Adv Anurag Nema

Adv Anurag Nema अधिवक्ता
मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय जबलपुर
जिला एवम सत्र न्यायालय।
🄻🄻🄱,🄻🄻🄼

31/08/2022
19/08/2021

अब E-FIR की सुविधा भी आपके पास, मध्यप्रदेश पुलिस का सहयोग आपके साथ

अब आपको FIR दर्ज कराने के लिए पुलिस थाने जाने की जरूरत नहीं है। मध्यप्रदेश पुलिस ने E-FIR की सुविधा शुरू कर दी है।

25/01/2021

MP High Court Jabalpur

25/08/2020

कांग्रेस वो स्कूल है....!
जहाँ कोई भी छात्र,कितने भी अच्छे अंक ले आए...!!
फ़र्स्ट तो हेडमास्टर का बेटा ही आएगा..!!

 ुगपुरुष_डॉक्टर_हेडगेवार               - 21 जून पुण्यतिथि -एक प्रखर स्वतंत्रता सेनानी डॉक्टर केशवराव बलिराम हेडगेवार द्व...
21/06/2020

ुगपुरुष_डॉक्टर_हेडगेवार
- 21 जून पुण्यतिथि -

एक प्रखर स्वतंत्रता सेनानी डॉक्टर केशवराव बलिराम हेडगेवार द्वारा 1925 में स्थापित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने जन्मकाल से आज तक नाम, पद, यश, गरिमा, आत्मप्रशंसा और प्रचार से कोसों दूर रहकर राष्ट्र हित में समाजसेवा, धर्मरक्षा और राष्ट्रभक्ति के प्रत्येक कार्य में अग्रणी भूमिका निभाई है. भारत में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध लड़े गए स्वतंत्रता संग्राम में भी संघ ने आजादी के लिए संघर्षरत तत्कालीन प्रायः सभी संस्थाओं/दलों द्वारा आयोजित आंदोलनों/सत्याग्रहों और सशस्त्र क्रांति में बढ़चढ़ कर भाग लिया था. संघ ने अपने संगठन को सदैव पार्श्व भूमिका में रखा. उस समय यही राष्ट्र के हित में था. परन्तु इसका यह अर्थ लगा लेना मूर्खता ही है कि संघ ने कुछ नहीं किया. सम्भवतया संघ ही उस समय का एकमात्र ऐसा संगठन था, जिसके निर्माता ने स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भागीदारी और हिन्दू संगठन का कार्य इन दोनों मोर्चों पर सफलता प्राप्त की.

इतिहास के साथ खिलवाड़
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रसिद्धिपराङमुखता और निःस्वार्थ कार्यपद्धति को संघ की कमजोरी मानकर कतिपय स्वार्थी तत्वों ने स्वतंत्रता संग्राम में संघ के अग्रणी योगदान पर प्रश्नचिन्ह लगा दिए. संघ विरोधी इन तत्वों ने अपने राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए संघ के स्वयंसेवकों की स्वतंत्रता संग्राम में भागीदारी को सिरे से खारिज कर दिया. चिरपुरातन भारत राष्ट्र के विभाजन के लिए जिम्मेदार इन लोगों ने तो 1857 के स्वतंत्रता संग्राम, वासुदेव बलवंत फड़के के किसान आंदोलन, सतगुरु रामसिंह के कूका आंदोलन, देशव्यापी क्रांतिकारी संगठन अनुशीलन समिति, हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातांत्रिक सेना, गदर पार्टी, अभिनव भारत, सशस्त्र क्रांतिकारी समूहों, हिन्दू महासभा, आर्यसमाज, आजाद हिन्द फौज और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसी अनेकों राष्ट्रभक्त संस्थाओं के योगदान को नकार कर समस्त स्वतंत्रता संग्राम को एक ही दल और एक ही नेता के खाते में डाल दिया. इन लोगों ने इतिहास के साथ खिलवाड़ करने के साथ उन लाखों स्वतंत्रता सेनानियों का अपमान किया है, जिन्होंने स्वतंत्रता देवी के चरणों में अपना सर्वस्व अर्पण कर दिया और बाजा बजा दिया ‘दे दी हमें आजादी हमें बिना खड़ग बिना ढाल’.

