12/12/2024
दहेज प्रताड़ना की समस्या भारतीय समाज में एक गंभीर कुरीति है, जिसके समाधान के लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए को लागू किया गया। इस प्रावधान का उद्देश्य था कि महिलाओं को दहेज के लिए होने वाले उत्पीड़न से सुरक्षा दी जाए और उनके अधिकार सुनिश्चित किए जाएं। हालांकि, समय के साथ इस कानून का व्यापक रूप से दुरुपयोग होने लगा है। कई मामलों में यह देखा गया है कि पारिवारिक विवादों में महिलाएं इस प्रावधान का इस्तेमाल झूठे आरोप लगाकर पुरुषों और उनके परिवारों को प्रताड़ित करने के लिए करती हैं। इससे न केवल निर्दोष पुरुषों का मानसिक और सामाजिक उत्पीड़न होता है, बल्कि परिवारों का विघटन भी होता है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस समस्या को गंभीरता से लेते हुए कई ऐतिहासिक फैसले दिए हैं। अरणेश कुमार बनाम बिहार राज्य (2014) में सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि 498ए के तहत सीधे गिरफ्तारी नहीं होनी चाहिए और मामले की गहन जांच के बाद ही कार्रवाई की जानी चाहिए। राजेश शर्मा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2017) में यह निर्णय हुआ कि परिवार कल्याण समितियां बनाई जाएं, जो शिकायत की सत्यता की जांच करें। इसके अलावा, सोशल एक्शन फोरम फॉर मैनवूमन (2018) मामले में कोर्ट ने दोहराया कि धारा 498ए का उद्देश्य महिलाओं की रक्षा करना है, लेकिन इसके दुरुपयोग पर रोक लगाना आवश्यक है।
यह स्पष्ट है कि इस कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए कानूनी संशोधन और सामाजिक जागरूकता की आवश्यकता है। झूठे मामलों पर सख्त दंड का प्रावधान किया जाना चाहिए और मध्यस्थता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। साथ ही, जांच प्रक्रिया को पारदर्शी और निष्पक्ष बनाना होगा। इस कानून का उद्देश्य तभी सफल होगा, जब इसे सही तरीके से लागू किया जाएगा और इसका उपयोग न्याय दिलाने के लिए होगा, न कि प्रतिशोध के लिए।