिए मिलती है। खरीदार को यहां पर जांच करनी चाहिए कि जो व्यक्ति अपनी संपत्ति बेच रहा है उसे संपत्ति किस प्रकार से मिली है और क्या उसे बेचने का अधिकार है।

🛑संपत्ति के नामांतरण की जांच कैसे करें ❓

✅ऐसी पट्टाशुदा संपत्ति को खरीदते समय सबसे पहले उसके नामांतरण की जांच की जाना चाहिए। यह देखा जाना चाहिए कि नगर निगम और ग्राम पंचायत के खातों में उस संपत्ति को किस नाम से रजिस्टर्ड किया गया है। यह देखा जाना चाहिए कि नगर निगम के संपत्ति कर के खाते में उस संपत्ति को किस नाम से रजिस्टर्ड किया गया है और किस व्यक्ति के नाम से उस संपत्ति का संपत्ति कर जलकर भरा जा रहा है।

✅ऐसा ही रिकॉर्ड ग्राम पंचायत और नगरपालिका के रजिस्टर में भी उपलब्ध होता है। किसी भी संपत्ति का नामांतरण इसलिए आवश्यक होता है क्योंकि एक सरकारी रिकॉर्ड होता है जो व्यक्ति संपत्ति का स्वामी होता है अधिकांश मामले में तो नामांतरण उसी व्यक्ति के नाम होता है परंतु अनेक मामले ऐसे होते हैं कि संपत्ति का स्वामी कोई और होता है और संपत्ति का नामांतरण किसी अन्य व्यक्ति के नाम पर होता है। जहां भी ऐसा मामला दिखाई दे वहां उस संपत्ति को नहीं खरीदा जाना चाहिए।

✅संपत्ति के स्वामित्व के सभी दस्तावेजों की चेन देखना चाहिए। यह देखा जाना चाहिए कि संपत्ति किस किस व्यक्ति के पास किस किस प्रकार से आई है और उससे संबंधित दस्तावेज कौन-कौन से थे।

✅जो भी व्यक्ति संपत्ति का अंतिम स्वामी होता है उस व्यक्ति के पास सभी व्यक्तियों को मिले हुए स्वामित्व के दस्तावेज की मूल और ओरिजिनल प्रतियां होती है। यह प्रतियां अंतिम स्वामी के द्वारा रखी जाती है।

28/12/2021

किराया अनुबंध 11 महीने का क्यों होता है और किराएदार क्या कभी मकान मालिक हो सकता है❓

क्या हो सकता है मालिकाना हक़ ❓

🛑पट्टा (lease)और किराया (Rent )

✅अमूमन पट्टा और किराया को अलग-अलग समझा जाता है जबकि ऐसा नहीं है। पट्टा और किराया एक ही चीज है पट्टे का अर्थ होता है किसी भी संपत्ति को एक निश्चित समय सीमा के लिए या अनिश्चित समय के लिए किसी दूसरे व्यक्ति को उपभोग करने के लिए सौंप देना और उसके बदले में कोई निश्चित धनराशि ले लेना। इसे अंग्रेजी में लीज कहा जाता है। आमतौर पर सरकार पट्टे जारी करती है तो ऐसा समझा जाता है कि पट्टे सरकार ही देती है जबकि कोई भी संपत्ति को किराए पर लेना पट्टा ही होता है। इसका स्पष्ट उल्लेख संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम में मिलता है।

✅जब कभी किसी संपत्ति को पट्टे पर दिया जाता है तो उसका एक पट्टा लिखा जाता है। संपत्ति का मालिक अपनी सहमति से यह पट्टा लिखता है कि वे संपत्ति का मालिक है और उसके द्वारा किसी दूसरे व्यक्ति को संपत्ति का उपयोग करने के लिए एक निश्चित प्रतिफल के बदले संपत्ति सौंपी जा रही है। अब इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि जो व्यक्ति संपत्ति पर कब्जा किए हुए हैं उस व्यक्ति का कब्जा एक किराएदार के नाते हैं अर्थात उस जमीन को या मकान को पट्टे पर लिया है।

किराया अनुबंध और किराए की रसीद आवश्यक है

✅किराएदारी मामले में देखा जाता है कि किराया अनुबंध और किराए की रसीद को लेकर मकान मालिक और किराएदार सतर्क नहीं होते हैं। मकान मालिक भी अपना किरायानामा बनवाते नहीं है और किराएदार भी इस पर जोर नहीं देते जबकि यह बहुत खतरनाक है। किसी भी संपत्ति को किराए के देने पर पूर्व उस संपत्ति का किरायानामा बनवाया जाना चाहिए और हर महीने किराए की वसूली पर मकान मालिक द्वारा किराएदार को एक रसीद देना चाहिए जिसे किराया रसीद कहा जाता है। इस प्रकार के व्यवहार से सबूत रिकॉर्ड पर रहते हैं।