जन्मजात स्वतंत्रता सेनानी
उपरोक्त संदर्भ में सबसे अधिक अन्याय हुआ संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार के साथ. स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी परन्तु अज्ञात योद्धा डॉक्टर हेडगेवार तो जन्मजात स्वतंत्रता सेनानी थे. बाल्यकाल से लेकर जीवन की अंतिम श्वास तक देश की स्वतंत्रता के लिए जूझने वाले इस युगपुरुष ने न तो अपनी आत्मकथा लिखी और न ही समाचार पत्रों में छपने की चाहत पाली. मात्र 8-10 वर्ष की आयु में ही ‘वंदेमातरम’ के लिए संघर्ष, नागपुर के सीताबर्ड़ी किले पर भगवा ध्वज फहराने की योजना और महारानी विक्टोरिया के राज्यारोहण एवं जन्मदिवस का बहिष्कार इत्यादि साहसिक गतिविधियों के साथ ही इस स्वतंत्रता सेनानी का संग्राम प्रारम्भ हो गया था. कलकत्ता में सक्रिय क्रांतिकारी संगठन अनुशीलन समिति में सक्रियता के बाद 1915-17 में प्रथम विश्व युद्ध के समय देशव्यापी विपलव की तैयारी, महात्मा गांधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन एवं दांडी यात्रा में सक्रिय सहयोग, कांग्रेसी नेता के नाते अंग्रेजों के विरुद्ध जनसभाओं में धुंआधार भाषण, कांग्रेस के अधिवेशनों में व्यवस्था की जिम्मेदारी और स्वयंसेवक दल का गठन, पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव लाना इत्यादि प्रसंग उनके स्वतंत्रता संग्राम में संघर्षरत जीवन का परिचय है.

डॉक्टर हेडगेवार ने दो बार एक-एक वर्ष के घोर कारावास में यातनाएं सहन कीं. संघ स्थापना के बाद भी उन्होंने स्वयंसेवकों को गांधी जी के आंदोलनों में बढ़चढ़ कर भाग लेने की स्वीकृति दी. हजारों स्वयंसेवक जेलों में यातनाएं सहते रहे. संघ ने यह जंग कांग्रेस और महात्मा जी के नेतृत्व में लड़ी. 26 जनवरी 1929 को संघ की सभी शाखाओं में स्वतंत्रता दिवस मनाया गया. वीर सावरकर, सुभाष चंद्र बोस एवं डॉक्टर हेडगेवार सेना में विद्रोह एवं आजाद हिन्द फौज के गठन के पक्षधर थे. सन् 1942 में अंग्रेजों भारत छोड़ो के आंदोलन में संघ के स्वयंसेवकों की मुख्य भूमिका थी (इन सभी प्रसंगों का सिलसिलेवार ब्यौरा अगली किश्तों में दिया जाएगा).

स्वतंत्रता संग्राम में अग्रणी भूमिका
संघ के ऊपर स्वतंत्रता संग्राम से दूर रहने जैसे आरोप वही लोग लगाते हैं जो स्वयं अंग्रजों की जी हुजूरी करते रहे, जो हाथ में भीख का कटोरा लेकर अंग्रेजों से आजादी की भीख मांगते रहे. इन लोगों ने सदैव सुभाष, सावरकर, भगत सिंह, त्रलोक्यनाथ अग्रणी , करतार सिंह सराभा , रासबिहारी बोस, श्यामजी कृष्ण वर्मा, लाला हरदयाल, यतीन्द्रनाथ सान्याल, राम प्रसाद बिस्मिल और चन्द्रशेखर आजाद जैसे प्रखर राष्ट्र भक्त स्वतंत्रता सेनानियों को ‘पथभ्रष्ट देशभक्त’ तक कह डाला. उल्लेखनीय है कि इन सभी स्वतंत्रता सेनानियों को संघ का पूर्ण सहयोग मिलता रहा था. अपने संगठन के नाम से ऊपर उठकर स्वयंसेवकों ने अहिंसक सत्याग्रह एवं सशस्त्र क्रांति दोनों में अग्रणी भूमिका निभाई थी.

ऐतिहासिक सच्चाई तो यह है कि 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद पूरे भारत में तेज गति के साथ हो रहे हिन्दुत्व के जागरण, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पुनर्स्थापन , चहुंओर क्रांतिकारी गतिविधियों, संगठित हो रहे भारतीय समाज और भारतवासियों की स्वातन्त्रय प्राप्ति के लिए उत्कट इच्छा कुचलकर उसे दिशाभ्रमित करने के लिए 1885 में एक कट्टरपंथी ईसाई अंग्रेज ए.ओ. ह्यूम ने प्रारम्भिक क्रांग्रेस की स्थापना की थी. (इस कांग्रेस का स्वतंत्रता संग्राम से कोई लेना देना नहीं था. यह कांग्रेस अंग्रेजों का सुरक्षा कवच थी) अतः अंग्रेजों की इसी कुटिल चाल को विफल करने, भारतीयता को विदेशी/विधर्मी षड्यंत्रों से बचाने, स्वतंत्रता आंदोलन को सनातन राष्ट्रीय आधार प्रदान करने और एक राष्ट्रव्यापी, शक्तिशाली हिन्दू संगठन (सभी भारतीयों का संगठन) तैयार करने के लिए डॉक्टर हेडगेवार ने 1925 में संघ की स्थापना की थी. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अर्थात् राष्ट्र की स्वतंत्रता/सुरक्षा के लिए देशभक्त स्वतंत्रता सेनानियों का संगठन.

