Legal Manthan - 94663-71020

Legal Manthan - 94663-71020 "कानून के समक्ष समानता आपका सबका अधिका

26/04/2025

26/08/2024
28/04/2019

*मोबाइल चोरी होने पर अक्सर लोग मायूस हो जाते हैं और शिकायत दर्ज कराने के लिए उन्हें धक्के खाने पड़ते हैं, लेकिन सरकार ने एक हेल्पलाइन नंबर 14422 जारी किया है। इससे पूरे देश में लोगों को अब शिकायत दर्ज कराने के लिए भटकना नहीं पड़ेगा। इस नंबर पर डायल करने या संदेश भेजने पर शिकायत दर्ज हो जाएगी और पुलिस व सेवा प्रदाता कंपनी मोबाइल की खोज में जुट जाएगी। दूरसंचार मंत्रालय मई के अंत में महाराष्ट्र सर्किल में इसकी शुरुआत करेगा। देश के 21 अन्य दूरसंचार सर्कल में कई चरणों में इसे दिसंबर तक लागू किया जाएगा।*

*दूरसंचार विभाग द्वारा तैयार सीईआईआर में हर नागरिक का मोबाइल ब्योरा होगा*

दूरसंचार प्रौद्योगिकी केंद्र (सी-डॉट) ने चोरी या गुम मोबाइल का पता लगाने के लिए सेंट्रल इक्विपमेंट आईडेंटिटी रजिस्टर (सीईआईआर) तैयार कर लिया है। सीईआईआर में देश के हर नागरिक का मोबाइल मॉडल, सिम नंबर और आईएमईआई नंबर है। मोबाइल मॉडल पर निर्माता कंपनी द्वारा जारी आईएमईआई नंबर के मिलान का तंत्र सी-डॉट ने ही विकसित किया है। इस तंत्र को चरणबद्ध तरीके से राज्यों की पुलिस को सौंपा जाएगा। मोबाइल के खोने पर शिकायत दर्ज होते ही पुलिस और सेवा प्रदाता मोबाइल मॉडल और आईएमईआई का मिलान करेंगी। अगर आईएमईआई नंबर बदला जा चुका होगा, तो सेवा प्रदाता उसे बंद कर देंगी, हालांकि सेवा बंद होने पर भी पुलिस मोबाइल ट्रैक कर सकेगी।


*शिकायत के बाद कोई सिम काम नहीं करेगी*

सी-डॉट के मुताबिक शिकायत मिलने पर मोबाइल में कोई भी सिम लगाए जाने पर नेटवर्क नहीं आएगा, लेकिन उसकी ट्रैकिंग होती रहेगी। पिछले कुछ सालों से रोजाना हजारों मोबाइल की चोरी और लूट की घटनाओं को देखते हुए सी-डॉट को दूरसंचार मंत्रालय ने यह तंत्र विकसित करने को कहा था। मंत्रालय के एक सर्वे में सामने आया था कि देश में एक ही आईएमईआई नंबर पर 18 हजार हैंडसेट चल रहे हैं।

*आईएमईआई बदलने पर होगी जेल *

13/03/2019

How to file civil case – भारत में सिविल केस दर्ज कराने के लिए एक प्रोसीजर बनाया गया है, अगर उस प्रोसीजर को फॉलो नहीं किया जाता तो रजिस्ट्रार के पास केस को खारिज करने का अधिकार होता है। आम आदमी की भाषा में अभियोग का अर्थ होता है लिखित शिकायत या फिर आरोप, जो व्यक्ति मुकदमा दर्ज कराता है उसे वादी अर्थात Plaintiff और जिसके खिलाफ केस दर्ज किया जाता है उसे प्रतिवादी अर्थात Defendant कहा जाता है।
शिकायतकर्ता को अपना अभियोग सीमा अधिनियम में निर्धारित समय सीमा के भीतर कराना होता है। शिकायत की कॉपी टाइप होनी चाहिए और उस पर न्यायालय का नाम, शिकायत की प्रकृति, पक्षों के नाम और उनका पता स्पष्ट रुप से लिखा होना चाहिए। शिकायत में वादी द्वारा शपथ पत्र भी संलग्न किया जाना चाहिए जिसमें यह कहा गया हो की शिकायत में लिखी गई सभी बातें सही हैं।