🛑किरायानामा 11 महीने का ही क्यों❓

✅आमतौर पर यह भी देखा जाता है कि जब भी किसी मकान या जमीन को किराए पर दिया जाता है तो मकान मालिक 11 महीने का किरायानामा बनाता है जिससे लोगों को यह लगने लगा है कि किरायानामा 11 महीने का ही होता है जबकि यह बात ठीक नहीं है।

✅11 महीने का किरायानामा जैसी चीज कानून में कहीं कोई उल्लेखित नहीं मिलती है। यह तो लोगों द्वारा बनाई गई एक प्रथा है।

✅कोई भी किरायानामा 11 महीने का भी हो सकता है और 11 महीने से कम का भी हो सकता है और 50 वर्ष तक का भी हो सकता है और एक अनिश्चित समय के लिए भी हो सकता है।

✅इसके लिए कोई निश्चित समय नहीं है पर कोई भी संपत्ति को 11 महीने से अधिक समय के लिए किराए पर दिया जाता है तब ऐसी संपत्ति के पट्टे का रजिस्ट्रेशन कराना होता है।

✅इसका उल्लेख भारतीय रजिस्ट्रेशन एक्ट के अंतर्गत मिलता है जहां यह स्पष्ट रुप से लिखा हुआ है कि अगर 11 महीने से अधिक समय के लिए किसी संपत्ति को किराए पर दिया जाता है तब ऐसी स्थिति में उस किरायानामा को रजिस्टर कार्यालय में रजिस्टर्ड करवाया जाएगा।
✅अब यहां पर रजिस्ट्रेशन का काम थोड़ा महंगा होता है, वहां पर स्टांप शुल्क देना होता है रजिस्ट्रेशन का शुल्क देना होता है और फिर किरायानामा रजिस्टर्ड होता है तभी उसे कानूनी मान्यता मिलती है।

✅यहां पर लोग किरायानामा की रजिस्ट्री से बचने के लिए यह विकल्प इस्तेमाल करते हैं कि किरायानामा को 11 महीने से अधिक का बनाते ही नहीं है और किरायानामा में यह लिख देते हैं कि 11 महीने के बाद किराया कितना रहेगा और हर साल किराए में कितनी बढ़ोतरी होगी इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि एक बार किरायानामा बना लेने से अगली बार बनाने की आवश्यकता नहीं होगी और अगली बार मौखिक रूप से ही किरायानामा रहेगा।

✅एक बार का किरायानामा साक्ष्य के रूप में काम आ जाता है इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि किसी संपत्ति का कब्जा किसी दूसरे व्यक्ति को एक किराएदार की हैसियत से दिया गया है और उसमें एक निश्चित धनराशि मकान मालिक द्वारा तय की गई है जो किराए के रूप में किराएदार द्वारा दी जाएगी। इसके अलावा 11 महीने के किरायानामा जैसी कोई भी चीज कानून में कहीं भी उपलब्ध नहीं है यह केवल रजिस्ट्री से बचने का एक उपाय मात्र है।

✅किरायानामा को एक हजार या कम से कम ₹500 के नॉन जुडिशल स्टांप पर लिखकर किसी नोटरी वकील से तस्दीक करवाया जा सकता है। उसकी तस्दीक करने से इस किरायानामा को कानूनी मान्यता मिल जाती है।

🛑क्या किरायेदार को सम्पत्ति का अधिकार हो है ❓

✅किसी भी संपत्ति का किराएदार उसका मालिक तब तक नहीं हो सकता है जब तक वह संपत्ति को खरीदता नहीं है या दान के रुप में या वसीयत के रूप में हासिल नहीं करता है। केवल एक किराएदार की हैसियत से वह संपत्ति का मालिक कभी भी नहीं बन सकता।

✅संपत्ति का मालिक बनने के लिए संपत्ति को खरीदना पड़ता है यह दान के जरिए लेना होता है या फिर वसीयत के जरिए संपत्ति को प्राप्त करना होता है। एक किराएदार के रूप में संपत्ति कभी भी नहीं मिलती है। किराएदार को संपत्ति पर केवल एक उपभोग करने का अधिकार प्राप्त होता है और उसके बदले भी उसे एक निश्चित धनराशि संपत्ति के मालिक को देना पड़ती है।

