Advocate Wasim Khan

Advocate Wasim Khan Basically Deals with legal problems,
deal with child & women related issues specially for criminally cases
Advocate, Raj. highcourt, jaipur

अगर पुलिस आपको कॉल या मैसेज करके पूछताछ के लिए बुलाए तो पहले लिखित में नोटिस जरूर मांगे BNSS की धारा 179 आपको यह अधिकार ...
21/12/2025

अगर पुलिस आपको कॉल या मैसेज करके पूछताछ के लिए बुलाए तो पहले लिखित में नोटिस जरूर मांगे BNSS की धारा 179 आपको यह अधिकार देती है बिना नोटिस आपको थाने जाना जरूरी नहीं है...

नए कानून (BNSS) के अनुसार आपके अधिकार
1. पूछताछ के लिए नोटिस (Section 35(3) BNSS)
पुराने कानून की धारा 41A को अब BNSS की धारा 35(3) में बदल दिया गया है।
नियम: यदि किसी ऐसे अपराध का आरोप है जिसमें 7 साल से कम की सजा है, तो पुलिस आपको सीधे गिरफ्तार नहीं कर सकती। उन्हें आपको लिखित नोटिस देना होगा।
अनिवार्य शर्त: पुलिस को गिरफ्तारी करने से पहले अब अपने वरिष्ठ अधिकारी (कम से कम DSP स्तर) की लिखित अनुमति लेना आवश्यक है, यदि वे 7 साल से कम सजा वाले मामले में किसी बुजुर्ग (60+ साल) या बीमार व्यक्ति को गिरफ्तार करना चाहते हैं।
2. महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों के लिए विशेष सुरक्षा (Section 179 BNSS)
नए कानून ने उन लोगों की सूची बढ़ा दी है जिन्हें थाने नहीं बुलाया जा सकता। BNSS की धारा 179 के अनुसार, निम्नलिखित व्यक्तियों को पूछताछ के लिए थाने बुलाने के बजाय पुलिस को उनके घर जाना होगा:
महिलाएं: किसी भी उम्र की महिला को थाने नहीं बुलाया जा सकता।
बच्चे: 15 वर्ष से कम आयु के बच्चे।
बुजुर्ग: 60 वर्ष से अधिक आयु के व्यक्ति (पुराने कानून में यह सीमा 65 वर्ष थी)।
दिव्यांग: मानसिक या शारीरिक रूप से अक्षम व्यक्ति।
3. गिरफ्तारी की सूचना देना अनिवार्य (Section 36 BNSS)
अब पुलिस के लिए यह अनिवार्य है कि वे प्रत्येक थाने और जिला मुख्यालय पर एक अधिकारी (Designated Officer) नियुक्त करें, जो गिरफ्तार व्यक्ति के परिवार को तुरंत सूचना देगा। इसके अलावा, थाने के बाहर एक बोर्ड पर गिरफ्तार व्यक्तियों के नाम और उनके खिलाफ आरोपों की जानकारी प्रदर्शित करनी होगी।
4. हथकड़ी का प्रयोग (Section 43(3) BNSS) - नया बदलाव
नए कानून में पुलिस को गंभीर अपराधों (जैसे बलात्कार, हत्या, आतंकवाद) के आरोपियों को गिरफ्तार करते समय हथकड़ी लगाने का अधिकार दिया गया है। लेकिन सामान्य मामलों या छोटे अपराधों में हथकड़ी का प्रयोग अभी भी प्रतिबंधित है।
🛡️ अगर पुलिस परेशान करे तो आपके पास क्या विकल्प हैं?
जीरो एफआईआर (Zero FIR): अब आप किसी भी थाने में शिकायत दर्ज करा सकते हैं, चाहे अपराध कहीं भी हुआ हो।
वीडियो रिकॉर्डिंग: नए कानून के अनुसार, तलाशी और जब्ती के दौरान वीडियो रिकॉर्डिंग (Audio-Video Means) अनिवार्य है। आप इसकी मांग कर सकते हैं।
मजिस्ट्रेट को शिकायत: यदि पुलिस प्रक्रिया का पालन नहीं कर रही है, तो आप BNSS की धारा 175 के तहत मजिस्ट्रेट से शिकायत कर सकते हैं।

