Advocate Chandra Shekhar

Advocate Chandra Shekhar Advocate Supreme Court of India

⚖️ कासगंज से राजस्थान तक – न्याय के पथ पर एक नया कदम कल दिनांक 18/06/2026 को मेरे अधिवक्ता जीवन का एक विशेष दिन है। उत्त...
17/06/2026

⚖️ कासगंज से राजस्थान तक – न्याय के पथ पर एक नया कदम
कल दिनांक 18/06/2026 को मेरे अधिवक्ता जीवन का एक विशेष दिन है। उत्तर प्रदेश के जनपद कासगंज से निकलकर राजस्थान राज्य के जिला दौसा स्थित सिकराय न्यायालय में एक महत्वपूर्ण प्रकरण की पैरवी हेतु उपस्थित होने जा रहा हूँ।
जब मैंने विधि व्यवसाय को चुना था, तब यह केवल एक पेशा नहीं बल्कि न्याय, अधिकार और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा का संकल्प था। आज किसी अन्य राज्य की अदालत में अपने मुवक्किल के पक्ष का प्रतिनिधित्व करना उसी संकल्प की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
न्यायालय की सीमाएँ भौगोलिक हो सकती हैं, परंतु न्याय की भावना और अधिवक्ता का दायित्व सीमाहीन होता है। प्रत्येक मुकदमा केवल एक केस फाइल नहीं होता, बल्कि किसी व्यक्ति के अधिकार, सम्मान और विश्वास से जुड़ा होता है।
मैं अपने सभी वरिष्ठ अधिवक्ताओं, न्यायविदों, सहयोगियों, मित्रों और मुवक्किलों का आभार व्यक्त करता हूँ, जिनके विश्वास और मार्गदर्शन ने मुझे इस मुकाम तक पहुँचाया।
ईश्वर से प्रार्थना है कि सत्य, न्याय और विधि के प्रति मेरी निष्ठा सदैव अडिग रहे तथा मैं अपने दायित्वों का निर्वहन पूरी ईमानदारी और समर्पण के साथ करता रहूँ।
Advocate Chandra Shekhar
District & Sessions Court, Kasganj (U.P.)
Advocate-on-Record, High Court of Judicature at Allahabad
"न्याय की राह में दूरी नहीं, केवल दायित्व दिखाई देता है।"

17/06/2026
15 अगस्त 1947 की उस आधी रात को जब 57 वर्षीय पंडित जवाहरलाल नेहरू ने केवल 5 मिनट 30 सेकंड का जो नियति से साक्षात्कार का भ...
14/06/2026

15 अगस्त 1947 की उस आधी रात को जब 57 वर्षीय पंडित जवाहरलाल नेहरू ने केवल 5 मिनट 30 सेकंड का जो नियति से साक्षात्कार का भाषण दिया था। वह भाषण 20वीं सदी के सबसे महान और ऐतिहासिक भाषणों में गिना जाता है।

वह केवल 5 मिनट 30 सेकंड का भाषण नहीं था, बल्कि सदियों से छुआछूत, गले में मटकिया और कमर में झाड़ू बांधकर घूमने पर मजबूर किए गए समाज को मुख्यधारा में लाने का एक पवित्र संकल्प था।

1951 में नेहरू सरकार द्वारा लाए गए पहले संविधान संशोधन के जरिए अनुच्छेद 15(4) को जोड़कर सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण का जो मजबूत कानूनी आधार तैयार किया गया, उसी ने इस देश के 18 करोड़ वंचित लोगो को आत्मसम्मान से जीना सिखाया।

1950 से लेकर 1964 के अपने 14 साल के प्रधानमंत्रित्व काल में नेहरू जी ने IIT, IIM, AIIMS और LIC जैसी सैकड़ों सरकारी संस्थाएं खड़ी कीं, ताकि आरक्षण सिर्फ कागजों पर न रहे, बल्कि दलितों-पिछड़ों के बच्चों को इनमें नौकरियां और उच्च शिक्षा मिल सके।