✅11 महीने के किराया अनुबंध जैसी चीज भी कानून में नहीं है यह केवल रजिस्ट्री से बचने का एक उपाय मात्र है। यदि एक लंबे समय के लिए किसी व्यक्ति को मकान किराए से दिया जाए तब एक पट्टा रजिस्टर्ड करवाया जाना चाहिए जैसे कि सरकार अपनी संपत्ति जब भी किसी व्यक्ति को किराए पर देती है तब उससे एक निश्चित अवधि के लिए एकमुश्त राशि लेकर उसे पट्टा लिखकर दे देती है।

✅जैसे कि अनेक फैक्ट्री और टॉकीज सरकार द्वारा दी गई लीज की जमीन पर चल रहे हैं। सरकार ने उन्हें 100 वर्ष या 50 वर्ष के लिए वह संपत्ति एक पट्टा लिख कर दिया है। वह लोग उस संपत्ति के मालिक नहीं है उन्होंने सरकार को एक निश्चित धनराशि 100 वर्ष या 50 वर्ष के लिए दी है उसके बाद उनका उस संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं है।

06/12/2021

संपत्ति खरीदने का सौदा करने के बाद मालिक रजिस्ट्री नहीं करे तब क्या है खरीददार के अधिकार ❓

--आपराधिक कानून:-

जब भी किसी व्यक्ति द्वारा अपने मालिकाना हक की संपत्ति को बेचने का सौदा किसी क्रेता के साथ किया जाता है तब प्रतिफल की संपूर्ण राशि अदा कर देने के पश्चात विक्रेता का यह दायित्व बनता है कि वह क्रेता के पक्ष में रजिस्ट्री कर दे। कभी-कभी यह होता है कि विक्रेता द्वारा संपूर्ण धनराशि प्राप्त तो कर ली जाती है पर ऐसी धनराशि को प्राप्त करने के बाद रजिस्ट्री करने से इंकार कर दिया जाता है या फिर क्रेता को झूठे वादे करके फसाया जाता है।

भारतीय दंड संहिता 1860 के अंतर्गत इस परिस्थिति से निपटने हेतु संपूर्ण व्यवस्था दी गई है। अधिनियम की धारा 420 और 406 इस मामले में प्रयोज्य होती है।

--धारा 420:-

यह धारा किसी व्यक्ति के साथ छल किए जाने पर लागू होती है। यह प्रसिद्ध धारा है जो छल का प्रतिषेध करती है। इस धारा के अंतर्गत यदि किसी व्यक्ति द्वारा किसी व्यक्ति को छल और कपट के माध्यम से उसकी संपत्ति को हड़पा जाता है तब दंड की व्यवस्था की जाती है। शिकायतकर्ता जो ऐसे अपराध से पीड़ित होता है अपनी शिकायत को लेकर संबंधित क्षेत्र के थाना प्रभारी के पास जा सकता है और एक लिखित ज्ञापन देकर थाना प्रभारी को इस प्रकरण से अवगत करा सकता है।

संबंधित क्षेत्र थाना की पुलिस ऐसे व्यक्ति पर जिसके द्वारा छल किया गया है, एक विक्रय अनुबंध किया गया और उस विक्रय अनुबंध के बाद रजिस्ट्री नहीं की गई तब उस व्यक्ति पर धारा 420 के अंतर्गत एफआईआर दर्ज करके मामले की विवेचना करके न्यायालय में प्रस्तुत कर देती है। इस प्रकरण में व्यक्ति को लंबी जेल भी होती है तथा शीघ्र जमानत मिलना भी सरल नहीं होता है।

--धारा 406:-

भारतीय दंड संहिता की धारा 406 अमानत में खयानत से संबंधित है। इस धारा के अंतर्गत किसी व्यक्ति के साथ यदि छल के माध्यम से अमानत में खयानत की जाती है तब दंड का प्रावधान किया गया है। विक्रय का सौदा करना और उसके बाद रजिस्ट्री नहीं करना एक प्रकार से अमानत में खयानत है और ऐसी अमानत में खयानत छल के माध्यम से की जाती है।

