Adv.Udit Parashar

Adv.Udit Parashar Contact information, map and directions, contact form, opening hours, services, ratings, photos, videos and announcements from Adv.Udit Parashar, Legal Service, Khirkiya, Harda.

13/10/2023

चेक के अनादर के मामले में, एनआई अधिनियम की धारा 139 के तहत एक धारणा है कि चेक ऋण या देनदारी के बदले में जारी किया गया था।

इस अनुमान का खंडन करने का दायित्व अभियुक्त पर है, जिसे 'संभावना की प्रबलता' से यह साबित करना होगा कि चेक किसी ऋण या देनदारी के लिए जारी नहीं किया गया था। यदि आरोपी ऐसा करने में विफल रहता है, तो अदालत उसे दोषी ठहराने के लिए आगे बढ़ सकती है।

राजेश जैन बनाम अजय सिंह (2023)
उदित पाराशर अधिवक्ता
088711 02074

 😷
15/04/2021

😷

सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकार का संरक्षण) अधिनियम 2019 के तहत किए गए अपराध के लिए अग्रिम जम...
03/01/2021

सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकार का संरक्षण) अधिनियम 2019 के तहत किए गए अपराध के लिए अग्रिम जमानत देने पर कोई रोक नहीं है, बशर्ते अग्रिम जमानत देने से पहले सक्षम अदालत को उस विवाहित मुस्लिम महिला की सुनवाई अवश्य करनी चाहिए, जिसने शिकायत की है। ज‌स्ट‌िस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने माना है कि विवाहित मुस्लिम महिला को नोटिस जारी करते हुए अग्रिम जमानत अर्जी के लंबित होने के दौरान आरोपी को अंतरिम राहत देना अदालत का विवेकाधिकार होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकार का संरक्षण) अधिनियम 2019 के तहत किए गए अपराध के लिए अग्रिम ज....

travel partner
16/12/2020

travel partner

15/05/2020

*CRIMINAL LAWS*
*IMPORTANT DECISIONS*
*2019 & 2020*
*(Message No.01/15.05.2020)*

Abetment of su***de - Having advanced money to deceased, accused might have uttered some abusive words - That by itself not sufficient to constitute offence u/s 306 IPC. (2019(1) Criminal Court Cases 735 (S.C.)

Compromise - Non-compoundable offence - Where dispute between parties predominantly or overwhelming seems to be of a civil nature and dispute is a private one between two private parties, even though offences alleged are non-compoundable, offences can be compounded. (2019(3) Criminal Court Cases 528 (S.C.)

