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यूपी पुलिस प्रमोशन व प्रसिद्धि के लिए एनकाउंटर का सहारा ले रही, दंड देने का अधिकार केवल न्यायपालिका का है, पुलिस का नहीं...
01/02/2026

यूपी पुलिस प्रमोशन व प्रसिद्धि के लिए एनकाउंटर का सहारा ले रही, दंड देने का अधिकार केवल न्यायपालिका का है, पुलिस का नहीं : इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा आरोपियों के पैरों में गोली मारने (जिसे 'ऑपरेशन लंगड़ा' भी कहा जाता है) की बढ़ती प्रवृत्ति पर कड़ी फटकार लगाई है। न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की पीठ ने स्पष्ट किया कि दंड देने का अधिकार (Right to Punish) केवल न्यायपालिका का है, पुलिस का नहीं।
अदालत ने पाया कि कई मामलों में पुलिसकर्मी अपनी बहादुरी दिखाने, सोशल मीडिया पर प्रसिद्धि पाने या आउट ऑफ टर्न प्रमोशन (समयपूर्व पदोन्नति) पाने के लालच में आरोपियों को जानबूझकर पैरों में गोली मार रहे हैं। कोर्ट ने इसे 'पूरी तरह अस्वीकार्य' और लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ बताया।
न्यायालय ने आदेश दिया है कि यदि भविष्य में एनकाउंटर के दौरान पीयूसीएल (PUCL) बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित गाइडलाइन्स का पालन नहीं किया गया, तो न केवल मुठभेड़ करने वाली टीम, बल्कि संबंधित जिले के एसपी (SP), एसएसपी (SSP) या पुलिस कमिश्नर भी व्यक्तिगत रूप से न्यायालय की अवमानना (Contempt of Court) के दोषी माने जाएंगे।
पीयूसीएल बनाम महाराष्ट्र राज्य (PUCL vs State of Maharashtra, 2014)
एनकाउंटर के बाद तत्काल एफआईआर (FIR), घायल का मजिस्ट्रेट के सामने बयान और वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा स्वतंत्र जाँच अनिवार्य है।
ContemptOfCourt

साइबर पुलिस की मनमानी पर लगाम, सिर्फ संदिग्ध राशि ही होगी होल्ड, पूरा खाता नहीं, खाताधारकों के लिए बड़ी राहत: इलाहाबाद ह...
31/01/2026

साइबर पुलिस की मनमानी पर लगाम, सिर्फ संदिग्ध राशि ही होगी होल्ड, पूरा खाता नहीं, खाताधारकों के लिए बड़ी राहत: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तय किए बैंक अकाउंट फ्रीजिंग के कड़े नियम