पुराने कानून के अनुसार

आपके मुख्य कानूनी अधिकार (Your Key Legal Rights)
1. बिना वारंट गिरफ्तारी से संरक्षण (Protection from Arrest without Warrant)
CrPC की धारा 41: पुलिस आपको केवल तभी गिरफ्तार कर सकती है जब उनके पास कोई ठोस कारण (जैसे आपने कोई संज्ञेय अपराध किया है) हो।
41A नोटिस (Notice of Appearance): अगर किसी मामले में सात साल तक की सजा हो सकती है (जैसे छोटे-मोटे झगड़े, धमकी, आदि), तो पुलिस आपको सीधे गिरफ्तार नहीं कर सकती। उन्हें आपको पहले CrPC की धारा 41A के तहत एक नोटिस भेजना होगा, जिसमें थाने में हाजिर होने की तारीख और समय लिखा हो।
नोट: अगर आप इस नोटिस का पालन करते हैं, तो पुलिस को आपको गिरफ्तार नहीं करना चाहिए, जब तक कि उनके पास नए और मजबूत कारण न हों।
2. पूछताछ के लिए बुलाने का नियम (Rules for Calling for Interrogation)
थाने में बुलाने का कारण: पुलिस आपको केवल जांच (Investigation) या पूछताछ (Interrogation) के लिए ही बुला सकती है। उन्हें बताना होगा कि वे किस मामले या शिकायत के संबंध में आपको बुला रहे हैं।
महिलाओं के लिए विशेष नियम (Special Rule for Women):
CrPC की धारा 160 के तहत, किसी भी महिला को पूछताछ के लिए थाने में नहीं बुलाया जा सकता। पुलिस को उनके निवास स्थान (घर पर) या किसी अन्य सहमत स्थान पर जाकर ही पूछताछ करनी होगी, और यह एक महिला पुलिस अधिकारी या महिला कांस्टेबल की उपस्थिति में होना चाहिए।
समय सीमा: किसी भी व्यक्ति को सुबह 6 बजे से पहले और शाम 6 बजे के बाद पूछताछ के लिए थाने में नहीं बुलाया जा सकता।
3. वकील से मिलने का अधिकार (Right to Meet a Lawyer)
गिरफ्तारी के समय: अगर आपको गिरफ्तार किया जाता है, तो आपको अपने पसंद के वकील से मिलने और कानूनी सलाह लेने का अधिकार है (संविधान का अनुच्छेद 22)।
पूछताछ के समय: पूछताछ के दौरान आप अपने वकील को साथ रखने की मांग कर सकते हैं, हालांकि वकील को पूरी पूछताछ के दौरान आपके साथ बैठने की अनुमति नहीं दी जा सकती, लेकिन उन्हें निश्चित दूरी से देखने की अनुमति दी जानी चाहिए।
📝 अगर पुलिस आपको बिना कारण बुलाती है तो क्या करें? (What to Do if Police Call Without Cause?)
विनम्रता से कारण पूछें: पुलिस अधिकारी से विनम्रता से पूछें कि वे आपको किस मामले, शिकायत संख्या (FIR Number), या धारा के तहत बुला रहे हैं।
लिखित नोटिस मांगें: हमेशा CrPC की धारा 41A के तहत लिखित नोटिस की मांग करें। मौखिक बुलावा कानूनी रूप से कमजोर होता है।
वरिष्ठ अधिकारियों से संपर्क करें: यदि आपको लगता है कि पुलिस अधिकारी उत्पीड़न कर रहे हैं, तो आप उनके वरिष्ठ अधिकारियों (DSP/ACP, SP, या कमिश्नर) से शिकायत कर सकते हैं।
कानूनी सहायता लें: तुरंत किसी वकील से संपर्क करें। वकील आपको सही सलाह देंगे कि क्या आपको थाने जाना चाहिए और वहां क्या कहना है।
हाई कोर्ट में याचिका (Habeas Corpus): अगर आपको गैरकानूनी रूप से हिरासत में लिया जाता है, तो आपका वकील हाई कोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) की याचिका दायर कर सकता है।
निष्कर्ष:
पुलिस आपको 'सिर्फ यूं ही' या 'बिना कारण' थाने नहीं बुला सकती। उन्हें हमेशा एक वैध कानूनी आधार और लिखित नोटिस देना होगा, खासकर अगर अपराध गंभीर नहीं है।

एक ऐतिहासिक फैसले में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक ही घटना या उससे संबंधित परिस्थितियों के लिए दूसरी प्राथमिकी (एफआई...
20/04/2025

एक ऐतिहासिक फैसले में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक ही घटना या उससे संबंधित परिस्थितियों के लिए दूसरी प्राथमिकी (एफआईआर)** दर्ज करने के संबंध में पाँच प्रमुख सिद्धांत निर्धारित किए हैं । यह निर्णय इस मुद्दे पर एक महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण के रूप में आया है कि दूसरी एफआईआर कब दर्ज की जा सकती है और किन शर्तों के तहत इसकी अनुमति है।
दूसरी एफआईआर दर्ज करने के मुख्य सिद्धांत:

