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First National Lok Adalat - 14 March 2026Join the National Lok Adalat on 14th March 2026 (Second Saturday) for the swift...
13/03/2026

First National Lok Adalat - 14 March 2026

Join the National Lok Adalat on 14th March 2026 (Second Saturday) for the swift, efficient, and timely resolution of your cases.

Organized by:

District Legal Services Authority, District Court Kanpur Nagar, Family Court, Motor Vehicle Accident Tribunal, and all tehsils of Kanpur Nagar District.

Types of Cases Covered:

Bank Recovery

Tenancy Disputes

Mobile Phone and Cable Network Issues

Income Tax Cases

Bank and Financial Institution Cases

Civil Suits

Succession Disputes

Family Disputes

Motor Accident Compensation Cases

Cheque Bounce Cases

Public Utility Services and Commerce Cases

Tax-related Matters

Revenue/Consolidation/Labor Disputes

Compoundable Criminal Cases

Traffic-related Challans

Access to Justice for All

Make sure to utilize this opportunity for an easy, successful, and timely resolution of your cases!

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Wishing you a very Happy Holi! 🎨May this festival of colors fill your life with happiness, prosperity, and positivity. C...
04/03/2026

Wishing you a very Happy Holi! 🎨
May this festival of colors fill your life with happiness, prosperity, and positivity. Celebrate safely and spread love and joy everywhere.

CelebrateWithJoy HoliVibes 🌸🎉

May the fire of Holika Dahan burn all negativity and bring happiness, peace, and success into your life. Happy Holika Da...
02/03/2026

May the fire of Holika Dahan burn all negativity and bring happiness, peace, and success into your life. Happy Holika Dahan!

यूपी पुलिस प्रमोशन व प्रसिद्धि के लिए एनकाउंटर का सहारा ले रही, दंड देने का अधिकार केवल न्यायपालिका का है, पुलिस का नहीं...
01/02/2026

यूपी पुलिस प्रमोशन व प्रसिद्धि के लिए एनकाउंटर का सहारा ले रही, दंड देने का अधिकार केवल न्यायपालिका का है, पुलिस का नहीं : इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा आरोपियों के पैरों में गोली मारने (जिसे 'ऑपरेशन लंगड़ा' भी कहा जाता है) की बढ़ती प्रवृत्ति पर कड़ी फटकार लगाई है। न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की पीठ ने स्पष्ट किया कि दंड देने का अधिकार (Right to Punish) केवल न्यायपालिका का है, पुलिस का नहीं।
अदालत ने पाया कि कई मामलों में पुलिसकर्मी अपनी बहादुरी दिखाने, सोशल मीडिया पर प्रसिद्धि पाने या आउट ऑफ टर्न प्रमोशन (समयपूर्व पदोन्नति) पाने के लालच में आरोपियों को जानबूझकर पैरों में गोली मार रहे हैं। कोर्ट ने इसे 'पूरी तरह अस्वीकार्य' और लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ बताया।
न्यायालय ने आदेश दिया है कि यदि भविष्य में एनकाउंटर के दौरान पीयूसीएल (PUCL) बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित गाइडलाइन्स का पालन नहीं किया गया, तो न केवल मुठभेड़ करने वाली टीम, बल्कि संबंधित जिले के एसपी (SP), एसएसपी (SSP) या पुलिस कमिश्नर भी व्यक्तिगत रूप से न्यायालय की अवमानना (Contempt of Court) के दोषी माने जाएंगे।
पीयूसीएल बनाम महाराष्ट्र राज्य (PUCL vs State of Maharashtra, 2014)
एनकाउंटर के बाद तत्काल एफआईआर (FIR), घायल का मजिस्ट्रेट के सामने बयान और वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा स्वतंत्र जाँच अनिवार्य है।
ContemptOfCourt

साइबर पुलिस की मनमानी पर लगाम, सिर्फ संदिग्ध राशि ही होगी होल्ड, पूरा खाता नहीं, खाताधारकों के लिए बड़ी राहत: इलाहाबाद ह...
31/01/2026