​संविधान बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने लिखा, लेकिन उसे जमीन पर उतारने के लिए कांग्रेस ने 70 साल तक अपना खून-पसीना बहाया है। बाबा साहब के लिखने मात्र से व्यवस्थाएं लागू नहीं हो जातीं, उसे लागू करने के लिए जिस राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत थी, वह कांग्रेस ने दिखाई।

15 अगस्त 1947 से लेकर 2014 तक कांग्रेस सरकारों ने सामंतों, राजा-रजवाड़ों और जमींदारों की हेकड़ी को कुचलकर भूमि सुधार कानून लागू किए, ताकि भूमिहीन दलितों को जमीन का हक मिल सके। यह कांग्रेस शासन की ही देन है कि आज एक दलित और शोषित वर्ग का दूल्हा घोड़ी पर बैठकर शान से अपनी बारात निकाल लेता है, वरना सदियों तक इस समाज को घोड़ी पर बैठने तक की इजाजत नहीं थी।

जिन सरकारी स्कूलों, मुफ्त अस्पतालों और यूनिवर्सिटीज में पढ़कर आज की पीढ़ी बड़ी हुई है, वे सब नेहरू, इंदिरा, राजीव और लाल बहादुर शास्त्री जैसे नेताओं की दूरदर्शिता का परिणाम हैं।

​1969 में इंदिरा गांधी द्वारा 14 बड़े बैंकों का राष्ट्रीयकरण करना और 1971 में राजा-महाराजाओं के प्रिवी पर्स (शाही भत्ते) को खत्म करना इस बात का सबसे बड़ा सबूत था कि कांग्रेस अमीरों के खिलाफ और गरीबों के साथ खड़ी थी। बैंकों के दरवाजे खुलते ही दबे-कुचले समाज को आर्थिक ताकत मिली।

27वें संविधान संशोधन और 1970-80 के दशकों में अनुसूचित जाति और जनजाति के कल्याण के लिए 'स्पेशल कंपोनेंट प्लान' (SCP) और 'ट्राइबल सब-प्लान' (TSP) के तहत बजट का सीधा हिस्सा आवंटित किया गया।

1989 में राजीव गांधी सरकार द्वारा लाया गया 'अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम' (SC/ST Act) वह अचूक हथियार था, जिसने सामंती ताकतों की रीढ़ तोड़ दी और कमजोर वर्ग को कानूनी सुरक्षा कवच दिया।

​लेकिन आज 2026 के भारत की कड़वी हकीकत देखिए। सोशल मीडिया पर जिन्हें जनता 'साहेब', 'फेकू' और 'अंतिम सम्राट' जैसे तंज कसकर ट्रोल करती है, उनकी वर्तमान भाजपा सरकार ने आरक्षण को पूरी तरह से खोखला कर दिया है।

'अंधभक्त' जिसे 'अमृतकाल' कहते हैं, वह असल में गरीबों के लिए 'अंधकार काल' बन चुका है। केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों में आज भी लाखों की संख्या में बैकलॉग के पद खाली पड़े हैं, जिन्हें जानबूझकर नहीं भरा जा रहा है।

सार्वजनिक उपक्रमों (PSUs) का अंधाधुंध निजीकरण करके रेलवे, एयरपोर्ट्स और कोल इंडिया जैसी जगहों से आरक्षण को पिछले दरवाजे से खत्म किया जा रहा है। जब सरकारी नौकरियां ही नहीं बचेंगी, तो आरक्षण कहां मिलेगा?