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने दूसरी एफआईआर दर्ज करने के लिए निम्नलिखित पाँच शर्तें निर्धारित कीं:

1. प्रति-शिकायत या प्रतिद्वंद्वी संस्करण : एक दूसरी एफआईआर की अनुमति दी जा सकती है यदि इसमें एक प्रति-शिकायत या उन तथ्यों का प्रतिद्वंद्वी संस्करण प्रस्तुत किया जाता है जिनके आधार पर पहले की एफआईआर पहले से मौजूद है।

2. दो एफआईआर का दायरा अलग-अलग है : यदि दो एफआईआर एक ही घटना से संबंधित हैं, लेकिन अलग-अलग पहलुओं या कोणों को कवर करती हैं, तो उन्हें अनुमति दी जा सकती है, भले ही वे समान परिस्थितियों से उत्पन्न हुई हों।

3. बड़ी साजिश : दूसरी एफआईआर तब स्वीकार्य हो सकती है जब बाद की जांच या तथ्यों से पता चले कि पिछली एफआईआर एक बड़ी साजिश का हिस्सा थी।

4. नये तथ्य या परिस्थितियाँ : जब घटना से संबंधित नये तथ्य, व्यक्ति या परिस्थितियाँ सामने आती हैं, तो दूसरी एफआईआर दर्ज करना उचित हो सकता है।

5. अलग-अलग घटनाएं लेकिन समान या भिन्न अपराध : यदि घटनाएं अलग-अलग हैं लेकिन अपराध समान या संबंधित हैं, तो दूसरी एफआईआर दर्ज करना उचित हो सकता है।

मामले का विवरण :

सर्वोच्च न्यायालय राजस्थान जैव ईंधन प्राधिकरण के मुख्य कार्यकारी अधिकारी-सह-परियोजना निदेशक सुरेन्द्र सिंह राठौर से संबंधित अपील पर विचार कर रहा था , जिन पर जैव ईंधन की बिक्री और लाइसेंस देने के लिए रिश्वत मांगने का आरोप लगाया गया था।

पहली एफआईआर : पहली एफआईआर (संख्या 123/2022) 4 अप्रैल, 2022 को कथित रिश्वत की मांग के लिए भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 और 7ए के तहत दर्ज की गई थी ।

दूसरी एफआईआर : राठौर पर बायो-फ्यूल पंप चलाने के लिए लाइसेंस देने के लिए रिश्वत मांगने के आरोप सामने आने के बाद 14 अप्रैल, 2022 को दूसरी एफआईआर दर्ज की गई। भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो के एक कांस्टेबल श्याम प्रकाश द्वारा दर्ज की गई यह शिकायत 30 सितंबर, 2021 से 12 अप्रैल, 2022 तक की घटनाओं पर आधारित है ।

राजस्थान उच्च न्यायालय ने पहले दूसरी एफआईआर को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि यह प्रक्रिया का दुरुपयोग है। न्यायालय ने यह भी कहा कि आरोपियों के खिलाफ जांच के लिए पूर्व अनुमति की आवश्यकता होती है, जो इस मामले में नहीं ली गई।

सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय

सर्वोच्च न्यायालय ने राजस्थान राज्य द्वारा दायर अपील को स्वीकार करते हुए कहा कि संबंधित विभाग में व्यापक भ्रष्टाचार की जांच के लिए दूसरी एफआईआर महत्वपूर्ण थी । न्यायालय ने कहा कि:

"एफआईआर को रद्द करने से इस तरह के भ्रष्टाचार की जांच शुरू में ही रुक जाएगी। यह समाज के हित के खिलाफ होगा।"

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दूसरी एफआईआर विभाग में भ्रष्टाचार के बड़े मुद्दे को संबोधित करती है और इस प्रकार पहली एफआईआर की तुलना में इसका दायरा व्यापक है। नतीजतन, दूसरी एफआईआर की जांच को जनहित में माना गया और राजस्थान उच्च न्यायालय के फैसले को पलट दिया गया।

केस शीर्षक-
राजस्थान राज्य बनाम सुरेन्द्र सिंह राठौर

Law is King of King
03/10/2024

Law is King of King

26/12/2022

IPC और CRPC क्या है:-

IPC-इंडियन पीनल कोड जिसे हिंदी में भारतीय दंड संहिता या भारतीय दंड विधान और उर्दू में इसे ताजीरात हिन्द कहा जाता है ये 1860 में पारित हुआ था IPC में 511 धाराएं और 23 अध्याय हैं जब सबसे पहले कानून लॉ लागू किया गया था तो वो साल 1834 था उस साल पहला विधि आयोग बनाया गया था जिसके चेयर पर्सन लार्ड मैकारे बनाये गए इंडियन पीनल कोड विश्व का सबसे बड़ा दाण्डिक कानून है.