तूने सींचा है अपने लहू से वतन की मिट्टी को वीरों की इस मिट्टी पर हम अभिमान करते हैं। ऐ मेरे वतन के शेर तेरे जाने से चीत्...
19/06/2020

तूने सींचा है अपने लहू से वतन की मिट्टी को
वीरों की इस मिट्टी पर हम अभिमान करते हैं।

ऐ मेरे वतन के शेर तेरे जाने से चीत्कार रहा दिल
तेरे लहू के हर कतरे, तेरी शहादत को सलाम करते हैं।

भारत-चीन की झड़प में शहीद हुए रीवा के वीर सपूत दीपक सिंह के चरणों में विनम्र श्रद्धांजलि।

अभी नही तो कभी नहीं
17/06/2020

अभी नही तो कभी नहीं

"यदि अस्पृश्यता पाप नहीं है तो दुनियाँ में अन्य कोई पाप हो ही नहीं सकता" - प.पू. बाला साहब देवरसराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ...
17/06/2020

"यदि अस्पृश्यता पाप नहीं है तो दुनियाँ में अन्य कोई पाप हो ही नहीं सकता" - प.पू. बाला साहब देवरस
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय #सरसंघचालक प.पु. #बालासाहब_देवरस जी की पुण्यतिथि पर उन्हें सादर नमन।

08/06/2020

संघर्षों से लड़ना सीखा, संघर्ष हमारी गाथा है,
सत्ता का कोई शौक नहीं, बस हिन्दू धर्म से नाता है!

🚩 जय श्री राम 🚩 हर हर महादेव 🚩

परम पूजनीय स्वामी विवेकानन्द  (जन्म: 12 जनवरी,१८६३ - मृत्यु: ४ जुलाई,१९०२) वेदान्त के विख्यात और प्रभावशाली आध्यात्मिक ग...
15/05/2020

परम पूजनीय स्वामी विवेकानन्द

(जन्म: 12 जनवरी,१८६३ - मृत्यु: ४ जुलाई,१९०२)

वेदान्त के विख्यात और प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरु थे। उनका वास्तविक नाम नरेन्द्र नाथ दत्त था।
उन्होंने अमेरिका स्थित शिकागो में सन् १८९३ में आयोजित विश्व धर्म महासभा में भारत की ओर से सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया था।

भारत का आध्यात्मिकता से परिपूर्ण वेदान्त दर्शन अमेरिका और यूरोप के हर एक देश में स्वामी विवेकानन्द की वक्तृता के कारण ही पहुँचा।
उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की थी जो आज भी अपना काम कर रहा है। वे रामकृष्ण परमहंस के सुयोग्य शिष्य थे। उन्हें 2 मिनट का समय दिया गया था लेकिन उन्हें प्रमुख रूप से उनके भाषण की शुरुआत

"मेरे अमरीकी भाइयो एवं बहनो"

के साथ करने के लिये जाना जाता है। उनके संबोधन के इस प्रथम वाक्य ने सबका दिल जीत लिया था।

( जन्म और बचपन )

स्वामी विवेकानन्द का जन्म 12 जनवरी सन् 1863 को कलकत्ता में एक कायस्थपरिवार में हुआ था।

उनके बचपन का घर का नाम वीरेश्वर रखा गया, किन्तु उनका औपचारिक नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था।था।

पिता विश्वनाथ दत्त कलकत्ता हाईकोर्ट के एक प्रसिद्ध वकील थे।

दुर्गाचरण दत्ता, (नरेंद्र के दादा) संस्कृत और फारसी के विद्वान थे

उन्होंने अपने परिवार को 25 की उम्र में छोड़ दिया और एक साधु बन गए।

उनकी माता भुवनेश्वरी देवी धार्मिक विचारों की महिला थीं।

उनका अधिकांश समय भगवान शिव की पूजा-अर्चना में व्यतीत होता था।

नरेंद्र के पिता और उनकी माँ के धार्मिक, प्रगतिशील व तर्कसंगत रवैया ने उनकी सोच और व्यक्तित्व को आकार देने में मदद की।

बचपन से ही नरेन्द्र अत्यन्त कुशाग्र बुद्धि के तो थे ही नटखट भी थे। अपने साथी बच्चों के साथ वे खूब शरारत करते और मौका मिलने पर अपने अध्यापकों के साथ भी शरारत करने से नहीं चूकते थे। उनके घर में नियमपूर्वक रोज पूजा-पाठ होता था धार्मिक प्रवृत्ति की होने के कारण माता भुवनेश्वरी देवी को पुराण,रामायण, महाभारत आदि की कथा सुनने का बहुत शौक था।

