Advocate Akhil Mishra , Jaipur

Advocate Akhil Mishra , Jaipur Ra

RAJASTHAN JUNIOR LEGAL OFFICER J.L.O 2025 NOTIFICATION OUT
19/08/2025

RAJASTHAN JUNIOR LEGAL OFFICER J.L.O 2025 NOTIFICATION OUT

Rjs 2025 pre result out
19/08/2025

Rjs 2025 pre result out

27/02/2025

RJS 2025 NOTIFICATION FOR 44 POST OUT

08/05/2024

1 जुलाई 2024 से समाप्त हो जायेंगी साधारण मारपीट और गाली-गलौच करने पर लगने वाली IPC अर्थात भारतीय दंड संहिता की धारा 323,294 और 506(b)-

आज शाम चार बजे की बात है मैं किसी काम से बाजार जा रहा था/या बैठा था दो लोग या चार लोग आये जो मुझे गाली देने लगे मैंने गाली देने से मना किया तो मेरे साथ लात घूसों और मुक्के से मारपीट करने लगे झगड़ा होते देख वहां कुछ लोग आ गए जिन्होंने मुझे बचाया, जाते-जाते वो लोग कह रहे थे कि अगर पुलिस में रिपोर्ट करने गए तो जान से खत्म कर देंगे,घटना इन्होने इन्होने देखी है, सो रिपोर्ट करता हूँ कार्यवाही की जाये अक्सर साधारण मारपीट और गाली गलौज के मामलों में इस तरह की FIR दर्ज कराई जाना देखने को मिलती हैं और इसके बाद आहत व्यक्ति द्वारा रिपोर्ट करने पर पुलिस IPC की धारा 294,323 और 506(b) के तहत मुकदमा दर्ज कर लेती है,

अक्सर हमने मोहल्ले पड़ोस और गाँव देहातों या किसी कॉलोनी में हुए लड़ाई झगड़े और साधारण मारपीट के मामलों में IPC की धारा 323 294 और 506 (b )के अंतर्गत मुकदमे दर्ज होते देखे होंगे,सामान्य तौर पर हम सभी सामान्य बोलचाल की भाषा में जानते हैं कि किसी व्यक्ति को साधारण उपहति अर्थात चोट पहुंचाने पर IPC अर्थात भारतीय दंड संहिता की धारा 323, उसके साथ सार्वजानिक स्थान पर गाली गलौच करने पर IPC की धारा 294 एवं उसको जान से मारने की धमकी देने पर IPC की धारा 506(b) आकर्षित होती है।

चूँकि ये सभी जमानतीय अपराध हैं अतः आरोपी तात्कालिक रूप से दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 436 के प्रावधानों के अनुसार आसानी से जमानत पर छूट जाया करते हैं हालाकि बाद में कठोर परीक्षण एवं सम्पूर्ण ट्रायल से गुजरने के दौरान अंततः दोषी व्यक्ति को उचित दंड भी भुगतना पड़ता है।

सामान्यत: हम सभी यह जानते हैं की किसी व्यक्ति को उपहति कारित करने अर्थात साधारण चोट पहुंचाने पर IPC की धारा 323 के तहत एक वर्ष तक का साधारण/या कठोर कारावास तथा एक हजार रु.(1000-₹) तक के जुर्माने से दण्डित किये जाने का प्रावधान है,वहीं पब्लिक प्लेस अर्थात लोक स्थान पर अश्लील शब्दों का उच्चारण या ऐसी गाली गलौच करने पर जिससे सुनने वाले व्यक्ति को क्षोभ हो IPC की धारा 294 के अंतर्गत 3 महीने के कारावास या जुर्माने से दण्डित किये जाने का प्रावधान है और साथ ही किसी आदमी को जान से मारने या गंभीर रूप से घायल करने की धमकी देने अर्थात अभित्रास कारित करने पर पर सात साल तक की जेल और जुर्माने का प्रावधान है।

परंतु 1 जुलाई 2024 से सम्पूर्ण भारतवर्ष में भारतीय न्याय संहिता लागू होने के उपरांत ये तीनों ही धाराएँ अब कल की बात हो जायेंगी अर्थात जो उपहति कारित करने से सम्बंधित अपराध धारा 323 में दण्डनीय था वह अब भारतीय न्याय संहिता की धारा 115 के दूसरे खंड अर्थात 115(2) में एक वर्ष के कारावास और दस हजार रूपये तक के जुर्माने से दण्डनीय होगा,याद रहे अभी तक भारतीय दंड संहिता में इस जुर्माने की रकम मात्र ₹1000 तक थी वहीं न्याय संहिता की इसी धारा की उपधारा (1) अर्थात धारा 115(1) में उपहति को परिभाषित किया गया है।

