14/06/2026
15 अगस्त 1947 की उस आधी रात को जब 57 वर्षीय पंडित जवाहरलाल नेहरू ने केवल 5 मिनट 30 सेकंड का जो नियति से साक्षात्कार का भाषण दिया था। वह भाषण 20वीं सदी के सबसे महान और ऐतिहासिक भाषणों में गिना जाता है।
वह केवल 5 मिनट 30 सेकंड का भाषण नहीं था, बल्कि सदियों से छुआछूत, गले में मटकिया और कमर में झाड़ू बांधकर घूमने पर मजबूर किए गए समाज को मुख्यधारा में लाने का एक पवित्र संकल्प था।
1951 में नेहरू सरकार द्वारा लाए गए पहले संविधान संशोधन के जरिए अनुच्छेद 15(4) को जोड़कर सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण का जो मजबूत कानूनी आधार तैयार किया गया, उसी ने इस देश के 18 करोड़ वंचित लोगो को आत्मसम्मान से जीना सिखाया।
1950 से लेकर 1964 के अपने 14 साल के प्रधानमंत्रित्व काल में नेहरू जी ने IIT, IIM, AIIMS और LIC जैसी सैकड़ों सरकारी संस्थाएं खड़ी कीं, ताकि आरक्षण सिर्फ कागजों पर न रहे, बल्कि दलितों-पिछड़ों के बच्चों को इनमें नौकरियां और उच्च शिक्षा मिल सके।
संविधान बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने लिखा, लेकिन उसे जमीन पर उतारने के लिए कांग्रेस ने 70 साल तक अपना खून-पसीना बहाया है। बाबा साहब के लिखने मात्र से व्यवस्थाएं लागू नहीं हो जातीं, उसे लागू करने के लिए जिस राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत थी, वह कांग्रेस ने दिखाई।
15 अगस्त 1947 से लेकर 2014 तक कांग्रेस सरकारों ने सामंतों, राजा-रजवाड़ों और जमींदारों की हेकड़ी को कुचलकर भूमि सुधार कानून लागू किए, ताकि भूमिहीन दलितों को जमीन का हक मिल सके। यह कांग्रेस शासन की ही देन है कि आज एक दलित और शोषित वर्ग का दूल्हा घोड़ी पर बैठकर शान से अपनी बारात निकाल लेता है, वरना सदियों तक इस समाज को घोड़ी पर बैठने तक की इजाजत नहीं थी।
जिन सरकारी स्कूलों, मुफ्त अस्पतालों और यूनिवर्सिटीज में पढ़कर आज की पीढ़ी बड़ी हुई है, वे सब नेहरू, इंदिरा, राजीव और लाल बहादुर शास्त्री जैसे नेताओं की दूरदर्शिता का परिणाम हैं।
1969 में इंदिरा गांधी द्वारा 14 बड़े बैंकों का राष्ट्रीयकरण करना और 1971 में राजा-महाराजाओं के प्रिवी पर्स (शाही भत्ते) को खत्म करना इस बात का सबसे बड़ा सबूत था कि कांग्रेस अमीरों के खिलाफ और गरीबों के साथ खड़ी थी। बैंकों के दरवाजे खुलते ही दबे-कुचले समाज को आर्थिक ताकत मिली।
27वें संविधान संशोधन और 1970-80 के दशकों में अनुसूचित जाति और जनजाति के कल्याण के लिए 'स्पेशल कंपोनेंट प्लान' (SCP) और 'ट्राइबल सब-प्लान' (TSP) के तहत बजट का सीधा हिस्सा आवंटित किया गया।
1989 में राजीव गांधी सरकार द्वारा लाया गया 'अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम' (SC/ST Act) वह अचूक हथियार था, जिसने सामंती ताकतों की रीढ़ तोड़ दी और कमजोर वर्ग को कानूनी सुरक्षा कवच दिया।
लेकिन आज 2026 के भारत की कड़वी हकीकत देखिए। सोशल मीडिया पर जिन्हें जनता 'साहेब', 'फेकू' और 'अंतिम सम्राट' जैसे तंज कसकर ट्रोल करती है, उनकी वर्तमान भाजपा सरकार ने आरक्षण को पूरी तरह से खोखला कर दिया है।
'अंधभक्त' जिसे 'अमृतकाल' कहते हैं, वह असल में गरीबों के लिए 'अंधकार काल' बन चुका है। केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों में आज भी लाखों की संख्या में बैकलॉग के पद खाली पड़े हैं, जिन्हें जानबूझकर नहीं भरा जा रहा है।
सार्वजनिक उपक्रमों (PSUs) का अंधाधुंध निजीकरण करके रेलवे, एयरपोर्ट्स और कोल इंडिया जैसी जगहों से आरक्षण को पिछले दरवाजे से खत्म किया जा रहा है। जब सरकारी नौकरियां ही नहीं बचेंगी, तो आरक्षण कहां मिलेगा?