वकालतनामा –
यह एक ऐसा document है जिसके द्वारा कोई पार्टी केस दर्ज करवाने के लिए वकील को अपनी ओर से प्रतिनिधित्व करने के लिए अधिकृत करता है। वकालतनामा में कुछ बातों का उल्लेख किया होता है जैसे कि किसी भी फैसले में client वकील को जिम्मेदार नहीं ठहरायेगा और client अदालती कार्यवाही के दौरान किए गए सभी खर्चों को खुद ही वहन करेगा। जब तक वकील को पूरी फीस का भुगतान नहीं किया जाता तब तक उसे वाद से संबंधित सभी दस्तावेज को अपने पास रखने का अधिकार होगा। Client कोर्ट कारवाही में किसी भी स्तर पर वकील को छोड़ने के लिए स्वतंत्र होता है। वकील को अदालत में सुनवाई के दौरान मुवक्किल के हित में अपने दम पर निर्णय लेने का पूरा अधिकार होता है।

वकालतनामा को petition की आखरी पृष्ठ के साथ जोड़कर अदालत में रिकॉर्ड के रूप में रखा जाता है। वकालतनामा तैयार करवाने के लिए कोई भी फीस की आवश्यकता नहीं होती हालांकि आजकल हाई कोर्ट के नियमों के अनुसार वकालतनामा के साथ ₹25 का अधिवक्ता कल्याण डाक टिकट लगाया जाता है।


इसके बाद पहली सुनवाई के लिए वादी को एक तारीख दी जाती, इस तारीख पर अदालत यह तय करता है कि कार्यवाही को आगे जारी रखना है या नहीं। अगर यह निर्णय होता है कि इस मामले में कोई सच्चाई नहीं है तो प्रतिवादी को बुलाये बिना ही केस को खारिज कर दिया जाता है लेकिन अदालत को लगता है कि इस मामले में कोई सच्चाई है तो कार्यवाही आगे बढ़ाई जाती है।

कोर्ट के प्रोसीजर –
सुनवाई के पहले दिन अगर कोर्ट को लगता है कि इस मामले में सच्चाई है तो वह प्रतिवादी को एक निश्चित तारीख तक अपना बहस दर्ज कराने के लिए नोटिस देता है। प्रतिवादी को नोटिस भेजने से पहले वादी को कुछ कार्य करने होते हैं, जैसे कि अदालती कार्यवाही के लिए आवश्यक शुल्क का भुगतान करना होता है और कोर्ट में हर एक प्रतिवादी के लिए अपने पिटिशन की दो कॉपियां जमा करानी होती है। सभी प्रतिवादी के पास जमा किए गए पिटिशन की दो कॉपियों में से एक को रजिस्टर्ड डाक द्वारा भेजा जाता है जबकि दूसरी कॉपी को साधारण पोस्ट द्वारा भेजा जाता है।

लिखित बयान –
जब प्रतिवादी को नोटिस जारी कर दिया जाता है तो उसे नोटिस में दर्ज की गई तारीख पर कोर्ट में पेश होना अनिवार्य होता है। ऐसी तारीख से पहले प्रतिवादी को अपना लिखित बयान दर्ज कराना होता है अर्थात उसे 30 दिन के भीतर कोर्ट द्वारा दिए गए समय सीमा के भीतर ही वादी द्वारा लगाए गए आरोपों के खिलाफ अपना बचाव तैयार करना पड़ता है। लिखित बयान में विशेष रूप से उन आरोपों को इंकार करना चाहिए जिनके बारे में प्रतिवादी सोचता है कि वह झूठ है।

यदि लिखित बयान में किसी विशेष आरोप से इनकार नहीं किया जाता तो ऐसा समझा जाता है कि प्रतिवादी उस आरोप को स्वीकार्य करता है और लिखित बयान में प्रतिवादी का शपथ पत्र भी संलग्न होना चाहिए जिसमें यह कहा गया हो कि लिखित बयान में लिखी गई सारी बातें सच है। लिखित बयान दर्ज कराने के लिए निर्धारित समय सीमा 30 दिनों की अवधि है और कोर्ट की अनुमति से 90 दिन तक बढ़ाई जा सकती है।

