Adv.Kamal Gour

Adv.Kamal Gour Advocat Kamal Gour(A Right Indian Lawyer)

23/10/2021
हथियारों से लैस आरोपी पक्ष इस बात का लाभ नहीं उठा सकता कि झगड़ा अचानक हुआ था, पढ़िए सुप्रीम कोर्ट का फैसला
28/09/2019

हथियारों से लैस आरोपी पक्ष इस बात का लाभ नहीं उठा सकता कि झगड़ा अचानक हुआ था, पढ़िए सुप्रीम कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने ग़ौर करते हुए कहा कि जब आरोपी पक्ष अपराध स्थल पर हथियारों से लैस होकर आया तो यह इस बात का स्पष्ट सं.....

12/07/2019

💐💐जय श्री राम💐💐

*🙏लीगल पॉइंट🙏*

*चेक का डिसऑनर*

: सुप्रीम कोर्ट के हालिया 14 निर्णय एनआई अधिनियम की धारा 148 का प्रभाव है भूतलक्षी (Retrospective) [सुरिंदर सिंह देशवाल @ कर्नल एस. एस. देसवाल बनाम वीरेंद्र गांधी] इस मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने यह कहा कि निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट की संशोधित धारा 148, एक्ट की धारा 138 के तहत अपराध के लिए सजा और सजा के आदेश के खिलाफ अपील के संबंध में लागू होगी। यहां तक कि यह ऐसे मामले में भी यह लागू होगी जहां धारा 138 के तहत अपराध की शिकायत वर्ष 2018 के संशोधन अधिनियम से पहले यानी 01.09.2018 से पहले दायर की गयी थी। NI अधिनियम की धारा 148, जिसे वर्ष 2018 में एक संशोधन द्वारा पेश किया गया, अपीलीय अदालत को यह शक्ति देती है कि वह अभियुक्त/अपीलार्थी को ट्रायल कोर्ट द्वारा तय 'जुर्माना' या 'मुआवज़े' का न्यूनतम 20% जमा करने का निर्देश दे सके। पीठ ने यह भी कहा कि अपीलीय अदालत के पास, ट्रायल कोर्ट द्वारा तय 'जुर्माना' या 'मुआवज़े' का न्यूनतम 20%, जमा करने के आदेश देने की शक्ति है। यह भी देखा गया कि अपीलीय अदालत द्वारा जमा करने का निर्देश नहीं देना एक अपवाद है जिसके लिए विशेष कारणों को दिया जाना होगा। प्रश्न पूछे जाने पर वित्तीय क्षमता की व्याख्या करने के लिए शिकायतकर्ता है बाध्य [बसलिंगप्पा बनाम मुदीबसप्पा] यहां, अभियुक्त ने शिकायतकर्ता की वित्तीय क्षमता पर सवाल उठाया था, जिसे समझाया नहीं गया था। ट्रायल कोर्ट ने इन पहलुओं पर विचार करते हुए आरोपी को बरी कर दिया था। हालांकि, उच्च न्यायालय ने इस आदेश को उलट दिया और उसे दोषी ठहराया। शीर्ष अदालत ने यह माना कि चेक बाउंस के मामले में एक शिकायतकर्ता अपनी वित्तीय क्षमता की व्याख्या करने के लिए बाध्य है, जब अभियुक्तों द्वारा सबूतों के साथ उस पर सवाल उठाए जाते हैं। धारा 139 की परिकल्पना (presumption) धारित कर लेने के बाद, शिकायतकर्ता को निधि के स्रोत सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं है, [रोहितभाई जीवनलाल पटेल बनाम गुजरात राज्य] सर्वोच्च न्यायालय ने यह माना है कि यदि एक बार न्यायालय ने निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 139 के अनुसार कानूनी रूप से लागू किए गए ऋण (legally enforceable debt) के अस्तित्व के विषय में परिकल्पना धारित कर ली है, उसके बाद यदि आरोपी उक्त परिकल्पना को ग़लत साबित करने में सक्षम नहीं है, तो धन के स्रोत (source of funds) जैसे कारक प्रासंगिक नहीं हैं। "यह जांच करने के दौरान कि क्या अभियुक्त द्वारा, परिकल्पना को ग़लत साबित किया गया है या नहीं, जब ऐसी परिकल्पना धारित कर ली गयी है, तो प्राप्तियों या खातों के रूप में