इलाहाबाद उच्च न्यायालय (लखनऊ खंडपीठ) ने हाल ही में एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए साइबर क्राइम पुलिस द्वारा बैंक खातों को पूरी तरह फ्रीज (Blanket Freeze) करने की प्रक्रिया को अवैध और मनमाना घोषित किया है।
यह मामला खालसा मेडिकल स्टोर के मालिक यशवंत सिंह द्वारा दायर किया गया था। उनकी याचिका के अनुसार, हैदराबाद की साइबर क्राइम पुलिस ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 94/106 के तहत नोटिस जारी कर उनके एक्सिस बैंक खाते को पूरी तरह फ्रीज कर दिया था। पुलिस का आरोप था कि इस खाते का उपयोग धोखाधड़ी से संबंधित धन के हस्तांतरण के लिए किया गया है। हालांकि, बैंक ने कोर्ट को बताया कि पुलिस ने न तो कोई औपचारिक जब्ती आदेश (Seizure Order) दिया और न ही उस विशिष्ट राशि का उल्लेख किया जिसे फ्रीज किया जाना था।
न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि BNSS की धारा 106 पुलिस को केवल "संदेह" के आधार पर खाता ब्लॉक करने का अधिकार नहीं देती; इसके लिए "उचित विश्वास" (Reasonable Belief) होना अनिवार्य है। न्यायालय ने निम्नलिखित दिशा-निर्देश निर्धारित किए:
पुलिस केवल उसी संदिग्ध राशि पर 'लीन' (Lien) लगा सकती है जो अपराध से जुड़ी हो। पूरे बैंक खाते को ब्लॉक करना नागरिक के अधिकारों का उल्लंघन है।
बैंक को नोटिस के साथ FIR की प्रति और जब्ती आदेश उपलब्ध कराना अनिवार्य है।
खाता फ्रीज करने की जानकारी 24 घंटे के भीतर संबंधित न्यायिक मैजिस्ट्रेट को देनी होगी, अन्यथा यह कार्रवाई शून्य (Void) मानी जाएगी।
अदालत ने अपने फैसले में तपस डी. नियोगी (1999) और तीस्ता अतुल सीतलवाड़ (2018) जैसे सुप्रीम कोर्ट के मामलों का संदर्भ दिया, जिनमें बैंक खाते को 'संपत्ति' माना गया है। साथ ही, राजस्थान और केरल उच्च न्यायालय के फैसलों का हवाला देते हुए 'आनुपातिकता' (Proportionality) के सिद्धांत पर जोर दिया।
अदालत ने पुलिस की कार्रवाई को अनुचित बताते हुए खाते को तत्काल डी-फ्रीज करने का आदेश दिया ताकि याचिकाकर्ता अपनी सामान्य व्यावसायिक गतिविधियां जारी रख सके।



अनुच्छेद 21 के तहत मासिक धर्म स्वास्थ्य अब जीवन का मौलिक अधिकार, स्कूलों में लड़कियों मुफ्त सैनिटरी पैड और अलग शौचालय मि...
31/01/2026

अनुच्छेद 21 के तहत मासिक धर्म स्वास्थ्य अब जीवन का मौलिक अधिकार, स्कूलों में लड़कियों मुफ्त सैनिटरी पैड और अलग शौचालय मिलना सुनिश्चित करें: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने डॉ. जया ठाकुर बनाम भारत सरकार (2026) के ऐतिहासिक फैसले में यह स्पष्ट कर दिया है कि मासिक धर्म स्वच्छता (Menstrual Hygiene) केवल एक स्वास्थ्य मुद्दा नहीं, बल्कि अनुच्छेद 21 के तहत 'गरिमा के साथ जीने के अधिकार' का अभिन्न अंग है। कोर्ट ने माना कि स्कूलों में सैनिटरी पैड और अलग शौचालयों की कमी के कारण लड़कियां पढ़ाई छोड़ने (Drop-out) पर मजबूर होती हैं, जो उनके शिक्षा के अधिकार (अनुच्छेद 21A) का उल्लंघन है।
इस निर्णय में न्यायपालिका ने 'सब्सटेंटिव इक्वालिटी' (Substantive Equality) के सिद्धांत पर जोर दिया है। कोर्ट का मानना है कि केवल कानून बना देना काफी नहीं है, बल्कि उन बाधाओं को दूर करना जरूरी है जो लड़कियों को लड़कों के समान अवसर प्राप्त करने से रोकती हैं।
विभिन्न उच्च न्यायालयों और पिछले फैसलों का संदर्भ:
मोहिनी जैन और उन्नीकृष्णन केस: शिक्षा को जीवन के अधिकार का हिस्सा माना गया।
राजस्थान हाई कोर्ट (राधा शेखावत केस): स्कूलों में क्रियाशील शौचालयों की अनिवार्यता पर जोर दिया गया।
उत्तराखंड हाई कोर्ट (दीपक राणा केस): बुनियादी ढांचे की कमी को शिक्षा के स्तर में गिरावट का मुख्य कारण बताया गया।
केरल और दिल्ली हाई कोर्ट: स्पष्ट किया कि वित्तीय कमी (Paucity of funds) का बहाना बनाकर सरकार मौलिक अधिकारों को लागू करने से पीछे नहीं हट सकती।
प्रमुख निर्देश:
कक्षा 6 से 12 तक की छात्राओं को मुफ्त बायो-डिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन प्रदान किए जाएं।
सभी स्कूलों में साफ, अलग और सुरक्षित शौचालय सुनिश्चित हों।
इस्तेमाल किए गए पैड के निपटान के लिए पर्यावरण के अनुकूल तंत्र (Incinerators) लगाए जाएं।
लड़कों और पुरुष शिक्षकों को भी जागरूक किया जाए ताकि मासिक धर्म से जुड़ी सामाजिक वर्जनाएं और शर्म (Stigma) खत्म हो सके।
कोर्ट ने अंत में एक 'कंटीन्यूइंग मैंडमस' (Continuing Mandamus) जारी किया है, जिसका अर्थ है कि अदालत इस मामले की निगरानी जारी रखेगी और तीन महीने बाद अनुपालन रिपोर्ट (Compliance Report) की समीक्षा करेगी।
केस का नाम: डॉ. जया ठाकुर बनाम भारत सरकार एवं अन्य [Writ Petition (Civil) No. 1000 of 2022]
संदर्भित मामले: मोहिनी जैन, उन्नीकृष्णन, के.एस. पुट्टास्वामी, विशाखा बनाम राजस्थान राज्य, राधा शेखावत बनाम राजस्थान राज्य।