भाजपा के नेता खुलेआम संविधान बदलने और आरक्षण की समीक्षा करने की बातें करते हैं, और इस हक को 'खैरात' कहकर दलित-पिछड़े समाज के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाते हैं।
यह सरकार पूरी तरह से चुनिंदा पूंजीपतियों, उद्योगपतियों और बड़े व्यापारियों की सरकार बनकर रह गई है। गरीब जनता को हर महीने 5 किलो मुफ्त राशन के पैकेट की कतार में खड़ा करके आत्मनिर्भरता का ढोंग रचाया जा रहा है, जबकि कारपोरेट घरानों के लाखों-करोड़ों रुपए के लोन बट्टे खाते (Write-off) में डाल दिए जाते हैं।
प्रधानमंत्री खुद के लिए हजारों करोड़ के विमानों में घूमते हैं और जनता महंगाई की चौतरफा मार झेल रही है। रसोई गैस, पेट्रोल, डीजल और खाने-पीने की चीजों के दाम आसमान छू रहे हैं।
सुकन्या समृद्धि योजना, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, आयुष्मान भारत या प्रधानमंत्री जन धन योजना जैसी योजनाओं का ढोल तो बहुत पीटा गया, लेकिन हकीकत यह है कि आज भी महिलाओं के खिलाफ अपराधों के आंकड़े डराने वाले हैं, बुजुर्गों की पेंशन बेअसर हो चुकी है और गरीब इलाज के अभाव में दम तोड़ रहा है।
सबसे बड़ा धोखा तो धर्म के नाम पर हुआ है। 2014 के बाद से भाजपा ने धर्म को एक राजनीतिक औजार बनाकर रख दिया है, जिससे समाज में नफरत और विभाजन की दीवारें खड़ी हो गईं। नेहरू और इंदिरा गांधी ने सच्चे अर्थों में सनातन और भारतीय संस्कृति का संरक्षण किया था, जहां सभी धर्मों का सम्मान था।
नेहरू जी के कार्यकाल में ही कुंभ मेलों का भव्य आयोजन और धार्मिक स्थलों का गरिमापूर्ण रखरखाव बिना किसी राजनीतिक तमाशे के होता था। आज धर्म के नाम पर युवाओं को रोजगार देने के बजाय उन्हें नफरती बहसों में झोंक दिया गया है।
धर्म के इस राजनीतिकरण ने समाज के ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर दिया है, जिसे देखकर हर संवेदनशील नागरिक की आंखें नम हो जाती हैं।
गद्दार वे नेता और नीतियां नहीं थीं जिन्होंने एम्स, आईआईटी और सुदृढ़ कानून दिए, बल्कि गद्दारी वह सोच है जो आज मुफ़्त के राशन पर गरीबों को जिंदा रखकर उनके बुनियादी अधिकारों, उनकी शिक्षा और उनके आरक्षण को छीन रही है।
इस जुमला तंत्र और पूंजीपतियों की सरकार से तार्किक सवाल पूछे और बाबा साहब के संविधान तथा लोकतंत्र की रक्षा के लिए इस दमनकारी सोच को सिरे से नकारा जाए।