दस्तावेजी सबूतों की जरुरत या धन के स्रोत के संबंध में सबूत जैसे कारक प्रासंगिक नहीं हैं", हाईकोर्ट के एक फैसले, जिसमें ट्रायल कोर्ट द्वारा बरी किये जाने के आदेश को रद्द कर दिया गया, की अपील को खारिज करते हुए जस्टिस ए. एम. सप्रे और दिनेश माहेश्वरी की बेंच ने कहा। खाली एवं हस्ताक्षरित चेक का बाद में भरा जाना, बदलाव नहीं [बीर सिंह बनाम मुकेश कुमार] सर्वोच्च न्यायालय ने यह माना है कि बाद में भरे गए एक खाली हस्ताक्षरित चेक को भरना एक परिवर्तन (alteration) नहीं है और यहां तक कि एक खाली चेक लीफ, जो स्वेच्छा से हस्ताक्षरित है और जिसे आरोपी द्वारा सौंप दिया गया है, जो कि भुगतान की ओर है, किसी भी स्पष्ट सबूत के अभाव में (यह दिखाने के लिए कि वह चेक किसी ऋण के निर्वहन में जारी नहीं किया गया था) नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट की धारा 139 के तहत अनुमान को आकर्षित करेगा। न्यायमूर्ति आर. बनुमथी और न्यायमूर्ति इंदिरा बनर्जी की पीठ ने यह भी देखा कि चेक के आदाता और उसके ड्रॉअर के बीच एक विश्वासाश्रित संबंध (fiduciary relationship) का अस्तित्व, अनुचित प्रभाव (undue influence) या जोर-जबरदस्ती (coercion) के साक्ष्य के अभाव में, आदाता (payee) को निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट अधिनियम की धारा 139 के तहत परिकल्पना के लाभ से वंचित नहीं करेगा । बिक्री समझौते के उद्देश्य से जारी किए गए चेक- धारा 138 के अंतर्गत आयेंगे [रिपुदमन सिंह बनाम बालकृष्ण] उच्चतम न्यायालय ने यह देखा है कि निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत एक शिकायत लायी जा सकती है, जब बिक्री समझौते (agreement to sell) हेतु जारी किए गए चेक का अनादर (bounce) हुआ हो। यह माना गया कि चेक, बिक्री समझौते के अनुसरण में जारी किए गए थे. हालांकि, एक बिक्री समझौता, अचल संपत्ति में कोई अधिकार को जन्म नहीं देता है, फिर भी यह पार्टियों के बीच कानूनी रूप से लागू करने योग्य एक अनुबंध का गठन करता है, अदालत ने कहा। दूसरी सूचना के आधार पर चेक-बाउंस की शिकायत विचारणीय है [सिकाज़ेन इंडिया लिमिटेड बनाम महिंद्रा वादिनेनी] इस मामले में आरोपियों द्वारा जारी किए गए 3 चेक शिकायतकर्ता द्वारा प्रस्तुत किए गए थे, और जब वो बाउंस हो गए, तो 31.08.2009 को आरोपियों को नोटिस जारी किये गए थे, जिनमे राशि के पुनर्भुगतान की मांग की गयी थी। इसके बाद, ये चेक फिर से प्रस्तुत किए गए, जो फिर से बाउंस हो गए। शिकायतकर्ता ने 25.01.2010 को एक सांविधिक नोटिस जारी किया और बाद में दूसरी सांविधिक सूचना के आधार पर परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 138 के तहत शिकायत दर्ज की। शीर्ष अदालत ने कहा कि चेक की पुन: प्रस्तुति के बाद जारी किए गए दूसरे वैधानिक नोटिस के आधार पर दायर एक 'चेक बाउंस' शिकायत, विचारण योग्य है. पीठ ने एमएसआर लेदर्स बनाम एस. पलान्यप्पन और अन्य में 3-न्यायाधीश पीठ के फैसले का उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि अधिनियम की धारा 138 के प्रावधानों में ऐसा कुछ भी नहीं है जो चेक के धारक को चेक की क्रमिक प्रस्तुति (successive presentation) करने से और उस द्वितीय चेक की प्रस्तुति के आधार पर आपराधिक शिकायत दर्ज कराने से मना करता हो। आनुपातिकता के परीक्षण (Test of