साइबर पुलिस की मनमानी पर लगाम, सिर्फ संदिग्ध राशि ही होगी होल्ड, पूरा खाता नहीं, खाताधारकों के लिए बड़ी राहत: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तय किए बैंक अकाउंट फ्रीजिंग के कड़े नियम

इलाहाबाद उच्च न्यायालय (लखनऊ खंडपीठ) ने हाल ही में एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए साइबर क्राइम पुलिस द्वारा बैंक खातों को पूरी तरह फ्रीज (Blanket Freeze) करने की प्रक्रिया को अवैध और मनमाना घोषित किया है।
यह मामला खालसा मेडिकल स्टोर के मालिक यशवंत सिंह द्वारा दायर किया गया था। उनकी याचिका के अनुसार, हैदराबाद की साइबर क्राइम पुलिस ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 94/106 के तहत नोटिस जारी कर उनके एक्सिस बैंक खाते को पूरी तरह फ्रीज कर दिया था। पुलिस का आरोप था कि इस खाते का उपयोग धोखाधड़ी से संबंधित धन के हस्तांतरण के लिए किया गया है। हालांकि, बैंक ने कोर्ट को बताया कि पुलिस ने न तो कोई औपचारिक जब्ती आदेश (Seizure Order) दिया और न ही उस विशिष्ट राशि का उल्लेख किया जिसे फ्रीज किया जाना था।
न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि BNSS की धारा 106 पुलिस को केवल "संदेह" के आधार पर खाता ब्लॉक करने का अधिकार नहीं देती; इसके लिए "उचित विश्वास" (Reasonable Belief) होना अनिवार्य है। न्यायालय ने निम्नलिखित दिशा-निर्देश निर्धारित किए:
पुलिस केवल उसी संदिग्ध राशि पर 'लीन' (Lien) लगा सकती है जो अपराध से जुड़ी हो। पूरे बैंक खाते को ब्लॉक करना नागरिक के अधिकारों का उल्लंघन है।
बैंक को नोटिस के साथ FIR की प्रति और जब्ती आदेश उपलब्ध कराना अनिवार्य है।
खाता फ्रीज करने की जानकारी 24 घंटे के भीतर संबंधित न्यायिक मैजिस्ट्रेट को देनी होगी, अन्यथा यह कार्रवाई शून्य (Void) मानी जाएगी।
अदालत ने अपने फैसले में तपस डी. नियोगी (1999) और तीस्ता अतुल सीतलवाड़ (2018) जैसे सुप्रीम कोर्ट के मामलों का संदर्भ दिया, जिनमें बैंक खाते को 'संपत्ति' माना गया है। साथ ही, राजस्थान और केरल उच्च न्यायालय के फैसलों का हवाला देते हुए 'आनुपातिकता' (Proportionality) के सिद्धांत पर जोर दिया।
अदालत ने पुलिस की कार्रवाई को अनुचित बताते हुए खाते को तत्काल डी-फ्रीज करने का आदेश दिया ताकि याचिकाकर्ता अपनी सामान्य व्यावसायिक गतिविधियां जारी रख सके।



अनुच्छेद 21 के तहत मासिक धर्म स्वास्थ्य अब जीवन का मौलिक अधिकार, स्कूलों में लड़कियों मुफ्त सैनिटरी पैड और अलग शौचालय मि...
31/01/2026