प्रत्युत्तर –
प्रत्युत्तर वह जवाब होता है जो कि वादी प्रतिवादी द्वारा लिखित बयान के खिलाफ दर्ज कराता है। प्रत्युत्तर में वादी को लिखित बयान में उठाए गए आरोपों से इनकार करना चाहिए। अगर प्रत्युत्तर में किसी विशेष आरोप से इनकार नहीं किया जाता तो ऐसा समझा जाता है कि वादी उस आरोप को स्वीकार्य करता है। प्रत्युत्तर में वादी का शपथ पत्र भी अटैच होता है जिसमें यह कहा जाता है कि प्रत्युत्तर में लिखी गई सभी बातें उसने सच लिखी है तो याचिका पूरी हो जाती है।

जब एक बार याचिका पूरी हो जाती है तो उसके बाद दोनों पार्टियों को उन दस्तावेजों को जमा कराने का अवसर दिया जाता है जिन पर वह भरोसा करते हैं और जो उनके दावे को सिद्ध करने के लिए आवश्यक है। अंतिम सुनवाई के दौरान ऐसे किसी दस्तावेज को मान्यता नहीं दी जाती, जिसे कोर्ट के सामने पेश नहीं किया गया है। एक बार दस्तावेज स्वीकार्य कर लेने के बाद वह कोर्ट के रिकॉर्ड का हिस्सा हो जाता है और उस पर वाद से संबंधित सभी तरह के विवरण जैसे कि पक्षों के नाम, वाद का शीर्षक अंकित कर दिया जाता है। कोर्ट में सभी दस्तावेज की ओरिजिनल कॉपी जमा कर ली जाती है और उनकी एक कॉपी विरोधी पक्ष को दे दी जाती है। इसके बाद कोर्ट द्वारा उन सभी मुद्दों को तैयार किया जाता है जिसके आधार पर बहस और गवाहों से पूछताछ की जाती है।

दोनों पार्टियों को केस दर्ज कराने के 15 दिन के भीतर या फिर कोर्ट द्वारा निर्देशित अन्य अवधि के भीतर अपने अपने गवाहों की सूची कोर्ट में पेश करनी होती है। दोनों पक्ष या तो गवाह को स्वयं बुलाते हैं या फिर अदालत उन्हें समन भेजकर कह सकती है। अगर कोर्ट किसी गवाह को समन भेजता है तो ऐसे गवाह को बुलाने के लिए सम्बंधित पक्ष को कोर्ट के पास पैसे जमा कराने पड़ते हैं जिसे की diet money कहा जाता है।

निर्धारित तारीख पर दोनों पक्षों द्वारा गवाह से पूछताछ की जाति। किसी पार्टी द्वारा अपने स्वयं के गवाहों से पूछताछ करने की प्रक्रिया को Examination of Chief कहा जाता है। जब कि किसी पार्टी द्वारा विरोधी पक्ष के गवाहों से पूछताछ करने के प्रोसीजर को क्रॉस एग्जामिनेशन कहा जाता है। जब गवाहों से पूछताछ की प्रक्रिया समाप्त हो जाती है तो दस्तावेज की जांच कर ली जाती है और कोर्ट की अंतिम सुनवाई के लिए तारीख तय कर दी जाती है।

अंतिम सुनवाई के लिए निर्धारित तिथि को दोनों पक्ष अपने तर्क प्रस्तुत करते है और दोनों पक्षों को अपने तर्क प्रस्तुत करते समय वाद से सम्बंधित मुद्दों का ख्याल रखना पड़ता है। उसके बाद कोर्ट अपना अंतिम फैसला सुनाता है जिसे या तो उसी तारीख को या फिर कोर्ट द्वारा निर्धारित किसी दूसरी तारीख को सुनाया जाता है। जब भी किसी पार्टी के खिलाफ कोई आदेश पारित किया जाता है तो ऐसा नहीं होता कि उसके पास कोई उपाय नहीं होता, ऐसी पार्टी अपील रेफरेंस और रिव्यू के माध्यम से कार्यवाही को आगे बढ़ा सकती है।

30/10/2018

आत्मरक्षा या निजी रक्षा क्या है ?