ठीक इसी तरह जो लोक स्थान पर गाली-गलौच और अश्लील शब्दों को उच्चारित करने सम्बंधित अपराध करने पर जो दंड IPC की धारा 294 में निर्धारित किया गया था वही अब भारतीय न्याय संहिता की धारा 296 में देखने को मिलेगा जो पूर्व की ही तरह 3 महीने तक के कारावास और एक हजार रु. (1000₹) तक के जुर्माने का होगा।

इसी तरह किसी को जान से मारने या घायल करने की धमकी अर्थात अभित्रास कारित करने पर जो IPC की धारा 506(b)में दण्डित किये जाने का प्रावधान था वह अब भारतीय न्याय संहिता की धारा 351 के भाग(3) अर्थात धारा 351(3) में देखने को मिलेगा वहीं आपराधिक अभित्रास की परिभाषा 351(1) और साधारण अभित्रास का दंड 351(2) में देखने मिलेगा जो दो वर्ष का कारावास या जुर्माना या दोनों होगा।

याद रखें इन तीनों ही धाराओं के तहत किया गया कोई अपराध पूर्व की तरह किसी भी मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय रहेगा परंतु 351(3) अर्थात जान से मारने या गंभीर रूप से घायल करने की धमकी देने के संबंध में दिया गया कोई आपराधिक अभित्रास का अपराध प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट के यहाँ ही विचारणीय होगा, बताते चलें कि इन तीनों ही धाराओं के तहत किए गए अपराध पहले के ही जैसे जमानतीय अपराधों की श्रेणी में रखे गए हैं अर्थात इन अपराधों के अंतर्गत कोई मुकदमा दर्ज हो जाने पर आरोपी द्वारा न्यायालय से जमानतदार प्रस्तुत करने के उपरांत न्यायालय से जमानत कराई जा सकती है।

अगर देखा जाये तो यहाँ पर यह भी याद रखने योग्य तथ्य है कि भारतीय न्याय संहिता की धारा 115(1) एवं 351(3) के अंतर्गत किये गए अपराध राजीनामा योग्य अर्थात शमनीय होंगे परंतु धमकी अर्थात अभित्रास देने सम्बंधित अपराध धारा 296 के तहत अशमनीय अर्थात गैर राजीनामा योग्य होगा हालांकि ये बात अलग है कि बाकी धाराओं में समझौता होने के उपरांत धारा 296 में भी फरियादी अर्थात शिकायतकर्ता के बयान पलटवाकर पूरे मामले को ही समाप्त कर दिया जाये तो पूरा केस स्वतः ही खत्म हो जाएगा, परंतु अगर फरियादी/घायल/आहत/शिकायतकर्ता जिसने एफ.आई.आर की है अगर समझौते को तैयार ना हुआ न्यायालय अपना फैसला सुनाने के लिए स्वतंत्र है और आरोपी ऊपर दी गई धाराओं में बताई गई सजा भुगतने के लिए।

इस तरह हम कह सकते हैं कि धारा (323,294 और 506(b) के नाम से जाने वाली धाराएँ अब 1 जुलाई 2024 से धारा 323 की जगह धारा 115(2),धारा 294 की जगह धारा 296 और धारा 506(b) की जगह 351(3) के नाम से अर्थात 115(2),294 और 351(3) के नाम से जानी जाएंगी।