भाजपा के नेता खुलेआम संविधान बदलने और आरक्षण की समीक्षा करने की बातें करते हैं, और इस हक को 'खैरात' कहकर दलित-पिछड़े समाज के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाते हैं।

​यह सरकार पूरी तरह से चुनिंदा पूंजीपतियों, उद्योगपतियों और बड़े व्यापारियों की सरकार बनकर रह गई है। गरीब जनता को हर महीने 5 किलो मुफ्त राशन के पैकेट की कतार में खड़ा करके आत्मनिर्भरता का ढोंग रचाया जा रहा है, जबकि कारपोरेट घरानों के लाखों-करोड़ों रुपए के लोन बट्टे खाते (Write-off) में डाल दिए जाते हैं।

प्रधानमंत्री खुद के लिए हजारों करोड़ के विमानों में घूमते हैं और जनता महंगाई की चौतरफा मार झेल रही है। रसोई गैस, पेट्रोल, डीजल और खाने-पीने की चीजों के दाम आसमान छू रहे हैं।

सुकन्या समृद्धि योजना, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, आयुष्मान भारत या प्रधानमंत्री जन धन योजना जैसी योजनाओं का ढोल तो बहुत पीटा गया, लेकिन हकीकत यह है कि आज भी महिलाओं के खिलाफ अपराधों के आंकड़े डराने वाले हैं, बुजुर्गों की पेंशन बेअसर हो चुकी है और गरीब इलाज के अभाव में दम तोड़ रहा है।

​सबसे बड़ा धोखा तो धर्म के नाम पर हुआ है। 2014 के बाद से भाजपा ने धर्म को एक राजनीतिक औजार बनाकर रख दिया है, जिससे समाज में नफरत और विभाजन की दीवारें खड़ी हो गईं। नेहरू और इंदिरा गांधी ने सच्चे अर्थों में सनातन और भारतीय संस्कृति का संरक्षण किया था, जहां सभी धर्मों का सम्मान था।

नेहरू जी के कार्यकाल में ही कुंभ मेलों का भव्य आयोजन और धार्मिक स्थलों का गरिमापूर्ण रखरखाव बिना किसी राजनीतिक तमाशे के होता था। आज धर्म के नाम पर युवाओं को रोजगार देने के बजाय उन्हें नफरती बहसों में झोंक दिया गया है।

धर्म के इस राजनीतिकरण ने समाज के ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर दिया है, जिसे देखकर हर संवेदनशील नागरिक की आंखें नम हो जाती हैं।

​गद्दार वे नेता और नीतियां नहीं थीं जिन्होंने एम्स, आईआईटी और सुदृढ़ कानून दिए, बल्कि गद्दारी वह सोच है जो आज मुफ़्त के राशन पर गरीबों को जिंदा रखकर उनके बुनियादी अधिकारों, उनकी शिक्षा और उनके आरक्षण को छीन रही है।

इस जुमला तंत्र और पूंजीपतियों की सरकार से तार्किक सवाल पूछे और बाबा साहब के संविधान तथा लोकतंत्र की रक्षा के लिए इस दमनकारी सोच को सिरे से नकारा जाए।

नमस्कार।Allahabad & Lucknow High Court Assistance Network (ALHCAN) में आपका स्वागत है।यह मंच अधिवक्ताओं के मध्य पेशेवर स...
11/06/2026

नमस्कार।
Allahabad & Lucknow High Court Assistance Network (ALHCAN) में आपका स्वागत है।
यह मंच अधिवक्ताओं के मध्य पेशेवर सहयोग, विधिक शोध एवं उच्च न्यायालय संबंधी उपयोगी जानकारी के आदान-प्रदान हेतु स्थापित किया गया है।
इस नेटवर्क के माध्यम से नियमित रूप से साझा किया जाएगा:
✓ महत्वपूर्ण उच्च न्यायालय एवं सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय
✓ E-Filing एवं Virtual Hearing Updates
✓ Drafting Tips एवं Practice Notes
✓ Procedural Guidance
✓ Legal Research Material
✓ Professional Networking Opportunities
सभी अधिवक्तागण सादर आमंत्रित हैं।
https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSfRyA5LRVU0u-MeeY0bvqGDIGdBKsn9w1saj7gnJs5HCvS68Q/viewform?usp=sharing&ouid=109454467598110349132

बहुत ही कटु सत्य लिख रहा हूँ… शायद प्रदेश के बहुत से माननीय अधिवक्ता भाई-बहन इसे मानने के लिए तैयार न हों, और संभव है मे...
17/05/2026