अनुच्छेद 21 के तहत मासिक धर्म स्वास्थ्य अब जीवन का मौलिक अधिकार, स्कूलों में लड़कियों मुफ्त सैनिटरी पैड और अलग शौचालय मिलना सुनिश्चित करें: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने डॉ. जया ठाकुर बनाम भारत सरकार (2026) के ऐतिहासिक फैसले में यह स्पष्ट कर दिया है कि मासिक धर्म स्वच्छता (Menstrual Hygiene) केवल एक स्वास्थ्य मुद्दा नहीं, बल्कि अनुच्छेद 21 के तहत 'गरिमा के साथ जीने के अधिकार' का अभिन्न अंग है। कोर्ट ने माना कि स्कूलों में सैनिटरी पैड और अलग शौचालयों की कमी के कारण लड़कियां पढ़ाई छोड़ने (Drop-out) पर मजबूर होती हैं, जो उनके शिक्षा के अधिकार (अनुच्छेद 21A) का उल्लंघन है।
इस निर्णय में न्यायपालिका ने 'सब्सटेंटिव इक्वालिटी' (Substantive Equality) के सिद्धांत पर जोर दिया है। कोर्ट का मानना है कि केवल कानून बना देना काफी नहीं है, बल्कि उन बाधाओं को दूर करना जरूरी है जो लड़कियों को लड़कों के समान अवसर प्राप्त करने से रोकती हैं।
विभिन्न उच्च न्यायालयों और पिछले फैसलों का संदर्भ:
मोहिनी जैन और उन्नीकृष्णन केस: शिक्षा को जीवन के अधिकार का हिस्सा माना गया।
राजस्थान हाई कोर्ट (राधा शेखावत केस): स्कूलों में क्रियाशील शौचालयों की अनिवार्यता पर जोर दिया गया।
उत्तराखंड हाई कोर्ट (दीपक राणा केस): बुनियादी ढांचे की कमी को शिक्षा के स्तर में गिरावट का मुख्य कारण बताया गया।
केरल और दिल्ली हाई कोर्ट: स्पष्ट किया कि वित्तीय कमी (Paucity of funds) का बहाना बनाकर सरकार मौलिक अधिकारों को लागू करने से पीछे नहीं हट सकती।
प्रमुख निर्देश:
कक्षा 6 से 12 तक की छात्राओं को मुफ्त बायो-डिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन प्रदान किए जाएं।
सभी स्कूलों में साफ, अलग और सुरक्षित शौचालय सुनिश्चित हों।
इस्तेमाल किए गए पैड के निपटान के लिए पर्यावरण के अनुकूल तंत्र (Incinerators) लगाए जाएं।
लड़कों और पुरुष शिक्षकों को भी जागरूक किया जाए ताकि मासिक धर्म से जुड़ी सामाजिक वर्जनाएं और शर्म (Stigma) खत्म हो सके।
कोर्ट ने अंत में एक 'कंटीन्यूइंग मैंडमस' (Continuing Mandamus) जारी किया है, जिसका अर्थ है कि अदालत इस मामले की निगरानी जारी रखेगी और तीन महीने बाद अनुपालन रिपोर्ट (Compliance Report) की समीक्षा करेगी।
केस का नाम: डॉ. जया ठाकुर बनाम भारत सरकार एवं अन्य [Writ Petition (Civil) No. 1000 of 2022]
संदर्भित मामले: मोहिनी जैन, उन्नीकृष्णन, के.एस. पुट्टास्वामी, विशाखा बनाम राजस्थान राज्य, राधा शेखावत बनाम राजस्थान राज्य।

उच्चतम न्यायालय ने 'यूजीसी (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना) विनियम, 2026' की वैधता को चुनौती देने वाली ...
30/01/2026

उच्चतम न्यायालय ने 'यूजीसी (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना) विनियम, 2026' की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए इन नियमों के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी है। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जयमाल्य बागची की पीठ ने पाया कि इन विनियमों की शब्दावली अस्पष्ट है और इनके दुरुपयोग की गंभीर संभावना है। न्यायालय ने विशेष रूप से विनियम 3(c) और 3(e) के बीच विरोधाभास पर सवाल उठाया, जहाँ 'जाति-आधारित भेदभाव' और सामान्य 'भेदभाव' को अलग-अलग परिभाषित किया गया है, जबकि उपचार की प्रक्रिया दोनों के लिए समान है। पीठ ने यह भी चिंता जताई कि इन नियमों में अति-पिछड़ा वर्गों (EBC/MBC) का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। सबसे गंभीर आपत्ति विनियम 7(d) में प्रयुक्त 'पृथक्करण' (Segregation) शब्द पर ली गई, जिसे कोर्ट ने संविधान की प्रस्तावना में निहित बंधुत्व की भावना और 'समानता के अधिकार' के विरुद्ध माना। इसके अतिरिक्त, 2012 के नियमों से 'रैगिंग' जैसे महत्वपूर्ण विषय को हटा दिए जाने को न्यायालय ने एक प्रतिगामी कदम बताया है। इन कानूनी विसंगतियों को देखते हुए अदालत ने चार प्रमुख संवैधानिक प्रश्न निर्धारित किए हैं और केंद्र सरकार व यूजीसी से जवाब तलब किया है।
केस टाइटल: राहुल दीवान और अन्य बनाम भारत संघ एवं अन्य (Rahul Dewan and Ors. vs. Union of India & Ors.)

