Adv Arjun Chandna

Adv Arjun Chandna A human for the Nation First, RssThinker,Social Activist, blogger & Investigate person.. Sujan Singh Gurjar (Farmer)
•Mother-Mrs.

Advocate- Arjun singh gurjar(Adv arjun chandna)
(an introduction)
•Name- Arjun Singh Gurjar (Chandna)
•Father- Mr. Geeta Bai Gurjar
•Date of Birth-07-07-1996
•Birthplace- Village Garda, Panchayat Asalpur, post-borkheri(gujran),block Aklera326039.
•work Place - Jhalawar (Rajasthan-india),

Dedicated to public service through journalism for 10 years.(Newspaper - Correspondent in Rajasthan Patrika fr

om 2011 - Assistant Editor in Dainik Bhaskar till 2021)

•Academic Life-
•Graduate in Arts stream from Kota University (BA),
• Master of Arts (MA),&
• Bachelor of Laws (LL.B),
• Graduate in Journalism, from Vardhman Kota Open University (BJMC),

•Social life-
•Trained volunteers of Rashtriya Swayamsevak Sangh(RSS), Sangh age-20 years, (since childhood), former pracharak- (Dungarpur-Chittor prant), liability event, ghatnayak to 2005 from block secretary (karyvaah) till 2022.and social worker.

•Currently working-
•Advocate in Aklera (Jhalawar))

10/02/2026

राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने सरकार से वीडीए/क्रिप्टोकरेंसी को वैध बनाने और उन्हें एक अलग परिसंपत्ति वर्ग के रूप में मान्यता देने का आग्रह किया है, साथ ही स्पष्ट नियमन और नीतिगत स्पष्टता की मांग की है।

राजनीति काजल की कोठरी है। काजल की कोठरी में धवल वस्त्र पहनकर प्रवेश करना कोई चमत्कार नहीं है, चमत्कार है काजल की कोठरी स...
05/02/2026

राजनीति काजल की कोठरी है। काजल की कोठरी में धवल वस्त्र पहनकर प्रवेश करना कोई चमत्कार नहीं है, चमत्कार है काजल की कोठरी से उजले व्यक्तित्व के साथ बेदाग वापस लौटना। ये चमत्कार वही कर सकते हैं जिनमें प्रामाणिकता कूट कूट कर भरी हो। जो निर्लिप्त, निष्काम, निर्दोष हो। संघ के प्रचारक श्री हितानन्द शर्मा जी की पांच साल बाद बीजेपी से संघ में वापसी हुई। जैसे गए थे वैसे ही, बल्कि व्यक्तित्व में और निखार के साथ लौटे हैं।

यूं तो संघ के प्रचारकों में ध्येयनिष्ठा और राष्ट्र के प्रति समर्पण रहता ही है। लेकिन राजनीति का क्षेत्र बड़े ही आकर्षण का क्षेत्र होता है। आज के परिदृश्य की राजनीति, वह भी सत्ता के संगठन की राजनीति का क्षेत्र तो और भी जोखिम भरा है। यहां षड्यंत्र, आरोप, प्रलोभन, अहंकार, भ्रम, राग, द्वेष जैसे विकारों के लिए पर्याप्त आशंकाएं या यूं कहें कि संभावनाएं होती हैं। ऐसे में इन विकारों से प्रभावित हुए बिना कार्य करना एक कठिन चुनौती है।

श्री हितानन्द जी इस चुनौती पूर्ण क्षेत्र में अपनी भूमिका का सार्थक निर्वाह कर वापस लौटे हैं। संघ ने उन्हें मध्य क्षेत्र (मध्यप्रदेश छत्तीसगढ़) का सह बौद्धिक प्रमुख का दायित्व सौंपा है। संघ की सीधी वर्किंग में वापसी होना ही उनकी ध्येयनिष्ठा और प्रामाणिकता का पर्याय है। वास्तव में जैसा कि उनका पिंड है, मुझे लगता है कि राजनीति में पांच साल बिताना उनके लिए आसान नहीं रहा होगा।