Ranks in police department
17/08/2023

Ranks in police department

13/08/2023

*_Zero FIR =अब हर थाने में हो सकेगी एफ आई आर , जीरो एफ आई आर कानूनी प्रावधान होगी , एफ आई आर कहीं भी किसी भी थाने में दर्ज कराई/हो सकेगी ।_*
अब ई एफ आई आर कानूनी प्रावधान होगी और हर थाने में ई एफ आई आर दर्ज होगी, एक अधिकारी हर थाने में ई एफ आई आर के लिये और हर कानूनी आनलाइन काम के लिये नियुक्त किया जायेगा ।
अब एफ आई आर , केस डायरी, रोजनामचा, विवेचना, चालान आदि सभी आनलाइन होंगे / अनिवार्य होंगें । आनलाइन पुलिस कार्य बढ़ाया जायेगा , अब पेपर लेस पुलिस और थाने होंगें ।
Pendency of court case --अब 3 साल से ज्यादा कोई भी कोर्ट में केस नहीं चलेगा , अधिकतम 3 साल के भीतर केस का फैसला करना अनिवार्य , हर फैसला अधिकतम 7 दिन के भीतर आनलाइन अपलोड करना अनिवार्य होगा ।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, जो CrPC को रिप्लेस करेगी, में अब 533 धाराएं रहेंगी, 160 धाराओं को बदल दिया गया है , 9 नई धाराएं जोड़ी गई हैं और 9 धाराओं को निरस्त किया गया है
भारतीय न्याय संहिता, जो IPC को रिप्लेस करेगी, में पहले की 511 धाराओं के स्थान पर अब 356 धाराएं होंगी, 175 धाराओं में बदलाव किया गया है, 8 नई धाराएं जोड़ी गई हैं और 22 धाराओं को निरस्त किया गया है
भारतीय साक्ष्य विधेयक, जो Evidence Act को रिप्लेस करेगा, में पहले की 167 के स्थान पर अब 170 धाराएं होंगी, 23 धाराओं में बदलाव किया गया है, 1 नई धारा जोड़ी गई है और 5 धाराएं निरस्त की गई हैं
ये तीनों पुराने कानून गुलामी की निशानियों से भरे हुए थे, इन्हें ब्रिटेन की संसद ने पारित किया था, कुल 475 जगह ग़ुलामी की इन निशानियों को समाप्त कर आज हम नए कानून लेकर आए हैं
कानून में दस्तावेज़ों की परिभाषा का विस्तार कर इलेक्ट्रॉनिक या डिजिटल रिकॉर्ड्स, ई-मेल, सर्वर लॉग्स, कम्प्यूटर, स्मार्ट फोन, लैपटॉप्स, एसएमएस, वेबसाइट, लोकेशनल साक्ष्य, डिवाइस पर उपलब्ध मेल, मैसेजेस को कानूनी वैधता दी गई है
FIR से केस डायरी, केस डायरी से चार्जशीट और चार्जशीट से जजमेंट तक की सारी प्रक्रिया को डिजिटलाइज़ करने का प्रावधान इस कानून में किया गया है
सर्च और ज़ब्ती के वक़्त वीडियोग्राफी को कंपल्सरी कर दिया गया है जो केस का हिस्सा होगी और इससे निर्दोष नागरिकों को फंसाया नहीं जा सकेगा, पुलिस द्वारा ऐसी रिकॉर्डिंग के बिना कोई भी चार्जशीट वैध नहीं होगी
पहली बार ई-FIR का प्रावधान जोड़ा जा रहा है, हर ज़िले और पुलिस थाने में एक ऐसा पुलिस अधिकारी नामित किया जाएगा जो गिरफ्तार किए गए व्यक्ति के परिवार को उसकी गिरफ्तारी के बारे में ऑनलाइन और व्यक्तिगत रूप से सूचना करेगा

यौन हिंसा के मामले में पीड़ित का बयान कंपल्सरी कर दिया गया है और यौन उत्पीड़न के मामले में बयान की वीडियो रिकॉर्डिंग भी अब कंपल्सरी कर दी गई है
पुलिस को 90 दिनों में शिकायत का स्टेटस और उसके बाद हर 15 दिनों में फरियादी को स्टेटस देना कंपल्सरी होगा
पीड़ित को सुने बिना कोई भी सरकार 7 वर्ष या उससे अधिक के कारावास का केस वापस नहीं ले सकेगी, इससे नागरिकों के अधिकारों की रक्षा होगी
छोटे मामलों में समरी ट्रायल का दायरा भी बढ़ा दिया गया है, अब 3 साल तक की सज़ा वाले अपराध समरी ट्रायल में शामिल हो जाएंगे, इस अकेले प्रावधान से ही सेशन्स कोर्ट्स में 40 प्रतिशत से अधिक केस समाप्त हो जाएंगे
आरोप पत्र दाखिल करने के लिए 90 दिनों की समयसीमा तय कर दी गई है और परिस्थिति देखकर अदालत आगे 90 दिनों की परमीशन और दे सकेंगी, इस प्रकार 180 दिनों के अंदर जांच समाप्त कर ट्रायल के लिए भेज देना होगा
कोर्ट अब आरोपित व्यक्ति को आरोप तय करने का नोटिस 60 दिनों में देने के लिए बाध्य होंगे, बहस पूरी होने के 30 दिनों के अंदर माननीय न्यायाधीश को फैसला देना होगा, इससे सालों तक निर्णय पेंडिंग नहीं रहेगा और फैसला 7 दिनों के अंदर ऑनलाइन उपलब्ध कराना होगा