11/03/2020

निर्णय, आदेश और डिक्री यह तीन शब्द आम धारणा में एक जैसे प्रतीत होते हैं, परंतु इन शब्दों में अत्यधिक भेद है। इन शब्दों में भेद का वर्णन हमें सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 में मिलता है। बहुत से लोग इन 3 शब्दों में ज्यादा कन्फ्यूज्ड होते हैं, क्योंकि प्रकृति से यह तीनों शब्द एक जैसे आभास होते हैं। न्यायालय कार्यवाही में निरंतर इन शब्दों का प्रयोग किया जाता है। विधि के इन शब्दों के संबंध में संपूर्ण जानकारी होनी चाहिए तथा इस बात का ज्ञान होना चाहिए यह तीनों शब्द अपने अपने अर्थों में क्या महत्व रखते हैं। निर्णय किसी भी सिविल वाद में विवाधक तथ्य निर्णय की बुनियाद होते हैं। वादपत्र पर सिविल न्यायालय की समस्त कार्यवाही निर्णय के लिए ही होती है। निर्णय किसी भी विवाद के बिंदु पर न्यायालय द्वारा दिया गया समस्त निचोड़ है। निर्णय बड़ा शब्द है, जिसके अंतर्गत आदेश और डिक्री दोनों समाहित होती है। किसी भी निर्णय में अनेक आदेश होते हैं और अंत में एक डिक्री अवश्य होती है। सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 2 की उपधारा धारा 9 के अनुसार, "निर्णय से अभिप्राय आज्ञप्ति या आदेश के आधारों पर न्यायाधीशों द्वारा दिए गए कथन से है" सिविल प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत दी गई निर्णय की इस परिभाषा से यह सिद्ध होता है कि निर्णय में आदेश और डिक्री दोनों समाहित होती है। किसी भी सिविल मामले में समय-समय पर न्यायालय को अनेक आदेश देना होते हैं तथा इन आदेशों को मिलाकर अंत में विवाधक तथ्यों को लेकर न्यायालय द्वारा अपना एक निचोड़ पेश किया जाता है। इस निचोड़ में विवाद के समस्त बिंदुओं पर न्यायाधीश अपने कथन रखते हैं जो तथ्य साबित हो जाते हैं, उन तथ्यों को साबित मानकर उनके पक्ष में निर्णय सुना दिया जाता है। निर्णय पक्ष में होना नहीं होना इसका महत्व नहीं है, अपितु महत्व केवल इतना है कि न्यायालय तथ्यों के साथ साबित नासाबित के आधार पर अपना कथन करता है उस कथन को ही निर्णय कहा जाता है।
निर्णय के आवश्यक तत्व /-
मामले का संक्षिप्त विवरण निर्णय में किसी भी मामले का संक्षिप्त विवरण रखा जाता है। जैसे जब वाद को न्यायालय में प्रस्तुत किया जाता है तो एक वाद पत्र भी होता है तथा बाद में प्रतिवादी द्वारा इस वाद पत्र पर लिखित अभिकथन किया जाता है। किसी भी वाद में अनेक तथ्य होते हैं। इन समस्त तथ्यों को लिख पाना असंभव सा है, इसलिए न्यायाधीश इन सभी तथ्यों को संक्षिप्त करके लिखते हैं और इसे निर्णय में लिखा जाता है। अवधारणा के लिए प्रश्न इसका अर्थ विवाधक तथ्य तय किया जाना है। निर्णय में विवाधक तथ्य तय किए जाते हैं, जिन तथ्यों पर समस्त विचारण चलेगा। इन विवाधक तथ्यों का विवरण निर्णय में लिखा जाता है। विवाधक तथ्यों पर निर्णय निर्णय में किन्हीं दो पक्षकारों के बीच तय किए गए विवाधक तथ्यों पर न्यायालय द्वारा अपना निर्णय दिया जाता है। निर्णय में इन तथ्यों से संबंधित अधिकार और दायित्व को तय किया जाता है। इस निर्णय का कारण अथवा आधार न्यायालय द्वारा जो निर्णय दिया जाता है, उस निर्णय का कारण और उसका आधार भी लिखा जाता है तथा यह निर्णय का निष्कर्ष होता है, कौन से आधारों पर निर्णय दिया गया है। निर्णय का एक प्रारूप होता है,जिस प्रारूप में वाद के संक्षिप्त विवरण से प्रारंभ होकर निष्कर्ष तक न्यायाधीशों द्वारा अपने कथन रखे जाते है,और अंत में एक डिक्री लिखी होती है,जिसमें पक्षकारों के अधिकारों को तय किया जाता है। आज्ञप्ति (डिक्री) /-