--पुलिस सुनवाई नहीं करे तब:-

यदि पुलिस द्वारा इस प्रकरण में एफआईआर दर्ज नहीं की जाती है और आरोपी पर मुकदमा संस्थित नहीं किया जाता है तब पीड़ित पक्षकार न्यायालय में भी अपनी शिकायत प्रस्तुत कर सकता है तथा धारा 156(3) के अंतर्गत एक निजी परिवाद के माध्यम से मजिस्ट्रेट द्वारा पुलिस को प्रकरण दर्ज करने हेतु आदेशित करवा सकता है।

--विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम (धारा 10):-

विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम (Specific Relief Act) की धारा 10 किसी भी संविदा के पालन करवाए जाने के संबंध में उपबंध करती है। इस धारा के अंतर्गत पीड़ित पक्षकार न्यायालय के समक्ष उपस्थित होकर अपनी संविदा को पालन करवाए जाने हेतु निवेदन कर सकता है। इस धारा के अंतर्गत न्यायालय को संविदा का पालन करवाना ही होता है तथा उसे किसी प्रकार का विवेकाधिकार प्राप्त नहीं है।

Greetings on the occasion of  .This day is celebrated across India to mark the birth anniversary of an eminent noble   a...
03/12/2021

Greetings on the occasion of .

This day is celebrated across India to mark the birth anniversary of an eminent noble and the first president of independent India Dr Ji.

02/12/2021

जब संपत्ति पर अवैध कब्ज़ा हो जाए तो आपको क्या कानूनी उपाय करने चाहिए ❓

संपत्ति पर कब्जा उसके मालिक का होना एक कानूनी अधिकार है।
किसी भी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से उसकी इच्छा के विरुद्ध बेकब्जा नहीं किया जा सकता।
अपराधी चाकू और बंदूकों की नोक पर सीधे सरल सभ्य नागरिको के जमीन मकानों पर कब्ज़ा कर लेते हैं और उन्हें संपत्ति से बेदखल कर देते हैं।
भारतीय कानून में इस समस्या से निपटने हेतु संपूर्ण व्यवस्था दी गई है

आपराधिक कानून आईपीसी की धारा 420

भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 420 एक सार्वभौमिक प्रसिद्ध धारा है। यह धारा धोखाधड़ी के अनेक मामलों में प्रयोज्य होती है। किसी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से आपराधिक बल के माध्यम से बेदखल करने पर इस धारा को लागू किया जा सकता है। संबंधित पुलिस थाने से इस धारा के अंतर्गत कार्यवाही की जा सकती है। कोई भी पीड़ित व्यक्ति को सर्वप्रथम अपने इस अधिकार का उपयोग करना चाहिए।

आईपीसी की धारा 406

भारतीय दंड संहिता की धारा 406 अमानत में खयानत के मामलों में लागू होती है। इस धारा के अंतर्गत किसी व्यक्ति की संपत्ति में विश्वास के आधार पर घुसकर उस पर कब्जा कर लेगा संगीन अपराध है। पीड़ित पक्षकार अपने साथ हुए अन्याय को लेकर इस धारा के अंतर्गत संबंधित पुलिस थाना क्षेत्र के अंतर्गत शिकायत दर्ज कर सकता है।

आईपीसी की धारा 467 भारतीय दंड संहिता की धारा 467 कूटरचना पर लागू होती है। यदि किसी संपत्ति को कूट रचित दस्तावेज के माध्यम से हथिया लिया गया है तथा उस पर अपना कब्जा जमा लिया गया है तब पीड़ित पक्षकार ऐसे मामले में इस धारा के अंतर्गत शिकायत कर सकता है।

सिविल कानून

सिविल कानून का नाम सुनकर ही जनता के भीतर एक लंबी कानूनी प्रक्रिया का चित्र सामने आ जाता है। यह बात सच है कि भारत की अदालतों में न्याय की प्रक्रिया अत्यंत विषाद और खर्चीली है जहां कोई भी वंचित व्यक्ति अपने मामले को लेकर जाने के से भयभीत होता है क्योंकि अदालत में जाना समय और धन दोनों का नुकसान करना मालूम होता है पर अनेक मामले ऐसे हैं जिनमें कानून ने शीघ्र और सस्ती राहत उपलब्ध कराई है। उन्हीं मामलों में यह मामला भी आता है जहां किसी व्यक्ति की संपत्ति पर गैरकानूनी कब्जा कर लिया जाता है।