बेहद सरल, अंतर्मुखी, संकोची और सीधे सपाट व्यक्तित्व के धनी श्री हितानन्द शर्मा जी को उनके अप्रभावित, अविचलित, शांत व्यक्तित्व के कारण ही संघ ने बीजेपी में भेजा होगा। संघ को भी विश्वास होगा कि राजनीति के क्षेत्र में माया मोह में पड़कर एक प्रचारक कम नहीं होगा। बल्कि और निखर कर लौटेगा। वैसा ही हुआ भी। संगठनकर्ताओं में यही दूरदृष्टी होती है।

वर्ना यह कहने में कोई परहेज नहीं है कि आजकल कई लोग आरएसएस को पॉलिटिकल फील्ड में एंट्री का शॉर्ट रूट समझने लगे हैं। यह बात और है कि ऐसे लोगों को संघ भी कुछ समय बाद ताड़ लेता है और उचित मार्ग दिखा देता है। ऐसे विचित्र दौर में श्री हितानन्द शर्मा जी जैसे व्यक्तित्व न केवल संगठन की पूंजी में शामिल हैं बल्कि संघ को समझने का माध्यम भी हैं।

पूर्ण विश्वास है कि संघ कार्य को विस्तार देने में उनकी भूमिका पुनः सार्थक होगी और कार्यकर्ताओं में उनका व्यक्तित्व और सानिध्य संघ को अंदर से समझने में सहायक होगा। शुभकामनाएं। 🚩🚩🙏

31/01/2026

"ना रुके, ना थके, ना झुके"
शतक: ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 साल का सफर' की पूरी टीम को टीजर के सफल लॉन्च पर पूज्य सद्गुरु श्री ऋतेश्वर जी की ओर से बहुत-बहुत शुभकामनाएं!

एक ऐसे संगठन की कहानी को बड़े पर्दे पर लाना, जिसने भारतीय समाज और राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना में एक सदी तक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, अपने आप में एक सराहनीय प्रयास है। उम्मीद है कि यह फिल्म दर्शकों को इतिहास के उन अनछुए पहलुओं से परिचित कराएगी जो अब तक जनमानस से दूर थे।
निर्देशक आशीष मल्ल और निर्माता वीर कपूर को इस साहसी प्रोजेक्ट के लिए ढेरों शुभकामनाएँ। हमें विश्वास है कि यह फिल्म भारतीय सिनेमा में एक नया अध्याय लिखेगी।

यह नवगठित भैरव (BHAIRAV) बटालियन की कुछ तस्वीरें हैं,पिछली बार मैने जब badge और प्रतिकात्मक तस्वीरें डाली थी ,तो कुछ लोग...
17/01/2026

यह नवगठित भैरव (BHAIRAV) बटालियन की कुछ तस्वीरें हैं,पिछली बार मैने जब badge और प्रतिकात्मक तस्वीरें डाली थी ,तो कुछ लोगों ने डीएम में कहा कि मैडम ये भैरव‌ नही हैं।

सच कहूं तो मैं पहले उनकी परेड,कामो और कुछ डिटेल्स पता करना चाहती थी।आधी अधूरी जानकारी ही थी तब मेरे पास।

मैने जो तस्वीरें डाली हैं उसमें खड़ा हर जवान छह फ़ुट से ऊँचा, चौड़े कंधों वाला, चट्टान-सी काया लिए हुए है।

अगर कभी भी किसी स्पेशल फोर्स के जवान से हाथ मिलाइएगा, तो ऐसा लगेगा मानो पत्थर से बना हाथ थाम लिया हो।

ये जो डेजर्ट कैमोफ्लाज में दिख रहे जवान 2 BRV (राजपूताना राइफल्स) के हैं, और सामान्य भारतीय सेना कैमोफ्लाज में 4 BRV (सिख लाइट इन्फैंट्री) के।

2 BRV और 4 BRV के कंपनी कमांडरों की तस्वीरें ख़ास तौर पर किसी का भी ध्यान खींच लेती हैं।

ये वो अफ़सर हैं जो भारतीय सेना की सबसे अधिक अलंकृत और गौरवशाली रेजिमेंटों से आकर इस रेजिमेंट में पहुँचे हैं। ऐसे में उनसे उम्मीदें भी आसमान छू रही हैं और भारतीय सेना इन्हें पूरे ज़ोर-शोर से आगे बढ़ा रहा है।