भारतीय दण्ड संहिता की धारा 96 से लेकर 106 तक की धारा में सभी व्यक्तियों को आत्मरक्षा का अधिकार दिया गया है ।

1-व्यक्ति स्वयं की रक्षा किसी भी हमले या अंकुश के खिलाफ कर सकता है ।
2-व्यक्ति स्वयं की संपत्ति का रक्षा किसी भी चोरी, डकैती, शरारत व अपराधिक अतिचार के खिलाफ कर सकता है।

आत्मरक्षा के अधिकार के सिद्धांत
1-आत्मरक्षा का अधिकार रक्षा या आत्मसुरक्षा का अधिकार है । इसका मतलब प्रतिरोध या सजा नहीं है।

2-आत्मरक्षा के दौरान चोट जितने जरुरी हों उससे ज्यादा नही होने चाहिए ।

3-ये अधिकार सिर्फ तभी तक ही उपलब्ध हैं जब तक कि शरीर अथवा संपत्ति को खतरे की उचित आशंका हो या जब कि खतरा सामने हो या होने वाला हो।

आत्मरक्षा को साबित करने की जिम्मेदारी अभियुक्त की होती है
1-आपराधिक मुकदमों में अभियुक्त को आत्मरक्षा के अधिकार के लिए निवेदन करना चाहिए।

2-ये जिम्मेदारी अभियुक्त की होती है कि वह तथ्यों व परिस्थितियों के द्वारा ये साबित करे कि उसका काम आत्मरक्षा में किया गया है।

3-आत्मरक्षा के अधिकार का प्रश्न केवल अभियोग द्वारा तथ्यों व परिस्थितियों के साबित करने के बाद ही उठाया जा सकता है ।

4-अगर अभियुक्त आत्मरक्षा के अधिकार की गुहार नहीं कर पाता है, तब भी न्यायालय को ये अधिकार है कि अगर उसे उचित सबूत मिले तो वह इस बात पर गौर करे। यदि उपलब्ध साक्ष्यों से ये न्याय संगत लगे तब ये निवेदन सर्वप्रथम अपील में भी उठाया जा सकता है ।

5-अभियुक्त पर घाव के निशान आत्मरक्षा के दावे को साबित करने के लिए मददगार साबित हो सकते हैं ।

30/10/2018

Q.1 फांसी की सजा सुनाने के बाद जज पेन की निब क्यों तोड़ देते हैं ?

Ans. हमारे कानून में फाँसी की सजा सबसे बड़ी सजा हैं. फांसी की सजा सुनाने के बाद पेन की निब इसलिए तोड़ दी जाती है क्योकिं इस पेन से किसी का जीवन खत्म हुआ है तो इसका कभी दोबारा प्रयोग ना हो. एक कारण ये भी है कि एक बार फैसला लिख दिये जाने और निब तोड़ दिये जाने के बाद खुद जज को भी यह यह अधिकार नहीं होता कि उस जजमेंट की समीक्षा कर सके या उस फैसले को बदल सके या पुनर्विचार की कोशिश कर सके.

Q.2 फांसी देते वक्त कौन-कौन मौजूद रहते हैं ?

Ans. फाँसी देते समय कुछ ही लोग मौजूद रहते हैं इनमें फांसी देते वक्त वहां पर जेल अधीक्षक, एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट, जल्लाद और डाॅक्टर मौजूद रहते हैं. इनके बिना फांसी नही दी जा सकती.

Q.3 फांसी देने से पहले जल्लाद क्या बोलता हैं ?

Ans. जल्लाद फांसी देने से पहले बोलता है कि मुझे माफ कर दो. हिंदू भाईयों को राम-राम, मुस्लिम को सलाम, हम क्या कर सकते है हम तो है हुकुम के गुलाम.