CRPC-क्रिमिनल प्रोसीजर कोड जिसे हिंदी में दंड प्रक्रिया संहिता कहते हैं दंड प्रक्रिया संहिता एक पूरी प्रक्रिया है जो किसी भी जुर्म करने के बाद या पहले उसके लिए दिए जाने वाली सजा की कार्यवाही का तरीका बताती है CRPC को दो लॉ में बाटा गया है पहला मौलिक विधि (सब्स्टन्सिव लॉ) और दूसरा प्रक्रिया विधि (प्रोसीज़रल लॉ)। इन लॉ को फिर से दो भागों में बाटा जाता है पहला सिविल लॉ (दीवानी विधि) और दूसरा क्रिमिनल लॉ (फौजदारी विधि).

IPC और CrPC में अंतर-

IPC मौलिक विधि (सब्स्टन्सिव लॉ) होता है जबकि CrPC क्रिमिनल लॉ (फौजदारी विधि) होता है IPC अपराध की परिभाषा बताती है और दंड का प्राबधान करती है. CrPC प्रक्रिया को बताता है की कैसे और किस विधि द्वारा पुरे अपराध की कार्यवाही होगी.

IPC में सभी लॉ पहले से बनाये गए हैं कि किस अपराध का क्या नाम है और उसके लिए कौन सी सजा दी जाएगी और CrPC में अपराध होने के बाद किस तरह से कार्यवाही की जाएगी वो बताया जाता है.

हमे सारे अपराधों की दफा और धारा IPC में मिलती हैं और उन सभी अपराधों के बाद कार्यवाही को किस प्रकार से किया जायेगा इन सभी बातों की जानकारी CrPC में मिलती है.

01/10/2022

कोर्ट किसी के साथ हुई नाइंसाफी की भरपाई किसी बेगुनाह को सज़ा देकर नहीं कर सकता:-सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने छह साल की बच्ची से कथित बलात्कार और हत्या के मामले में मौत की सजा पाए व्यक्ति को बरी कर दिया कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष के गवाहों द्वारा दिए गए बयानों में गंभीर अंतर्विरोध हैं और ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट दोनों ने इसे पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया है जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर, जस्टिस एएस बोपन्ना और जस्टिस वी रामसुब्रमण्यम की बेंच ने मामले की सुनवाई की। पीठ ने कहा, "कोर्ट किसी के साथ हुई नाइंसाफी की भरपाई किसी बेगुनाह को सज़ा देकर नहीं कर सकता।

पीठ ने यह भी कहा कि आरोपी इतना गरीब है कि वह सत्र न्यायालय में भी एक वकील को नियुक्त करने का जोखिम नहीं उठा सकता था। जिला एवं सत्र न्यायाधीश की अदालत में उनके बार-बार अनुरोध के बाद, एक वकील की सेवा एमिकस के रूप में प्रदान की गई थी। पीठ ने जांच ठीक से नहीं करने के लिए अभियोजन पक्ष की भी आलोचना की। कोर्ट ने कहा, " हम इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि यह 6 साल की बच्ची के साथ रेप और हत्या का वीभत्स मामला है। अभियोजन पक्ष ने जांच ठीक से नहीं कर पीड़िता के परिवार के साथ अन्याय किया है। बिना किसी सबूत के अपीलकर्ता पर दोष तय करके अभियोजन पक्ष ने अपीलकर्ता के साथ अन्याय किया है। कोर्ट किसी के साथ हुई नाइंसाफी की भरपाई किसी बेगुनाह को सज़ा देकर नहीं कर सकता।" कोर्ट आरोपी के खिलाफ अभियोजन का मामला यह था कि उसने होली के मौके पर अपनी करीब 6 साल की भतीजी को डांस और गाने की परफॉर्मेंस दिखाने के बहाने साथ लेकर गया और उसके बाद रेप कर उसकी हत्या कर दी। सत्र न्यायालय ने उसे आईपीसी की धारा 302 और 376 के तहत दंडनीय अपराधों के लिए दोषी ठहराया और मौत की सजा सुनाई। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उनकी अपील को खारिज करते हुए मौत की सजा की पुष्टि कर दी। अपील में, अपीलकर्ता ने कुछ अंतर्विरोधों के आलोक में (i) पीडब्लू 1 से 3 की गवाही की विश्वसनीयता के संबंध में विवाद उठाया; (ii) न्यायालय को प्राथमिकी अग्रेषित करने में पुलिस की ओर से विलंब के परिणाम; (iii) फोरेंसिक/चिकित्सा साक्ष्य प्रस्तुत करने में अभियोजन की विफलता और उसका प्रभाव और (iv) जिस तरीके से संहिता की धारा 313 के तहत पूछताछ की गई और दर्ज किए गए निष्कर्षों पर उसका प्रभाव।