अभी आपने वेनुजुएला में जो डेल्टा फोर्स का आपरेशन देखा ,मुझे लग रहा कि इन्हे स्पेशल इसी की तरह तैयार किया जा रहा है ,क्योंकि घातक और पारा एसएफ के साथ एक और ऐसी ही टीम की जरूरत भारतीय सेना को है।

अभी जो आर्मी डे परेड कल हुआ है उसके लिए लगभग महीने पहले से एक जैसे रूटिन में ये जवान सुबह 4 बजे से लेकर दोपहर 3 बजे तक लगातार चार किमी मार्च करते थे।

इनकी सुबह की शुरुआत हार्डकोर मॉर्निंग पीटी से होती है, उसके बाद ड्रिल उस्तादों की कड़ी परख, और फिर अंत में 3 से 4 किलोमीटर का मार्च रोजाना चाहे मौसम कोई भी हो, परिस्थिती कुछ भी है।

ड्रील उस्तादों का तो आपको पता ही है ,सबके रोंगटे खड़े होते हैं ,उनके पीटी परेड से।
सोचकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं—जिस शरीर ने सुबह से खुद को निचोड़ दिया हो, वही शरीर अनुशासन में ढला हुआ, एक लय में क़दम से क़दम मिलाकर आगे बढ़ता है। यह सिर्फ़ कसरत या ड्रिल नहीं होती, यह शरीर और मन दोनों की लिमिटेड सीमा को रोज़ तोड़ने की प्रक्रिया है ताकि ये सीमा इनफीनिटी तक पहुंच जाए।

सच में स्पेशल फोर्स के जवानों की स्टैमिना और ताक़त वाक़ई हैरान कर देने वाली होती है। थकान उनके चेहरे पर नहीं दिखाई ही नही देती, बल्कि उन्होने उसे मस्तिष्क के किसी कोने के भीतर दबी रहती है, क्योंकि सामने सिर्फ़ एक ही चीज़ होती है ड्यूटी फर्स्ट..
यही वो raw and brutal ट्रेनिंग है जो एक आम सिपाही को भैरव बनाती है। इसके बाद उनकी आँखों में जो सख़्ती और संकल्प दिखाई देता है, वही भैरव की असली पहचान है,जो दुश्मन पर काल भैरव जैसा टूट पड़ेगा।

अभयम् भैरव:

भारतीय संसद में जब किसी मुद्दे की गूंज उठती है तो यह संकेत होता है कि वह समस्या अब सिर्फ ज़मीनी स्तर तक सीमित नहीं, बल्क...
21/12/2025

भारतीय संसद में जब किसी मुद्दे की गूंज उठती है तो यह संकेत होता है कि वह समस्या अब सिर्फ ज़मीनी स्तर तक सीमित नहीं, बल्कि राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन चुकी है। हाल के वक्त में ऐसा ही हुआ जब डिलीवरी ब्वॉय और गिग वर्करों की दिक्कतों को लेकर चर्चा हुई और यह कहा गया कि उनकी हालत कई बार दिहाड़ी मज़दूरों से भी बदतर है। यह तुलना सिर्फ भावनात्मक नहीं, बल्कि काम के घंटे, सुरक्षा, बीमा और आय की अनिश्चितता जैसी वास्तविकताओं से निकलती है।

डिलीवरी ब्वॉय की मुश्किलें
ऑनलाइन फूड, ग्रॉसरी और ई‑कॉमर्स के बढ़ते दौर में डिलीवरी पार्टनर शहरों की लाइफ़लाइन बन गए हैं, लेकिन उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी चुनौतियों से भरी है। अक्सर उन्हें प्रति ऑर्डर या इंसेंटिव‑आधारित मॉडल पर भुगतान मिलता है, जिससे महीने की फिक्स आय तय करना मुश्किल हो जाता है। खराब मौसम, ट्रैफिक, रात की ड्यूटी और समय पर ऑर्डर न पहुंचने पर पेनल्टी जैसी स्थितियां मानसिक दबाव बढ़ाती हैं, जबकि मेडिकल इंश्योरेंस, सोशल सिक्योरिटी या पेंशन जैसी सुविधाएं ज्यादातर मामलों में बहुत सीमित या लगभग नदारद रहती हैं।