Q.4 आखिर सुबह के समय सूर्योदय से पहले ही फांसी क्यो दी जाती हैं ?

Ans. फाँसी देना जेल अधिकारियों के लिए बहुत बड़ा काम होता हैं और इसे सुबह होने से पहले इसलिए निपटा दिया जाता है ताकि दूसरे कैदी और काम प्रभावित ना हो. एक नैतिक कारण ये भी हैं कि जिसको फांसी की सजा सुनाई गई हो उसे पूरा इंतजार कराना भी उचित नही हैं सुबह फांसी देने से उनके घर वालो को भी अंतिम संस्कार के लिए पूरा समय मिल जाता हैं.

Q.5 फांसी से पहले आखिरी इच्छा में जेल प्रशासन क्या क्या दे सकता हैं ?

Ans. आखिरी इच्छा पूछे बगैर किसी को फांसी नही दी जा सकती. कैदी की किसी आखिरी इच्छा में परिजनों से मिलना, कोई खास डिश खाना या कोई धर्म ग्रंथ पढ़ना शामिल होता हैं.

Q.6 कितनी देर के लिए फांसी पर लटकाया जाता हैं ?

Ans. फांसी से पहले मुजरिम के चेहरे को काले सूती कपड़े से ढक दिया जाता हैं और 10 मिनट के लिए फांसी पर लटका दिया जाता हैं फिर डाॅक्टर फांसी के फंदे में ही चेकअप करके बताता हैं कि वह मृत है या नहीं उसी के बाद मृत शरीर को फांसी के फंदे से उतारा जाता हैं.

फांसी से जुड़े 6 रोचक तथ्य

1. सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश के मुताबिक जिसे मौत की सजा दी जाती है उसके रिश्तेदारों को कम से कम 15 दिन पहले खबर मिल जानी चाहिए ताकि वो आकर मिल सकें.

2. फांसी की सजा पाए कैदियों के लिए फंदा जेल में ही सजा काट रहा कैदी तैयार करता है आपको अचरज हो सकता है, लेकिन अंग्रेजों के जमाने से ऐसी ही व्यवस्था चली आ रही हैं.

3. देश के किसी भी कोने में फांसी देने की अगर नौबत आती है तो फंदा सिर्फ बिहार की बक्सर जेल में ही तैयार होता है इसकी वजह यह है कि वहां के कैदी इसे तैयार करने में माहिर माने जाते हैं.

4. फांसी के फंदे की मोटाई को लेकर भी मापदंड तय है. फंदे की रस्सी डेढ़ इंच से ज्यादा मोटी रखने के निर्देश हैं. इसकी लंबाई भी तय हैं.

5. फाँसी के फंदे की कीमत बेहद कम हैं. दस साल पहले जब धनंजय को फांसी दी गई थी, तब यह 182 रुपए में जेल प्रशासन को उपलब्ध कराया गया था.

6. भारत में फांसी देने के लिए बस 2 ही जल्लाद हैं. ये जल्लाद जिन राज्यों में रहते हैं वहाँ की सरकार इन्हें 3,000 रूपए महीने के देती हैं और किसी को फांसी देने पर अलग से पैसे दिए जाते हैं. आतंकवादी संगठनो के सदस्यों को फांसी देने पर उनको मोटी फीस दी जाती हैं जैसे इंदिरा गांधी के हत्यारों को फांसी देने पर जल्लाद को 25,000 रूपए दिए गए थे.

7. हमारे देश में दुर्लभतम मामलों में मौत की सजा दी जाती है. अदालत को अपने फैसले में ये लिखना पड़ता है कि मामले को दुर्लभतम (रेयरेस्ट ऑफ द रेयर) क्यों माना गया ?

29/10/2018

क्या है राष्ट्रद्रोह...

