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POCSO और छेड़छाड़ के गंभीर आरोपों से चारों आरोपियों को मैंने दोषमुक्त कराया।मैंने, सिहोरा न्यायालय मेंPOCSO अधिनियम (धार...
08/11/2025

POCSO और छेड़छाड़ के गंभीर आरोपों से चारों आरोपियों को मैंने दोषमुक्त कराया।

मैंने, सिहोरा न्यायालय में
POCSO अधिनियम (धारा 7/8) सहित IPC की गंभीर धाराओं में आरोपित
चारों मुवक्किलों को सभी आरोपों से दोषमुक्त (Acquitted) कराया।

प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश श्री श्याम सुंदर झा के न्यायालय ने दिनांक 09 अक्टूबर 2025 को यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया।
यह फैसला केवल एक कानूनी जीत नहीं है, बल्कि उन चार निर्दोष परिवारों पर लगे कलंक को धोकर उनकी खोई हुई प्रतिष्ठा और सम्मान की बहाली है, जिन पर निराधार आरोप लगाए गए थे।
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जहां तर्क सशक्त हों और नीयत निष्पक्ष, वहां सत्य की जीत निश्चित होती है।” 🇮🇳 ⚖️



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13/05/2025

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07/05/2024

कोर्ट ने जोर देकर कहा कि न्यायाधीशों और न्यायिक अधिकारियों को गरिमा बनाए रखनी चाहिए और ऐसे आचरण से बचना चाहिए जो न्यायपा...
04/05/2024

कोर्ट ने जोर देकर कहा कि न्यायाधीशों और न्यायिक अधिकारियों को गरिमा बनाए रखनी चाहिए और ऐसे आचरण से बचना चाहिए जो न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को धूमिल कर सके। उन्होंने उल्लेख किया कि जब न्यायिक अधिकारी का व्यवहार न्यायपालिका की छवि को कमजोर करता है तो रिट अदालतों द्वारा हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं होती।

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10/04/2024

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08/04/2024

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में एक 24 साल पुराने आपराधिक मामले को रद्द/खारिज करते हुए जोर देकर कहा कि स्पीडी ट्रायल संवि...
21/09/2022

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में एक 24 साल पुराने आपराधिक मामले को रद्द/खारिज करते हुए जोर देकर कहा कि स्पीडी ट्रायल संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित जीवन और स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का एक अभिन्न अंग है। जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी की पीठ ने पिछले कई वर्षों से अनावश्यक और आधारहीन आपराधिक कार्यवाही लंबित होने पर भी अपना रोष व्यक्त किया और कहा कि वर्तमान मामले में, आपराधिक कार्यवाही 1998 से, यानी लगभग 24 वर्षों से लंबित है और यह केवल डिस्चार्ज आवेदन के चरण तक पहुंच पाई थी।
कोर्ट ने आगे अपने आदेश में कहा,''चूंकि इस अदालत ने कार्यवाही को रद्द कर दिया है, लेकिन 24 साल बाद, इसलिए आरोपी व्यक्तियों/आवेदकों की पीड़ा की भरपाई नहीं की जा सकती है। स्पीडी ट्रायल न केवल शिकायतकर्ता का बल्कि आरोपी व्यक्तियों का भी अधिकार है। इस बात का कोई स्पष्टीकरण नहीं है कि दो दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी कार्यवाही केवल डिस्चार्ज आवेदन के चरण तक ही क्यों पहुंच पाई है ... निचली अदालतों को यह प्रयास करने का निर्देश दिया जाता है कि प्रत्येक आपराधिक कार्यवाही को शीघ्रता से समाप्त किया जाए क्योंकि स्पीडी ट्रायल शिकायतकर्ता और आरोपी दोनों व्यक्तियों का अधिकार है।''

संक्षेप में मामला डॉ. मेराज अली और अन्य (आवेदक) के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 467 और 468 के तहत कथित रूप से अपराध करने के मामले में एक एफआईआर दर्ज की गई थी। जांच के बाद 18 नवंबर 2000 को चार्जशीट दाखिल की गई और संज्ञान भी लिया गया। आवेदकों ने 23 दिसंबर, 2021 को डिस्चार्ज के लिए एक आवेदन दायर किया, जिसे 9 मार्च, 2022 के आक्षेपित आदेश के माध्यम से खारिज कर दिया गया।
अदालत ने आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया क्योंकि कोर्ट ने पाया कि आवेदकों के खिलाफ शुरू की गई कार्यवाही में स्पष्ट रूप से दुर्भावना शामिल थी और निजी और व्यक्तिगत रंजिश के कारण आवेदकों से बदला लेने की दृष्टि से एक गुप्त उद्देश्य के साथ दुर्भावनापूर्ण तरीके से कार्यवाही शुरू की गई थी।
परिणामस्वरूप, आवेदन को अनुमति दे दी गई और मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, अलीगढ़ द्वारा 09 मार्च, 2022 को पारित आदेश को रद्द कर दिया गया।
केस टाइटल - डॉ. मेराज अली व अन्य बनाम यू.पी. राज्य व अन्य

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 195/340 के तहत शिकायत करने से पहले किसी संभावित-आरोपी...
19/09/2022

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 195/340 के तहत शिकायत करने से पहले किसी संभावित-आरोपी को सुनवाई का मौका देना जरूरी नहीं है। जस्टिस संजय किशन कौल, जस्टिस अभय एस. ओका और जस्टिस विक्रम नाथ की खंडपीठ दो न्यायाधीशों की पीठ की ओर से भेजे गये संदर्भ का जवाब दे रही थी। संदर्भित मुद्दे थे- (i) क्या दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 340 किसी कोर्ट द्वारा संहिता की धारा 195 के तहत शिकायत किए जाने से पहले प्रारंभिक जांच और संभावित आरोपी को सुनवाई का अवसर प्रदान करती है? (ii) ऐसी प्रारंभिक जांच का दायरा और परिधि क्या है?
कोर्ट ने कहा: एक आदेश दिए गए तथ्यात्मक परिदृश्य में है। निर्णय कानून के सिद्धांतों को निर्धारित करता है। परिदृश्य यह है कि इस कोर्ट द्वारा पारित कोई भी आदेश या निर्णय रिपोर्ट किए गए मामलों की अधिक मात्रा तैयार करने के लिए रिपोर्ट योग्य कवायद बन जाता है! इस प्रकार प्रचलित कानूनी सिद्धांतों पर कुछ भ्रम पैदा होने की संभावना बनती है। उपरोक्त उद्धृत पैराग्राफ में टिप्पणियों को स्पष्ट रूप से कानून के किसी भी सिद्धांत के निर्धारण के बजाय आदेश के तहत सामने आया था और यही कारण है कि बेंच ने इसे दिये गये तथ्यात्मक परिदृश्य के रूप में वर्गीकृत किया।

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