सिविल सर्वेंट या पुलिस अधिकारी के विरूद्ध ट्रायल के लिए सरकार को 120 दिनों के अंदर अनुमति पर फैसला करना होगा वरना इसे डीम्ड परमीशन माना जाएगा और ट्रायल शुरू कर दिया जाएगा
घोषित अपराधियों की संपत्ति की कुर्की का भी प्रावधान लेकर आए हैं, अंतरराज्यीय गिरोह और संगठित अपराधो के विरूद्ध अलग प्रकार की कठोर सज़ा का नया प्रावधान भी इस कानून में जोड़ा जा रहा है
शादी, रोज़ग़ार और पदोन्नति के झूठे वादे और गलत पहचान के आधार पर यौन संबंध बनाने को पहली बार अपराध की श्रेणी में लाया गया है, गैंग रेप के सभी मामलों में 20 साल की सज़ा या आजीवन कारावास का प्रावधान किया गया है
18 वर्ष से कम आयु की बच्चियों के साथ अपराध के मामले में मृत्यु दंड का भी प्रावधान रखा गया है, मॉब लिंचिग के लिए 7 साल, आजीवन कारावास और मृत्यु दंड के तीनों प्रावधान रखे गए है

मोबाइल फोन या महिलाओं की चेन की स्नेचिंग के लिए कोई प्रावधान नहीं था, लेकिन अब इसके लिए भी प्रावधान रखा गया ह
हमेशा के लिए अपंगता आने या ब्रेन डेड होने की स्थिति में 10 साल या आजीवन कारावास की सज़ा का प्रावधान किया गया है
बच्चों के साथ अपराध करने वाले व्यक्ति के लिए सज़ा को 7 साल से बढ़ाकर 10 वर्ष कर दिया गया है, अनेक अपराधों में जुर्माने की राशि को भी बढ़ाने का प्रावधान किया गया है
सज़ा माफी को राजनीतिक फायदे के लिए उपयोग करने के कई मामले देखे जाते थे, अब मृत्यु दंड को आजीवन कारावास, आजीवन कारावास को कम से कम 7 साल की सज़ा और 7 साल के कारावास को कम से कम 3 साल तक की सज़ा में ही बदला जा सकेगा और किसी भी गुनहगार को छोड़ा नहीं जाएगा
राजद्रोह को पूरी तरह से समाप्त करने जा रही है क्योंकि भारत में लोकतंत्र है और सबको बोलने का अधिकार है
पहले आतंकवाद की कोई व्याख्या नहीं थी, अब सशस्त्र विद्रोह, विध्वंसक गतिविधियां, अलगाववाद, भारत की एकता, संप्रभुता और अखंडता को चुनौती देने जैसे अपराधों की पहली बार इस कानून में व्याख्या की गई है
अनुपस्थिति में ट्रायल के बारे में एक ऐतिहासिक फैसला किया है, सेशन्स कोर्ट के जज द्वारा भगोड़ा घोषित किए गए व्यक्ति की अनुपस्थिति में ट्रायल होगा और उसे सज़ा भी सुनाई जाएगी, चाहे वो दुनिया में कहीं भी छिपा हो, उसे सज़ा के खिलाफ अपील करने के लिए भारतीय कानून और अदालत की शरण में आना होगा
कानून में कुल 313 बदलाव किए गए हैं जो हमारे क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम में एक आमूलचूल परिवर्तन लाएंगे और किसी को भी अधिकतम 3 वर्षों में न्याय मिल सकेगा।
इस कानून में महिलाओं और बच्चो का विशेष ध्यान रखा गया है, अपराधियों को सज़ा मिले ये सुनिश्चित किया गया है और पुलिस अपने अधिकारों का दुरुपयोग ना कर सके, ऐसे प्रावधान भी किए गए है
एक तरफ राजद्रोह जैसे कानूनों को निरस्त किया गया है, दूसरी ओर धोखा देकर महिला का शोषण करने और मॉब लिंचिग जैसे जघन्य अपराधों के लिए दंड का प्रावधान और संगठित अपराधों और आतंकवाद पर नकेल कसने का काम भी किया है
आज भारतीय न्याय संहिता, 2023, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 और भारतीय साक्ष्य विधेयक, 2023 लोक सभा में चर्चा के लिए रखे।