राजद्रोह यानी आईपीसी (भारतीय दंड संहिता) की धारा-124 A, क्या कहती है?
कोई भी आदमी यदि देश के खिलाफ लिखकर, बोलकर, संकेत देकर या फिर अभिव्यक्ति के जरिये विद्रोह करता है या फिर नफरत फैलाता है या ऐसी कोशिश करता है तब मामले में आईपीसी की धारा-124 ए के तहत केस बनता है। इस कानून के तहत दोषी पाए जाने पर अधिकतम उम्रकैद की सजा का प्रावधान है। वहीं, इस कानून के दायरे में स्वस्थ आलोचना नहीं आती।

धारा के दुरुपयोग को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने दिया है आदेश
इस धारा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कुछ फैसले सुनाए हैं और उससे साफ होता है कि कोई भी हरकत या सरकार की आलोचनाभर से देशद्रोह का मामला नहीं बनता, बल्कि उस विद्रोह के कारण हिंसा और कानून और व्यवस्था की समस्या उत्पन्न हो जाए तभी देशद्रोह का मामला बनता है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में राजद्रोह की कुछ ऐसी व्याख्या की है। 1962 में केदारनाथ बनाम बिहार राज्य के केस में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला दिया और सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में फेडरल कोर्ट ऑफ (ब्रिटिश) इंडिया से सहमति जताई थी। सुप्रीम कोर्ट ने केदारनाथ केस में व्यवस्था दी कि सरकार की आलोचना या फिर प्रशासन पर टिप्पणी भर से देशद्रोह का मुकदमा नहीं बनता।

सुप्रीम कोर्ट ने धारा-124 ए के दायरे को सीमित करते हुए कहा था कि वैसा ऐक्ट जिसमें अव्यवस्था फैलाने या फिर कानून व व्यवस्था में गड़बड़ी पैदा करने या फिर हिंसा को बढ़ावा देने की प्रवृत्ति या फिर मंशा हो तभी देशद्रोह का मामला दर्ज हो सकता है।

सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की संवैधानिक बेंच ने अपने आदेश में कहा था कि देशद्रोह के मामले में हिंसा को बढ़ावा देने का तत्व मौजूद होना चाहिए। महज नारेबाजी राजद्रोह नहीं।

सुप्रीम कोर्ट ने 1995 में बलवंत सिंह बनाम पंजाब राज्य के मामले में कहा था कि महज नारेबाजी किए जाने से राजद्रोह का मामला नहीं बनता। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक-दो बार कुछ लोगों द्वारा कुछ नारेबाजी किए जाने पर राजद्रोह का मामला नहीं बनाता। सरकारी नौकरी करने वाले दो लोगों ने देश के खिलाफ नारेबाजी की थी और तब पंजाब में चल रहे खालिस्तान की मांग के पक्ष में नारे लगाए थे। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि दो लोगों द्वारा बिना कुछ और किए दो बार नारेबाजी किए जाने से देश को किसी प्रकार के खतरे का मामला नहीं बनता।

कोर्ट ने साफ कहा कि ऐसी हरकत जिससे कि देश और समुदाय के खिलाफ विद्रोह और नफरत पैदा हो तभी देशद्रोह का मामला बनेगा।

कानून के जानकारों का कहना है कि देशद्रोह की परिभाषा काफी व्यापक है और इस कारण इसके दुरुपयोग की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता। इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए सीआरपीसी की धारा-196 में प्रावधान किया गया कि देशद्रोह से संबंधित मामले में दर्ज मामले में पुलिस को चार्जशीट के वक्त मुकदमा चलाने के लिए केंद्र अथवा राज्य सरकार से संबंधित प्राधिकरण से मंजूरी लेना जरूरी है।

124 A. Sedition.
1*[124A. Sedition.--Whoever by words, either spoken or written,
or by signs, or by visible representation, or otherwise, brings or
attempts to bring into hatred or contempt, or excites or attempts to
excite disaffection towards, 2***the Government established by law in
3*[India], a 4***shall be punished with 5*[imprisonment for life], to
which fine may be added, or with imprisonment which may extend to
three years, to which fine may be added, or with fine.
Explanation 1.-The expression "disaffection" includes disloyalty
and all feelings of enmity.
Explanation 2.-Comments expressing disapprobation of the measures
of the Government with a view to obtain their alteration by lawful
means, without exciting or attempting to excite hatred, contempt or
disaffection, do not constitute an offence under this section.
Explanation 3.-Comments expressing disapprobation of the
administrative or other action of the Government without exciting or
attempting to excite hatred, contempt or disaffection, do not
constitute an offence under this section.]