कथावाचक बराबर इनके घर आते रहते थे। नियमित रूप से भजन-कीर्तन भी होता रहता था। परिवार के धार्मिक एवं आध्यात्मिक वातावरण के प्रभाव से बालक नरेन्द्र के मन में बचपन से ही धर्म एवं अध्यात्म के संस्कार गहरे होते गये। माता-पिता के संस्कारों और धार्मिक वातावरण के कारण बालक के मन में बचपन से ही ईश्वर को जानने और उसे प्राप्त करने की लालसा दिखायी देने लगी थी। ईश्वर के बारे में जानने की उत्सुकता में कभी-कभी वे ऐसे प्रश्न पूछ बैठते थे कि इनके माता-पिता और कथावाचक पण्डितजी तक चक्कर में पड़ जाते थे।


( शिक्षा )

सन् 1871 में, आठ साल की उम्र में, नरेंद्रनाथ ने ईश्वर चंद्र विद्यासागर के मेट्रोपोलिटन संस्थान में दाखिला लिया जहाँ वे स्कूलगए।

1877 में उनका परिवार रायपुर चला गया। 1879 में, कलकत्ता में अपने परिवार की वापसी के बाद, वह एकमात्र छात्र थे जिन्होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज प्रवेश परीक्षा में प्रथम डिवीजन अंक प्राप्त किये।

वे दर्शन, धर्म, इतिहास, सामाजिक विज्ञान, कला और साहित्य सहित विषयों के एक उत्साही पाठक थे।

इनकी वेद, उपनिषद, भगवद् गीता, रामायण, महाभारत और पुराणों के अतिरिक्त अनेक हिन्दू शास्त्रों में गहन रूचि थी। नरेंद्र को भारतीय शास्त्रीय संगीत में प्रशिक्षित किया गया था

और ये नियमित रूप से शारीरिक व्यायाम में व खेलों में भाग लिया करते थे। नरेंद्र ने पश्चिमी तर्क, पश्चिमी दर्शन और यूरोपीय इतिहास का अध्ययन जनरल असेंबली इंस्टिटूशन (अब स्कॉटिश चर्च कॉलेज) में किया।

1881 में इन्होंने ललित कला की परीक्षा उत्तीर्ण की, और 1884 में कला स्नातक की डिग्री पूरी कर ली।

नरेंद्र ने डेविड ह्यूम, इमैनुएल कांट, जोहान गोटलिब फिच, बारूक स्पिनोज़ा, जोर्ज डब्लू एच हेजेल, आर्थर स्कूपइन्हार , ऑगस्ट कॉम्टे, जॉन स्टुअर्ट मिल और चार्ल्स डार्विन के कामों का अध्ययन किया।

उन्होंने स्पेंसर की किताब एजुकेशन (1860) का बंगाली में अनुवाद किया।

ये हर्बर्ट स्पेंसर के विकासवाद से काफी मोहित थे।
पश्चिम दार्शनिकों के अध्यन के साथ ही इन्होंने संस्कृत ग्रंथों और बंगाली साहित्य को भी सीखा।

विलियम हेस्टी (महासभा संस्था के प्रिंसिपल) ने लिखा, "नरेंद्र वास्तव में एक जीनियस है। मैंने काफी विस्तृत और बड़े इलाकों में यात्रा की है लेकिन उनकी जैसी प्रतिभा वाला का एक भी बालक कहीं नहीं देखा यहाँ तक की जर्मन विश्वविद्यालयों के दार्शनिक छात्रों में भी नहीं।" अनेक बार इन्हें श्रुतिधर( विलक्षण स्मृति वाला एक व्यक्ति) भी कहा गया है।


( अध्यात्मिक शिक्षा )

1880 में नरेंद्र, ईसाई से हिन्दू धर्म में रामकृष्ण के प्रभाव से परिवर्तित केशव चंद्र सेन की नव विधान में शामिल हुए,
नरेंद्र 1884 से पहले कुछ बिंदु पर, एक फ्री मसोनरी लॉज और साधारण ब्रह्म समाज जो ब्रह्म समाज का ही एक अलग गुट था और जो केशव चंद्र सेन और देवेंद्रनाथ टैगोर के नेतृत्व में था।
1881-1884 के दौरान ये सेन्स बैंड ऑफ़ होप में भी सक्रीय रहे जो धूम्रपान और शराब पीने से युवाओं को हतोत्साहित करता था।

यह नरेंद्र के परिवेश के कारण पश्चिमी आध्यात्मिकता के साथ परिचित हो गया था। उनके प्रारंभिक विश्वासों को ब्रह्म समाज ने जो एक निराकार ईश्वर में विश्वास और मूर्ति पूजा का प्रतिवाद करता था, ने प्रभावित किया और सुव्यवस्थित, युक्तिसंगत, अद्वैतवादी अवधारणाओं , धर्मशास्त्र ,वेदांत और उपनिषदों के एक चयनात्मक और आधुनिक ढंग से अध्यन पर प्रोत्साहित किया।


( यात्राएं )

२५ वर्ष की अवस्था में नरेन्द्र ने गेरुआ वस्त्र धारण कर लिए थे। तत्पश्चात उन्होंने पैदल ही पूरे भारतवर्ष की यात्रा की।

