Vikram Singh Rathore

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04/01/2026
04/01/2026
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥ परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ध...
09/05/2025

यदा यदा हि धर्मस्य
ग्लानिर्भवति भारत
अभ्युत्थानमधर्मस्य
तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
परित्राणाय साधूनां
विनाशाय च दुष्कृताम्
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥

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15/03/2023

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22/12/2022

. खाली पीपे

एक बहुत बड़ा सौदागर नौका लेकर दूर दूर देशो में करोड़ो रुपये कमाने जाता था।

उसके मित्रों ने उससे कहा की तुम नौका में घूमते हो। पुराने जमाने की नौका है तूफ़ान आते हैं, खतरे होते हैं, नावें डूब जाती है। तुम तैरना तो सीख लो।

सौदागर ने कहा कि तैरना सीखने के लिए मेरे पास समय कहां है?

लोगों ने कहा, ज्यादा समय की जरूरत नहीं गाँव में एक कुशल तैराक है जो कहता है तीन दिन में ही वो तैरना सीखा देगा।

वह जो कहता है ठीक ही कहता होगा; लेकिन मेरे पास तीन दिन कहां? तीन दिन में हज़ारों का कारोबार कर लेता हूँ। तीन दिन में तो लाखों रूपए यहां से वहाँ हो जाते हैं। कभी फुरसत मिलेगी तो जरूर सीख लूंगा।

फिर भी लोगों ने कहा कि खतरा बहुत बड़ा है, तुम्हारा जीवन निरन्तर नाव पर है, किसी भी दिन खतरा हो सकता है और तुम तो तैरना भी नहीं जानते।

उसने कहा कि और कोई सस्ती तरकीब हो तो बताओ, इतना समय तो मेरे पास नहीं है। तो लोगों ने कहा कि कम से कम दो पीपे अपने पास रख लो। कभी जरूरत पड़ जाए तो उन्हें पकड़कर तुम तैर तो सकोगे।

उसने दो खाली पीपे मुंह बन्द करवाकर अपने पास रख लिए। उनको हमेशा अपनी नाव में जहां वो सोता वहीं रखता।

और किसी को पता भी न था और एक दिन वह घड़ी आ गई। तूफान उठा और नाव डूबने लगी।

वह चिल्लाया, मेरे पीपे कहां है?

उसके नाविकों ने बताया कि वह तो उसके बिस्तर के पास ही रखे हुए हैं।

बाकी नाविक तो कूद गये, वे तैरना जानते थे।

वह अपने पीपों के पास गया। लेकिन दो खाली पीपे भी वहां थे जो उसने तैरने के लिए रखे थे और दो स्वर्ण मुद्राओं से भरे पीपे भी थे, जिन्हें वह लेकर आ रहा था।

उसका मन डांवाडोल होने लगा की कौन से पीपे लेकर कूदे- सोने से भरे या खाली? फिर उसने देखा की नाव डूबने वाली है। खाली पीपे लेकर कूदने से क्या होगा? उसने अपने सोने से भरे पीपे लिए और कूद गया।

जो उस सौदागर का हुआ होगा वह आप समझ सकते हैं।

वह तैरने के लिए समय नहीं निकाल सका था। क्या आप समय निकाल सके हैं? उसे तो मौका भी मिल गया था । वह खाली पीपे लेकर कूद सकता था, लेकिन वह भरे पीपे लेकर कूदा।

यही हाल हमारा है अभी थोड़ा व्यापार संभाल लें, थोड़ा मकान देख लें, परिवार में मेरे बिना सब चौपट हो जाएगा, थोड़ा उसको भी देख लें, बस ऐसे ही जीवन निकाल रहे हैं, तैरना कब सीखेंगे संसार सागर में टूटी हुई नाव में बैठे हैं।

सभी सन्त महात्मा पुकार पुकार के कह रहे हैं। लेकिन हमारे पास समय नहीं है ।

*यहां तक कि 2 खाली पीपे भी हमने साथ नहीं रखे हैं सत्संग और सेवा । उनको भी हमने अहंकार और दौलत के दिखावे से भर रखा है ।* क्योंकि जिनको जीवनभर दिखावे, अहंकार और दौलत से भरे - भरे होने की आदत होती है, वे एक क्षण भी खाली होने को राजी नहीं हो सकते।🙏🙏

18/12/2022

1857 के गदर की वीरांगना #शिवदेवी #तोमर

शिव देवी तोमर बड़ौत की 16 वर्षीय तोमर थी।प्रथम गदर में क्रांति की मशाल बिजरौल निवासी बाबा शाहमल सिंह तोमर ने थामी। उन्होंने ब्रितानी हुकूमत की ईंट से ईट बजाकर फिरंगियों के छक्के छुड़ा दिए। 10 मई 1857 को प्रथम जंग-ए-आजादी का बिगुल बजने के बाद बाबा शाहमल सिंह तोमर ने बड़ौत तहसील पर कब्जा करते हुए आजादी के प्रतीक ध्वज को फहराया। यहां से लूटे धन को दिल्ली के अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को भिजवाया। \
बड़का गांव में 18 जुलाई 1857 को गोरी सेना से आमने-समाने की लड़ाई में बाबा शाहमल शहीद हो गए। जिस के बाद
1857 की क्रांति को दबाने के लिए अंग्रेजों ने बड़ौत की पट्टी चौधरान स्थित मकानों को ध्वस्त कर चबूतरों में तब्दील कर दिया। लोग बेघर हो गए। इससे जनाक्रोश भड़का। उधर, बाबा शाहमल की शहादत के बाद उनका साथ देने वाले 32 जाट क्रांतिकारियों को अंग्रेजों ने एक साथ बिजरौल गांव के बाहर बरगद के पेड़ पर फांसी दे दी।
इस घटना की चश्मदीद रहीं बड़ौत निवासी शिवदेई तोमर का खून खौल उठा। उन्होंने दुश्मन को ललकारा और 17 फिरंगियों को तलवार से मौत के घाट उतार दिया जबकि 25 भागकर छिपने में सफल रहे। घायल शिवदेवी अपने घावों की मरहम पट्टी कर रही थी कि बाहर से आए अंग्रेजों ने उसे घेर लिया। वीर बालिका ने मरते दम तक अंग्रेजों से लोहा लिया। 🚩🚩जय वीरांगना🚩🚩
(शेयर किए पोस्ट की आभार के साथ प्रस्तुति)

दिवाली की हार्दिक शुभकामनाएं 🌷🕉🚩
24/10/2022

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