उच्चतम न्यायालय ने 'यूजीसी (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना) विनियम, 2026' की वैधता को चुनौती देने वाली ...
30/01/2026

उच्चतम न्यायालय ने 'यूजीसी (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना) विनियम, 2026' की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए इन नियमों के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी है। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जयमाल्य बागची की पीठ ने पाया कि इन विनियमों की शब्दावली अस्पष्ट है और इनके दुरुपयोग की गंभीर संभावना है। न्यायालय ने विशेष रूप से विनियम 3(c) और 3(e) के बीच विरोधाभास पर सवाल उठाया, जहाँ 'जाति-आधारित भेदभाव' और सामान्य 'भेदभाव' को अलग-अलग परिभाषित किया गया है, जबकि उपचार की प्रक्रिया दोनों के लिए समान है। पीठ ने यह भी चिंता जताई कि इन नियमों में अति-पिछड़ा वर्गों (EBC/MBC) का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। सबसे गंभीर आपत्ति विनियम 7(d) में प्रयुक्त 'पृथक्करण' (Segregation) शब्द पर ली गई, जिसे कोर्ट ने संविधान की प्रस्तावना में निहित बंधुत्व की भावना और 'समानता के अधिकार' के विरुद्ध माना। इसके अतिरिक्त, 2012 के नियमों से 'रैगिंग' जैसे महत्वपूर्ण विषय को हटा दिए जाने को न्यायालय ने एक प्रतिगामी कदम बताया है। इन कानूनी विसंगतियों को देखते हुए अदालत ने चार प्रमुख संवैधानिक प्रश्न निर्धारित किए हैं और केंद्र सरकार व यूजीसी से जवाब तलब किया है।
केस टाइटल: राहुल दीवान और अन्य बनाम भारत संघ एवं अन्य (Rahul Dewan and Ors. vs. Union of India & Ors.)

🇮🇳 Happy Republic Day from LEGALLOTS® 🇮🇳On this 26th January, we salute the spirit of our Constitution and the values th...
26/01/2026

🇮🇳 Happy Republic Day from LEGALLOTS® 🇮🇳

On this 26th January, we salute the spirit of our Constitution and the values that make India strong—Justice, Liberty, Equality & Fraternity.

Let’s celebrate this day with pride and promise to uphold the law and unity of our great nation.