विवेकानंद ने 31 मई 18 9 3 को अपनी यात्रा शुरू की और जापान के कई शहरों (नागासाकी, कोबे, योकोहामा, ओसाका, क्योटो और टोक्यो समेत) का दौरा किया,
चीन और कनाडा होते हुए अमेरिका के शिकागो पहुँचे

सन्‌ १८९३ में शिकागो (अमरीका) में विश्व धर्म परिषद् हो रही थी। स्वामी विवेकानन्द उसमें भारत के प्रतिनिधि के रूप में पहुँचे।

योरोप-अमरीका के लोग उस समय पराधीन भारतवासियों को बहुत हीन दृष्टि से देखते थे। वहाँ लोगों ने बहुत प्रयत्न किया कि स्वामी विवेकानन्द को सर्वधर्म परिषद् में बोलने का समय ही न मिले। परन्तु एक अमेरिकन प्रोफेसर के प्रयास से उन्हें थोड़ा समय मिला। उस परिषद् में उनके विचार सुनकर सभी विद्वान चकित हो गये। फिर तो अमरीका में उनका अत्यधिक स्वागत हुआ। वहाँ उनके भक्तों का एक बड़ा समुदाय बन गया। तीन वर्ष वे अमरीका में रहे और वहाँ के लोगों को भारतीय तत्वज्ञान की अद्भुत ज्योति प्रदान की। उनकी वक्तृत्व-शैली तथा ज्ञान को देखते हुए वहाँ के मीडिया ने उन्हें साइक्लॉनिक हिन्दू का नाम दिया।

"अध्यात्म-विद्या और भारतीय दर्शन के बिना विश्व अनाथ हो जायेगा" यह स्वामी विवेकानन्द का दृढ़ विश्वास था। अमरीका में उन्होंने रामकृष्ण मिशन की अनेक शाखाएँ स्थापित कीं। अनेक अमरीकी विद्वानों ने उनका शिष्यत्व ग्रहण किया। वे सदा अपने को 'गरीबों का सेवक' कहते थे। भारत के गौरव को देश-देशान्तरों में उज्ज्वल करने का उन्होंने सदा प्रयत्न किया।


( योगदान एवं महत्व )

परम पूजनीय स्वामी विवेकानंद जी का जीवन परिचय बताता है कि उन्तालीस वर्ष के संक्षिप्त जीवनकाल में स्वामी विवेकानन्द जो काम कर गये वे आने वाली अनेक शताब्दियों तक पीढ़ियों का मार्गदर्शन करते रहेंगे।

तीस वर्ष की आयु में स्वामी विवेकानन्द ने शिकागो, अमेरिका के विश्व धर्म सम्मेलन में हिंदू धर्म का प्रतिनिधित्व किया और उसे सार्वभौमिक पहचान दिलवायी। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने एक बार कहा था-"यदि आप भारत को जानना चाहते हैं तो विवेकानन्द को पढ़िये। उनमें आप सब कुछ सकारात्मक ही पायेंगे, नकारात्मक कुछ भी नहीं।"

रोमां रोलां ने उनके बारे में कहा था-"उनके द्वितीय होने की कल्पना करना भी असम्भव है, वे जहाँ भी गये, सर्वप्रथम ही रहे। हर कोई उनमें अपने नेता का दिग्दर्शन करता था। वे ईश्वर के प्रतिनिधि थे और सब पर प्रभुत्व प्राप्त कर लेना ही उनकी विशिष्टता थी। हिमालय प्रदेश में एक बार एक अनजान यात्री उन्हें देख ठिठक कर रुक गया और आश्चर्यपूर्वक चिल्ला उठा-‘शिव!’ यह ऐसा हुआ मानो उस व्यक्ति के आराध्य देव ने अपना नाम उनके माथे पर लिख दिया हो।"

वे केवल सन्त ही नहीं, एक महान देशभक्त, वक्ता, विचारक, लेखक और मानव-प्रेमी भी थे। अमेरिका से लौटकर उन्होंने देशवासियों का आह्वान करते हुए कहा था-"नया भारत निकल पड़े मोची की दुकान से, भड़भूँजे के भाड़ से, कारखाने से, हाट से, बाजार से; निकल पडे झाड़ियों, जंगलों, पहाड़ों, पर्वतों से।" और जनता ने स्वामीजी की पुकार का उत्तर दिया। वह गर्व के साथ निकल पड़ी। गान्धीजी को आजादी की लड़ाई में जो जन-समर्थन मिला, वह विवेकानन्द के आह्वान का ही फल था। इस प्रकार वे भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के भी एक प्रमुख प्रेरणा के स्रोत बने। उनका विश्वास था कि पवित्र भारतवर्ष धर्म एवं दर्शन की पुण्यभूमि है। यहीं बड़े-बड़े महात्माओं व ऋषियों का जन्म हुआ, यही संन्यास एवं त्याग की भूमि है तथा यहीं-केवल यहीं-आदिकाल से लेकर आज तक मनुष्य के लिये जीवन के सर्वोच्च आदर्श एवं मुक्ति का द्वार खुला हुआ है। उनके कथन-"‘उठो, जागो, स्वयं जागकर औरों को जगाओ। अपने नर-जन्म को सफल करो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाये।"