स्पेसिफिक रिलीफ एक्ट,

1963 त्वरित न्याय हेतु भारत की संसद द्वारा बनाया गया यह अधिनियम मील का पत्थर साबित हुआ है। इस अधिनियम की धारा 6 इस समस्या से निपटने का समाधान उपलब्ध करती है जहां किसी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से बेक़ब्ज़ा कर दिया गया है और ऐसा बेकब्जा किसी वैधानिक कार्यवाही के माध्यम से नहीं किया गया है अपितु मनमर्जी से किसी व्यक्ति की संपत्ति में घुसकर उस पर अपना कब्जा जमा लिया गया है। वहां पर धारा 6 लागू होती है, इस धारा के अंतर्गत पीड़ित को सरल संक्षिप्त न्याय दिया जाता है।

30/11/2021

पॉवर ऑफ़ अटॉर्नी क्या है और कब दी जाती है ❓..............................................................
पॉवर ऑफ अटॉर्नी एक विधिक दस्तावेज है जिसे किसी एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति को अपनी संपत्ति के संबंध में दिया जाता है।
आमतौर पर ऐसी पॉवर ऑफ अटॉर्नी संपत्ति के संबंध में ही दी जाती है।
अन्य मामलों में भी पॉवर ऑफ अटॉर्नी दी जा सकती है।

कानून द्वारा एक व्यक्ति को अनेक अधिकार दिए गए हैं, उन अधिकारों को उपयोग करने के लिए ऐसा व्यक्ति अपने को मिले अधिकार को पॉवर ऑफ अटॉर्नी के जरिए किसी दूसरे व्यक्ति को दे सकता है। जो व्यक्ति अधिकार देता है उसे अधिकारदाता कहा जाता है और जिस व्यक्ति को अधिकार मिलता है उसे अधिकारग्रह्यता कहा जाता है। जैसे कि किसी जमीन का मालिक उस जमीन की देखरेख, उसे बेचने, उसे किराए पर देने, उसे गिरवी रखने से संबंधित सभी अधिकार रखता है। पॉवर ऑफ अटॉर्नी के जरिए ऐसा मालिक अपने सभी अधिकारों को किसी दूसरे व्यक्ति को हस्तांतरित कर देता है। ऐसा दस्तावेज पॉवर ही पॉवर ऑफ अटॉर्नी कहलाता है।

कैसे करें पॉवर ऑफ अटॉर्नी ❓....................................

सर्वप्रथम तो पॉवर ऑफ अटॉर्नी का रजिस्टर्ड होना अत्यंत आवश्यक है। भारतीय रजिस्ट्रेशन अधिनियम के अंतर्गत ऐसी पॉवर ऑफ अटॉर्नी को रजिस्टर्ड किए जाने का आदेश दिया गया है और कोई भी पॉवर ऑफ अटॉर्नी तब तक सबूत के तौर पर इस्तेमाल नहीं की जा सकती जब तक उसे रजिस्टर्ड नहीं किया जाता है पर यदि रजिस्टर्ड नहीं किया जाए तो कम से कम ऐसी पॉवर ऑफ अटॉर्नी को नोटरीराइज़ तो करवाया ही जा सकता है।

किन किन कार्यों में पॉवर ऑफ अटॉर्नी का उपयोग किया जा सकता है ❓........................................................................................

पॉवर ऑफ अटॉर्नी का उपयोग हर उस कार्य में किया जा सकता है जिस कार्य में किसी व्यक्ति की संपत्ति से जुड़ा मामला है। जैसे कि किसी वाहन के संबंध में पॉवर ऑफ अटॉर्नी दी जा सकती है, किसी बैंक खाते के संचालन के संबंध में पॉवर ऑफ अटॉर्नी दी जा सकती है, किसी बीमा पालिसी के संबंध में पॉवर ऑफ अटॉर्नी दी जा सकती है, किसी अचल संपत्ति के संबंध में भी पावर ऑफ अटॉर्नी दी जा सकती है। ऐसी पॉवर ऑफ अटॉर्नी पर उस व्यक्ति के हस्ताक्षर होना चाहिए जिसके द्वारा निष्पादित की का रही है। बगैर हस्ताक्षर के पावर ऑफ अटॉर्नी नहीं हो सकती।

कौन व्यक्ति करते हैं पावर ऑफ अटॉर्नी ❓.......................................................

कोई भी व्यक्ति पॉवर ऑफ अटॉर्नी कर सकता है जो किसी बीमारी से जूझ रहा है या फिर किसी कारणवश अपनी संपत्ति की देखरेख नहीं कर पा रहा है।

FIR का क्‍या महत्‍व है?किसी भी अपराध या वारदात की जांच में FIR सबसे जरूरी डॉक्‍युमेंट होता है क्‍योंकि आगे की कानूनी कार...
23/11/2021

FIR का क्‍या महत्‍व है?