दिहाड़ी मजदूरों से भी बदतर क्यों?
दिहाड़ी मजदूर भले रोज़गार के लिए लाइनों में खड़े होते हों, लेकिन जो दिन वह काम करते हैं, उसके बदले उन्हें एक तय रकम मिलती है और काम देने वाला पक्ष कानूनी रूप से पहचाना जा सकता है। इसके उलट, कई गिग प्लेटफॉर्म डिलीवरी ब्वॉय को “पार्टनर” या “इंडिपेंडेंट कॉन्ट्रैक्टर” कहकर पारंपरिक नियोक्ता‑कर्मचारी जिम्मेदारियों से खुद को दूर रख लेते हैं। नतीजा यह कि दुर्घटना या बीमारी जैसी स्थितियों में जिम्मेदारी साफ‑साफ तय नहीं होती, और मेहनत के बावजूद सुरक्षा जाल बहुत कमजोर रहता है।

संसद में रखी गई प्रमुख मांगें
ऐसी बहस में आमतौर पर यह मांग उठती है कि सरकार गिग वर्करों के लिए अलग से लेबर कोड या सोशल सिक्योरिटी फ्रेमवर्क तैयार करे, जिसमें न्यूनतम मानदेय, दुर्घटना बीमा, स्वास्थ्य सुविधा और रिटायरमेंट के लिए फंड जैसी बातें शामिल हों। प्लेटफॉर्म कंपनियों पर यह अनिवार्य किया जा सकता है कि वे हर ऑर्डर पर एक छोटा‑सा सेस या योगदान सोशल सिक्योरिटी पूल में जमा करें, जिससे लाखों डिलीवरी वर्करों के लिए सुरक्षा कवच तैयार किया जा सके। इसके साथ ही, एल्गोरिदम‑आधारित रेटिंग और इंसेंटिव सिस्टम में पारदर्शिता भी जरूरी है, ताकि वर्कर समझ सकें कि उनकी कमाई किन मानकों से तय हो रही है।

आगे क्या किया जा सकता है
सरकारी नीतियों के साथ‑साथ राज्य सरकारों और शहरी निकायों की भी भूमिका अहम है, जो सड़क सुरक्षा, हेलमेट‑जैसे नियम और पार्किंग‑जोन जैसी सुविधाओं के ज़रिए डिलीवरी ब्वॉय की जिंदगी थोड़ी सुरक्षित बना सकते हैं। ट्रेड यूनियन या एसोसिएशन के रूप में गिग वर्करों का संगठित होना भी जरूरी है, ताकि वे अपनी शर्तों पर बातचीत कर सकें, न कि अकेले‑अकेले ऐप की शर्तों के आगे झुकते रहें। समाज के स्तर पर भी उपभोक्ताओं को यह समझना होगा कि समय पर ऑर्डर मिलने के पीछे किसी इंसान की मेहनत और जोखिम है; थोड़ा सम्मान, उचित टिप और सहयोग, इस नए दौर के “शहरी मेहनतकशों” के लिए बड़ी नैतिक ताकत बन सकता है। #संसद

ये है भारत के gen-z की ताकत.. 🔥दुनिया एक तरफ जहाँ AI (Artificial Intelligence) से हैरान है, वहीं भारत के देवव्रत ने अपनी...
12/12/2025

ये है भारत के gen-z की ताकत.. 🔥
दुनिया एक तरफ जहाँ AI (Artificial Intelligence) से हैरान है, वहीं भारत के देवव्रत ने अपनी NI (Natural Intelligence) से दुनिया को चौंका दिया है।

50 दिन में 2000 मंत्र की जटिल साधना और पाठ। जिसके साथ टूट गया 200 साल पुराना रिकॉर्ड।

देवव्रत ने वेदों का "दंडक्रम पारायण" पूरा किया है। यह सिर्फ़ पूजा या अनुष्ठान नहीं, बल्कि गणित और विज्ञान का एक असंभव कारनामा है।

इसे करने के लिए दिमाग को हर सेकंड शब्दों को उलटना-पलटना और जोड़ना पड़ता है। एक भी मात्रा की गलती, और पूरी चेन टूट जाएगी। यह कोडिंग बिना कीबोर्ड के की गई है।