इन तीनों विधेयकों में क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम के लिए मूलभूत कानून हैं। उन्होंने कहा कि इंडियन पीनल कोड, 1860, क्रिमिनल प्रोसीजर कोड, (1898), 1973 और इंडियन एवीडेंस एक्ट, 1872 में अंग्रेज़ों द्वारा बनाए गए और अंग्रेज़ी संसद द्वारा पारित किए गए इन तीनों कानूनों को समाप्त कर आज हम तीनों नए कानून लाए हैं। इंडियन पीनल कोड, 1860 की जगह भारतीय न्याय संहिता, 2023 स्थापित होगा, क्रिमिनल प्रोसीजर कोड, 1898 की जगह अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 और इंडियन एवीडेंस एक्ट, 1872 की जगह भारतीय साक्ष्य विधेयक, 2023 स्थापित होगा। समाप्त होने वाले ये तीनों कानून अंग्रेज़ी शासन को मज़बूत करने और उसकी रक्षा करने के लिए बनाए गए थे और उनका उद्देश्य दंड देने का था, न्याय देने का नहीं था, इन दोनों मूलभूत चीज़ों को हम परिवर्तन करने जा रहे हैं। इन तीनों कानूनों को रिप्लेस कर आने वाले तीन नए कानूनों की आत्मा होगी, भारतीय नागरिकों को संविधान द्वारा दिए गए सभी अधिकारों की रक्षा करना। इन कानूनों का उद्देश्य किसी को दंड देना नहीं बल्कि न्याय देना होगा और इस प्रक्रिया में दंड वहीं दिया जाएगा, जहां अपराध रोकने की भावना पैदा करने की ज़रूरत है।
1860 से 2023 तक अंग्रेज़ी संसद द्वारा बनाए गए कानूनों के आधार पर इस देश का क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम चलता रहा, अब इन तीनों कानूनों की जगह भारतीय आत्मा के साथ ये तीन कानून स्थापित होंगे जिससे हमारे क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम में बहुत बड़ा परिवर्तन आएगा। उन्होंने कहा कि अभी के कानूनों में मानव हत्या या स्त्री के साथ दुराचार जैसे जघन्य अपराधों को बहुत नीचे रखा गया और राजद्रोह, खजाने की लूट शासन के अधिकारी पर हमले जैसे अपराधों को इनसे ऊपर रखा गया। इस अप्रोच को हम बदल रहे हैं और इन नए कानूनों में सबसे पहला चैप्टर महिलाओं और बच्चों के साथ अपराध पर होगा। दूसरा चैप्टर मानव वध और मानव शरीर के साथ होने वाले अपराधों पर होगा। हम शासन की जगह नागरिक को केन्द्र में लाने का बहुत बड़ा सैद्धांतिक निर्णय कर ये कानून लाए, इन कानूनों को बनाने के पीछे बहुत लंबी प्रक्रिया रही है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री ने 2019 में हम सबका मार्गदर्शन किया था कि अंग्रेज़ों के समय के बनाए गए जितने भी कानून जिस विभाग में भी हैं, उन पर पर्याप्त चर्चा और विचार कर आज के समय के अनुरूप और भारतीय समाज के हित में बनाना चाहिए। उन्होंने कहा कि इन कानूनों को बनाने के लिए हर जगह व्यापक कंसल्टेशन किया गया है।अगस्त, 2019 में सर्वोच्च न्यायालय के सभी न्यायाधीशों, देश के सभी उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों और देश के सभी कानून विश्वविद्यालयों को पत्र लिखे थे। वर्ष 2020 में सभी सांसदों, मुख्यमंत्रियों, राज्यपालों और संघशासित प्रदेशों के प्रशासकों को पत्र लिखे गए। इसके बाद व्यापक कंसल्टेशन के बाद आज ये प्रक्रिया कानून बनने जा रही है। उन्होंने कहा कि 18 राज्यों, 6 संघशासित प्रदेशों, सुप्रीम कोर्ट, 16 हाई कोर्ट, 5 न्यायिक अकादमी, 22 विधि विश्वविद्यालय, 142 सांसद, लगभग 270 विधायकों और जनता ने इन नए कानूनों पर अपने सुझाव दिए हैं। श्री शाह ने कहा कि 4 सालों तक इन पर गहन विचार विमर्श किया गया है और वे स्वयं 158 बैठकों में उपस्थित रहे हैं।