उन्नीसवीं सदी के आखिरी वर्षोँ में विवेकानन्द लगभग सशस्त्र या हिंसक क्रान्ति के जरिये भी देश को आजाद करना चाहते थे। परन्तु उन्हें जल्द ही यह विश्वास हो गया था कि परिस्थितियाँ उन इरादों के लिये अभी परिपक्व नहीं हैं। इसके बाद ही विवेकानन्द ने ‘एकला चलो‘ की नीति का पालन करते हुए एक परिव्राजक के रूप में भारत और दुनिया को खंगाल डाला।

उन्होंने कहा था कि मुझे बहुत से युवा संन्यासी चाहिये जो भारत के ग्रामों में फैलकर देशवासियों की सेवा में खप जायें। उनका यह सपना पूरा नहीं हुआ। विवेकानन्द पुरोहितवाद, धार्मिक आडम्बरों, कठमुल्लापन और रूढ़ियों के सख्त खिलाफ थे। उन्होंने धर्म को मनुष्य की सेवा के केन्द्र में रखकर ही आध्यात्मिक चिंतन किया था। उनका हिन्दू धर्म अटपटा, लिजलिजा और वायवीय नहीं था। उन्होंने यह विद्रोही बयान दिया था कि इस देश के तैंतीस करोड़ भूखे, दरिद्र और कुपोषण के शिकार लोगों को देवी देवताओं की तरह मन्दिरों में स्थापित कर दिया जाये और मन्दिरों से देवी देवताओं की मूर्तियों को हटा दिया जाये।

उनका यह कालजयी आह्वान इक्कीसवीं सदी के पहले दशक के अन्त में एक बड़ा प्रश्नवाचक चिन्ह खड़ा करता है। उनके इस आह्वान को सुनकर पूरे पुरोहित वर्ग की घिग्घी बँध गई थी। आज कोई दूसरा साधु तो क्या सरकारी मशीनरी भी किसी अवैध मन्दिर की मूर्ति को हटाने का जोखिम नहीं उठा सकती। विवेकानन्द के जीवन की अन्तर्लय यही थी कि वे इस बात से आश्वस्त थे कि धरती की गोद में यदि ऐसा कोई देश है जिसने मनुष्य की हर तरह की बेहतरी के लिए ईमानदार कोशिशें की हैं, तो वह भारत ही है।

उन्होंने पुरोहितवाद, ब्राह्मणवाद, धार्मिक कर्मकाण्ड और रूढ़ियों की खिल्ली भी उड़ायी और लगभग आक्रमणकारी भाषा में ऐसी विसंगतियों के खिलाफ युद्ध भी किया। उनकी दृष्टि में हिन्दू धर्म के सर्वश्रेष्ठ चिन्तकों के विचारों का निचोड़ पूरी दुनिया के लिए अब भी ईर्ष्या का विषय है। स्वामीजी ने संकेत दिया था कि विदेशों में भौतिक समृद्धि तो है और उसकी भारत को जरूरत भी है लेकिन हमें याचक नहीं बनना चाहिये। हमारे पास उससे ज्यादा बहुत कुछ है जो हम पश्चिम को दे सकते हैं और पश्चिम को उसकी बेसाख्ता जरूरत है।

यह स्वामी विवेकानन्द का अपने देश की धरोहर के लिये दम्भ या बड़बोलापन नहीं था। यह एक वेदान्ती साधु की भारतीय सभ्यता और संस्कृति की तटस्थ, वस्तुपरक और मूल्यगत आलोचना थी। बीसवीं सदी के इतिहास ने बाद में उसी पर मुहर लगायी।

स्वामी विवेकानन्द के शिक्षा दर्शन के आधारभूत सिद्धान्त

१. शिक्षा ऐसी हो जिससे बालक का शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक विकास हो सके।
२. शिक्षा ऐसी हो जिससे बालक के चरित्र का निर्माण हो, मन का विकास हो, बुद्धि विकसित हो तथा बालक आत्मनिर्भर बने।
३. बालक एवं बालिकाओं दोनों को समान शिक्षा देनी चाहिए।
४. धार्मिक शिक्षा, पुस्तकों द्वारा न देकर आचरण एवं संस्कारों द्वारा देनी चाहिए।
५. पाठ्यक्रम में लौकिक एवं पारलौकिक दोनों प्रकार के विषयों को स्थान देना चाहिए।
६. शिक्षा, गुरू गृह में प्राप्त की जा सकती है।
७. शिक्षक एवं छात्र का सम्बन्ध अधिक से अधिक निकट का होना चाहिए।
८. सर्वसाधारण में शिक्षा का प्रचार एवं प्रसार किया जान चाहिये।
९. देश की आर्थिक प्रगति के लिए तकनीकी शिक्षा की व्यवस्था की जाय।
१०. मानवीय एवं राष्ट्रीय शिक्षा परिवार से ही शुरू करनी चाहिए।
११. शिक्षा ऐसी हो जो सीखने वाले को जीवन संघर्ष से लड़ने की शक्ती दे।
१२. स्वामी विवेकानंद के अनुसार व्यक्ति को अपनी रूचि को महत्व देना चाहिए|