पिछली 2 सदियों से यह विद्या लगभग लुप्त थी। जब नालंदा जली थी, तब इन्ही विधियों ने हमारे ज्ञान को बचाया था। आज देवव्रत ने उस परंपरा को पुनर्जीवित (Revive) किया है।

यह वेदों का 'Security System' है। हमारे ऋषियों ने मंत्रों को लॉक करने के लिए यह पैटर्न बनाया था ताकि कलयुग में कोई वेदों में मिलावट न कर सके।

इस युवा की तपस्या और मेधा को नमन।
यह है असली भारत।

विज्ञान के नज़रिया से देखे तो "दुनिया की सबसे पुरानी कोडिंग" (The Science of Ancient Coding) में इसे सिर्फ़ 'याद करना' (Memorization) कहना गलत होगा। यह "Real-time Algorithmic Processing" है।

असल में ये बाइनरी कोडिंग से भी जटिल है, कंप्यूटर 0 और 1 की भाषा समझता है। वेद पाठी को मंत्रों के शब्दों (Words), स्वरों (Accents), और मात्राओं (Syllables) को एक जटिल गणितीय सूत्र (Formula) में पिरोना होता है।

दंडक्रम कैसे जटिल होता है इसका गणित समझिए: मान लीजिए मूल मंत्र है: क ख ग घ (1-2-3-4)

दंडक्रम में इसे ऐसे बोला जाएगा: क ख, ख क, क ख, ख ग, ग ख, ख ग, ग घ... (अर्थात: 1-2, 2-1, 1-2, 2-3, 3-2, 2-3, 3-4...)

इसमें सबसे बड़ी चुनौती है कि देवव्रत ने 50 दिनों तक लगातार, बिना रुके, बिना एक भी गलती किए, 2000 मंत्रों के लिए इस पैटर्न को दिमाग में चलाया और पाठ किया।

Neuroscience के अनुसार, इस स्तर के पाठ के दौरान दिमाग के 'Left Hemisphere' (तर्क) और 'Right Hemisphere' (रचनात्मकता) के बीच जो सिनैप्स (Synapse) फायरिंग होती है, वो किसी सुपरकंप्यूटर से कम नहीं है। यह Neuroplasticity का चरम उदाहरण है।

इतिहास के नज़रिया से यह अनुपम उपलब्धि है क्योंकि यह विद्या लुप्त हो गई थी.. अंग्रेजों के आगमन और आधुनिक शिक्षा पद्धति के कारण गुरुकुल नष्ट हो गए। 'संहिता पाठ' (सीधा-सीधा पढ़ना) तो बचा रहा, लेकिन 'विकृति पाठ' (जटिल तरीके जैसे घन, दंड, जटा) सिखाने वाले गुरु और सीखने वाले शिष्य कम हो गए।

कहा जाता है कि पिछले लगभग 200 वर्षों (19वीं सदी की शुरुआत से) में किसी ने सार्वजनिक रूप से इतने बड़े पैमाने पर 'दंडक्रम' का प्रदर्शन नहीं किया था।

सोचिए जब दुनिया कागज पर स्याही से इतिहास लिख रही थी, भारत अपने इतिहास को ब्राह्मणों के दिमाग में 'रिकॉर्ड' कर रहा था।

देवव्रत की यह उपलब्धि बताती है कि अगर दुनिया की सारी किताबें जल भी जाएं, तो भी एक वेद-पाठी अपने दिमाग से पूरा ग्रंथ हूबहू दोबारा लिख सकता है। यह इतिहास को सुरक्षित रखने की "Lossless Audio Compression" तकनीक है।

यह वेदों का अभेद्य कवच है, समझिए कि धर्म के हिसाब से यह सबसे महत्वपूर्ण क्यों है?