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, जो CrPC को रिप्लेस करेगी, में अब 533 धाराएं रहेंगी, 160 धाराओं को बदल दिया गया है , 9 नई धाराएं जोड़ी गई हैं और 9 धाराओं को निरस्त किया गया है। भारतीय न्याय संहिता, जो IPC को रिप्लेस करेगी, में पहले की 511 धाराओं के स्थान पर अब 356 धाराएं होंगी, 175 धाराओं में बदलाव किया गया है, 8 नई धाराएं जोड़ी गई हैं और 22 धाराओं को निरस्त किया गया है। भारतीय साक्ष्य विधेयक, जो Evidence Act को रिप्लेस करेगा, इसमें पहले की 167 के स्थान पर अब 170 धाराएं होंगी, 23 धाराओं में बदलाव किया गया है, एक नई धारा जोड़ी गई है और 5 धाराएं निरस्त की गई हैं। ये तीनों पुराने कानून गुलामी की निशानियों से भरे हुए थे, इन्हें ब्रिटेन की संसद ने पारित किया था और हमने सिर्फ इन्हें अडॉप्ट किया था। इन कानूनों में पार्लियामेंट ऑफ यूनाइटेड किंगडम, प्रोविंशियल एक्ट, नोटिफिकेशन बाई द क्राउन रिप्रेज़ेन्टेटिव, लंदन गैज़ेट, ज्यूरी और बैरिस्टर, लाहौर गवर्नमेंट, कॉमनवेल्थ के प्रस्ताव, यूनाइटेड किंगडम ऑफ ग्रेट ब्रिटेन एंड आयरलैंड पार्लियामेंट का ज़िक्र है। इन कानूनों में हर मैजेस्टी और बाइ द प्रिवी काउंसिल के रेफेरेंस दिए गए हैं, कॉपीज़ एंड एक्सट्रैक्ट्स कंटेट इन द लंदन गैज़ेट के आधार पर इन कानूनों को बनाया गया है, पज़ेशन ऑफ द ब्रिटिश क्राउन, कोर्ट ऑफ जस्टिस इन इंग्लैंड और हर मैजेस्टी डॉमिनियन्स का भी ज़िक्र इन कानूनों में कई स्थानों पर है। उन्होंने कहा कि कुल 475 जगह ग़ुलामी की इन निशानियों को समाप्त कर आज हम नए कानून लेकर आए हैं। इन कानूनों से हमने नए युग को भी जोड़ने का प्रयास किया है। हमारे क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम में बहुत समय लगता है, न्याय इतनी देर से मिलता है कि न्याय का कोई मतलब ही नहीं रह जाता है, लोगों की श्रद्धा उठ गई है और अदालत में जाने से डरते हैं।
इन कानूनों में अत्याधुनिकतम तकनीकों को समाहित किया गया है। दस्तावेज़ों की परिभाषा का विस्तार कर इलेक्ट्रॉनिक या डिजिटल रिकॉर्ड्स, ई-मेल, सर्वर लॉग्स, कम्प्यूटर, स्मार्ट फोन, लैपटॉप्स, एसएमएस, वेबसाइट, लोकेशनल साक्ष्य, डिवाइस पर उपलब्ध मेल और मैसेजेस को कानूनी वैधता दी गई है, जिनसे अदालतों में लगने वाले कागज़ों के अंबार से मुक्ति मिलेगी। एफआईआर से केस डायरी, केस डायरी से चार्जशीट और चार्जशीट से जजमेंट तक की सारी प्रक्रिया को डिजिटलाइज़ करने का प्रावधान इस कानून में किया गया है। अभी सिर्फ आरोपी की पेशी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से हो सकती है, लेकिन अब पूरा ट्रायल, क्रॉस क्वेश्चनिंग (cross questioning) सहित, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से होगा। शिकायतकर्ता और गवाहों का परीक्षण, जांच-पड़ताल और मुक़दमे में साक्ष्यों की रिकॉर्डिंग और उच्च न्यायालय के मुक़दमे और पूरी अपीलीय कार्यवाही भी अब डिजिटली संभव होगी। हमने नेशनल फॉरेंसिक साइंस यूनिवर्सिटी और इस विषय के देशभर के विद्वानों और तकनीकी एक्सपर्ट्स के साथ चर्चा कर इसे बनाया है। सर्च और ज़ब्ती के वक़्त हमने वीडियोग्राफी को कंपल्सरी कर दिया है जो केस का हिस्सा होगी और इससे निर्दोष नागरिकों को फंसाया नहीं जा सकेगा। पुलिस द्वारा ऐसी रिकॉर्डिंग के बिना कोई भी चार्जशीट वैध नहीं होगी।