स्वामी विवेकानंद के शिक्षा पर विचार मनुष्य-निर्माण की प्रक्रिया पर केन्द्रित हैं, न कि महज़ किताबी ज्ञान पर।

एक पत्र में वे लिखते हैं–"शिक्षा क्या है? क्या वह पुस्तक-विद्या है? नहीं! क्या वह नाना प्रकार का ज्ञान है? नहीं, यह भी नहीं। जिस संयम के द्वारा इच्छाशक्ति का प्रवाह और विकास वश में लाया जाता है और वह फलदायक होता है, वह शिक्षा कहलाती है।" शिक्षा का उपयोग किस प्रकार चरित्र-गठन के लिए किया जाना चाहिए, इस विषय में स्वामी जी कहते हैं, "शिक्षा का मतलब यह नहीं है कि तुम्हारे दिमाग़ में ऐसी बहुत-सी बातें इस तरह ठूँस दी जायँ, जो आपस में, लड़ने लगें और तुम्हारा दिमाग़ उन्हें जीवन भर में हज़म न कर सके। जिस शिक्षा से हम अपना जीवन-निर्माण कर सकें, मनुष्य बन सकें, चरित्र-गठन कर सकें और विचारों का सामंजस्य कर सकें, वही वास्तव में शिक्षा कहलाने योग्य है। यदि तुम पाँच ही भावों को हज़म कर तदनुसार जीवन और चरित्र गठित कर सके हो तो तुम्हारी शिक्षा उस आदमी की अपेक्षा बहुत अधिक है, जिसने एक पूरी की पूरी लाइब्रेरी ही कण्ठस्थ कर ली है।"

देश की उन्नति–फिर चाहे वह आर्थिक हो या आध्यात्मिक–में स्वामी जी शिक्षा की भूमिका केन्द्रिय मानते थे।

भारत तथा पश्चिम के बीच के अन्तर को वे इसी दृष्टि से वर्णित करते हुए कहते हैं, "केवल शिक्षा! शिक्षा! शिक्षा! यूरोप के बहुतेरे नगरों में घूमकर और वहाँ के ग़रीबों के भी अमन-चैन और विद्या को देखकर हमारे ग़रीबों की बात याद आती थी और मैं आँसू बहाता था। यह अन्तर क्यों हुआ? जवाब पाया – शिक्षा!" स्वामी विवेकानंद का विचार था कि उपयुक्त शिक्षा के माध्यम से व्यक्तित्व विकसित होना चाहिए और चरित्र की उन्नति होनी चाहिए। सन् १९०० में लॉस एंजिल्स, कैलिफ़ोर्निया में दिए गए एक व्याख्यान में स्वामी जी यही बात सामने रखते हैं, "हमारी सभी प्रकार की शिक्षाओं का उद्देश्य तो मनुष्य के इसी व्यक्तित्व का निर्माण होना चाहिये। परन्तु इसके विपरीत हम केवल बाहर से पालिश करने का ही प्रयत्न करते हैं। यदि भीतर कुछ सार न हो तो बाहरी रंग चढ़ाने से क्या लाभ? शिक्षा का लक्ष्य अथवा उद्देश्य तो मनुष्य का विकास ही है।"

( परम पूजनीय जी का संदेश )

उठो जागो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त नहीं हो जाता।

हर आत्मा ईश्वर से जुड़ी है, करना ये है कि हम इसकी दिव्यता को पहचाने अपने आप को अंदर या बाहर से सुधारकर। कर्म, पूजा, अंतर मन या जीवन दर्शन इनमें से किसी एक या सब से ऐसा किया जा सकता है और फिर अपने आपको खोल दें। यही सभी धर्मो का सारांश है। मंदिर, परंपराएं , किताबें या पढ़ाई ये सब इससे कम महत्वपूर्ण है।

एक विचार लें और इसे ही अपनी जिंदगी का एकमात्र विचार बना लें। इसी विचार के बारे में सोचे, सपना देखे और इसी विचार पर जिएं। आपके मस्तिष्क , दिमाग और रगों में यही एक विचार भर जाए। यही सफलता का रास्ता है। इसी तरह से बड़े बड़े आध्यात्मिक धर्म पुरुष बनते हैं।


( परम पूज्य जी की संपूर्ण जीवन यात्रा )