सिविल प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत एक शब्द डिक्री है जिसे हिंदी में आज्ञप्ति कहा जाता है। आम भाषा में डिक्री और निर्णय को एक समान समझ लिया जाता है, परंतु डिक्री किसी भी निर्णय का केवल एक भाग मात्र है, जो पक्षकारों के अधिकारों का विनिश्चय करता है। न्यायाधीश इस आज्ञप्ति के प्रारूप के माध्यम से पक्षकारों के अधिकारों के संबंध में अपने कथन करते हैं। इसे पक्षकारों के अधिकारों की घोषणा के रूप में समझा जाता सकता है। सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 2 उपधारा 2 के अनुसार आज्ञप्ति की परिभाषा दी गई है। जो इस प्रकार है। " आज्ञप्ति से ऐसे न्याय निर्णय की औपचारिक अभिव्यक्ति अभिप्रेत है जो कि वाद के में सभी या किन्हीं विवादास्पद विषयों के संबंध में पक्षकारों के अधिकारों को वहां तक निश्चित रूप से आधारित करता है, जहां तक की उसे अभिव्यक्त करने वाले न्यायालय का संबंध है। यह प्रारंभिक या अंतिम हो सकती है। डिक्री तब प्रारंभिक होती है जब बाद में पूर्ण रूप से निपटारा कर दिए जा सकने के पहले आगे और कार्यवाही की जानी है। अंतिम डिक्री वह होती है जो अंतिम रूप से अधिकारों को विनिश्चय कर दे, जब ऐसा न्यायनिर्णय वाद को पूर्ण रूप से निपटा देता है। वह भागतः प्रारंभिक और भागतः अंतिम हो सकेगी।" किसी भी डिक्री में निम्न आवश्यक बातें होती है वाद का निस्तारण हो गया हो। वाद का निस्तारण न्यायालय के द्वारा हुआ हो। यह निस्तारण किसी सिविल या राजस्व न्यायालय द्वारा अंतिम रूप से हुआ हो। निश्चित रूप से पक्षकारों के अधिकारों का अवधारण हो गया हो। व्यतिक्रम में वाद के खारिज होने के आदेश की अभिव्यक्ति ना हो। छोला राम बनाम मासक के मामले में राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा यह अभिनिर्धारित किया गया है कि वाद या अपील को अवधिरूद्ध करने वाला आदेश डिक्री नहीं है, क्योंकि इसमें पक्षकारों के अधिकारों का विनिश्चय नहीं होता है। रतन सिंह बनाम विजय सिंह के मामले में यह तय किया गया है कि विलंब को माफ करने के लिए प्रस्तुत किए गए आवेदन पत्र को अस्वीकार करते हुए विलंब के कारण अवधिरूद्ध अपील को खारिज किए जाने का आदेश डिग्री नहीं है। सिन्नामणि बनाम जी वेट्रीवेल के मामले में यह कहा गया है कि संविधान के अनुच्छेद 226 के अधीन उच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेश डिक्री की परिभाषा में नहीं आता है। समय-समय पर भारत के उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालय द्वारा डिक्री के संबंध में निर्णय दिए जाते रहे है। किसी भी आज्ञप्ति के अनिवार्य तत्व आज्ञप्ति के लिए न्याय निर्णयन की औपचारिक अभिव्यक्ति आवश्यक है। न्याय निर्णयन न्यायालय के समक्ष चलने वाले किसी वाद में किया जाना आवश्यक है। न्याय निर्णयन का वाद में के विवादास्पद विषयों में से सब या किसी एक के बारे में पक्षकारों के अधिकारों का आधारित किया जाना आवश्यक है। न्याय निर्णय का निश्चय होना आवश्यक है। ऐसे न्याय निर्णय का किसी सिविल अथवा राजस्व न्यायालय द्वारा किया जाना आवश्यक है। कोई भी डिक्री मुख्यतः तीन प्रकार की होती है। प्रारंभिक बिक्री। अंतिम डिग्री। प्रारंभिक एवं अंतिम दोनों भांति की मिश्रित डिक्री।
प्रारंभिक डिक्री/-
किसी भी मामले में ऐसी परिस्थितियां हो सकती हैं, जिसमें न्यायालय द्वारा प्रारंभिक हस्तक्षेप किया जाना नितांत आवश्यक हो जाता है। ऐसी परिस्थितियों में न्यायालय द्वारा कुछ मामलों को तथा कुछ अधिकारों को तय करने हेतु प्रारंभिक डिक्री दे दी जाती है। प्रारंभिक डिक्री में निर्णय हो यह आवश्यक नहीं है, प्रारंभिक डिक्री मामले की तत्काल परिस्थितियों से निपटने हेतु दी जाती है। प्रारंभिक डिक्री उन मामलों में पारित की जाती है, जिनमें की न्यायालय को प्रथमतः पक्षकारों के अधिकारों पर न्याय निर्णयन करना होता है। उसके बाद उसे अपने हाथों में तब तक कुछ समय के लिए रोकना पड़ता है, जब तक कि वह इस स्थिति में नहीं हो जाता कि वह वाद में अंतिम आज्ञप्ति पारित करे। सहिंता द्वारा किन मामलों में प्रारंभिक आज्ञप्ति पारित की जाएगी इसका विवरण दिया गया है, तथा उन मामलों को सूचीबद्ध किया गया है जिनमें प्रारंभिक डिक्री पारित की जा सकेगी। कब्जा किराया या मध्यवर्ती लाभों के लिए वाद। प्रशासनिक वाद। भागीदारी की समाप्ति के लिए वाद। मालिक अभिकर्ता के बीच हिसाब के लिए वाद। विभाजन और पृथक कब्जे के लिए वाद। बंधक संपत्ति के विक्रय का वाद। बंधक मोचन संबंधी वाद। महेश चंद्र बनाम राम रतन यहां यह उल्लेखनीय है कि प्रारंभिक आज्ञप्ति केवल ऐसे मामलों में ही पारित की जा सकती है उनके बारे में संहिता में स्पष्ट रूप से व्यवस्था की गई है।