बहुत ही कटु सत्य लिख रहा हूँ… शायद प्रदेश के बहुत से माननीय अधिवक्ता भाई-बहन इसे मानने के लिए तैयार न हों, और संभव है मेरी इस पोस्ट पर कोई प्रतिक्रिया भी न दें।
लेकिन सच यही है कि आज प्रदेश का अधिवक्ता समाज जिन समस्याओं से जूझ रहा है—
अधिवक्ताओं की हत्याएं,
झूठे मुकदमे दर्ज होना,
मारपीट की घटनाएं,
प्रशासन द्वारा सुनवाई न होना,
चैम्बरों पर कार्रवाई होना—
इन सबके लिए कहीं न कहीं हम स्वयं भी जिम्मेदार हैं।
चुनाव चाहे बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश का हो या स्थानीय बार एसोसिएशन का, आज हमारी सोच बदल चुकी है।
आज से लगभग 30 वर्ष पहले न इतना जातिवाद था, न जिलावाद, न क्षेत्रवाद, और न ही धर्म के आधार पर वोट मांगे जाते थे। कोई यह नहीं पूछता था कि आप किस जाति या धर्म से हैं। प्रत्याशी अपने काम, अपने चरित्र और अपनी योग्यता के आधार पर पहचाना जाता था।
लेकिन जब मैंने इस बार बार काउंसिल का चुनाव होते देखा तब मुझे एहसास हुआ कि हमारे अधिवक्ता समाज के भीतर यह विभाजन कितनी गहराई तक पहुँच चुका है।
अगर समय रहते हमने पूरे अधिवक्ता समाज को अपना परिवार नहीं माना, तो आने वाले समय में हमारी कहीं भी सुनवाई नहीं होगी।
हमें जाति, बिरादरी, धर्म, जिला और क्षेत्र देखकर नहीं, बल्कि प्रत्याशी का चरित्र, संघर्ष और अधिवक्ता हित के प्रति उसकी प्रतिबद्धता देखकर मतदान करना होगा।
लेकिन अब जब वोटों की गिनती हो रही है, तो सच्चाई सामने आ रही है।
कहीं निजी स्वार्थ,
कहीं जिलावाद,
कहीं क्षेत्रवाद,
कहीं आर्थिक लाभ,
और कहीं छिपे हुए व्यक्तिगत समीकरण—
अधिवक्ता हित पर भारी पड़ गए।
आज राजधानी में अधिवक्ताओं के चैम्बर टूट रहे हैं। एक वीडियो में एक वरिष्ठ अधिवक्ता पुलिसकर्मी से विनती कर रहे थे—
"मेरा 36 साल पुराना चैम्बर है… मैं कहाँ जाऊँ? मैं मर जाऊँगा..."
यह दृश्य केवल उनका दर्द नहीं है, यह पूरे उत्तर प्रदेश के अधिवक्ता समाज की विफल सोच का परिणाम है।
हापुड़ कांड से भी यदि हमने सबक नहीं लिया… तो फिर कब लेंगे?
बस "अधिवक्ता एकता ज़िंदाबाद" के नारे लगाते रहिए,
सोशल मीडिया पर बड़े-बड़े आंदोलन की धमकियाँ देते रहिए,
और जहाँ भी कोई घटना हो, वहाँ फोटो खिंचवाकर ग्रुपों में डालते रहिए…
अगर सच में बदलाव चाहिए, तो सबसे पहले अपनी सोच बदलनी होगी।
कड़वा है… लेकिन सच है। 🙏
मेरा मानना है की अधिवक्ता का चैम्बर अवैध है तो जब इतने चैम्बर बन रहें थे तब नगर निगम और प्रशासन कहाँ था अगर गलत था तब बनने ही क्यों दिया गया आज शासन अगर कहीं भी लोगों झुग्गी झोपड़ी हटाता है तो उस से पहले उनके रहने की व्यवस्था करता है लेकिन यहाँ क्यों नहीं
आखिर कब तक ऐसे बटे रहोगे माननीय जी 🙏
चन्द्र शेखर अधिवक्ता हाई कोर्ट इलाहाबाद एवं लखनऊ खंडपीठ।
9410879960.

