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28/09/2026

Compassionate Appointment पर बड़ा फैसला: ससुर को Maintenance के लिए Salary से ₹20,000 देने का आदेश

राजस्थान हाईकोर्ट ने Compassionate Appointment और dependent parents की maintenance से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण आदेश दिया।
मामले में महिला को अपने दिवंगत पति की मृत्यु के बाद compassionate appointment मिली थी। Appointment के समय दिए गए undertaking में deceased husband के dependent parents की देखभाल का आश्वासन भी महत्वपूर्ण था।
बाद की परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने उसकी salary से ₹20,000 प्रति माह उसके ससुर के maintenance के लिए जमा कराने का निर्देश दिया।
⚖️ यह फैसला Compassionate Appointment के साथ जुड़े undertaking और dependent family members की maintenance के संदर्भ में महत्वपूर्ण है।
Case: Bhagwan Singh v. Suptd. Engineer Pawas & Ors.
Court: Rajasthan High Court

26/09/2026

पत्नी ने मुकदमा वापस लिया तो दोबारा नहीं कर सकती दायर — High Court का अहम फैसला

पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि Domestic Violence Act के तहत दायर शिकायत बिना शर्त वापस ले ली गई है और कोई नई liberty नहीं ली गई, तो उसी आधार पर दूसरी शिकायत दायर करना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
पूरा फैसला जानने के लिए वीडियो देखें। कमेंट में अपनी राय बताएं और शेयर करें ताकि सभी तक यह जानकारी पहुंचे।
Case: Surinder Kumar Vs Charu Mirg | CRM-M-57463 of 2025 | 05.08.2026

केस हार गए, फिर भी रहेगा कब्जा! ⚖️ | इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा फैसलाक्या Sale Deed रद्द होने के बाद भी व्यक्ति का कब्जा...
25/09/2026

केस हार गए, फिर भी रहेगा कब्जा! ⚖️ | इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा फैसला

क्या Sale Deed रद्द होने के बाद भी व्यक्ति का कब्जा बना रह सकता है?
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि लंबे समय से शांतिपूर्ण और स्थायी कब्जे में रहने वाले व्यक्ति को केवल Sale Deed रद्द होने के आधार पर जबरन बेदखल नहीं किया जा सकता।
🔹 जबरन बेदखली नहीं की जा सकती
🔹 कानून की उचित प्रक्रिया का पालन जरूरी
🔹 केवल Sale Deed रद्द होना पर्याप्त नहीं
🔹 स्वामित्व और कब्जा अलग-अलग कानूनी मुद्दे हैं
⚖️ मामला: Rekha Saxena & Anr. v. Roman Catholic Diocese, Allahabad Pvt. Ltd. & Anr.
इलाहाबाद हाई कोर्ट | 2026
Vikas Duhan Advocate

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Rekha Saxena v. Roman Catholic Diocese, Allahabad Pvt. Ltd., इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच), दिनांक 23.09.2026 में अदालत ...
25/09/2026

Rekha Saxena v. Roman Catholic Diocese, Allahabad Pvt. Ltd., इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच), दिनांक 23.09.2026 में अदालत ने अस्थायी निषेधाज्ञा और लंबे समय से चले आ रहे शांतिपूर्ण कब्ज़े के संबंध में महत्वपूर्ण सिद्धांत स्पष्ट किए।
लंबे समय से शांतिपूर्ण कब्ज़ा महत्वपूर्ण है — केवल टाइटल विवादित होने से settled possession वाले व्यक्ति को जबरन बेदखल नहीं किया जा सकता।
बिक्री विलेख रद्द होने मात्र से बेदखली नहीं — यदि डिक्री में कब्ज़ा दिलाने या eviction का आदेश नहीं है, तो उसके आधार पर जबरन कब्ज़ा नहीं लिया जा सकता।
Due process of law जरूरी है — वास्तविक मालिक भी कानून अपने हाथ में लेकर settled possession वाले व्यक्ति को नहीं हटा सकता।
Temporary injunction के तीन मुख्य परीक्षण — prima facie case, balance of convenience और irreparable injury। इस स्तर पर कोर्ट को मुकदमे का mini-trial नहीं करना चाहिए।
इस मामले में अपीलीय अदालत ने हस्तक्षेप किया क्योंकि Trial Court ने settled possession और injunction के स्थापित सिद्धांतों को उचित रूप से नहीं देखा था।

सुरभि बेदी बनाम मंजीत कौर (हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट, Cr. MMO 797/2026, निर्णय दिनांक 04.08.2026, न्यायमूर्ति राकेश कैंथला)...
24/09/2026