अंतिम आज्ञप्ति /-
जहां न्याय निर्णय मामले का पूर्ण रूप से निपटारा करता है वहां न्यायायल की अंतिम आज्ञप्ति होती है। कोई आज्ञप्ति अंतिम आज्ञप्ति हो जाती है, वह सक्षम न्यायालय द्वारा पारित की गई है और उसके विरुद्ध कोई अपील संस्थित नहीं की गई हो। किसी एक वाद में एकाधिक प्रारंभिक अथवा अंतिम आज्ञप्ति नहीं हो सकती अर्थात किसी भी मामले में केवल एक आज्ञप्ति अंतिम आज्ञप्ति होगी। निम्न दो परिस्थिति में कोई आज्ञप्ति अंतिम आज्ञप्ति हो जाती है। उसके विरुद्ध अपील के समय का अवसान बिना अपील संस्थित किए ही हो गया हो या उस विषय का विनिश्चय उच्चतम न्यायालय की आज्ञप्ति के द्वारा हो गया हो। आज्ञप्ति जहां तक उसे पारित करने वाले न्यायालय का संबंध है वाद का पूर्णरूपेण निपटारा कर देती है। कोई भी आज्ञप्ति जब किसी बात का पूर्णरूपेण निपटारा करती है तथा उस आज्ञप्ति के विरुद्ध अपील संस्थित करने की शक्ति नहीं होती है तो ऐसी परिस्थिति में आज्ञप्ति की अंतिम आज्ञप्ति कहलाती है। प्रारंभिक और अंतिम दोनों प्रकार की आज्ञप्ति कुछ मामले ऐसे होते हैं, जिन्हें प्रारंभिक और अंतिम विज्ञप्ति दोनों प्रकार की आज्ञप्ति जारी करना होती है। यह होती तो एक ही आज्ञप्ति है, परंतु इसकी प्रकृति ऐसी होती है की यह अंतिम एवं प्रारंभिक भी होती है। एक उदाहरण के माध्यम से इसे समझा जा सकता है। कोई वाद किसी संपत्ति के कब्जे के संबंध में लगाया गया है, तथा संपत्ति का हिस्सा अलग अलग है। ऐसी परिस्थिति में किसी एक हिस्से के लिए कोई आज्ञप्ति पारित कर दी जाती है तथा आगे की कार्यवाही जारी रहती है। जिस हिस्से के लिए आज्ञप्ति पारित की गई है, यदि यह आज्ञप्ति अपील योग्य नहीं है तो अंतिम आज्ञप्ति हो जाएगी परंतु वाद की अंतिम आज्ञप्ति नहीं होगी क्योंकि वाद तो अभी जारी है। यह भागतः अंतिम है और भागतः प्रारंभिक है। आदेश डिग्री और निर्णय की तरह का एक शब्द और है जिसे आदेश कहा जाता है।सिविल प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत आदेश को भी परिभाषित किया गया है इसकी परिभाषा धारा 2 की उप धारा 14 के अंतर्गत दी गई है। आदेश से अभिप्राय व्यवहार न्यायालय के निर्णय की औपचारिक अभिव्यक्ति से है जो आज्ञप्ति नहीं है। इस परिभाषा से मालूम होता है कि कोई भी डिक्री नहीं होने वाला व्यवहार आदेश हो जाएगा। किसी भी वाद की कार्यवाही में समय-समय पर न्यायालय को आदेश करने होते है इन आदेशों के माध्यम से वाद का संचालन किया जाता है।वाद में किसी भी आवेदन पर आदेश हो सकता है।वाद के संस्थित होने तथा वाद के निस्तारण होने तक आदेश किसी भी प्रक्रिया में हो सकता है।किसी भी आवेदन पर आदेश किया जा सकता है,सभी आदेश की अपील नहीं होती है। कुछ आदेश अपील योग्य होते है,केवल वही आदेश जो धारा 104 के अंतर्गत आदेश 43 के अंतर्गत नियम 1 में उल्लेखित है अपील योग होते है। न्यायालय द्वारा समय-समय पर आदेश किए जाते रहते है।उदाहरण के लिए जैसे यदि किसी पक्षकार द्वारा कार्यवाही पर लगे वाद को किसी विशेष दिनांक पर बढ़ाने हेतु कोई आवेदन दिया जाता है तो ऐसे आवेदन पर न्यायालय उस वादको उस विशेष दिनांक पर डालने की आज्ञा देता है या नहीं देता है इस के संदर्भ में अपना आदेश देगा,इसे आदेश कहा जाएगा। विशेषकर आदेश वाद के संचालन के लिए न्यायालय द्वारा दिए जाते है।समय-समय पर दिए गए आदेशों का संकलन करने पर ही कोई एक निर्णय तैयार होता है।यह माना जा सकता है कि आदेशों का संकलन ही निर्णय है परंतु यह परिभाषा पूर्ण नहीं है।आदेश बहुत छोटे तत्थों के लिए भी हो सकता है तथा कोई भी आदेश किसी एक वाद में किसी समय किसी एक पक्षकार के पक्ष में हो सकता है तथा किसी समय उसी पक्षकार के विरुद्ध हो सकता है। आदेश पक्षकारों के अधिकारों का अंतिम रूप से निर्धारण कर भी सकता है और नहीं भी करता है। आदेश आज्ञप्ति की भांति प्रारंभिक और अंतिम प्रकार का नहीं होता है।