12 जनवरी 1863 -- कलकत्ता में जन्म

1879 -- प्रेसीडेंसी कॉलेज कलकत्ता में प्रवेश

1880 -- जनरल असेम्बली इंस्टीट्यूशन में प्रवेश

नवम्बर 1881 -- रामकृष्ण परमहंस से प्रथम भेंट

1882-86 -- रामकृष्ण परमहंस से सम्बद्ध

1884 -- स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण; पिता का स्वर्गवास

1885 -- रामकृष्ण परमहंस की अन्तिम बीमारी

16 अगस्त 1886 -- रामकृष्ण परमहंस का निधन

1886 -- वराहनगर मठ की स्थापना

1887 -- वड़ानगर मठ में औपचारिक सन्यास

1890-93 -- परिव्राजक के रूप में भारत-भ्रमण

25 दिसम्बर 1892 -- कन्याकुमारी में

13 फ़रवरी 1893 -- प्रथम सार्वजनिक व्याख्यान सिकन्दराबाद में

31 मई 1893 -- मुम्बई से अमरीका रवाना

25 जुलाई 1893 -- वैंकूवर, कनाडा पहुँचे

30 जुलाई 1893 -- शिकागो आगमन

अगस्त 1893 -- हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रो॰ जॉन राइट से भेंट

11 सितम्बर 1893 -- विश्व धर्म सम्मेलन, शिकागो में प्रथम व्याख्यान

27 सितम्बर 1893 -- विश्व धर्म सम्मेलन, शिकागो में अन्तिम व्याख्यान

16 मई 1894 -- हार्वर्ड विश्वविद्यालय में संभाषण

नवंबर 1894 -- न्यूयॉर्क में वेदान्त समिति की स्थापना

जनवरी 1895 -- न्यूयॉर्क में धार्मिक कक्षाओं का संचालन आरम्भ

अगस्त 1895 -- पेरिस में

अक्टूबर 1895 -- लन्दन में व्याख्यान

6 दिसम्बर 1895 -- वापस न्यूयॉर्क

22-25 मार्च 1896 -- फिर लन्दन

मई-जुलाई 1896 -- हार्वर्ड विश्वविद्यालय में व्याख्यान

15 अप्रैल 1896 -- वापस लन्दन

मई-जुलाई 1896 -- लंदन में धार्मिक कक्षाएँ

28 मई 1896 -- ऑक्सफोर्ड में मैक्समूलर से भेंट

30 दिसम्बर 1896 -- नेपाल से भारत की ओर रवाना

15 जनवरी 1897 -- कोलम्बो, श्रीलंका आगमन

जनवरी, 1897 -- रामनाथपुरम् (रामेश्वरम) में जोरदार स्वागत एवं भाषण

6-15 फ़रवरी 1897 -- मद्रास में

19 फ़रवरी 1897 -- कलकत्ता आगमन

1 मई 1897 -- रामकृष्ण मिशन की स्थापना

मई-दिसम्बर 1897 -- उत्तर भारत की यात्रा

जनवरी 1898 -- कलकत्ता वापसी

19 मार्च 1899 -- मायावती में अद्वैत आश्रम की स्थापना

20 जून 1899 -- पश्चिमी देशों की दूसरी यात्रा

31 जुलाई 1899 -- न्यूयॉर्क आगमन

22 फ़रवरी 1900 -- सैन फ्रांसिस्को में वेदान्त समिति की स्थापना

जून 1900 -- न्यूयॉर्क में अन्तिम कक्षा

26 जुलाई 1900 -- योरोप रवाना

24 अक्टूबर 1900 -- विएना, हंगरी, कुस्तुनतुनिया, ग्रीस, मिस्र आदि देशों की यात्रा

26 नवम्बर 1900 -- भारत रवाना

9 दिसम्बर 1900 -- बेलूर मठ आगमन

10 जनवरी 1901 -- मायावती की यात्रा

मार्च-मई 1901 -- पूर्वी बंगाल और असम की तीर्थयात्रा

जनवरी-फरवरी 1902 -- बोध गया और वाराणसी की यात्रा

मार्च 1902 -- बेलूर मठ में वापसी

4 जुलाई 1902 -- महासमाधि

परम पूजनीय अटल जी ।
01/08/2017

परम पूजनीय अटल जी ।

साजिश की बू आ रही --- अपनी राह में वो ख़ुद कांटे बो नहीं सकते,   कितना भी क्रोध हो आपा खो नहीं सकते।  खेतों में पसीना बहा...
08/06/2017

साजिश की बू आ रही ---
अपनी राह में वो ख़ुद कांटे बो नहीं सकते,
कितना भी क्रोध हो आपा खो नहीं सकते।
खेतों में पसीना बहा के फसल उगाने वाले,
किसान कभी भी इतने उग्र हो नहीं सकते।।
हमारे किसान भाई कभी इतने उग्र हो नही सकते।

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