असल में इसमें मिलावट रोकने की तकनीक है (Anti-Corruption Mechanism): ऋषियों को पता था कि भविष्य में लोग मंत्रों में अपनी मर्जी से शब्द जोड़ देंगे या बदल देंगे। इसलिए उन्होंने 'दंडक्रम' जैसे 11 तरीके (विकृतियां) बनाए।

अगर कोई मूल मंत्र में एक शब्द भी बदलता है, तो 'दंडक्रम' का पूरा गणितीय चैन (Chain) टूट जाएगा और गलती तुरंत पकड़ में आ जाएगी।

देवव्रत ने यह सिद्ध किया कि वेद "अपौरुषेय" (Not created by humans) हैं और इन्हें बदला नहीं जा सकता है। यह वेदों की शुद्धता (Purity) को लॉक करने का "Cryptographic Hash Function" है।

माना जाता है कि जब मंत्रों को इस क्रम में बोला जाता है, तो जो ध्वनि तरंगें (Sound Vibrations) पैदा होती हैं, वे वातावरण के आणविक ढांचे (Molecular Structure) को प्रभावित करती है।

साभार।

बहुत ही गंभीर बात आज के आधुनिक युग में ऐसे तुच्छ मानसिक बीमार लोग है जो ये कहते है कि हमारे यहां कार्ड नहीं आया। तो क्यु...
07/12/2025

बहुत ही गंभीर बात आज के आधुनिक युग में ऐसे तुच्छ मानसिक बीमार लोग है जो ये कहते है कि हमारे यहां कार्ड नहीं आया। तो क्यु जायें शादी-ब्याह में, ऐसे लोगों से कहना चाहता हूं जिसके परिवार में कम लोग है।, आने जाने की सही सुविधा नहीं है। फिर भी लोग अपनी शर्म लाज रखने के लिए 50km 60km या अधिक दूर कार्ड देने घर घर जाते हैं। रास्ते में ट्रैफिक, कभी रात कभी दिन ऊपर से शादी का समारोह कैसे हो पैसे का इंतज़ाम कैसे होगा ऐसी बहुत सारी टेंशन रहती है जिसके घर में शादी होती अतः लोग मजबूर कर देते है कार्ड मगाने के लिए, तभी ऐसी जल्दी के चक्कर में लोग अपने जिम्मेदार व्यक्ति को खो देते ना कितने परिवार का चिराग बुझ जाता है ना जाने कितनी माँ की गोद सुनी हो जाती है, ना जाने कितनी बहनो के भाई छिन जाते है, और ना जाने कितने पिता अपने जवान बेटो को कंधा देते है

भाई लोगों कार्ड को व्हाट्स app पर ही स्वीकार कर लिया करें🙏🙏🙏

भुवनेश्वर से हुबली जा रहे नवविवाहित मेधा क्षीरसागर और संगमा दास ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उनका रिसेप्शन किसी ...
06/12/2025

भुवनेश्वर से हुबली जा रहे नवविवाहित मेधा क्षीरसागर और संगमा दास ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उनका रिसेप्शन किसी फिल्म की तरह नहीं, बल्कि इंडिगो की मेहरबानी से एक “Zoom मीटिंग” बन जाएगा। दोनों बेंगलुरु में सॉफ्टवेयर इंजीनियर, शादी 23 नवंबर को भुवनेश्वर में हो चुकी थी, और 3 दिसंबर को हुबली के गुजरात भवन में धूमधाम से रिसेप्शन होना था। सब प्लान बढ़िया—बस एक चीज़ ग़लत थी: फ्लाइट इंडिगो की थी।

2 दिसंबर की भुवनेश्वर–बेंगलुरु–हुबली फ्लाइट पहले लेट हुई, फिर और लेट हुई… फिर लेट-लेट-लेट होकर आखिर 3 दिसंबर को रद्द हो गई। वजह वही, नए FDTL नियम, पायलटों की कमी, और एयरलाइन का वो भरोसा जो कभी था… अब बस यादों में है। ऊपर से कई रिश्तेदारों की उड़ानें भी रद्द होकर हवा में ही गायब हो गईं।

उधर हुबली में हॉल पूरी तरह सज चुका था, मेहमान तैयार, स्टेज चमक रहा था—बस दूल्हा-दुल्हन नहीं थे। मजबूरी में दुल्हन के माता-पिता ही स्टेज पर बैठ गए और रस्में निभाने लगे। और मेधा–संगमा? दोनों भुवनेश्वर में तैयार होकर कैमरा ऑन करके बैठे, अपने ही रिसेप्शन में मेजबान की तरह नहीं, बल्कि “कनेक्शन स्टेबल है क्या?” पूछते हुए ऑनलाइन एंट्री मारनी पड़ी।

