24/03/2025
==== दोस्त / मित्र FRiEND ====
- ‘पूर्ण’ से “सम्पूर्ण” की इबारत लिखी जाती है - दोस्ती में
By- शिवकुमार ‘अवार’ फ़ौजदार
MO.-8290123456
आज के समय में हर व्यक्ति कुशल, होशियार, बलवान, हैंडसम, पॉवरफूल, रसूख़दार, बुद्धिवान है, घर, गाड़ी, बंगला, शोहरत, शबाब, पद, पॉवर, प्रतिष्ठा, पैसा सब कुछ है, उसे ना किसी की ज़रूरत है और ना ही किसी के सहयोग की, उसे वैशाखी पर चलना मंज़ूर नहीं है। ना किसीका हस्तक्षेप चाहिए और ना ही कटाक्ष, उसके निर्णय से मानो सल्तनत चलती हो ..... वह अपने आप में “पूर्ण” है। फिर भी वह ‘सम्पूर्ण’ बनने की चाहत रखता है, घर किराए पर लेना है तो कई साथियों से पूछहेगा, गाड़ी लेनी है तो उसकी पेरफ़ोरमेंस पूछेगा, मोबाइल लेगा तो उसके फीचर्स पूछेगा, रिश्ता करेगा तो भी पूछेगा, ऑफ़िस के काम करेगा तो भी पूछेगा- फिर वो अपनेआप को ‘सर्वज्ञानी’ मानता है।
जीवन में एक ‘दोस्त’ होना ज़रूरी है, चाहे वह ख़ून के रिश्ते में हो भाई-बहन, माँ-बाप, जीवनसाथी, प्रेमी-प्रेमिका, नातेदार-रिश्तेदार, गुरु या आपके पितृज भी हो सकते हैं। आप ख़ुद ‘पूर्ण’ है और दोस्त के साथ ‘सम्पूर्ण’ हैं। पूर्ण से सम्पूर्ण की इबारत दोस्त से लिखी जाती है, उस जीवनसाथी, उस हम-सफ़र से गढ़ी जाती है, जिसका परिणाम हमेशा सार्थक होता है ....🌹माँ-बाप को बच्चों से दोस्ती कर लेनी चाहिए, इससे पहले कोई और दोस्ती कर ले.....
महाभारत में पाण्डव अपने आप में ‘पूर्ण ‘ थे, द्वारिकाधिश के बाद वो ‘सम्पूर्णता’ में गठित हुए और हर कठिनाई का सामना किया, पाण्डवों ने कभी कृष्ण जी पर आक्षेप-पटाक्षेप नहीं लगाए, उनकी किसी बात का अनादर नहीं किया और ना ही लाभ और हानि का श्रेय दिया ...बस उस नीतिकार और दूरदर्शीता की पटकथा पर चले और विजयश्री प्राप्त की, उनके हर सही और ग़लत के फ़ैसले को सर माथे लगाया और उनका बुद्धिबल काम में लेते हुए पाण्डवों ने अपना शौर्यबल काम में लिया और विजयश्री ‘पताका’ फहराई।
पाण्डवों ने ‘यज्ञ’ का आयोजन करना चाहा और अपना एकछत्र राज करने की इच्छा रखी तो उनकी यज्ञ में शक्तिशाली राजा ‘जरासन्ध’ बहुत बड़ी रुकावट थी, उसे झुकाना पृथ्वी पर किसी राजा के वश में नहीं था, ऐसे में उसको हराने से पहले उसकी ‘जन्मकुंडली’ अर्थात् इतिहास को कृष्णजी ने दोहराया कि उसका जन्म आधे आधे भाग में ऋषि द्वारा दिए गए आम के फल को दो रानियों को खिलाने से हुई उत्पत्ति थी, उन आधे शरीर वाले भ्रूण को फ़िकवा दिया और ‘ज़रा’ राक्षसनी ने जोड़ दिया और “ज़रासंध” का उद्भव हुआ। ऋषि का वेश रखकर जरासन्ध से मिले और ‘मलयुद्ध’ के लिए ललकारा। उसने भीम से युद्ध किया और वो परास्त नहीं हो सका। कृष्णजी ने जरासन्ध की उत्पत्ति देखी तो उसके अंत का रास्ता भी ‘सूझा’, लकड़ी की तीली उठाई और उसे दो भागों में करके फेंक दिया। भीम ने जरासन्ध को बीच में से फाड़कर दो हिस्सों में फेंक दिया, लेकिन ये क्या वो तो वापिस जुड़ गया और भीम को पछाड़ने लगा। कृष्णजी ने फिर अपनी “सूझ-बूझ” से पुनः लकड़ी की तीली उठाई और उसके दो फाड़ करते हुए ‘विपरीत’ दिशा में फेंक दिया उस इशारेनुसार जरासन्ध को बीच में से फाड़कर उसके शरीर को विपरीत दिशा में फेंक दिया और जरासन्ध का वध कर दिया।
कृष्णजी के हर फ़ैसले बिना कोई टीका टिप्पणी के, बिना कोई उनके सिर पर ठीकरा फोड़े, बिना कोई हास-उपहास किए, बिना कोई आरोप-प्रत्यारोप लगाए ..उसकी नीति को अंगीकार किया ... बस यही पाण्डवों की सबसे बड़ी जीत थी।
वर्तमान समय में ‘दोस्त’ या अच्छे साथी पर ख़ुद को सम्पूर्ण मानते हुए आरोप लगा देते हैं कि तुमने मुझे मरवा दिया, कंगाल कर दिया, कनहि का नहीं छोड़ा, मैं तो बिलकुल सही था, तुमने मुझे उलझा दिया ..फ़लाना..ढ़िकना ....सारे आरोप उसके सर मत्थे मढ़ दिए जाते हैं ... और उस दोस्त को ‘सूझ-बूझ’ से करने का मौक़ा ही नहीं मिल पाता है और अपने क़दम पीछे हटा लेता है ...!!!
कृष्णजी जानकार होने के बाद भी पहली बार में तीलियों को फेंकने से परिणाम तक नहीं पनहुँचे .... भीम ने पाँच-छः बार भी किया लेकिन शरीर जुड़ जाता वो हताश नहीं हुआ और ना ही कृष्ण पर ‘हेय’ दृष्टि से देखा ना कोई आरोप-प्रत्यारोप की प्रत्यंचा चढ़ाई, उन्हें पुनः मौक़ा दिया और सूझबूझ से तीली को फाड़कर दो विपरीत दिशाओं में फेंका और “विजयश्री” प्राप्त की।
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By - *एडवोकेट शिवकुमार ‘अवार’ फ़ौजदार*
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