⚖️ भारत की न्याय व्यवस्था को अधिक प्रभावी और सक्षम बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण संवैधानिक कदम उठाया गया है। राष्ट्रपत...
17/05/2026

⚖️ भारत की न्याय व्यवस्था को अधिक प्रभावी और सक्षम बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण संवैधानिक कदम उठाया गया है। राष्ट्रपति Droupadi Murmu ने “Supreme Court (Judges Strength) Amendment Ordinance, 2026” को मंजूरी प्रदान कर दी है। इस अध्यादेश के लागू होने के बाद Supreme Court of India में जजों की स्वीकृत संख्या 33 से बढ़ाकर 37 कर दी गई है। Chief Justice of India इस संख्या में शामिल नहीं होंगे।

केंद्र सरकार के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट में लगातार बढ़ते लंबित मामलों और न्यायिक कार्यभार को ध्यान में रखते हुए यह निर्णय लिया गया है। वर्तमान में शीर्ष अदालत में बड़ी संख्या में संवैधानिक, आपराधिक, नागरिक एवं जनहित से जुड़े मामले लंबित हैं। जजों की संख्या बढ़ने से अधिक बेंचों का गठन संभव होगा, जिससे मामलों की सुनवाई में तेजी आने और लंबित मामलों के शीघ्र निस्तारण की उम्मीद जताई जा रही है।

केंद्रीय कानून एवं न्याय राज्य मंत्री Arjun Ram Meghwal ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X के माध्यम से जानकारी साझा करते हुए बताया कि राष्ट्रपति ने “Supreme Court (Number of Judges) Act, 1956” में संशोधन संबंधी अध्यादेश को स्वीकृति दे दी है। कानूनी विशेषज्ञों और न्यायिक मामलों के जानकारों के अनुसार, यह फैसला भारतीय न्यायपालिका की संस्थागत क्षमता को मजबूत करने की दिशा में एक अहम पहल माना जा रहा है।

यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब न्यायपालिका में लंबित मामलों को लेकर लगातार चिंता व्यक्त की जा रही थी। अब देखना होगा कि जजों की बढ़ी हुई संख्या न्याय प्रक्रिया को कितनी गति प्रदान कर पाती है और आम नागरिकों को त्वरित न्याय दिलाने में कितनी प्रभावी साबित होती है।

Chandra Shekhar Advocate High Court Allahabad and lucknow Bench.
9410879960

जितने भी स्पेशल एक्ट के मुकदमे होते हैं, उनमें जमानत का सबसे मजबूत और प्रैक्टिकल आधार “प्रोसीजरल लैप्स” ही होता है। खासक...
30/04/2026

जितने भी स्पेशल एक्ट के मुकदमे होते हैं, उनमें जमानत का सबसे मजबूत और प्रैक्टिकल आधार “प्रोसीजरल लैप्स” ही होता है। खासकर NDPS Act, 1985 जैसे सख्त कानून में यह बात और ज्यादा लागू होती है। यह कानून भले ही कठोर हो, लेकिन इसकी प्रक्रिया (procedure) उससे भी ज्यादा सख्ती से लागू की जाती है। अगर जांच एजेंसी—जैसे NCB—कहीं भी प्रक्रिया में चूक कर देती है, तो वही चूक आरोपी के लिए जमानत का दरवाजा खोल देती है।

NDPS मामलों की शुरुआत आमतौर पर मुखबिर की सूचना से होती है, जिसे Section 42 के तहत लिखित रूप में दर्ज करना और समय रहते अपने वरिष्ठ अधिकारी को भेजना अनिवार्य है। लेकिन अक्सर यह देखा जाता है कि अधिकारी या तो सूचना को लिखित में रिकॉर्ड नहीं करते या गिरफ्तारी के बाद भेजते हैं, जबकि कानून के अनुसार यह कार्यवाही पहले होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे मामलों में इसे “fatal defect” माना है, जिससे जमानत मिलने की संभावना काफी बढ़ जाती है।