किसी भी अपराध या वारदात की जांच में FIR सबसे जरूरी डॉक्‍युमेंट होता है क्‍योंकि आगे की कानूनी कार्रवाई इसी के आधार पर की जाती है. एफआईआर लिखने के बाद ही पुलिस मामले की जांच शुरू करती है.

कौन फाइल करा सकता है FIR?
अगर किसी भी व्‍यक्ति के पास किसी संज्ञेय वारदात की जानकारी है, वो नजदीकी पुलिस स्‍टेशन में FIR दर्ज करा सकता है. ऐसा जरूरी है कि जिसके साथ वारदात हुई है, वही व्‍यक्ति FIR दर्ज कराएगा. अगर किसी पुलिस अधिकारी को संज्ञेय अपराध की जानकारी मिलती है तो वो भी खुद FIR फाइल कर सकता है. अगर आपके साथ कोई वारदात हुई है, अगर आपको पता है कि आपने न चाहते हुए भी कोई अपराध कर दिया है, वारदात के मौके पर वहां मौजूद थे, तो भी आप FIR दर्ज करा सकते हैं.

FIR दर्ज कराने का प्रोसेस क्‍या है?
दण्‍ड प्रक्रिया संहिता, 1973 के सेक्‍शन 154 में FIR का जिक्र है. जब कोई व्‍यक्ति किसी वारदात/घटना/अपराध की जानकारी मौखिक रूप से देता है तो पुलिस उसे लिखती है. शिकायतकर्ता या जानकारी देने वाले नागरिक के तौर पर यह आपका हक बनता है कि आपने जो मौखिक जानकारी दी है, पुलिस उसे लिखने के बाद आपको पढ़कर सुनाए. आपके द्वारा दी गई जानकारी को पुलिस द्वारा लिखने के बाद इसपर आपका साइन किया जाना जरूरी है.

आपको इस रिपोर्ट तभी साइन करना चाहिए, जब आपको लगे कि पुलिस ने आपके द्वारा दी गई जानकारी ठीक लिखा है, आपके कथन या तथ्‍यों को तोड़-मरोड़कर नहीं लिखा गया है. जो लोग ल‍िख या पढ़ नहीं सकते हैं, वे इस रिपोर्ट पर अंगूठे का निशान लगा सकते हैं. FIR दर्ज कराने के बाद उसकी एक कॉपी जरूर प्राप्‍त करनी चाहिए. FIR की कॉपी ब‍िल्‍कुल मुफ्त में प्राप्‍त करना आपका अधिकार है.

FIR में किस तरह की जानकारी देनी चाहिए?
FIR में आपका नाम, पता, तारीख, समय, रिपोर्टिंग की जगह आदि के बारे में जानकरी होनी चाहिए. वारदात/घटना/अपराध की सच्‍ची जानकारी व तथ्‍य, शामिल व्‍यक्तियों के नाम व अन्‍य जानकारी और अगर कोई चश्‍मदीद है तो उनकी जानकारी भी FIR में देनी चाहिए.

FIR दर्ज कराते समय आपको कोई भी गलत जानकारी या तथ्‍यों को तोड़-मरोड़कर नहीं बतानी चाहिए. भारतीय दंड संहिता, 1860 के सेक्‍शन 203 के तहत इसके लिए आप पर कार्रवाई की जा सकती है. इसमें कोई बयान ऐसा बयान भी नहीं होना चाहिए, जिसके बारे में आपको कोई स्‍पष्‍ट जानकारी नहीं हो.

अगर आपकी FIR दर्ज नहीं की जा रही तो क्‍या करना चाहिए?
अगर पुलिस स्‍टेशन में आपका FIR दर्ज नहीं किया जा रहा है तो आप पुलिस सुपरिटेंडेंट (SP) या इससे ऊपर डिप्‍टी इंस्‍पेक्‍टर जनरल ऑफ पुलिस (DIG) और इंस्‍पेक्‍टर जनरल ऑफ पुलिस (IG) से शिकायत कर सकते हैं. आप इन अधिकारियों को अपनी शिकायत लिखित रूप में पोस्‍ट के जरिए भेज सकते हैं. वे अपने स्‍तर पर से इस मामले की जांच करेंगे या जांच का निर्देश देंगे. आप चाहें तो प्राइवेट स्‍तर पर अधिकार-क्षेत्र में आने वाले कोर्ट में भी इसकी शिकायत कर सकते हैं.

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24/07/2021

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