08/03/2020

आदेश 33, सीपीसी: जानिए कौन है 'निर्धन व्यक्ति' जिसे प्रथमतः कोर्ट-फीस देने से मिल सकती है छूट?
****************************************

सुप्रीम कोर्ट ने शीला बरसे बनाम महाराष्ट्र राज्य AIR (1983) SC 378, सुनील बत्रा बनाम दिल्ली प्रशासन AIR 1978 SC 1675, एम. एच. होसकोट बनाम महाराष्ट्र राज्य AIR 1978 SC 1548, हुसैनारा खातून बनाम बिहार राज्य AIR 1979 SC 1369 और खत्री बनाम बिहार राज्य AIR 1981 SC 928 जैसे मामलों में भी गरीबों और जरूरतमंदों को समय-समय पर कानूनी सहायता के महत्व पर जोर दिया है।

इसके अलावा, अधिवक्ता अधिनियम, 1961 भी एक अधिवक्ता को एक निर्धन व्यक्ति की, जो अपनी व्यक्तिगत क्षमता में एक वकील से संपर्क करता है, कानूनी सहायता प्रदान करने के लिए जिम्मेदारी सौंपता है। हम एक अन्य लेख में इस विषय पर चर्चा कर चुके हैं कि आखिर वकीलों को क्यों देनी चाहिए प्रो-बोनो (निशुल्क) कानूनी सहायता?

सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 का आदेश 33 (ORDER ###III) हम यह जानते हैं कि प्लेंट (वाद-पत्र) दाखिल करने के समय एक वादी को कोर्ट फीस एक्ट, 1870 द्वारा निर्धारित अदालत के शुल्क का भुगतान करना पड़ता है। लेकिन, ऐसे असंख्य व्यक्ति हमारे समाज में मौजूद हैं, जो अपनी गरीबी के कारण कोर्ट-फीस का भुगतान करने में असमर्थ हैं।

इसी क्रम में सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के अंतर्गत आदेश 33 (ORDER ###III), ऐसे व्यक्तियों को कोर्ट-फीस देने से छूट प्रदान करता है। गौरतलब है कि आदेश 33 के अंतर्गत 'निर्धन व्यक्तियों' द्वारा मुकदमा दायर करने के सम्बन्ध में प्रावधान दिया गया है।

यह आदेश ऐसे लोगों को अदालत में अपना मुक़दमा लाने में सक्षम बनाता है, जो अदालत की फीस का भुगतान करने में सक्षम नहीं हैं, क्योंकि वे अत्यंत गरीब हैं उनके पास कोर्ट-फीस देने के पर्याप्त साधन नहीं हैं। इस आदेश के अंतर्गत उन्हें आवश्यक कोर्ट-फीस के भुगतान के बिना, प्रथमत: (at the first instance) वाद-पत्र दाखिल करने की अनुमति दी जाती है।