29/10/2018

आत्मरक्षा या निजी रक्षा क्या है ?
भारतीय दण्ड संहिता की धारा 96 से लेकर 106 तक की धारा में सभी व्यक्तियों को आत्मरक्षा का अधिकार दिया गया है ।

1-व्यक्ति स्वयं की रक्षा किसी भी हमले या अंकुश के खिलाफ कर सकता है ।
2-व्यक्ति स्वयं की संपत्ति का रक्षा किसी भी चोरी, डकैती, शरारत व अपराधिक अतिचार के खिलाफ कर सकता है।

आत्मरक्षा के अधिकार के सिद्धांत
1-आत्मरक्षा का अधिकार रक्षा या आत्मसुरक्षा का अधिकार है । इसका मतलब प्रतिरोध या सजा नहीं है।

2-आत्मरक्षा के दौरान चोट जितने जरुरी हों उससे ज्यादा नही होने चाहिए ।

3-ये अधिकार सिर्फ तभी तक ही उपलब्ध हैं जब तक कि शरीर अथवा संपत्ति को खतरे की उचित आशंका हो या जब कि खतरा सामने हो या होने वाला हो।

आत्मरक्षा को साबित करने की जिम्मेदारी अभियुक्त की होती है
1-आपराधिक मुकदमों में अभियुक्त को आत्मरक्षा के अधिकार के लिए निवेदन करना चाहिए।

2-ये जिम्मेदारी अभियुक्त की होती है कि वह तथ्यों व परिस्थितियों के द्वारा ये साबित करे कि उसका काम आत्मरक्षा में किया गया है।

3-आत्मरक्षा के अधिकार का प्रश्न केवल अभियोग द्वारा तथ्यों व परिस्थितियों के साबित करने के बाद ही उठाया जा सकता है ।

4-अगर अभियुक्त आत्मरक्षा के अधिकार की गुहार नहीं कर पाता है, तब भी न्यायालय को ये अधिकार है कि अगर उसे उचित सबूत मिले तो वह इस बात पर गौर करे। यदि उपलब्ध साक्ष्यों से ये न्याय संगत लगे तब ये निवेदन सर्वप्रथम अपील में भी उठाया जा सकता है ।

5-अभियुक्त पर घाव के निशान आत्मरक्षा के दावे को साबित करने के लिए मददगार साबित हो सकते हैं ।

29/10/2018

Stalking क्या होता है? Stalking के लिए कितनी सजा का प्रावधान है?
section 354(D) IPC

Stalking क्या होता है-
धारा 354(D) के अनुसार कोई पुरूष Stalking का अपराध करता है
1.जब वह पुरूष किसी महिला के द्वारा मना करने के बावजूद भी, उस महिला का पीछा करता है ओर संपर्क करता है या संपर्क करने की कोशिश करता है, या
2.जब वह पुरूष किसी महिला के द्वारा चलाए जाने वाले इंटरनेट ईमेल या किसी अन्य प्रकार की इलेक्ट्रॉनिक्स संसूचना को मॉनिटर करता है।
लेकिन निम्नलिखित परिस्थितियों में स्टॉकिंग अपराध नहीं है-
(अ) जब स्टॉकिंग किसी अपराध के निवारण या पता लगाने के लिए किया गया हो और राज्य सरकार ने उस पुरुष अभियुक्त को उस अपराध के निवारण या पता लगाने के लिए स्टॉकिंग करने का उत्तरदायित्व सौंपा हो।
(ब) जब स्टॉकिंग किसी विधि के अधीन किया गया।
(स) जब स्टॉकिंग ऐसी परिस्थितियों में किया गया हो जहां यह युक्तियुक्त और न्यायोचित था।