सुरभि बेदी बनाम मंजीत कौर (हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट, Cr. MMO 797/2026, निर्णय दिनांक 04.08.2026, न्यायमूर्ति राकेश कैंथला)
परिणाम: याचिका खारिज। सास को साझा घर में रहने का अधिकार है, भले ही घर बहू के स्वामित्व में हो।
तथ्य
मंजीत कौर (सास) ने घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 12, 17, 18, 19 और 22 के तहत अपनी बहू सुरभि बेदी (प्रतिवादी 1) के विरुद्ध आवेदन दायर किया।
परिवार सुरभि के स्वामित्व वाले घर में साथ रहता था, जिसमें वे 08.09.2024 को रहने गए थे। झगड़ों के बाद सुरभि ने एक किरायेदार (प्रतिवादी 2) बिठा दिया, और मंजीत व उनके पति को 07.11.2025 को बेदखल कर दिया गया।
सुरभि ने रिश्ते और किरायेदारी, दोनों को स्वीकार किया। उनका कहना था कि घर उनका है, मंजीत और उनके पति केवल अनुज्ञप्तिधारी (licensee) थे, और उन्होंने उसके साथ दुर्व्यवहार किया।
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने मंजीत का संयुक्त कब्जा बहाल किया, और अपर सत्र न्यायाधीश ने अपील में इसे बरकरार रखा। इसके बाद सुरभि ने यह याचिका दायर की।
याचिकाकर्ता का तर्क: घर उसका है, इसलिए वह "साझा घर" नहीं है। सास घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत बहू के विरुद्ध कार्यवाही नहीं कर सकती। उसने कृष्ण कुमार बनाम नवनीत (पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट, 2018) पर भरोसा किया।
न्यायालय का तर्क
साझा घर (धारा 2(s)): सतीश चंदर आहूजा बनाम स्नेहा आहूजा (2021) पर भरोसा करते हुए न्यायालय ने कहा कि जिस घर में पक्षकार घरेलू संबंध में साथ रहे हों, वह साझा घर है, चाहे उसका मालिक कोई भी हो। प्रतिवादी के अपने उत्तर में भी साथ रहना स्वीकार किया गया था।
एस.आर. बत्रा बनाम तरुणा बत्रा (2007): आहूजा में कहा गया कि इस मामले में सही कानून नहीं बताया गया था। घर का पति का होना या पति द्वारा किराए पर लिया गया होना आवश्यक नहीं है।
प्रभा त्यागी बनाम कमलेश देवी (2022): घरेलू संबंध में रहने वाली प्रत्येक महिला, जिनमें सास या बहू भी शामिल हैं, को साझा घर में रहने का अधिकार है, चाहे उसका उस घर में कोई स्वामित्व या हित हो या न हो।
धारा 17(1) यह अधिकार घरेलू हिंसा न होने पर भी संरक्षित करती है।
धारा 17(2) तब लागू होती है जब महिला पीड़ित व्यक्ति हो। उसे विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के बिना बेदखल या बहिष्कृत नहीं किया जा सकता।
यह अधिकार केवल वास्तविक निवास तक सीमित नहीं है, रचनात्मक निवास (constructive residence) भी इसमें शामिल है।
कृष्ण कुमार का निर्णय अनुसरणीय नहीं: यह आहूजा से पहले का है और बत्रा पर आधारित है, इसलिए इसका अनुसरण नहीं किया जा सकता।
निर्णय: सास घरेलू संबंध में है, और सुरभि के स्वामित्व के बावजूद वह घर साझा घर है। सुरभि उसे घर किसी तीसरे व्यक्ति को किराए पर देकर बेदखल नहीं कर सकती थी, और संयुक्त कब्जे की बहाली को बरकरार रखा गया। न्यायालय को अपनी अंतर्निहित अधिकारिता (धारा 528 BNSS / 482 CrPC) में हस्तक्षेप करने योग्य कोई त्रुटि नहीं मिली।

24/09/2026

बड़ा फैसला: घर बहू के नाम हो, तब भी सास को घर से नहीं निकाला जा सकता!
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि सास को साझा घर में रहने का अधिकार है (DV Act, धारा 17)। कानूनी प्रक्रिया के बिना बेदखली नहीं हो सकती, और किरायेदार बिठाने से यह अधिकार खत्म नहीं होता।
📌 सुरभि बेदी बनाम मंजीत कौर | Cr. MMO 797/2026 | 04.08.2026
आप इस फैसले पर क्या सोचते हैं? कमेंट में बताइए।

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सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसलाDebarati Bhunia Chakraborty बनाम Suman Sankar Bhuniaसुप्रीम कोर्ट | निर्णय दिनांक: 23 स...
24/09/2026

सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला
Debarati Bhunia Chakraborty बनाम Suman Sankar Bhunia
सुप्रीम कोर्ट | निर्णय दिनांक: 23 सितंबर 2026
1. बच्चे का कल्याण सर्वोच्च प्राथमिकता
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बच्चे की कस्टडी तय करते समय माता-पिता के अधिकारों से अधिक महत्वपूर्ण बच्चे का सर्वोत्तम हित और कल्याण (Best Interest & Welfare of the Child) है। बच्चे की उम्र और समझ के अनुसार उसकी इच्छा और भावनात्मक स्थिति को भी उचित महत्व दिया जाना चाहिए।
2. मां का बार-बार नौकरी बदलना “Nomadic Life” नहीं
निचली अदालतों ने मां द्वारा अलग-अलग स्थानों पर नौकरी करने और रहने को “Nomadic Life” माना था और इसी आधार पर पिता को कस्टडी दी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने इस दृष्टिकोण को अनुचित माना। कोर्ट ने कहा कि मां ने बेहतर नौकरी, आर्थिक सुरक्षा और बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए रोजगार बदले थे। इसलिए केवल नौकरी या स्थान बदलने के आधार पर उसे बच्चों की कस्टडी से वंचित नहीं किया जा सकता।
3. पिता के विरुद्ध POCSO मामले का कस्टडी पर गंभीर प्रभाव
बेटे ने NIMHANS में मनोचिकित्सक के सामने पिता द्वारा कथित यौन शोषण की जानकारी दी थी। इसके बाद POCSO Act के तहत FIR दर्ज हुई और जांच के बाद पिता के विरुद्ध Chargesheet दाखिल की जा चुकी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब तक पिता ऐसे गंभीर POCSO अभियोजन का सामना कर रहा है, तब तक उसे बच्चों की कस्टडी देना बच्चे के सर्वोत्तम हित और सुरक्षा के विरुद्ध होगा।
4. POCSO आरोपों को “झूठा/प्रेरित” बताना हाई कोर्ट के लिए उचित नहीं था
दिल्ली हाई कोर्ट ने POCSO आरोपों पर संदेह व्यक्त करते हुए उन्हें कथित रूप से प्रेरित बताया था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये टिप्पणियां समय से पहले, अनुचित और लंबित आपराधिक कार्यवाही को प्रभावित करने वाली थीं। इसलिए इन टिप्पणियों को निर्णय से हटा दिया गया (expunged) और कहा गया कि POCSO मामले की कार्यवाही में इनका कोई प्रभाव नहीं होगा।
5. बच्चों की इच्छा और भावनात्मक स्थिति को महत्व
सुप्रीम कोर्ट तथा काउंसलर्स के सामने हुई मुलाकातों के दौरान बेटे ने पिता के साथ रहने के प्रति अत्यधिक अनिच्छा दिखाई। बेटी ने भी डर, परेशानी और मां के पास वापस जाने की इच्छा व्यक्त की।
काउंसलर्स की रिपोर्ट में भी दोनों बच्चों की पिता के साथ बातचीत में झिझक तथा मां के साथ रहने की प्राथमिकता दर्ज की गई।
6. दादा-दादी की पेंशन पिता की जिम्मेदारी का विकल्प नहीं
पिता ने अपने माता-पिता की पेंशन और संपत्ति का हवाला दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बच्चों की शिक्षा और अन्य आवश्यकताओं को पूरा करना मुख्य रूप से माता-पिता की जिम्मेदारी है। दादा-दादी की पेंशन को पिता की आर्थिक जिम्मेदारी का विकल्प नहीं माना जा सकता।
7. विदेश जाने से बच्चे अपनी संस्कृति नहीं खो देते
पिता की ओर से तर्क दिया गया कि बच्चों को ब्रिटेन ले जाने से वे अपनी बंगाली संस्कृति और पारिवारिक मूल्यों से दूर हो जाएंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल किसी दूसरे देश में रहने से यह अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि बच्चे अपनी सांस्कृतिक जड़ों और मूल्यों को खो देंगे।
8. मां को बच्चों को ब्रिटेन ले जाने की अनुमति
सुप्रीम कोर्ट ने मां की नौकरी, आर्थिक स्थिति, बच्चों की प्राथमिक देखभाल करने वाली भूमिका, बच्चों की भावनात्मक स्थिति तथा पिता के विरुद्ध लंबित POCSO अभियोजन को देखते हुए फिलहाल मां को दोनों बच्चों को ब्रिटेन ले जाने और वहां अच्छे स्कूल में दाखिला दिलाने की अनुमति दी।
मां को छह सप्ताह के भीतर बच्चों की स्कूलिंग का विवरण शपथपत्र के माध्यम से रिकॉर्ड पर रखना होगा तथा जब भी कोर्ट निर्देश दे, बच्चों को कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत करने का undertaking देना होगा।
⚖️ मुख्य कानूनी सिद्धांत
बच्चों की कस्टडी के मामलों में सबसे महत्वपूर्ण विचार बच्चे का कल्याण और सर्वोत्तम हित है। केवल मां का नौकरी के कारण स्थान बदलना या विदेश में रहना उसे कस्टडी के अधिकार से वंचित करने का आधार नहीं हो सकता। वहीं, यदि किसी पिता के विरुद्ध बच्चे के खुलासे के आधार पर POCSO मामले में जांच के बाद Chargesheet दाखिल हो चुकी है, तो लंबित अभियोजन के दौरान उसे बच्चों की कस्टडी देना बच्चे की सुरक्षा और सर्वोत्तम हित के विपरीत हो सकता है।

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