हमारा दोष सिद्धि का प्रमाण बहुत कम है, इसीलिए फॉरेंसिक साइंस को हमने बढ़ावा देने का काम किया है, नेशनल फॉरेंसिक साइंस यूनिवर्सिटी बनाने का एक ऐतिहासिक निर्णय लिया है। तीन साल के बाद हर साल 33 हज़ार फॉरेंसिक साइंस एक्सपर्ट्स और साइंटिस्ट्स देश को मिलेंगे। इस कानून में हमने लक्ष्य रखा है कि दोष सिद्धि के प्रमाण (Conviction Ratio) को 90 प्रतिशत से ऊपर लेकर जाना है। इसके लिए एक महत्वपूर्ण प्रावधान किया गया है कि 7 वर्ष या इससे अधिक सज़ा वाले अपराधों के क्राइम सीन पर फॉरेंसिक टीम की विज़िट को कंपल्सरी किया जा रहा है। इसके माध्यम से पुलिस के पास एक वैज्ञानिक साक्ष्य होगा जिसके बाद कोर्ट में दोषियों के बरी होने की संभावना बहुत कम हो जाएगी। वर्ष 2027 से पहले देश की सभी अदालतों को कंप्यूटराइज़्ड कर देंगे। इसी प्रकार मोबाइल फॉरेंसिक वैन का भी अनुभव किया जा चुका है। दिल्ली में हमने एक सफल प्रयोग किया है कि 7 वर्ष से अधिक सज़ा के प्रावधान वाले किसी भी अपराध के स्थल को एफएसएल टीम विज़िट करती है। इसके लिए हमने मोबाइल एफएसएल के कॉन्सेप्ट को लॉंच किया है जो कि एक सफल कॉन्सेप्ट है और हर ज़िले में 3 मोबाइल एफएसएल रहेंगी और अपराध स्थल पर जाएंगी।
*_पहली बार ज़ीरो FIR को हम शुरू कर रहे हैं।_* अपराध कहीं भी हुआ हो उसे अपने थाना क्षेत्र के बाहर भी रजिस्टर किया जा सकेगा। अपराध रजिस्टर होने के 15 दिनों के अंदर संबंधित थाने को भेजना होगा। *_पहली बार हम _ई-एफआईआर का प्रावधान जोड़ रहे हैं।* हर ज़िले और पुलिस थाने में एक ऐसा पुलिस अधिकारी नामित किया जाएगा जो गिरफ्तार किए गए व्यक्ति के परिवार को उसकी गिरफ्तारी के बारे में ऑनलाइन और व्यक्तिगत रूप से सूचना देगा। यौन हिंसा के मामले में पीड़ित का बयान कंपल्सरी कर दिया गया है और यौन उत्पीड़न के मामले में बयान की वीडियो रिकॉर्डिंग भी अब कंपल्सरी कर दी गई है। पुलिस को 90 दिनों में शिकायत का स्टेटस और उसके बाद हर 15 दिनों में फरियादी को स्टेटस देना कंपल्सरी होगा। पीड़ित को सुने बिना कोई भी सरकार 7 वर्ष या उससे अधिक के कारावास का केस वापस नहीं ले सकेगी, इससे नागरिकों के अधिकारों की रक्षा होगी। पहली बार हम कम्युनिटी सर्विस को सज़ा के रूप में इस कानून में ला रहे हैं। छोटे मामलों में समरी ट्रायल का दायरा भी बढ़ा दिया गया है, अब 3 साल तक की सज़ा वाले अपराध समरी ट्रायल में शामिल हो जाएंगे, इस अकेले प्रावधान से ही सेशन्स कोर्ट्स में 40 प्रतिशत से अधिक केस समाप्त हो जाएंगे। आरोप पत्र दाखिल करने के लिए 90 दिनों की समयसीमा तय कर दी गई है और परिस्थिति देखकर अदालत आगे 90 दिनों की परमीशन और दे सकेंगी। इस प्रकार 180 दिनों के अंदर जांच समाप्त कर ट्रायल के लिए भेज देना होगा। कोर्ट अब आरोपित व्यक्ति को आरोप तय करने का नोटिस 60 दिनों में देने के लिए बाध्य होंगे। बहस पूरी होने के 30 दिनों के अंदर माननीय न्यायाधीश को फैसला देना होगा, इससे सालों तक निर्णय पेंडिंग नहीं रहेगा, और फैसला 7 दिनों के अंदर ऑनलाइन उपलब्ध कराना होगा।
सिविल सर्वेंट या पुलिस अधिकारी के विरूद्ध ट्रायल के लिए सरकार को 120 दिनों के अंदर अनुमति पर फैसला करना होगा वरना इसे डीम्ड परमीशन माना जाएगा और ट्रायल शुरू कर दिया जाएगा। हमने एक और बहुत बड़ा क्रांतिकारी बदलाव किया है जो पुलिस अधीक्षक (SP) अभी नौकरी कर रहा है वो ही फाइल देखकर गवाही देगा, जो पहले था उसे आने की ज़रूरत नहीं होगी, जिससे गवाही जल्द होगी और न्याय भी जल्द हो सकेगा। इसक् अलावा, घोषित अपराधियों की संपत्ति की कुर्की का भी प्रावधान लेकर आए हैं। अंतरराज्यीय गिरोह और संगठित अपराधो के विरूद्ध अलग प्रकार की कठोर सज़ा का नया प्रावधान भी हम इस कानून में जोड़ रहे हैं। महिलाओं के प्रति अपराध और सामाजिक समस्याओं के निपटारे के लिए भी कई प्रावधान किए हैं। पहली बार ऐसा प्रावधान किया गया कि शादी, रोज़ग़ार और पदोन्नति के झूठे वादे और गलत पहचान के आधार पर यौन संबंध बनाने को अपराध की श्रेणी में लाया गया है। गैंग रेप के सभी मामलों में 20 साल की सज़ा या आजीवन कारावास का प्रावधान किया है, जो आज अमल में नहीं है। 