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26 हफ्ते से अधिक की गर्भावस्था में गंभीर भ्रूण विकृति पर गर्भसमापन की अनुमति, महिला की प्रजनन स्वायत्तता सर्वोपरि: केरल ...
14/01/2026

26 हफ्ते से अधिक की गर्भावस्था में गंभीर भ्रूण विकृति पर गर्भसमापन की अनुमति, महिला की प्रजनन स्वायत्तता सर्वोपरि: केरल हाई कोर्ट

याचिकाकर्ता पति-पत्नी ने 26 सप्ताह से अधिक की गर्भावस्था को समाप्त करने की अनुमति मांगी, क्योंकि चिकित्सकीय जांच में भ्रूण में *Holoprosencephaly* जैसी अत्यंत गंभीर और जीवन-असंगत जन्मजात मस्तिष्क विकृति पाई गई। मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार भ्रूण का न्यूरोलॉजिकल विकास अत्यधिक प्रभावित है, जीवन-प्रत्याशा कुछ महीनों की ही है और यदि बच्चा जीवित जन्म लेता भी है तो वह गंभीर शारीरिक व मानसिक विकलांगता से ग्रस्त रहेगा। बोर्ड ने स्पष्ट रूप से गर्भसमापन को चिकित्सकीय रूप से उचित बताया।

हाई कोर्ट ने Medical Termination of Pregnancy Act, 1971 की धारा 3(2-B) का हवाला देते हुए कहा कि गंभीर भ्रूण असामान्यताओं के मामलों में गर्भावधि की सीमा लागू नहीं होती। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों के आधार पर कोर्ट ने माना कि प्रजनन संबंधी निर्णय महिला के *अनुच्छेद 21 के अंतर्गत मौलिक अधिकार* हैं और केवल गर्भकाल अधिक होने के आधार पर गर्भसमापन से इनकार नहीं किया जा सकता। मेडिकल बोर्ड की विशेषज्ञ राय को निर्णायक मानते हुए कोर्ट ने कहा कि गर्भ जारी रखना केवल परिवार की पीड़ा को अनावश्यक रूप से बढ़ाएगा।

अतः कोर्ट ने गर्भसमापन की अनुमति देते हुए मेडिकल कॉलेज को तत्काल प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश दिया, यह स्पष्ट करते हुए कि सर्वोत्तम चिकित्सकीय पद्धति अपनाई जाएगी, माता-पिता जोखिम व खर्च स्वयं वहन करेंगे और यदि भ्रूण जीवित जन्म लेता है तो उसे पूर्ण चिकित्सकीय देखभाल प्रदान की जाएगी।

*"लाइसेंस पर रहना मालिकाना हक नहीं बनाता: दिल्ली हाईकोर्ट ने कब्जा खाली करने का दिया आदेश"*  इस मामले में विवाद संपत्ति ...
13/01/2026

*"लाइसेंस पर रहना मालिकाना हक नहीं बनाता: दिल्ली हाईकोर्ट ने कब्जा खाली करने का दिया आदेश"*


इस मामले में विवाद संपत्ति संख्या B-25A, विजय नगर, दिल्ली के एक हिस्से (15×22 फीट) को लेकर था। प्रतिवादी Praveen Chawla ने दावा किया कि वे इस संपत्ति के पूर्ण और वैध मालिक हैं, जबकि अपीलकर्ता Kalyan Dass ने इसे संयुक्त हिंदू परिवार (HUF) की संपत्ति बताते हुए अपने स्वामित्व का दावा किया। अदालत ने पाया कि वर्ष 1950 में यह संपत्ति सरकार द्वारा लधा राम (प्रतिवादी के पिता) को आवंटित की गई थी और बाद में 1971 में उनके नाम Perpetual Lease Deed निष्पादित हुई। उनके निधन के पश्चात सभी कानूनी वारिसों ने 1996 में अपने अधिकार Praveen Chawla के पक्ष में छोड़ दिए, जिससे वे एकमात्र मालिक बन गए। 1999 में संपत्ति फ्रीहोल्ड होकर उनके नाम पंजीकृत हो गई।

Kalyan Dass को 1996 में केवल लाइसेंस के आधार पर संपत्ति के एक हिस्से में रहने और व्यवसाय करने की अनुमति दी गई थी। उसी दिन बनाई गई वसीयत (Will) बाद में 2009 में रद्द कर दी गई। अदालत ने स्पष्ट किया कि लाइसेंस से कोई स्वामित्व अधिकार नहीं मिलता और इसे मालिक द्वारा रद्द किया जा सकता है। Kalyan Dass HUF होने या मौखिक बंटवारे का कोई ठोस प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर पाए।

अदालत ने यह भी माना कि मुकदमा समय-सीमा के भीतर दायर किया गया था क्योंकि 2009 में वसीयत रद्द हुई और 2010 में लाइसेंस समाप्त कर नोटिस दिया गया। अंततः हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के निर्णय को सही ठहराते हुए अपील खारिज कर दी और अपीलकर्ताओं को तुरंत संपत्ति खाली करने का आदेश दिया। साथ ही ₹5000 प्रति माह हर्जाना 12% ब्याज सहित 01.06.2010 से कब्जा सौंपने तक देने का आदेश कायम रखा गया।

State of Uttar Pradesh बनाम Anurudh & Anr. (2026 INSC 47)यह मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा POCSO केस में आरोपी को दी गई ...
11/01/2026

State of Uttar Pradesh बनाम Anurudh & Anr. (2026 INSC 47)