कोर्ट ने एक बार फिर जल्द फैसला देने की जरूरत पर जोर दिया अदालत ने कहा कि आरोपी ने शुरू से ही बचाव किया था कि उसे स्थानीय रूप से शक्तिशाली व्यक्ति के इशारे पर फंसाया गया था, जिसकी पत्नी गांव की प्रधान है। रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों का हवाला देते हुए पीठ ने यह भी कहा कि (i) वह स्थान जहां पुलिस ने पहली बार शव देखा था, के संबंध में कई विरोधाभास हैं; (ii) वह व्यक्ति जिसने शव लिया था; और (iii) जिस स्थान पर शव ले जाया गया था और (iv) जांच के आयोजन के स्थान, तिथि और समय के बारे में विरोधाभास है। अदालत ने कहा कि ये विरोधाभास पीडब्लू 1 से 3 के साक्ष्य को पूरी तरह से अविश्वसनीय बनाते हैं। अदालत ने यह भी देखा कि विशेष रूप से इस मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में क्षेत्राधिकार वाली अदालत में प्राथमिकी को प्रेषित करने में 5 दिनों की देरी घातक है। अदालत ने यह भी कहा कि अभियोजन पक्ष ने आरोपी (अपीलकर्ता) को एक चिकित्सक द्वारा जांच के अधीन करने की परवाह नहीं की। इस पर कोर्ट ने कहा, "इस मामले में अभियोजन की विफलता अपीलकर्ता को चिकित्सा परीक्षण के अधीन करने के लिए निश्चित रूप से अभियोजन के मामले के लिए घातक है, खासकर जब ओकुलर सबूत भरोसेमंद नहीं पाए जाते हैं। पीड़ित द्वारा पहने गए सलवार पर रक्त/वीर्य के दाग पर फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला, अभियोजन की विफलता है।" अपील की अनुमति देते हुए पीठ ने कहा, "उसके द्वारा दिए गए बयानों में गंभीर रूप से निहित अंतर्विरोधों को दोनों अदालतों द्वारा विधिवत नोट नहीं किया गया है। जब अपराध जघन्य है, तो न्यायालय को भौतिक साक्ष्य को उच्च जांच के तहत रखना आवश्यक है। तर्क पर सावधानीपूर्वक विचार करने पर जैसा कि उच्च न्यायालय द्वारा पुष्टि की गई है, हम पाते हैं कि पीडब्ल्यू 1 से 3 तक के बयानों के आकलन में पर्याप्त सावधानी नहीं बरती गई है। किसी ने यह नहीं बताया कि अदालत को प्राथमिकी किसने भेजी और हैरानी की बात है कि पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट की कॉपी भी एसएचओ को 13.03.2012 को मिली थी, हालांकि पोस्टमॉर्टम 09.03.2012 को किया गया था। यह वही तारीख थी जिस दिन एफआईआर कोर्ट में पहुंची थी। कारक निश्चित रूप से अभियोजन द्वारा अनुमानित कहानी पर एक मजबूत संदेह पैदा करते हैं, लेकिन दोनों न्यायालयों ने इसे पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया।" नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी दिल्ली के प्रोजेक्ट 39A ने सुप्रीम कोर्ट में अपीलकर्ता को कानूनी सहायता प्रदान की। अपीलकर्ता का प्रतिनिधित्व सीनियर एडवोकेट एस नागमुथु ने किया।
केस टाइटल-छोटकाउ बनाम उत्तर प्रदेश राज्य 2022 लाइव लॉ (एससी) 804 | सीआरए 361-362 ऑफ 2018 | 28 सितंबर 2022 |

07/05/2022

FIR दर्ज किए बिना और SHO की मंजूरी के बिना किसी भी व्यक्ति को मौखिक रूप से थाने में नहीं बुलाया जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश

⚫लखनऊ में इलाहाबाद हाईकोर्ट की बेंच ने हाल ही में उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि किसी भी व्यक्ति को, जिसमें एक आरोपी भी शामिल है, थाना प्रभारी की सहमति/अनुमोदन के बिना अधीनस्थ पुलिस अधिकारियों द्वारा मौखिक रूप से पुलिस थाने में तलब नहीं किया जा सकता है।