18 वर्ष से कम आयु की बच्चियों के मामले में मृत्यु दंड का भी प्रावधान रखा गया है। मॉब लिंचिग के लिए 7 साल, आजीवन कारावास और मृत्यु दंड के तीनों प्रावधान रखे गए हैं। मोबाइल फोन या महिलाओं की चेन की स्नेचिंग के लिए पहले कोई प्रावधान नहीं था, लेकिन अब इसके लिए भी प्रावधान रखा गया है।
गंभीर चोट के कारण निष्क्रियता की स्थिति और मामूली चोट लगने के मामले, दोनों में 7 साल की सज़ा का प्रावधान था, हमने दोनों को अलग कर दिया है। उन्होंने कहा कि हमेशा के लिए अपंगता या ब्रेन डेड होने की स्थिति में 10 साल या आजीवन कारावास की सज़ा का प्रावधान किया गया है। बच्चों के साथ अपराध करने वाले व्यक्ति के लिए सज़ा को 7 साल से बढ़ाकर 10 वर्ष कर दिया गया है। अनेक अपराधों में जुर्माने की राशि को भी बढ़ाने का प्रावधान किया गया है। हिरासत में से भाग जाने वाले अपराधियों के लिए भी 10 साल की सज़ा का प्रावधान है। सज़ा माफी को राजनीतिक फायदे के लिए उपयोग करने के कई मामले देखे जाते थे, अब मृत्यु दंड को आजीवन कारावास, आजीवन कारावास को कम से कम 7 साल की सज़ा और 7 साल के कारावास को कम से कम 3 साल तक की सज़ा में ही बदला जा सकेगा और किसी भी गुनहगार को छोड़ा नहीं जाएगा।
राजद्रोह को पूरी तरह से समाप्त करने जा रही है क्योंकि भारत में लोकतंत्र है और सबको बोलने का अधिकार है। पहले आतंकवाद की कोई व्याख्या ही नहीं होती थी, लेकिन अब अलगाव, सशस्त्र विद्रोह, विध्वंसक गतिविधियां, अलगाववाद, भारत की एकता, संप्रभुता और अखंडता को चुनौती देने जैसे अपराधों की पहली बार इस कानून में व्याख्या की गई है और इससे जुड़ी संपत्तियों को ज़ब्त करने का अधिकार भी दिया गया है। जांचकर्ता पुलिस अधिकारी के संज्ञान पर कोर्ट इसका आदेश देगा। अनुपस्थिति में ट्रायल के बारे में सेशन्स कोर्ट के जज द्वारा प्रक्रिया के बाद भगोड़ा घोषित किए गए व्यक्ति की अनुपस्थिति में ट्रायल होगा और उसे सज़ा भी सुनाई जाएगी, चाहे वो दुनिया में कहीं भी छिपा हो। उसे सज़ा के खिलाफ अपील करने के लिए भारतीय कानून और अदालत की शरण में आना होगा।
देशभर के पुलिस स्टेशनों में बड़ी संख्या में केस संपत्तियां पड़ी रहती हैं, इनकी वीडियोग्राफी करके सत्यापित प्रति कोर्ट में जमा करके इनका निपटारा किया जा सकेगा। उन्होंने कहा कि कानून में कुल 313 बदलाव किए गए हैं जो हमारे क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम में एक आमूलचूल परिवर्तन लाएंगे और किसी को भी अधिकतम 3 वर्षों में न्याय मिल सकेगा। श्री शाह ने कहा कि इस कानून में महिलाओं और बच्चो का विशेष ध्यान रखा गया है, अपराधियों को सज़ा मिले ये सुनिश्चित किया गया है और पुलिस अपने अधिकारों का दुरुपयोग ना कर सके, ऐसे प्रावधान भी किए गए हैं। एक तरफ राजद्रोह जैसे कानूनों को निरस्त किया गया है, दूसरी ओर धोखा देकर महिला का शोषण करने और मॉब लिंचिग जैसे जघन्य अपराधों के लिए दंड का प्रावधान और संगठित अपराधों और आतंकवाद पर नकेल कसने का काम भी किया है।

12/08/2023
12/08/2023

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