Proportionality) के अनुसार यह निर्धारित किया जाना चाहिए कि क्या परिकल्पना (PRESUMPTION) को ग़लत साबित (rebutted) किया गया था [ANSS राजशेखर बनाम अगस्टस जेबा अनंत] यह अभिनिर्णीत करते हुए कि कानूनी रूप से प्रवर्तनीय ऋण (legally enforceable debt) के अस्तित्व के संबंध में, परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 139 के तहत धारित परिकल्पना (presumption) को ग़लत साबित कर दिया गया था, उच्चतम न्यायालय ने धारा 138 एनआई अधिनियम के तहत दर्ज एक मामले में एक अभियुक्त को बरी कर दिया। "यह निर्धारित करने में कि क्या धारित परकल्पना को ग़लत साबित कर दिया गया है, आनुपातिकता के परीक्षण को अपनाया जाना चाहिए। अधिनियम की धारा 139 के तहत, धारित परिकल्पना के खंडन के लिए प्रमाण का मानक (standard of proof) संभावनाओं के एक पूर्वनिर्धारण (preponderance of probabilities) द्वारा निर्देशित है", जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूड़ और एम. आर. शाह की पीठ ने उच्च न्यायालय के फैसले को रद्द करते हुए, जिसने प्रथम अपीलीय अदालत द्वारा बरी के आदेश को पलट दिया था, यह अवलोकन किया। कंपनी निदेशक के खिलाफ चेक बाउंस की शिकायत को रद्द किया जाना [एआर राधा कृष्ण बनाम दसारी दीप्ति] सर्वोच्च न्यायालय ने यह दोहराया है कि, कंपनी और उसके निदेशक के खिलाफ 'चेक बाउंस' की शिकायत में यह ख़ास तौर पर कहा और बताया जाना चाहिए, कि निदेशक उक्त समय के लिए, जब परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 138/141 के तहत अपराध हुआ, तो वह कंपनी के व्यवसाय का संचालन एवं जिम्मेदारी का निर्वहन कर रहा था। ऋण/देयता के मात्र इनकार से सबूत का भार (burden of proof) स्थानांतरित नहीं होता है [किशन राव बनाम शंकर गौड़ा] सुप्रीम कोर्ट ने यह दोहराया कि एक चेक के अनादर के मामले में केवल ऋण या देनदारी से इनकार करना, आरोपी के ऊपर से सबूत के भार (burden of proof) को स्थानांतरित नहीं कर सकता है। न्यायमूर्ति ए. के. सीकरी और न्यायमूर्ति अशोक भूषण की पीठ ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया कि निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 की धारा 139, धारक के पक्ष में परिकल्पना धारित करने की व्यवस्था करती है, और ऋण के अस्तित्व एवं प्रतिफल के पास होने से केवल इनकार करने से अभियुक्त के उद्देश्य की पूर्ति नहीं होगी। डिक्री राशि के प्रतिशत के आधार पर वकील का फीस का दावा, धारा 138 एनआई अधिनियम के तहत एक शिकायत का आधार नहीं हो सकता है [बी. सुनीता बनाम तेलंगाना राज्य] सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में यह अभिनिर्णित किया कि मुकदमेबाजी में विषय वस्तु के प्रतिशत के आधार पर एक वकील द्वारा शुल्क राशि का दावा, निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट अधिनियम की धारा 138 के तहत एक शिकायत का आधार नहीं हो सकता है। इसमें कहा गया है कि विषय वस्तु में हिस्सेदारी के आधार पर वकील द्वारा किया गया ऐसा दावा एक पेशेवर कदाचार (professional misconduct) है और उसके द्वारा दायर शिकायत को कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जाएगा और उसे रद्द करना होगा। अभियुक्त से मुआवजा प्राप्त किया जा सकता है, भले ही 'डिफ़ॉल्ट सेंटेंस' से गुजरा जा चुका है [कुमारन बनाम