Stalking के लिए कितनी सजा का प्रावधान है?
धारा 354(D) के तहत स्टॉकिंग के मामलों में पहली बार पकड़े जाने पर 3 साल तक की जेल और जुर्माने का प्रावधान है। लेकिन स्टॉकिंग के मामले में दूसरी बार गिरफ्तार किए जाने पर पांच साल तक की जेल ओर जुर्माने का प्रावधान है।

29/10/2018

वारंट क्या होता है
वारंट कोर्ट के द्वारा पुलिस को दिया गया आदेश है जिसमें कहा जाता है किसी व्यक्ति को पकड़कर कोर्ट के सामने लाया जाए।
वारंट एक कानूनी आदेश है जो कि किसी मजिस्ट्रेट या जज के द्वारा जारी किया जाता है, यह किसी कांस्टेबल, पुलिस अफसर या अन्य व्यक्ति को निर्दिष्ट हो सकता है जिससे पुलिस को किसी व्यक्ति को पकड़ने, उसके घर की तलाशी लेने का अधिकार मिल जाता है।

वारंट के प्रकार-
सामान्यतः वारण्ट दो प्रकार का होता है जमानतीय ओर अजमानतीय वारण्ट ।
1.जमानतीय वारण्ट
यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ जमानतीय वारंट जारी होता है तो उस वारंट के अधीन उस व्यक्ति को गिरफ्तार करने वाला पुलिस अधिकारी उस व्यक्ति को वारंट में लिखे अनुसार जमानत व मुचलका लेकर नियत तिथि को कोर्ट में पेश होने का निर्देश देकर छोड़ सकता है
2.अजमानतीय वारण्ट
अजमानतीय वारंट में गिरफ्तार होने पर पुलिस अधिकारी उस व्यक्ति को जमानत लेकर छोड़ नहीं सकते बल्कि उसे गिरफ्तार करने के 24 घंटे के अंदर उस कोर्ट के सामने पेश करना पड़ता है जिसने वारंट जारी किया था, कोर्ट ही उस व्यक्ति को जमानत दे सकता।

29/10/2018

समन का प्रारूप
प्रत्येक समन लिखित रूप में होगा और दो प्रतियों में तैयार किया जाएगा जिस पर न्यायालय के पीठासीन अधिकारी के हस्ताक्षर होंगे और उस पर कोर्ट की सील लगी होगी।
(धारा 61 CrPC)

समन की तामील कैसे की जाए-
1. समन की तामील पुलिस अधिकारी द्वारा या किसी अन्य लोक सेवक के द्वारा की जाएगी।
2. जिस व्यक्ति के नाम समन है उस व्यक्ति को समन की एक प्रति दी जाएगी और दूसरी प्रति पर उस व्यक्ति के हस्ताक्षर लिए जाएंगे।
3. यदि जिस व्यक्ति के नाम समन है ओर वह व्यक्ति घर पर नही मिलता है तो उसके परिवार वयस्क सदस्य को उस समन की एक प्रति दी जाएगी और दूसरी प्रति पर उसके हस्ताक्षर लिए जाएंगे। (सेक्शन 64 , CrPC)

4. यदि ऊपर बताए गए तरीकों से समन की तामील नहीं होती है तो उस समन की एक प्रति को उसके घर या ऐसे स्थान पर जहां वह रहता है, के इसे भाग पर चिपकाया जाएगा जहां से वह साफ-साफ दिख सके। (सेक्शन 65, CrPC)
5. किसी निगम पर समन की तामील उसके सेक्रेट्री, लोकल मैनेजर या किसी दूसरे मुख्य अफसर पर तामील करके की जा सकती है। (सेक्शन 63, CrPC)
6. सरकारी सेवक पर समन की तामील-
सरकारी सेवक पर समन की तामील करने के लिए सबसे पहले समन उस कार्यालय के प्रधान को भेजा जाएगा जिसमें वह व्यक्ति सेवक है और तब वह प्रधान उस समन की तामील कराके (ऊपर लिखे तरीके से) दूसरी प्रति पर अपने हस्ताक्षर करके वापस कोर्ट को लौटा देगा।
(सेक्शन 66 , CrPC)

Address

Chamber No. 405, District & Sessions Courts
Hisar
125001

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