🔵 न्यायमूर्ति अरविंद कुमार मिश्रा- I और न्यायमूर्ति मनीष माथुर की खंडपीठ ने निर्देश दिया
कि किसी भी पुलिस स्टेशन में शिकायत की जा सकती है, जिसमें जांच की आवश्यकता होती है और आरोपी की उपस्थिति, आपराधिक प्रक्रिया संहिता के प्रावधानों के तहत निर्धारित कार्रवाई का एक उपयुक्त तरीका है का पालन किया जाना चाहिए, जो ऐसे व्यक्ति को लिखित नोटिस देने पर विचार करता है, लेकिन मामला दर्ज होने के बाद ही।

पीठ ने जोर देकर कहा कि केवल पुलिस अधिकारियों के मौखिक आदेशों के आधार पर किसी व्यक्ति के जीवन, स्वतंत्रता और गरिमा को खतरे में नहीं डाला जा सकता है।

⏺️इस मामले में उच्च न्यायालय के समक्ष एक पत्र याचिका दायर की गई थी जिसमें एक लड़की (सरोजनी) ने दावा किया था कि उसके माता-पिता (रामविलास और सावित्री) को लखनऊ के महिला थाना पुलिस थाने में बुलाया गया था और वह वापस नहीं आए।

⭕याचिका को बंदी प्रत्यक्षीकरण के रूप में माना गया और 8 अप्रैल, 2022 को सुनवाई की गई, जब राज्य की ओर से अदालत को सूचित किया गया कि थाने में ऐसी कोई घटना नहीं हुई थी।

🟠सुनवाई की अगली तारीख (13 अप्रैल) को, याचिकाकर्ता सावित्री और रामविलास और उनकी बेटी अदालत के सामने पेश हुए और अदालत को सूचित किया कि कुछ पुलिस कर्मियों ने उन्हें पुलिस स्टेशन बुलाया, और जब वे पहुंचे, तो उन्हें हिरासत में लिया गया और कुछ पुलिस कर्मियो ने धमकी दी।

🔴हालाँकि, पुलिस ने बिना शर्त माफी माँगी और दावा किया कि याचिकाकर्ताओं को अपमानित करने या परेशान करने का कोई जानबूझकर प्रयास नहीं किया गया था, बल्कि यह एक कांस्टेबल का कदाचार और अवज्ञा थी, और पुलिस के पास याचिकाकर्ताओं के साथ दुर्व्यवहार करने का कोई कारण नहीं था।

🟣मामले के तथ्यों के आलोक में, हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि भारतीय संविधान या सीआरपीसी में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जिसके लिए पुलिस अधिकारी को प्राथमिकी दर्ज किए बिना भी किसी व्यक्ति को समन करने और हिरासत में लेने की आवश्यकता होती है, और वह भी मौखिक रूप से

🛑गौरतलब है कि कोर्ट ने यहां तक ​​कहा कि पुलिस अधिकारियों द्वारा इस तरह की किसी भी कार्रवाई को अनुच्छेद 21 द्वारा परिकल्पित व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के संदर्भ में देखा जाना चाहिए, जिसका अर्थ है कि एक निष्पक्ष, न्यायसंगत और उचित प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए।

आपका
मोहम्मद वसीम खान
राजस्थान उच्च न्यायालय, जयपुर।
9785706968

25/12/2021

प्रथम सूचना रिपोर्ट जिसे संक्षिप्त में f.i.r. कहा जाता है थाना प्रभारी के समक्ष प्रस्तुत करते समय निम्नलिखित प्रश्नों को ध्यान में रखते हुए f.i.r. लिखी जाए तो श्रेष्ठ रहता है जैसे घटना किस व्यक्ति के द्वारा, किसके साथ, किस दिनांक, समय, एवं किस स्थान पर किस आशय से कारित की गई और ऐसी घटना में अभियुक्त ने कौन से हथियार का उपयोग करते हुए किस तरह चोट पहुंचाई. यदि अभियुक्त एक से ज्यादा है तो प्रत्येक अभियुक्त के द्वारा किया गया कृत्य का अलग-अलग विवरण दिया जाना चाहिए कि किस व्यक्ति ने किस तरीके से किस व्यक्ति को कहां - कहां चोट पहुंचाई और ऐसी घटना को किस व्यक्ति ने देखा है या घटना के वक्त कौन-कौन मौजूद था और अंत में यह भी लिखना चाहिए कि अभियुक्त घटना करके अपने साथ कोई आइटम ले गया अथवा घटनास्थल पर छोड़ गया.
साथ ही आप किस हैसियत से ऐसी सूचना श्रीमान थाना प्रभारी को दे रहे हैं. यह भी लिखा जाना चाहिए.