इसके बाद आता है तलाशी और बरामदगी (Search & Seizure) का चरण, जहां Section 50 का पालन बेहद जरूरी है। यदि किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत तलाशी ली जा रही है, तो उसे यह अधिकार स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए कि वह अपनी तलाशी किसी Gazetted Officer या Magistrate के सामने करवा सकता है। कई मामलों में यह अधिकार या तो बताया ही नहीं जाता या सिर्फ औपचारिकता निभा दी जाती है। ऐसे में पूरी recovery ही संदेह के घेरे में आ जाती है और यह जमानत का मजबूत आधार बन जाता है।

गिरफ्तारी के समय भी कानून की प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है। आरोपी को गिरफ्तारी के कारण (grounds of arrest) बताना, arrest memo तैयार करना और उसमें स्वतंत्र गवाह (independent witness) का होना जरूरी होता है। यदि ये चीजें सही तरीके से नहीं की गईं, तो यह भी जमानत के पक्ष में एक महत्वपूर्ण बिंदु बन जाता है।

सबसे अहम चरण होता है sampling और sealing का। जब्त किए गए पदार्थ का नमूना मौके पर ही लिया जाना चाहिए, उसे सही तरीके से seal किया जाना चाहिए और उसकी chain of custody पूरी तरह सुरक्षित रहनी चाहिए। लेकिन अक्सर यहां बड़ी चूक हो जाती है या तो मौके पर sampling नहीं होती, या seal में mismatch होता है, या फिर chain टूट जाती है। कोर्ट ऐसे मामलों में recovery को ही संदिग्ध मान लेती है, जो जमानत के लिए सबसे मजबूत defense बन जाता है।

इसके बाद FSL (Forensic Science Lab) रिपोर्ट आती है, जिसमें भी कई बार देरी, seal mismatch या sample quantity में अंतर जैसी खामियां सामने आती हैं। इससे prosecution का केस और कमजोर हो जाता है। वहीं Section 67 के तहत आरोपी का बयान लिया जाता है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने Tofan Singh केस में साफ कर दिया है कि ऐसा बयान पुलिस के सामने दिए गए confession के समान है और केवल इसी आधार पर सजा नहीं दी जा सकती। यदि आरोपी बाद में अपने बयान से मुकर जाता है, तो prosecution का मामला और कमजोर पड़ जाता है।

Commercial quantity के मामलों में Section 37 NDPS Act के तहत जमानत पाना कठिन होता है, क्योंकि इसमें “twin conditions” लागू होती हैं—prima facie innocence और दोबारा अपराध न करने की संभावना। लेकिन जब प्रक्रिया में गंभीर खामियां होती हैं, तो अदालत इन्हीं खामियों को “reasonable grounds” मानकर जमानत दे देती है।

charge sheet 180 दिनों के भीतर दाखिल करना अनिवार्य होता है (कुछ मामलों में इसे 1 वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है)। यदि इसमें देरी होती है, तो आरोपी को default bail (statutory bail) का अधिकार मिल जाता है। ट्रायल के दौरान prosecution को यह साबित करना होता है कि आरोपी के पास conscious possession था, recovery genuine थी और chain of custody intact थी। लेकिन यदि शुरुआत से ही प्रक्रिया में खामियां हैं, तो पूरा केस कमजोर हो जाता है।

NDPS मामलों में यह स्पष्ट है कि कानून जितना सख्त है, उसकी प्रक्रिया उससे भी अधिक सख्त है और अगर कहीं भी procedure टूटता है, तो prosecution का पूरा केस गिर सकता है। इसलिए प्रैक्टिकल तौर पर NDPS के मामलों में जमानत का सबसे बड़ा आधार “procedural lapses” ही होता है—यही वह बिंदु है, जहां से बचाव पक्ष (defense) सबसे ज्यादा फायदा उठाता है।

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17, Setalvad Chambers, Supreme Court Of India , New
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110001

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