✨ Jai Hind! Happy Republic Day! ✨

Freedom is not given, it is taken.Remembering the fearless leader—Netaji Subhash Chandra Bose. 🙏🇮🇳
23/01/2026

Freedom is not given, it is taken.
Remembering the fearless leader—Netaji Subhash Chandra Bose. 🙏🇮🇳

पत्नी एल.एल.बी. पास है तो क्या? आय का खुलासा न करने पर पति के खिलाफ 'प्रतिकूल निष्कर्ष':इलाहाबाद हाईकोर्ट इलाहाबाद हाईको...
21/01/2026

पत्नी एल.एल.बी. पास है तो क्या? आय का खुलासा न करने पर पति के खिलाफ 'प्रतिकूल निष्कर्ष':इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में भरण-पोषण (Maintenance) के मामलों में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए एक अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि पति भरण-पोषण की कार्यवाही के दौरान अपनी आय और संपत्ति का ब्यौरा देने से बचता है, तो कोर्ट उसके खिलाफ सख्त रुख अपना सकता है।
यह मामला श्याम मोहन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (Criminal Revision No. 4929 of 2024) से संबंधित है। पति ने पीलीभीत फैमिली कोर्ट के 12 अगस्त 2024 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे अपनी पत्नी को 3,500 रुपये मासिक अंतरिम भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था। पत्नी का आरोप था कि 2020 में शादी के बाद, दहेज की मांग के चलते उसे 2022 में घर से निकाल दिया गया। पत्नी ने दावा किया कि पति के पास 75 बीघा जमीन है और वह कोचिंग चलाकर 40,000 रुपये महीना कमाता है, लेकिन पति ने अपनी आय का कोई भी शपथ पत्र (Affidavit) कोर्ट में पेश नहीं किया। वहीं, पति का तर्क था कि पत्नी एम.ए. और एल.एल.बी. पास है, इसलिए वह खुद कमाने में सक्षम है।
न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की पीठ ने पति की पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में 'प्रतिकूल निष्कर्ष' (Adverse Inference) के सिद्धांत को लागू किया। कोर्ट ने कहा कि जब पति पर्याप्त अवसर मिलने के बावजूद अपनी आय और संपत्ति का खुलासा करने वाला हलफनामा दाखिल नहीं करता, तो अदालत यह मान सकती है कि वह जानबूझकर जानकारी छिपा रहा है ताकि उसे पैसा न देना पड़े।
कोर्ट ने पति के इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि पत्नी एल.एल.बी. पास है इसलिए उसे भरण-पोषण नहीं मिलना चाहिए। कोर्ट ने माना कि पति यह साबित करने में विफल रहा कि पत्नी वर्तमान में कहीं नौकरी कर रही है या उसकी कोई कमाई है। कोर्ट ने कहा कि 3,500 रुपये की राशि बहुत ही उचित है और पत्नी को एक सम्मानजनक जीवन स्तर (Decent standard of living) सुनिश्चित करने के लिए यह आवश्यक है।
यह निर्णय संदेश देता है कि अदालती कार्यवाही में वित्तीय जानकारी छिपाना महँगा पड़ सकता है। फैमिली कोर्ट आय के शपथ पत्र पर भरोसा करती है ताकि निष्पक्ष मूल्यांकन किया जा सके।



क्या पति की बिकी हुई संपत्ति से भी पत्नी मांग सकती है गुजारा भत्ता?:केरल हाईकोर्ट की फुल बेंच का बड़ा फैसलाकेरल हाईकोर्ट...
18/01/2026

क्या पति की बिकी हुई संपत्ति से भी पत्नी मांग सकती है गुजारा भत्ता?:केरल हाईकोर्ट की फुल बेंच का बड़ा फैसला