मथाई एम्. पैकेदय बनाम सी. के. एंटोनी, (2011) 13 SCC 174 के मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा यह देखा गया था कि सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के आदेश 33 का उद्देश्य, न्याय की तलाश में किसी व्यक्ति को सक्षम बनाना है, जो गरीबी से पीड़ित है, या अन्यथा अदालत का शुल्क अदा करने हेतु उसके पास पर्याप्त साधन मौजूद नहीं है। सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 का आदेश 33 ऐसे निर्धन व्यक्ति को प्रथमतः (at the first instance) आवश्यक कोर्ट-फीस का भुगतान करने से छूट देता है, बशर्ते वह कुछ आवश्यक तत्वों को पूरा करे।

यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 आदेश 33 को मुख्यतः 3 उद्देश्यों की पूर्ती के लिए कानून में जगह दी गयी है। इन 3 उद्देश्यों को वेंकटासुब्बैयाह बनाम तिरुपथियाह, AIR 1955AP 165 के मामले में बताया गया था। आइये जानते हैं यह तीन उद्देश्य:-

(a) किसी निर्धन व्यक्ति के बोना फाइड क्लेम की रक्षा करने के लिए
(b) राजस्व के हित का बचाव करने के लिए
(c) प्रतिवादी के उत्पीडन से बचाव के लिए कौन है निर्धन व्यक्ति?

आर. वी. देव बनाम मुख्य सचिव केरल सरकार (2007) 5 एससीसी 698 के मामले में यह कहा गया था कि जब किसी निर्धन व्यक्ति द्वारा अपनी निर्धनता को लेकर एक आवेदन दायर किया जाता है (आदेश 33, सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के अंतर्गत निर्धन व्यक्ति के तौर पर सूट दायर करने हेतु), तो अदालत द्वारा इस बात को तय करने के लिए कुछ कारकों पर विचार किया जाना चाहिए कि वह व्यक्ति आदेश 33 के अर्थों में निर्धन है अथवा नहीं।

आइये, आगे बढ़ने से पहले सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के आदेश 33, नियम 1 को देख लेते हैं जो निर्धन व्यक्ति द्वारा वाद संस्थित किये जाने के बारे में प्रावधान करता है:-

1. निर्धन व्यक्ति द्वारा वाद संस्थित किए जा सकेंगे – निम्नलिखित उपबंधों के अधीन रहते हुए कोई भी वाद निर्धन व्यक्तियों द्वारा संस्थित किया जायेगा स्पष्टीकरण

1 – कोई व्यक्ति निर्धन व्यक्ति तब है

(a) जब उसके पास इतना पर्याप्त साधन (डिक्री के निष्पादन में कुर्की से छूट प्राप्त संप्पत्ति से और वाद की विषय वस्तु से भिन्न) नहीं है कि वह वाद या वाद पत्र के लिए विधि द्वारा विहित फीस दे सके; अथवा

(b) जहाँ ऐसी कोई फीस विहित नहीं है वहां, तब वह एक हज़ार रूपये के मूल्य की ऐसी संपत्ति का, जो डिक्री के जो डिक्री के निष्पादन में कुर्की से छूट प्राप्त संपत्ति से और वाद की विषय वस्तु से अलग है स्पष्टीकरण

2 – इस प्रश्न पर विचार करने में कि आवेदक निर्धन व्यक्ति है या नहीं, किसी ऐसी संपत्ति को ध्यान में रखा जायेगा जिसको उसने निर्धन व्यक्ति के रूप में वाद चलने की अनुज्ञा के लिए अपना आवेदन प्रस्तुत करने के पश्च्यात और आवेदन का विनिश्चय होने के पूर्व अर्जित किया है स्पष्टीकरण

3 – जहाँ वादी प्रतिनिधि की हैसियत में वाद लाता है वहां इस प्रश्न का अवधारण कि वह निर्धन व्यक्ति है, उन साधनों के प्रति निर्देश से किया जायेगा जो ऐसी हैसियत में उसके पास हैं यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि एक पार्टी जो निर्धनता के आधार पर कोर्ट-फीस के भुगतान से छूट के लिए आवेदन करती है, उसे अदालत को एक महत्वपूर्ण घटक के बारे में संतुष्ट करना होगा, कि पार्टी के पास वाकई कोर्ट-फीस का भुगतान करने की क्षमता नहीं है।

