04/09/2024
एक शहर (गाँव) सा
जिसमें मैं रहता हूं मेरा अपना शहर (गाँव)बहुत ही खूबसूरत, जहां जिंदगी हसीन और सुखद होती थी, जहां तालाब लबालब भरे होते थे कुएं भरे होते थे शुद्ध जमीनी जल स्रोत का जलस्तर बहुत ऊपर होता था ,बिजली यदा कदा जाती थी, बिजली का बिल सहन करने योग्य था, गैस की सुविधा के साथ साथ वैकल्पिक सुविधा भी उपलब्ध थी केरोसीन, कोयला ,उपले (गोबर के कंडे) भरपूर उपलब्ध थे, असानी से गली मोहल्ले की दुकानों पर मिलते जाते थे , पिता जी की 100 रुपये की कमाई में सभी सुविधाएँ मिल जाती थी शिक्षा निशुल्क या फिर बहुत ही कम फीस में उपलब्ध हो जाती थी, गुरु जी पूरी रुचि लेते थे बच्चों में बिना किसी भेदभाव के, शैतान और कमजोर बच्चों पर बहुत ध्यान देते थे उनपर पिता समान हक था ईश्वर तुल्य थे गुरुजन
फिर बदलाव की स्मार्ट सिटी की आँधी चली बहुत तरक्की हुयी, कुएं सुख गए या पाट दिए गए ट्यूबवेल लगे ज़मीनी जलस्त्रोत का स्तर गिरने लगा साथ ही साथ मानवता का स्तर भी, सड़के बनी सुविधा के नाम पर भ्रष्टाचार का खेल प्रारंभ हुआ, प्राइवेट स्कूल खोले गए उच्च शिक्षा के नाम पर ज्ञान का व्यापार शुरू हुआ, गुरु जी बिजनेसमैन बन गए, नगरपालिका बनी राजनेताओं ने झोला बड़ा पहनना शुरू किया हसरतें बड़ी,मानवता का स्थान पैसों ने ले लिया नेताजी का रुपये पैसे का खेल शुरु हुआ ,सुधार और तरक्की के नाम पर, हुयीं तरक्की नेताओं के फार्म हाऊस, होटल बंगलों का निर्माण हो गया वो भी आलिशान विदेशी साज सामान के साथ, अब बारी आयी समाज सुधारक की, उन्होंने अपने अपने जातीय समूहों का गठन कर लिया प्रेम प्यार भाइचारे का दम घोंट दिया, शहर (गाँव) के रक्त धमनियों (सड़कों) पर छाले पड़ गये उनमे केंसर ने जन्म लिया उनका झोला छाप डॉक्टर (ठेकेदार) उनका इलाज करने के नाम पर अपनी और अपने आकाओं की जेब भरने लगा, सरकारी मेहकमा बर्बाद दर्शाने लगा पर कर्मचारी बड़ी गाड़ियों में घूमने लगा उनकी आलिशान जिंदगी हो गई,.....
आज इतना ही.....जल्द ही लगातार
गुलजीत सिंह छाबड़ा एडवोकेट
98290u1792