Adv M. Wasim khan
Rajasthan high court
9785706968

07/10/2021

अपनी इच्छाओं को क़ाबू में रखिये वरना
ये शौक़ गुनाहों में बदल जाएंगे!

एडवोकेट वसीम खान

06/09/2021

क्या आप कभी सूचना के अधिकार कानून के आगे भी निकलकर विचार किये हैं? मानकर चलें की यदि आपको आरटीई फाइल करने के बाद जानकारी समयसीमा पर न मिले अथवा कोई जानकारी ही न मिले, अथवा अधूरी और भ्रामक जानकारी मिले, अथवा जो जानकारी दी जाय वह झूंठी और गलत हो तो आप क्या करेंगे? जाहिर है आप प्रथम अपील पर जायेंगे और और यदि प्रथम अपील में निराकरण नहीं होता तो आप सूचना योग में द्वितीय अपील में जायेंगे. लेकिन क्या आपने सोचना है की इस प्रक्रिया के साथ-साथ आप भारतीय दंड संहिता और दंड प्रक्रिया संहिता के विधान के तहत भी कार्यवाही की माग कर सकते हैं और जानकारी न देने और गलत भ्रामक जानकारी देने आरटीआई कानून का उल्लंघन करने के लिए लोक सूचना अधिकारी और प्रथम अपीलीय अधिकारी के उपर एफ आई आर भी दर्ज करवा सकते हैं.

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यदि लोक सूचना अधिकारी अथवा प्रथम अपीलीय अधिकारी अपने कर्तव्यों की अवहेलना करें और समयसीमा पर और सही जानकारी न उपलब्ध कराएँ तो उनके ऊपर भारतीय दंड विधान और और दंड प्रक्रिया संहिता के तहत एफआईआर दर्ज करवाई जा सकती है.

प्रथम अपील तक का स्तर और असद्भावना से की गयी कार्यवाहियां और दंड विधान
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किन नियमों के उल्लंघन पर किन किन धाराओं में एफआईआर दर्ज करवाई जा सकती है.

1- लोक सूचना अधिकारी द्वारा कोई जवाब नहीं देना धारा-7(2) आरटीआई एक्ट का उल्लंघन है.
2- लोक सूचना अधिकारी द्वारा आरटीआई एक्ट की धारा-7(8) का उल्लंघन पर भारतीय दंड संहिता की धारा 166ए और 167 के तहत एफ आई आर होगी.
3- लोक सूचना अधिकारी द्वारा झूठी जानकारी देना जिसका प्रमाण आवेदक के पास मौजूद है उस स्थिति में भारतीय दंड संहिता की धारा 166ए, 167, 420, 468 और 471 के तहत एफआईआर दर्ज होगी.
4- प्रथम अपीलीय अधिकारी द्वारा निर्णय नहीं किये जाने की स्थिति में भारतीय दंड संहिता की धारा 166ए, 188 के तहत एफ आई आर दर्ज कराई जा सकती है.
5- प्रथम अपीलीय अधिकारी के समक्ष लोक सूचना अधिकारी द्वारा सुनवाई के बाद सम्यक सूचना के भी गैरहाजिर रहने की स्थिति में भारतीय दंड संहिता की धारा 175, 176, 188, और 420 के तहत एफ आई आर दर्ज करवाई जा सकती है.
6- प्रथम अपीलीय अधिकारी द्वारा निर्णय करने के बाद भी सूचनाएं नहीं देने की स्थिति में भारतीय दंड संहिता की धारा 188 और 420 के तहत एफ आई आर दर्ज हो सकती है.
7- लोक सूचना अधिकारी अथवा प्रथम अपीलीय अधिकारी द्वारा आवेदक को धमकाने की स्थिति में आईपीसी की धारा 506 के तहत एफ आई आर दर्ज करने का प्रावधान है.
8- लोक सूचना अधिकारी द्वारा शुल्क लेकर भी सूचना नहीं देने की स्थिति में आईपीसी की धारा 406 और 420 के तहत एफआईआर दर्ज किये जाने का प्रावधान होगा.
9- पीईओ अथवा एफएओ द्वारा लिखित में ऐसे कथन करना जिसका झूठ होना पीईओ अथवा एफएओ को ज्ञात हो और इससे आवेदक को सदोष हानि हो उस स्थिति में आईपीसी की धारा 193, 420, 468, और 471 के तहत एफ आई आर दर्ज करवाई जा सकती है.