केरल राज्य] सर्वोच्च न्यायालय ने यह माना कि न्यायालय द्वारा आदेशित क्षतिपूर्ति/मुआवजा, वसूली योग्य होगा, भले ही एक डिफ़ॉल्ट सजा भुगती जा चुकी है। न्यायमूर्ति आर. एफ. नरीमन और न्यायमूर्ति नवीन सिन्हा की खंडपीठ ने केरल उच्च न्यायालय के एक फैसले को बरकरार रखा, जिसमें धारा 421 सीआरपीसी के अंतर्गत मजिस्ट्रेट के आदेश को मंजूरी दी गयी थी, जिसमें चेक बाउंस के मामले में आरोपी के खिलाफ मुआवजा देने हेतु एक डिस्ट्रेस वारंट का आदेश जारी किया गया था, लेकिन एक अलग तर्क के लिए। रिमाइंडर नोटिस, प्रथम सूचना के सर्विस न होने का एडमिशन नहीं है [एन. परमेश्वरन उन्नी बनाम जी. कन्नन] सुप्रीम कोर्ट ने यह माना कि चेक के ड्रावर को रिमाइंडर नोटिस भेजा जाना, शिकायतकर्ता द्वारा भेजी गयी प्रथम नोटिस के सर्विस न होने के एडमिशन/स्वीकृति के रूप में नहीं माना जा सकता है। इस मामले में, शिकायतकर्ता ने चेक बाउंस होने के 15 दिनों के भीतर एक नोटिस जारी किया था, लेकिन इसे एक तस्दीक (endorsement), 'सूचना दी गयी, पते पर रहने वाला अनुपस्थित' के साथ लौटा दिया गया था। उन्होंने फिर से एक नोटिस भेजा, जिस इस डाक को इस तस्दीक के साथ लौटाया गया कि, "इनकार किया गया, प्रेषक को लौटाया गया"। शीर्ष अदालत की खंडपीठ ने कहा कि यह कानून है कि जब कोई नोटिस पंजीकृत डाक से भेजा जाता है और डाक इस तस्दीक के साथ लौटाया जाता है कि "इनकार कर दिया" या "घर में उपलब्ध नहीं" या "घर बंद" या "दुकान बंद", तो नियत सेवा (due service) मान ली जाती है। 138 NI अधिनियम के तहत अपराध व्यक्ति विशिष्ट है [एन. हरिहर कृष्णन बनाम जे. थॉमस] सुप्रीम कोर्ट ने यह माना कि निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत अपराध व्यक्ति विशेष है। यह भी स्पष्ट किया गया कि Cr.P.C के तहत सामान्य अवधारणा कि अपराध के खिलाफ संज्ञान लिया जाता है और अपराधी के खिलाफ नहीं, यह एनआई अधिनियम के तहत अभियोजन के मामले में उचित नहीं है। मामले में शिकायतकर्ता को एक चेक जारी किया गया था, जिस पर एक हरिहर कृष्णन ने हस्ताक्षर किए थे। यह चेक कथित तौर पर मेसर्स नॉर्टन ग्रेनाइट्स प्राइवेट लिमिटेड द्वारा देय, शेष बिक्री पर प्रतिफल के निर्वहन में ड्रा किया गया था। हालांकि, चेक वास्तव में एक अन्य निजी लिमिटेड कंपनी, मेसर्स दक्षिण ग्रेनाइट्स प्राइवेट लिमिटेड के खाते पर ड्रा किया गया था, जिसमें हरिहर कृष्णन एक निदेशक भी थे। 15 दिनों के नोटिस की अवधि समाप्त होने से पहले शिकायत विचारणीय नहीं [योगेंद्र प्रताप सिंह बनाम सावित्री पांडे] उच्चतम न्यायालय ने यह माना कि निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट 1881 की धारा 138 के तहत दंडनीय अपराध का संज्ञान 15 दिनों की अवधि पूरी होने से पहले दर्ज की गई सूचना के आधार पर नहीं लिया जा सकता है, जो अवधि, निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट 1881 की धारा 138 (सी) के संदर्भ में चेक के ड्रॉअर को दिए जाने के लिए आवश्यक नोटिस अवधि के रूप में निर्धारित की गई है। यह भी कहा गया है कि चेक payee या धारक द्वारा आपराधिक मामले में फैसले की तारीख से एक महीने के भीतर एक नई शिकायत दर्ज की जा सकती है और उस दशा में, शिकायत दर्ज करने में देरी को एनआई अधिनियम की धारा 142 की धारा (बी) के परंतुक के तहत 'condoned' माना जाएगा।