केरल हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ (Full Bench) ने हिंदू पत्नियों के वित्तीय अधिकारों को सशक्त करते हुए एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि एक हिंदू पत्नी अपने पति की अचल संपत्ति (Immovable Property) से भरण-पोषण (Maintenance) पाने की हकदार है, और यह अधिकार 'हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम, 1956' के प्रावधानों से परे भी अस्तित्व में रहता है।
यह मामला एक रेफरेंस (Reference) के जरिए पूर्ण पीठ के पास पहुंचा था, जिसकी उत्पत्ति मेट्रीमोनियल अपील नं. 1093/2014 से हुई थी। विवाद का मुख्य बिंदु यह था कि यदि पति अपनी संपत्ति किसी तीसरे व्यक्ति को बेच देता है, तो क्या पत्नी उस संपत्ति के खरीदार (Transferee) के खिलाफ भरण-पोषण का दावा कर सकती है? पूर्व में, विजयन बनाम शोभना (2007) मामले में डिवीजन बेंच ने कहा था कि पत्नी को पति की संपत्ति के मुनाफे पर कोई अधिकार नहीं है, जिससे कानूनी विरोधाभास पैदा हो गया था।
जस्टिस सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच ने विजयन बनाम शोभना के फैसले को पलट दिया। कोर्ट ने 'संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम' (Transfer of Property Act) की धारा 39 की व्याख्या करते हुए एक सूक्ष्म सिद्धांत प्रतिपादित किया:
सुप्त अधिकार (Dormant Right): विवाह के साथ ही पत्नी का भरण-पोषण का अधिकार जन्म ले लेता है, लेकिन सामान्य स्थितियों में यह 'सुप्त' रहता है। इस दौरान यदि पति संपत्ति बेचता है, तो खरीदार को दोषी नहीं माना जा सकता।
सक्रिय अधिकार (Inchoate Right): जैसे ही पत्नी मेंटेनेंस के लिए कोई कानूनी कदम उठाती है (जैसे लीगल नोटिस भेजना या केस करना), यह अधिकार सक्रिय हो जाता है। यदि इसके बाद संपत्ति बेची जाती है, या यदि खरीदार को विवाद की जानकारी थी, तो पत्नी उस संपत्ति से अपना हक वसूल सकती है।
कोर्ट ने कहा कि केवल इसलिए कि 1956 के कानून में स्पष्ट प्रावधान नहीं है, एक असहाय महिला को उसके अधिकारों से वंचित करना "न्याय का उपहास" (Travesty of Justice) होगा।
कोर्ट ने सथियम्मा बनाम गायत्री (2013) और हादिया बनाम शमीरा (2025) के फैसलों को सही ठहराया और विजयन बनाम शोभना में दी गई व्यवस्था को खारिज कर दिया।


एफआईआर दर्ज न होने पर सीधे रिट याचिका पोषणीय नहीं, धारा 175 BNSS के तहत मजिस्ट्रेट ही सही मंच: कलकत्ता हाईकोर्टकलकत्ता ह...
17/01/2026