दुल्हन की मां बोलीं, “बहुत दुख हुआ, लेकिन इतने मेहमान आ चुके थे कि कार्यक्रम रोकना मुमकिन नहीं था।” यानी इंडिगो ने शादी नहीं रुकवाई, पर शो तो चलना ही था, चाहे Wi-Fi पर ही सही।

ये पूरा किस्सा बताता है कि भारत की सबसे बड़ी एयरलाइन इस वक्त इतनी छोटी गलतियों में उलझी है कि एक उड़ान की गड़बड़ी पूरे नेटवर्क को ICU में भेज देती है। इंडिगो ने अब गलती मानकर उड़ानें कम करने और फरवरी 2026 तक सिस्टम दुरुस्त करने का वादा किया है। तब तक यात्रियों को बस एक सलाह, फ्लाइट बुक करें, लेकिन प्लानिंग ऐसी रखें जैसे आप शादी नहीं, किसी अनिश्चित-भाग्य वाले रियलिटी शो में जा रहे हों।

✨🚩 हर हर महादेव 🚩✨आज काशी में सनातन वैदिक परंपरा का एक ऐतिहासिक, दिव्य और अविस्मरणीय क्षण साकार हुआ—जहाँ आधुनिक भारत के ...
02/12/2025

✨🚩 हर हर महादेव 🚩✨

आज काशी में सनातन वैदिक परंपरा का एक ऐतिहासिक, दिव्य और अविस्मरणीय क्षण साकार हुआ—
जहाँ आधुनिक भारत के तेजस्वी वेद-शौर्य
देवव्रत महेश रेखे (अहिल्यानगर, महाराष्ट्र)
का भव्य अभिनंदन समारोह अद्भुत गरिमा और वैदिक वैभव के साथ सम्पन्न हुआ।

केवल 19 वर्ष की आयु में
उन्होंने दण्डक्रम वेद पारायण के अंतर्गत—
🔱 25 लाख से अधिक पदों का
🔱 लगातार 50 दिनों तक
🔱 बिना ग्रंथ देखे, पूर्णत: त्रुटिरहित पारायण
कर पूरे सनातन धर्म और वेद-परंपरा को विश्व–मंच पर गौरवान्वित किया।

इस पावन अवसर पर
पूज्य श्री डॉ. दिव्यचेतन ब्रह्मचारी गुरु जी के कर-कमलों से
🌺 चाँदी की हनुमान चालीसा
🌺 भगवान श्रीराम का विग्रह
🌺 माँ भगवती के चंदन-इत्र प्रसाद
समर्पित कर दिव्य आशीर्वाद प्रदान किया गया।

इसी अतुलनीय उपलब्धि पर
श्रृंगेरी शारदा पीठ के
जगद्गुरु श्री शंकराचार्य जी की ओर से—
🌟 स्वर्ण कड़ा
🌟 ₹1,00,000 की आशीर्वाद-राशि
भी प्रदान की गई—
जो इस दिव्य बालक की साधना, श्रम और वेदनिष्ठा का उज्ज्वल प्रमाण है।

आज इसी दिव्य क्रम में
देवव्रत जी को—
🌟 रजत गदा
🌟 रजत मुकुट
🌟 स्वर्ण कड़ा
भी प्राप्त हुए, जो उनके अद्वितीय वैदिक पुरुषार्थ का अलौकिक सम्मान है।

और विशेष उल्लेखनीय यह कि—
चि. देवव्रत महेश रेखे घनपाठी जी को आज काशी में
‘वल्लभराम शालिग्राम साङ्गवेद विद्यालय’ में
अनेक विद्वानों की पावन उपस्थिति में विधिवत् सम्मानित किया गया।
जहाँ विद्या, तप और परंपरा का दिव्य संगम अवतरित हुआ।

यह केवल सम्मान नहीं—
सनातन वेद संस्कृति का पुनः विश्व–विजय घोष है।

🚩🚩 हर हर महादेव 🚩🚩

ादेव #देवव्रत_महेश_रेखे #दण्डक्रम_वेद_पारायण
#चिदेवव्रत_घनपाठी #डॉ_दिव्यचेतन_ब्रह्मचारी_गुरुजी
#शृंगेरी_शारदापीठ #जगद्गुरु_शंकराचार्य