🇮🇳 Happy Republic Day from LEGALLOTS® 🇮🇳On this 26th January, we salute the spirit of our Constitution and the values th...
26/01/2026

🇮🇳 Happy Republic Day from LEGALLOTS® 🇮🇳

On this 26th January, we salute the spirit of our Constitution and the values that make India strong—Justice, Liberty, Equality & Fraternity.

Let’s celebrate this day with pride and promise to uphold the law and unity of our great nation.

✨ Jai Hind! Happy Republic Day! ✨

Freedom is not given, it is taken.Remembering the fearless leader—Netaji Subhash Chandra Bose. 🙏🇮🇳
23/01/2026

Freedom is not given, it is taken.
Remembering the fearless leader—Netaji Subhash Chandra Bose. 🙏🇮🇳

पत्नी एल.एल.बी. पास है तो क्या? आय का खुलासा न करने पर पति के खिलाफ 'प्रतिकूल निष्कर्ष':इलाहाबाद हाईकोर्ट इलाहाबाद हाईको...
21/01/2026

पत्नी एल.एल.बी. पास है तो क्या? आय का खुलासा न करने पर पति के खिलाफ 'प्रतिकूल निष्कर्ष':इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में भरण-पोषण (Maintenance) के मामलों में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए एक अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि पति भरण-पोषण की कार्यवाही के दौरान अपनी आय और संपत्ति का ब्यौरा देने से बचता है, तो कोर्ट उसके खिलाफ सख्त रुख अपना सकता है।
यह मामला श्याम मोहन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (Criminal Revision No. 4929 of 2024) से संबंधित है। पति ने पीलीभीत फैमिली कोर्ट के 12 अगस्त 2024 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे अपनी पत्नी को 3,500 रुपये मासिक अंतरिम भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था। पत्नी का आरोप था कि 2020 में शादी के बाद, दहेज की मांग के चलते उसे 2022 में घर से निकाल दिया गया। पत्नी ने दावा किया कि पति के पास 75 बीघा जमीन है और वह कोचिंग चलाकर 40,000 रुपये महीना कमाता है, लेकिन पति ने अपनी आय का कोई भी शपथ पत्र (Affidavit) कोर्ट में पेश नहीं किया। वहीं, पति का तर्क था कि पत्नी एम.ए. और एल.एल.बी. पास है, इसलिए वह खुद कमाने में सक्षम है।
न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की पीठ ने पति की पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में 'प्रतिकूल निष्कर्ष' (Adverse Inference) के सिद्धांत को लागू किया। कोर्ट ने कहा कि जब पति पर्याप्त अवसर मिलने के बावजूद अपनी आय और संपत्ति का खुलासा करने वाला हलफनामा दाखिल नहीं करता, तो अदालत यह मान सकती है कि वह जानबूझकर जानकारी छिपा रहा है ताकि उसे पैसा न देना पड़े।
कोर्ट ने पति के इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि पत्नी एल.एल.बी. पास है इसलिए उसे भरण-पोषण नहीं मिलना चाहिए। कोर्ट ने माना कि पति यह साबित करने में विफल रहा कि पत्नी वर्तमान में कहीं नौकरी कर रही है या उसकी कोई कमाई है। कोर्ट ने कहा कि 3,500 रुपये की राशि बहुत ही उचित है और पत्नी को एक सम्मानजनक जीवन स्तर (Decent standard of living) सुनिश्चित करने के लिए यह आवश्यक है।
यह निर्णय संदेश देता है कि अदालती कार्यवाही में वित्तीय जानकारी छिपाना महँगा पड़ सकता है। फैमिली कोर्ट आय के शपथ पत्र पर भरोसा करती है ताकि निष्पक्ष मूल्यांकन किया जा सके।



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