एफआईआर दर्ज न होने पर सीधे रिट याचिका पोषणीय नहीं, धारा 175 BNSS के तहत मजिस्ट्रेट ही सही मंच: कलकत्ता हाईकोर्ट
कलकत्ता हाईकोर्ट ने हाल ही में 'संजना गुप्ता बनाम पश्चिम बंगाल राज्य एवं अन्य' (M.A.T. 1117 of 2025) मामले में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि यदि पुलिस एफआईआर दर्ज करने से इनकार करती है, तो सीधे संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका दायर करना सही कानूनी उपाय नहीं है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में पीड़ित को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 के तहत मजिस्ट्रेट की शरण में जाना चाहिए।
मामले के तथ्य
यह मामला मूल रूप से एक वैवाहिक विवाद और आपसी कलह से जुड़ा था। अपीलकर्ता संजना गुप्ता ने पुलिस अधिकारियों के समक्ष एक लिखित शिकायत दर्ज कराई थी, जिसमें उन्होंने विपक्षी पक्ष पर संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) करने का आरोप लगाया था। पुलिस द्वारा एफआईआर दर्ज न करने पर उन्होंने हाईकोर्ट की एकल पीठ (Single Bench) का दरवाजा खटखटाया। एकल पीठ ने उनकी याचिका यह कहते हुए निस्तारण कर दी कि पुलिस की निष्क्रियता की स्थिति में उन्हें क्षेत्राधिकार वाले मजिस्ट्रेट के पास जाना चाहिए। इस आदेश को चुनौती देते हुए संजना गुप्ता ने खंडपीठ (Division Bench) में अपील दायर की और तर्क दिया कि पुलिस कानूनन कार्रवाई करने के लिए बाध्य है।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश सुजॉय पॉल और न्यायमूर्ति पार्थ सारथी सेन की खंडपीठ ने अपील को खारिज कर दिया। कोर्ट ने बीएनएसएस की धारा 175 (जो पुरानी सीआरपीसी की धारा 156(3) के समान है) की व्याख्या करते हुए कहा कि विधायिका ने मजिस्ट्रेट को जांच का आदेश देने की शक्ति दी है।
कोर्ट ने माना कि रिट याचिका 'पोषणीय' (Maintainable) नहीं है क्योंकि:
* पीड़ित के पास मजिस्ट्रेट के समक्ष जाने का एक प्रभावी वैकल्पिक कानूनी उपाय मौजूद है।
* वैवाहिक विवादों में अक्सर कई शिकायतें होती हैं, और मजिस्ट्रेट ही अपराध की प्रकृति का सही आकलन कर सकते हैं।
अपने निर्णय को पुख्ता करने के लिए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों, विशेष रूप से 'साकिरी वासु बनाम उत्तर प्रदेश राज्य' (2008) और 'ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार' (2014) का हवाला दिया। इन फैसलों में शीर्ष अदालत ने यह सिद्धांत स्थापित किया था कि एफआईआर दर्ज न होने की स्थिति में हाईकोर्ट को रिट याचिकाओं से भरने के बजाय, पीड़ित को मजिस्ट्रेट के पास सीआरपीसी (अब BNSS) के प्रावधानों के तहत राहत मांगनी चाहिए।


सिर्फ महिला होना केस ट्रांसफर का आधार नहीं, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से भी हो सकती पेशी, यात्रा के खर्चे का वहन करेगा पति : ...
16/01/2026

सिर्फ महिला होना केस ट्रांसफर का आधार नहीं, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से भी हो सकती पेशी, यात्रा के खर्चे का वहन करेगा पति : एमपी हाईकोर्ट
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने हाल ही में वैवाहिक विवादों में केस ट्रांसफर (Case Transfer) को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। मामला श्रीमती रंजना चौकसे बनाम वैभव राय का है, जहाँ पत्नी ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 के तहत पति द्वारा गाडरवारा (नरसिंहपुर) में दायर तलाक के मुकदमे को अपने गृह नगर नर्मदापुरम ट्रांसफर करने की मांग की थी।मामले के तथ्य (Facts of the Case)याचिकाकर्ता पत्नी ने 'सिविल प्रक्रिया संहिता' (CPC) की धारा 24 के तहत याचिका दायर की थी। उनकी दलील थी कि उनका एक छोटा शिशु है (जिसका जन्म फरवरी 2025 में हुआ) और मायके से ससुराल (गाडरवारा) की दूरी 150 किमी है, जिसे तय करना उनके लिए कठिन है। वहीं, पति के वकील का तर्क था कि तलाक का आधार 'क्रूरता' है, और इससे जुड़े साक्ष्य और गवाह गाडरवारा में ही मौजूद हैं, इसलिए केस वहीं चलना चाहिए।कोर्ट का विश्लेषण और फैसला (Court's Analysis & Decision)न्यायमूर्ति दीपक खोत की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि केवल 'सुविधा' ही केस ट्रांसफर का एकमात्र आधार नहीं हो सकती। कोर्ट ने माना कि आधुनिक तकनीक के दौर में वादी को हर तारीख पर शारीरिक रूप से उपस्थित होने की आवश्यकता नहीं है।कोर्ट ने पत्नी की ट्रांसफर याचिका को तो खारिज कर दिया, लेकिन उन्हें बड़ी राहत देते हुए यह निर्देश दिया कि वे नियमित सुनवाई के लिए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (Video Conferencing) के माध्यम से जुड़ सकती हैं। उन्हें केवल गवाही (Evidence) दर्ज कराने के लिए कोर्ट में उपस्थित होना होगा, और उस दौरान आने-जाने व रुकने का पूरा खर्च पति द्वारा वहन किया जाएगा।महत्वपूर्ण नज़ीर (Reference Cases)अपने फैसले को मजबूती देने के लिए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के दो प्रमुख फैसलों का हवाला दिया:
• अनिंदिता दास बनाम श्रीजीत दास (2006): इसमें शीर्ष अदालत ने कहा था कि महिलाओं के प्रति दिखाई जाने वाली नरमी का दुरुपयोग हो रहा है, इसलिए हर मामले को उसकी मेरिट पर परखा जाना चाहिए।
• प्रीति शर्मा बनाम मंजीत शर्मा (2005): कोर्ट ने कहा था कि "सिर्फ़ इसलिए कि याचिकाकर्ता एक महिला है, इसका मतलब यह नहीं कि वह यात्रा नहीं कर सकती"।यह निर्णय उन मामलों में एक संतुलन स्थापित करता है जहाँ वादी की असुविधा और न्याय प्रक्रिया की निष्पक्षता दोनों महत्वपूर्ण हैं।