10/04/2019

प्रताड़ना से ससुराल छोड़ने वाली महिला कहीं से भी दर्ज करा सकती है केस

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि क्रूर व्यवहार या प्रताड़ना के कारण ससुराल छोड़कर मायके आ गई या किसी और जगह शरण लेने वाली महिला जहां शरण लेती है वहीं पर आइपीसी की धारा 498ए (प्रताड़ना) का मुकदमा दर्ज करा सकती है। वहां की अदालत को उस मुकदमे को सुनने का क्षेत्राधिकार होगा। कोर्ट ने धारा 498ए की व्याख्या करते हुए कहा कि इसमें शारीरिक और मानसिक दोनों प्रताड़नाएं शामिल मानी जाएंगी।

प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई, एल. नागेश्वर राव और संजय किशन कौल की पीठ ने दो न्यायाधीशों की पीठों के विरोधाभासी फैसलों के चलते तीन न्यायाधीशों की पीठ को भेजे गए कानूनी सवाल का जवाब देते हुए यह अहम व्यवस्था दी है। रूपाली देवी बनाम उत्तर प्रदेश के इस मामले में कोर्ट ने धारा 498ए की व्याख्या करते हुए उसमें दिए गए क्रूरता के व्यवहार का विश्लेषण किया है। कोर्ट ने कहा है कि क्रूरता शारीरिक और मानसिक दोनों तरह की हो सकती है।

कोर्ट ने कहा कि 498ए में दी गई क्रूरता की परिभाषा के मद्देनजर ससुराल द्वारा सताई गई महिला के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पति या रिश्तेदारों की क्रूरता के कारण पत्नी का मानसिक तनाव मायके आने के बाद भी कायम रहता है। शारीरिक प्रताड़ना के कारण मिली मानसिक प्रताड़ना, बेइज्जती, गंदी बातें, लड़ाई झगड़े का असर मायके आने के बाद भी महिला पर बना रहता है जबकि वहां उसे शारीरिक प्रताड़ना नहीं मिलती। ऐसे में यह एक अलग अपराध है जो उसके मायके या जहां वह शरण लेती है वहां तक जारी रहता है। यह अपराध धारा 498ए के तहत क्रूरता माना जाएगा।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने सवाल था कि क्या सताए जाने के कारण ससुराल छोड़ने को मजबूर हुई महिला मायके आकर या जहां वह शरण लेती है वहां सताने वालों के खिलाफ मुकदमा दायर कर सकती है। इस मामले में दो न्यायाधीशों की पीठों के अलग-अलग फैसले थे।