Vidyalay

फाइलें तो चलीं, पर राजस्थान आगे ना बढ़ा-जब सुधांशु पंत राजस्थान के मुख्य सचिव बने, तब उम्मींद थी कि अब प्रदेश में बड़े सु...
20/11/2025

फाइलें तो चलीं, पर राजस्थान आगे ना बढ़ा-

जब सुधांशु पंत राजस्थान के मुख्य सचिव बने, तब उम्मींद थी कि अब प्रदेश में बड़े सुधार होंगे। प्रधानमंत्री कार्यालय की तरफ़ से भी साफ संकेत था कि यह समय सिर्फ कागज़ी काम करने का नहीं, बल्कि राज्य को बदलने का है। राजनीतिक हालात भी कमजोर थे, तो ऐसे में नौकरशाही के पास बहुत मौका था कि वो कुछ नया करे।

पंत साहब, जो अपने सख्त प्रशासन और अनुशासन के लिए जाने जाते हैं, उन्होंने दफ्तरों में थोड़ी व्यवस्था तो जरूर कर दी—
• अफसर-कर्मचारी समय पर आने लगे,
• फाइलें जल्दी निपटने लगीं,
• जवाबदेही का माहौल थोड़ा वापस आ गया।

पर उनकी काम करने की शैली बस यहीं तक सीमित रह गई। उन्होंने सिस्टम को साफ-सुथरा बनाया, पर आगे बढ़ाने की बड़ी सोच नहीं दिखाई।

राजस्थान को इस समय पानी की सुरक्षा, उद्योगों को बढ़ावा देने, और शहरों को नए तरीके से विकसित करने जैसी बड़ी-बड़ी नीतियों की जरूरत थी। परंतु इन मुद्दों पर कोई बड़ी दिशा नहीं दी गई। मतलब, काम तो हुआ—but सिर्फ दफ्तर के अंदर; राज्य के विकास के लिए बड़ी योजना नहीं बनी।

2024 में प्रधानमंत्री ने साफ कहा था—
“अफसर की कोई पार्टी नहीं होती, उसका काम होता है प्रदर्शन।”
पंत राजनीतिक रूप से तो निष्पक्ष रहे, लेकिन बड़े बदलाव लाने वाले नेता नहीं बन पाए।

राजस्थान में पहले भी कई अफसरों ने सुधारों में बड़ी भूमिका निभाई है—
• सिंचाई सुधार,
• सौर ऊर्जा नीति,
• खनन क्षेत्र में बदलाव—
इन सबके पीछे दूरदर्शी अधिकारी थे।

लेकिन पंत साहब ज़्यादा तर एक "देखभाल करने वाले अफसर" ही बने रहे, "नयी सोच वाले नेता" नहीं।

नतीजा यह हुआ कि राजस्थान आज भी वहीं का वहीं खड़ा है—किसी ऐसे अधिकारी की इंतज़ार में जो सिस्टम संभालने के साथ-साथ बड़े सपने भी देख सके और उन्हें पूरा कर सके।

पंत का कार्यकाल स्थिरता वाला तो था, लेकिन दिशा वाला नहीं।
फाइलें चलीं, पर राज्य आगे ना बढ़ पाया।

#ब्यूरोक्रेसी

19/11/2025

बहुत सुंदर !! पीयूषजी
अत्यन्त मनोयोग से प्रस्तुति, मधुर कण्ठ, सधा हुआ स्वर, आत्मा तृप्त हो गई। बहुत वर्षों बाद एक युवा के द्वारा गाया हुआ काव्य गीत मन को भावविभोर कर गया। मै प्रसन्न हूं, संघ के पास नई पीढ़ी में भी इतने श्रेष्ठ गीत गायक हैं।

ना जायदाद, ना ख़ानदानी नाम…बस एक ही हथियार है — किताबें 📚                                                  Adv Arjun Cha...
28/09/2025

ना जायदाद, ना ख़ानदानी नाम…
बस एक ही हथियार है — किताबें 📚
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