झूठी FIR दर्ज कराने वालों पर अब पुलिस को करना होगा मुकदमा: इलाहाबाद हाईकोर्टयह मामला उम्मे फरवा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य ...
15/01/2026

झूठी FIR दर्ज कराने वालों पर अब पुलिस को करना होगा मुकदमा: इलाहाबाद हाईकोर्ट

यह मामला उम्मे फरवा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य का है, जिसकी सुनवाई इलाहाबाद हाई कोर्ट में हुई। इस प्रकरण में विपक्षी संख्या 2 (पति) ने अपनी पत्नी (आवेदिका) के खिलाफ आईपीसी की धारा 504 और 507 के तहत एफआईआर दर्ज कराई थी, जिसमें आरोप था कि पत्नी और उसके पार्टनर ने उसे धमकाया है। पुलिस ने जांच के बाद पाया कि आरोप झूठे थे और मामले में 'अंतिम आख्या' (Final Report/Closure Report) लगा दी, यह कहते हुए कि कोई अपराध नहीं बनता। इसके बाद, पति ने मजिस्ट्रेट के समक्ष 'प्रोटेस्ट पिटीशन' दाखिल की। मजिस्ट्रेट ने पुलिस की क्लोजर रिपोर्ट को खारिज करते हुए इसे एक 'स्टेट केस' (पुलिस केस) के रूप में स्वीकार कर लिया और पत्नी को समन जारी कर दिया। पत्नी ने इस आदेश को चुनौती दी।
न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरी ने मजिस्ट्रेट के आदेश को रद्द करते हुए एक बहुत ही महत्वपूर्ण विधिक सिद्धांत स्पष्ट किया। कोर्ट ने कहा कि धारा 504 और 507 आईपीसी 'असंज्ञेय अपराध' (Non-cognizable offences) हैं, इसलिए पुलिस को इसमें सीधे एफआईआर दर्ज करने के बजाय एनसीआर (NCR) दर्ज करनी चाहिए थी।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब पुलिस किसी असंज्ञेय अपराध में रिपोर्ट सौंपती है, तो उसे 'परिवाद' (Complaint) माना जाना चाहिए, न कि 'स्टेट केस'। मजिस्ट्रेट ने इसे पुलिस केस मानकर गलती की।
सबसे महत्वपूर्ण बात जो कोर्ट ने कही, वह यह है कि अगर पुलिस जांच में पाती है कि शिकायतकर्ता ने झूठी सूचना देकर पुलिस की शक्तियों का दुरुपयोग किया है, तो पुलिस अधिकारी का यह कर्तव्य है कि वह क्लोजर रिपोर्ट के साथ-साथ शिकायतकर्ता के खिलाफ धारा 177 और 182 आईपीसी (अब BNS की धारा 212 और 217) के तहत मुकदमा चलाने के लिए कोर्ट में लिखित परिवाद दाखिल करे। कोर्ट ने डीजीपी (DGP) को निर्देश दिया है कि भविष्य में यदि कोई झूठी एफआईआर दर्ज कराता है और पुलिस क्लोजर रिपोर्ट लगाती है, तो उस झूठे शिकायतकर्ता के खिलाफ भी अनिवार्य रूप से कार्यवाही की जाए।
कोर्ट ने अपने निर्णय में दीपू व अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2024) का हवाला देते हुए कहा कि 1 जुलाई 2024 के बाद की पेंडिंग जांच पर BNSS की प्रक्रिया लागू होगी। इसके अलावा भगवंत सिंह बनाम पुलिस कमिश्नर के फैसले का जिक्र करते हुए वादी को सूचित करने के अधिकार पर चर्चा की गई।

