25/08/2018
♥️ॐ त्र्यंबकम् मंत्र के 33 अक्षर हैं जो महर्षि वशिष्ठ के अनुसार 33 देवताओं के घोतक हैं। उन तैंतीस देवताओं में 8 वसु 11 रुद्र और 12 आदित्य 1 प्रजापति तथा 1 षटकार हैं❣️
♥️इन तैंतीस देवताओं की सम्पूर्ण शक्तियाँ महामृत्युंजय मंत्र से निहीत होती है जिससे महामृत्युंजय का पाठ करने वाला प्राणी दीर्घायु तो प्राप्त करता ही हैं साथ ही वह निरोग, ऐश्वर्ययुक्त धनवान भी होता है❣️
♥️महामृत्युंजय का पाठ करने वाला प्राणी हर दृष्टि से सुखी एवम समृध्दिशाली होता है। भगवान शिव की अमृतमयी कृपा उस पर निरन्तर बरसती रहती है❣️
♥️त्रि - ध्रववसु प्राण का घोतक है, जो सिर में स्थित है❣️
♥️यम- अध्ववरसु प्राण का घोतक है, जो मुख में स्थित है❣️
♥️ब- सोम वसु शक्ति का घोतक है, जो दक्षिण कर्ण में स्थित है❣️
♥️कम- जल वसु देवता का घोतक है, जो वाम कर्ण में स्थित है❣️
♥️य- वायु वसु का घोतक है, जो दक्षिण बाहु में स्थित है❣️
♥️जा- अग्नि वसु का घोतक है, जो बाम बाहु में स्थित है।
♥️म- प्रत्युवष वसु शक्ति का घोतक है, जो दक्षिण बाहु के मध्य में स्थित है❣️
♥️हे- प्रयास वसु मणिबन्धत में स्थित है❣️
♥️सु- वीरभद्र रुद्र प्राण का बोधक है। दक्षिण हस्त के अंगुलि के मूल में स्थित है❣️
♥️ग-शुम्भ् रुद्र का घोतक है दक्षिणहस्त् अंगुलि के अग्र भाग में स्थित है❣️
♥️ न्धिम् -गिरीश रुद्र शक्ति का मूल घोतक है। बायें हाथ के मूल में स्थित है❣️
♥️पु- अजैक पात रुद्र शक्ति का घोतक है वामहस्त के मध्य भाग में स्थित है❣️
♥️ ष्टि- अहर्बुध्य्त् रुद्र का घोतक है वामहस्त के मणिबन्ध में स्थित है❣️
♥️व- पिनाकी रुद्र प्राण का घोतक है बायें हाथ की अंगुलि के मूल में स्थित है❣️
♥️ र्ध- भवानीश्वपर रुद्र का घोतक है वामहस्त अंगुलि के अग्र भाग में स्थित है❣️
♥️नम्- कपाली रुद्र का घोतक है उरु मूल में स्थित है❣️
♥️उ- दिक्पति रुद्र का घोतक है यक्ष जानु में स्थित है❣️
♥️ र्वा- स्थाणु रुद्र का घोतक है जो यक्ष गुल्फ् में स्थित है❣️
♥️रु- भर्ग रुद्र का घोतक है जो चक्ष पादांगुलि मूल में स्थित है❣️
♥️क- धाता आदित्यद का घोतक है जो यक्ष पादांगुलियों के अग्र भाग में स्थित है❣️
♥️मि- अर्यमा आदित्यद का घोतक है जो वाम उरु मूल में स्थित है❣️
♥️व- मित्र आदित्यद का घोतक है जो वाम जानु में स्थित है❣️
♥️ब- वरुणादित्या का बोधक है जो वाम गुल्फा में स्थित है❣️
♥️न्ध- अंशु आदित्यद का घोतक है वाम पादंगुलि के मुल में स्थित है❣️
♥️नात्- भगादित्य का बोधक है वाम पैर की अंगुलियों के अग्रभाग में स्थित है❣️
♥️मृ- विवस्व्नर् सूर्य का घोतक है जो दक्ष पार्श्वि में स्थित है❣️
र्त्यो्- दन्दाददित्य् का बोधक है। वाम पार्श्वि भाग में स्थित है❣️
♥️मु- पूषादित्यं का बोधक है । पृष्ठै भगा में स्थित है ।
♥️क्षी- पर्जन्य् आदित्यय का घोतक है नाभि स्थिल में स्थित है❣️
♥️य- त्वणष्टान आदित्य का बोधक है गुहय भाग में स्थित है❣️
♥️मां- विष्णुय आदित्यय का घोतक है यह शक्ति स्वरूप दोनों भुजाओं में स्थित है❣️
♥️मृ- प्रजापति का घोतक है जो कंठ भाग में स्थित है❣️
♥️तात- अमित वषट्कार का घोतक है जो हदय प्रदेश में स्थित है❣️
♥️उपर वर्णन किये स्थानों पर उपरोक्त देवता, वसु आदित्य आदि अपनी सम्पूर्ण शक्तियों सहित विराजित हैं। जो प्राणी श्रध्दा सहित महामृत्युजय मंत्र का पाठ करता है उसके शरीर के अंग - अंग (जहां के जो देवता या वसु अथवा आदित्यद हैं) उनकी रक्षा होती है❣️