फैसले का यह होगा असर
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के दूरगामी परिणाम होंगे। इससे उन बहुत सी महिलाओं को राहत मिलेगी जो सताए जाने के कारण ससुराल छोड़कर मायके आ जाती हैं। अगर उनका मायका ससुराल से दूर किसी और राज्य में स्थित है तो वे अपने मायके में ससुराल वालों के खिलाफ प्रताड़ना का आपराधिक मुकदमा दर्ज नहीं करा पाती थीं।

उन्हें मुकदमा दर्ज कराने के लिए वहीं जाना पड़ता था जहां उनकी ससुराल स्थित होती थी। लेकिन अब सताए जाने के कारण ससुराल छोड़कर मायके या किसी और जगह शरण लेने वाली महिला जहां शरण लेगी वहीं ससुरालियों के खिलाफ आइपीसी की धारा 498ए (प्रताड़ना) का मुकदमा दर्ज करा सकती है।

20/12/2018

लीगल नोट
*(इम्पॉर्टेन्ट डिसिशन)*

Motor Vehicles Act, 1988 - S.166 - deceased was the owner-cum-driver of the vehicle in question - accident had occurred due to the rash and negligent driving of the vehicle by the deceased - No other vehicle was involved in the accident - deceased himself was responsible for the accident - deceased being the owner of the offending vehicle was not a third party within the meaning of the Act - deceased was the victim of his own action of rash and negligent driving - A Claimant cannot maintain a claim on the basis of his own fault or negligence and argue that even when he himself may have caused the accident on account of his own rash and negligent driving, he can nevertheless make the insurance company to pay for the same - respondents being the LRs of the deceased could not have maintained the claim petition.

*National Insurance Co. Ltd. v. Ashalata Bhowmik, AIR 2018 SC 4133 : 2018 (3) JKJ 107 : JT 2018 (8) SC 315 : 2018 (36) LCD 2505 : 2018 (4) RCR (Civil) 211 : 2018 (7) SLT 432 : (2018) 9 SCC 801*

20/07/2018

लेटेस्ट मोस्ट इम्पोर्टेन्ट जजमेंट ऑफ
*सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया*

*भारत के सुप्रीम कोर्ट लतेश वी / एस महाराष्ट्र राज्य 2018 (3) एससीसी 66 2018 एआईआर (एससी) 65 9*

आपराधिक परीक्षण -

हर आपराधिक मुकदमे में, घटना और बयान की तारीख के बीच लंबे समय के विलंब के कारण आम तौर पर विसंगतियां होती हैं अदालत के समक्ष बुद्धिमानों के बारे में जब विरोधाभास इतने गंभीर हैं और अदालत के दिमाग में बयान की सच्चाई के बारे में संदेह पैदा करते हैं, तो ऐसे सबूतों पर भरोसा करना सुरक्षित नहीं है

- तथ्यों पर हम महसूस करते हैं कि इस सबूत में विरोधाभास मामला प्रकृति में बहुत छोटा है और अभियोजन पक्ष के मामले को प्रभावित नहीं करेगा....

20/07/2018

*Accidental Death* & *Compensation*

*(Income Tax Return Required)*

अगर किसी व्यक्ति की accidental death होती है और वह व्यक्ति पिछले तीन साल से लगातार इनकम टैक्स रिटर्न फ़ाइल कर रहा था तो उसकी पिछले तीन साल की एवरेज सालाना इनकम की दस गुना राशि उस व्यक्ति के परिवार को देने के लिए सरकार बाध्य है ।

जी हाँ,
आपको आश्चर्य हो रहा होगा यह सुनकर लेकिन यह बिलकुल सही है
और
सरकारी नियम है ,

उदहारण के तौर पर अगर किसी की सालाना आय क्रमशः
पहले दूसरे और तीसरे साल चार लाख,पांच लाख और छः लाख है
तो उसकी औसत आय पांच लाख का दस गुना मतलब पचास लाख रूपए उस व्यक्ति के परिवार को सरकार से मिलने का हक़ है।

ज़्यादातर जानकारी के अभाव में लोग यह क्लेम सरकार से नहीं लेते हैं ।

जाने वाले की कमी तो कोई पूरी नहीं कर सकता है लेकिन अगर पैसा पास में हो तो भविष्य सुचारू रूप से चल सकता है ।