क्या पत्नी के शिक्षित होने मात्र से गुजारा भत्ता (Maintenance) का अधिकार समाप्त हो जाता है? - इलाहाबाद हाई कोर्ट का अहम ...
14/01/2026

क्या पत्नी के शिक्षित होने मात्र से गुजारा भत्ता (Maintenance) का अधिकार समाप्त हो जाता है? - इलाहाबाद हाई कोर्ट का अहम फैसला
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने श्रीमती सुमन वर्मा और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2026) के मामले में एक महत्वपूर्ण नज़ीर पेश की है। यह मामला दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) की धारा 125 के तहत पत्नी और नाबालिग बच्चे के भरण-पोषण (Maintenance) के अधिकारों को लेकर था।
मामले के मुख्य तथ्य:
निचली अदालत (फैमिली कोर्ट, बुलंदशहर) ने पत्नी की भरण-पोषण की याचिका को केवल इसलिए खारिज कर दिया था क्योंकि पत्नी उच्च शिक्षित (M.A. और I.T.I. डिप्लोमा) थी और कोर्ट का मानना था कि वह बिना किसी उचित कारण के पति से अलग रह रही है। निचली अदालत ने पति की 48,350 रुपये की ग्रॉस सैलरी के बावजूद, केवल नाबालिग बेटे के लिए 3,000 रुपये प्रति माह का मामूली भत्ता तय किया था। पति ने यह भी दावा किया था कि बच्चा उसका नहीं है, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया था।
कोर्ट का विश्लेषण और निर्णय:
माननीय न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की पीठ ने निचली अदालत के आदेश को त्रुटिपूर्ण मानते हुए निरस्त कर दिया और मामले को पुनः विचार के लिए भेज दिया। कोर्ट ने निम्नलिखित सिद्धांतों पर जोर दिया:
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पत्नी का केवल शिक्षित होना या उसके पास कमाने की क्षमता (potential to earn) होना, उसे भरण-पोषण से वंचित करने का आधार नहीं हो सकता। जब तक पति यह साबित न कर दे कि पत्नी वास्तव में कहीं नौकरी कर रही है, उसे मेंटेनेंस देने से मना नहीं किया जा सकता।
पति द्वारा अपने ही बच्चे की पितृत्व (Paternity) पर सवाल उठाना पत्नी के लिए घोर मानसिक क्रूरता है और यह उसके अलग रहने का पर्याप्त और उचित कारण है।
कोर्ट ने सुनीता कछवाहा (2014) और रजनीश बनाम नेहा (2021) के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि मेंटेनेंस सामाजिक न्याय का एक साधन है और इसकी राशि सम्मानजनक जीवन जीने लायक होनी चाहिए, न कि केवल गुजारे लायक।
रीना कुमारी (2025) के फैसले के अनुसार, अगर पति के पक्ष में 'दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना' (RCR) की डिक्री भी है, तब भी पत्नी धारा 125 के तहत मेंटेनेंस पाने की हकदार है।
अंततः, कोर्ट ने माना कि पत्नी और बेटा दोनों भरण-पोषण के हकदार हैं।

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