द्वितीय अपील तक का स्तर और असद्भावना से की गयी कार्यवाहियां और दंड विधान
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1- पीआईओ/एफएओ का अपील में नोटिस मिलने पर भी सुनवाई में बिना कोई सूचना के गैरहाजिर रहने की स्थिति में आईपीसी की धारा 175, 176, 188 और 420 के तहत एफआईआर की कार्यवाही.
2 - पीआईओ और एफएओ का नोटिस मिलने पर भी निर्धारित निर्देशों की मियाद में आयोग/अपीलार्थी को अपील का प्रतिउत्तर नहीं देने की स्थिति में आईपीसी की धारा 166ए, 188 और 420 के तहत एफआईआर की कार्यवाही.
3- पीआईओ/एफएओ का अपील का प्रतिउत्तर अधूरा /झूठा/तथ्यों के विपरीत होने की स्थिति में आईपीसी की धारा 166ए, 167, 193, 420, 468, और 471 के तहत एफआईआर की कार्यवाही.
4- पीआईओ/एफएओ का धारा-20(1) के नोटिस मिलने पर भी सुनवाई में बिना कोई सूचना के गैर हाजिर रहने की स्थिति में आईपीसी की धारा 175, 176, 188 और 420 के तहत सहपठित धारा-12 के तहत एफआईआर की कार्यवाही की जा सकती है.

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा-195(1)(क)(1)/(3),(ख)(1)/(2) सहपठित धारा-340
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जब सूचना आयोग के समक्ष लम्बित किसी अपील में प्रत्यर्थी/प्रथम अपीलीय अधिकारी को नोटिस जारी होने के बाद वह प्रतिउत्तर में दस्तावेजी साक्ष्यों के विरुद्ध झूठा अंकन करते हुए जवाब प्रेषित करे को माननीय आयोग को धारा-195(1)(क)(1)/(3), (ख)(1)/(2) सहपठित धारा-340 दंड प्रक्रिया संहिता के विधान के तहत आवेदन देकर ऐसे अपराध के लिए अभियोजन चलाने को आवेदन पेश किया जा सकता है. सूचना आयोग द्वारा ऐसे किसी भी आवेदन पर विचार करना न्यायसंगत है.

लिमिटेसन एक्ट 1963 धारा-5 :
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जहाँ देरी का कोई युक्तियुक्त कारण लोक सूचना अधिकारी/ प्रथम अपीलीय अधिकारी के जवाब में नहीं हो वहां ऐसा कोई दस्तावेज शून्य हैसियत रखने से पत्रावली में शामिल नहीं माना जा सकता है.

जब सूचना आयोग के समक्ष लम्बित किसी अपील में प्रत्यर्थी/ प्रथम अपीलीय अधिकारी को नोटिस जारी होने के बाद भी वह नोटिस के निर्देशों के अनुरूप निर्धारित समयावधि में प्रतिउत्तर प्रेषित/पेश करने में नाकाम रहता है तो सूचना आयोग को धारा-5 परिसीमा अधिनियम के विधान पर बहस सुननी चाहिए और जहाँ देरी का कोई युक्तियुक्त कारण जवाब में नहीं हो वहां ऐसा कोई दस्तावेज शून्य हैसियत रखने से पत्रावली में शामिल नहीं माना जा सकता है.

वसीम खान एडवोकेट
राजस्थान हाइकोर्ट, जयपुर

13/08/2021

भाजपा का नया भारत।
एक ग़रीब को नारा लगाकर पीट रहे दंगाईयों तुम्हें शर्म नहीं आती कि तुम्हारी इन हरकतों को देखकर मर्यादा पुरुषोत्तम राम जी क्या सोचते होंगे ।
जिसको तुम पीट रहे हो उसकी छोटी सी बेटी अपने पिता से लिपट जा रही है और इन दरिंदों को रहम तक नहीं आ रहा है ।
कानपुर की ये घटना योगी आदित्यनाथ के क़ानून व्यवस्था की असलियत बयान कर रही है ।
मोदी जी क्या सबका साथ यही है ?
यूपी पुलिस जिस तरह इन घटनाओं पर खानापूर्ति करने वाली कार्यवाही करती है उससे इन दंगाईयों का मनोबल और बढ़ता है ।

28/07/2021

CrPC की धारा 156(3)के तहत पुलिस जांच का आदेश देने से पहले CrPC की धारा 200के तहत शिकायतकर्ताकी शपथ पर जांच नहीं की जानी चाहिए :- SC

मोहब्बत की इस मिट्टी को हिंदुस्तान कहते हैं।🇳🇪🇳🇪🇳🇪🇳🇪🇳🇪🇳🇪🇳🇪🇳🇪
26/07/2021

मोहब्बत की इस मिट्टी को हिंदुस्तान कहते हैं।
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