अगर लगातार तीन साल तक रिटर्न दाखिल नहीं किया है तो ऐसा नहीं है कि परिवार को पैसा नहीं मिलेगा लेकिन ऐसे केस में सरकार एक डेढ़ लाख देकर किनारा कर लेती है लेकिन अगर लगातार तीन साल तक लगातार रिटर्न फ़ाइल किया गया है तो ऐसी स्थिति में केस ज़्यादा मजबूत होता है
और
यह माना जाता है कि मरने वाला व्यक्ति अपने परिवार का रेगुलर अर्नर था
और
अगर वह जिन्दा रहता तो अपने परिवार के लिए अगले दस सालो में वर्तमान आय का दस गुना तो कमाता ही जिससे वह अपने परिवार का अच्छी तरह से पालन पोषण कर पाता ।

सब सर्विस वाले लोग हैं और रेगुलर अर्नर हैं लेकिन बहुत से लोग रिटर्न फ़ाइल नहीं करते है जिसकी वजह से न तो कंपनी द्वारा काटा हुआ पैसा सरकार से वापस लेते हैं और न ही इस प्रकार से मिलने वाले लाभ का हिस्सा बन पाते हैं ।
इधर जल्दी में हमारे कई साथी / भाई एक्सीडेंटल डेथ में हमारा साथ छोड़ गए लेकिन जानकारी के अभाव में उनके परिवार को आर्थिक लाभ नहीं मिल पाया ।

Source - forwarded
*Section 166 of the Motor act, 1988 (Supreme Court Judgment under Civil Appeal No. 9858 of 2013, arising out of SLP (C) No. 1056 of 2008) Dt 31 Oct 2013.*

15/04/2017

(नवीनतम महत्वपूर्ण निर्णय )
*सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया*



1 Abetment to commit su***de. Cruelty under section 498-A. Proof of wilful conduct actuating the woman to commit su***de or cause danger to life must be established. Accused acquitted by SC in this case
Gurcharan Singh vs State of Punjab. (2017) 1 SCC 433.
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2 "Parity in Pay/Pay Scale". Latest and the most comprehensive judgment. "Equal pay for equal work" also applicable to temporary employees performing the same duties and responsibilities as regular employees.
(2017) 1 SCC 148.
State of Punjab & ors vs Jagjit Singh & others
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15/02/2017

Code of Civil Procedure, 1908 (V of 1908)
Order 7 Rule 11 CPC -- Court Fees Act, 1870 (7 of 1870), Section 7(iv) -- Ad valorem court fee – Rejection of plaint -- Suit for declaration for declaring sale deed null and void on account of non passing of consideration, the possession of the land remained with them and cheques for consideration were not honoured – Held, at this stage of litigation, only averments in the plaint are to be seen -- Trial Court is directed to proceed with the suit without insisting upon payment of ad valorem court fee. 2016(1) L.A.R. 305 (P&H).

Order 8 Rule 6A – Framing of issue – Counter claim – Permissibility of -- Counter claim after almost two and a half years after the framing of the issues -- Even though evidence on behalf of the respondent-plaintiff has commenced, it has not yet concluded -- The evidence on behalf of the defendants is yet to commence -- It has also not been shown that any prejudice would be caused to the respondent-plaintiff before the trial court, if the counter-claim was to be adjudicated upon, along with the main suit – Held, no serious injustice or irreparable loss would be suffered by the respondent-plaintiff – Application for counter-claim allowed.2016(1) L.A.R. 448 (SC).

Order 18 Rule 17 – Re-calling of witness – Inherent powers of Court -- Rigour under Rule 17 does not affect the inherent powers of the court to pass the required orders for ends of justice to reopen the evidence for the purpose of further examination or cross-examination or even for production of fresh evidence -- This power can also be exercised at any stage of the suit, even after closure of evidence. 2016(1) L.A.R. 268 (SC).

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