यह मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा POCSO केस में आरोपी को दी गई ज़मानत और उसके साथ जारी किए गए दिशानिर्देशों के खिलाफ उत्तर प्रदेश सरकार की अपील से जुड़ा है। आरोपी पर IPC की धारा 363, 366 और POCSO Act की धारा 7/8 के तहत *12 वर्षीय लड़की के अपहरण का आरोप था।* ट्रायल कोर्ट ने ज़मानत खारिज कर दी थी, लेकिन हाईकोर्ट ने ज़मानत देते हुए यह निर्देश दिया कि हर POCSO केस में पीड़िता की उम्र की मेडिकल जांच अनिवार्य रूप से कराई जाए और मेडिकल रिपोर्ट को स्कूल रिकॉर्ड से अधिक महत्व दिया जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने धारा 439 CrPC के तहत अपनी सीमा से बाहर जाकर आदेश दिए। बेल सुनवाई के दौरान कोर्ट का काम केवल यह तय करना होता है कि आरोपी को ज़मानत दी जाए या नहीं, न कि पूरे राज्य के लिए नीतिगत दिशा-निर्देश जारी करना। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पीड़िता की उम्र तय करने के लिए पहले *Juvenile Justice Act की धारा 94 के तहत दस्तावेज़ देखे जाएंगे, जैसे स्कूल या जन्म प्रमाणपत्र। मेडिकल जांच तभी कराई जा सकती है जब ये दस्तावेज़ उपलब्ध न हों*। हर मामले में मेडिकल एज टेस्ट अनिवार्य करना कानून के खिलाफ है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि बेल स्टेज पर दस्तावेज़ों की सच्चाई जांचना या उम्र को लेकर अंतिम निर्णय देना “मिनी ट्रायल” जैसा होगा, जो कानूनन गलत है। उम्र का अंतिम निर्धारण ट्रायल कोर्ट द्वारा साक्ष्यों के आधार पर किया जाना चाहिए, न कि बेल सुनवाई में। इसलिए हाईकोर्ट का यह कहना कि बेल कोर्ट दस्तावेज़ों की विश्वसनीयता तय कर सकती है, गलत है।

सुप्रीम कोर्ट ने POCSO कानून के दुरुपयोग पर भी गंभीर चिंता जताई और कहा कि कई मामलों में किशोर प्रेम संबंधों को गलत तरीके से अपराध बना दिया जाता है, जिससे निर्दोष युवक जेल में चले जाते हैं। कोर्ट ने सुझाव दिया कि सहमति से बने किशोर संबंधों को अपराध से बाहर रखने के लिए “रोमियो-जूलियट क्लॉज” जैसे प्रावधान पर विचार होना चाहिए और झूठे मुकदमे दर्ज कराने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का प्रावधान होना चाहिए।

अंत में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के सभी दिशानिर्देश रद्द कर दिए, लेकिन पहले दी गई ज़मानत को बरकरार रखा। यह भी कहा गया कि यह फैसला भविष्य के मामलों पर लागू होगा और पहले जिन मामलों में इन निर्देशों के आधार पर ज़मानत मिल चुकी है, उन पर इसका नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा।

⚖️ Usha S vs State of Kerala (2026) _Kerala High Court ने कहा कि जेल में बंद व्यक्ति पर भी Preventive Detention लगाया जा...
10/01/2026

⚖️ Usha S vs State of Kerala (2026)

_Kerala High Court ने कहा कि जेल में बंद व्यक्ति पर भी Preventive Detention लगाया जा सकता है,_

लेकिन यह तभी वैध होगा जब सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय की गई शर्तें पूरी हों।
कोर्ट ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख फैसलों का हवाला दिया –
1. Kamarunnissa v. Union of India (1991)
जिसमें "Triple Test" तय किया गया:
Authority को पता हो कि व्यक्ति custody में है
Bail मिलने की वास्तविक संभावना हो
Bail पर छूटने के बाद दोबारा अपराध का खतरा हो
2. Veeramani v. State of Tamil Nadu (1994)
3. Union of India v. Paul Manickam (2003)
इन मामलों में भी यही सिद्धांत दोहराया गया।
4. Union of India v. Dimple Happy Dhakad (2019)
कोर्ट ने कहा कि detention order में bail की संभावना शब्दों में न लिखी हो, फिर भी यदि रिकॉर्ड से स्पष्ट हो, तो आदेश वैध माना जाएगा।
इस केस में आरोपी NDPS मामले में पहले से जेल में था और उसके पास से commercial quantity M**A बरामद हुई थी।
हालांकि NDPS Act की धारा 37 bail को कठिन बनाती है,
लेकिन कोर्ट ने कहा कि bail पूरी तरह असंभव नहीं होती।
```कोर्ट ने माना कि आरोपी के पुराने आपराधिक रिकॉर्ड को देखते हुए bail मिलने पर उसके दोबारा अपराध करने की संभावना है।```
माँ द्वारा दी गई representation पर सरकार ने विचार किया
और उसका जवाब भी दिया गया,
इसलिए इस आधार पर detention रद्द नहीं किया जा सकता।

अंत में हाईकोर्ट ने Preventive Detention को सही ठहराया और याचिका खारिज कर दी।
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03/05/2025
मेहनत ही एक ऐसी चीज है जो आपको उस मुकाम तक पहुंचाएगी जहां आप जाना चाहते हो।
14/03/2024

मेहनत ही एक ऐसी चीज है जो आपको उस मुकाम तक पहुंचाएगी जहां आप जाना चाहते हो।

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