पार्टी के लिए इस आशय को लेकर सिर्फ एक साधारण बयान दे देना एक पर्याप्त नहीं होगा कि उसे निर्धन व्यक्ति के तौर पर वाद संस्थित करने की अनुमति दे दी जाये, क्योंकि इस देश में दलीलों में झूठे कथन दर्ज करना आम बात है। इसलिए यह कानून की आवश्यकता है कि पार्टी द्वारा दिए गए बयान को कोर्ट की संतुष्टि के अनुसार पुष्ट किया जाना चाहिए।

इसका मतलब यह होगा कि पार्टी को यह साबित करना होगा कि उसके पास न केवल किसी की संपत्ति या बैंक बैलेंस से कोर्ट-फीस का भुगतान करने की क्षमता नहीं है, बल्कि कोर्ट को इस बात को लेकर भी संतुष्ट किया जाना होगा कि पार्टी की स्थिति ऐसी नहीं है कि वह कोर्ट-फीस के भुगतान के लिए अपेक्षित धनराशि जुटा सके।

सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के आदेश 33 के मूल उद्देश्य पर केरल उच्च न्यायालय द्वारा सुमति कुट्टी बनाम नारायणी AIR 1973 Ker 19 में व्यापक रूप से चर्चा की गई, जहां यह देखा गया था कि वास्तविक परीक्षण यह है कि क्या याचिकाकर्ता अपनी संपत्ति को, यदि कोई हो तो, अपेक्षित कोर्ट-शुल्क का भुगतान करने के उद्देश्य से बिना किसी कठिनाई के कैश में बदल सकता है या नहीं।

"पर्याप्त साधन" से क्या तात्पर्य है? सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 33 के नियम 1 के स्पष्टीकरण 1 के अनुसार, वह व्यक्ति, जिसके पास या तो पर्याप्त साधन नहीं हैं कि वह सूट के लिए कानून द्वारा निर्धारित अदालती-शुल्क जमा कर सके (जहाँ कोर्ट-फीस निर्धारित है), या जहाँ ऐसी कोर्ट-फीस निर्धारित नहीं है, वहां वह 1 हज़ार मूल्य की संपत्ति का हकदार नहीं है।

दोनों ही मामलों में, एक डिक्री के निष्पादन में संलग्नक से छूट प्राप्त संपत्ति और सूट के विषय-वस्तु को ऐसे निर्धन व्यक्ति की वित्तीय मूल्य या क्षमता की गणना करने के लिए अदालत द्वारा ध्यान में नहीं रखा जाएगा।

इसके अलावा, अन्य कारकों जैसे कि व्यक्ति की रोजगार की स्थिति और पेंशन के रूप में सेवानिवृत्ति के लाभ, अचल संपत्ति का स्वामित्व, और व्यक्ति के कुल ऋण और परिवार के सदस्य या करीबी दोस्तों से प्राप्त वित्तीय सहायता के रूप में कुल आय को यह निर्धारित किये जाने के लिए कि क्या एक व्यक्ति पर्याप्त साधन से युक्त है या नहीं एवं क्या वह अपेक्षित न्यायालय शुल्क का भुगतान करने में असमर्थ है, ध्यान में रखा जा सकता है [मथाई एम्. पैकेदय बनाम सी. के. एंटोनी, (2011) 13 SCC 174]।

इसलिए, सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 33 नियम 1 में अभिव्यक्ति "पर्याप्त साधन" सामान्य रूप से किसी व्यक्ति द्वारा अदालत के शुल्क का भुगतान करने की क्षमता या अक्षमता के बारे में उपलब्ध वैध तरीकों से धन जुटाने के विचार करती है।

✍️Udit

11/12/2019

Address

Khirkiya
Harda

Opening Hours

Monday 11am - 7:30am
Tuesday 11am - 7:30am
Wednesday 11am - 7:30am
Thursday 11am - 7:30am
Friday 11am - 7:30am
Saturday 11am - 5am
Sunday 3am - 6am

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Adv.Udit Parashar posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Practice

Send a message to Adv.Udit Parashar:

Share

Category