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23/05/2026

लंबे समय तक अलग रहने पर तलाक का आधार कब बनता है:-

अलगाव अपने-आप तलाक नहीं, परिस्थितियाँ तय करती हैं परिणाम

अक्सर लोग यह मान लेते हैं कि यदि पति-पत्नी कई वर्षों से अलग रह रहे हैं तो तलाक स्वतः मिल जाएगा। व्यवहार में स्थिति इतनी सरल नहीं होती। केवल लंबे समय तक अलग रहना अपने-आप तलाक का आधार नहीं बनता, जब तक उससे जुड़ी कानूनी परिस्थितियाँ अदालत के सामने सिद्ध न हों।

केवल अलग रहना क्यों पर्याप्त नहीं-
कानून विवाह को एक वैध और संरक्षित संबंध मानता है। इसलिए अदालत यह देखती है कि अलगाव किस कारण से हुआ, कितने समय से है, और क्या वैवाहिक संबंध व्यवहारिक रूप से समाप्त हो चुके हैं। केवल दूरी, मनमुटाव या अलग निवास अपने-आप विवाह समाप्त नहीं करते।

किन परिस्थितियों में लंबा अलगाव महत्वपूर्ण हो सकता है

1-क्रूरता के संदर्भ में- यदि एक पक्ष यह साबित कर दे कि दूसरे के व्यवहार के कारण साथ रहना व्यावहारिक रूप से असंभव हो गया और उसी वजह से लंबे समय तक अलग रहना पड़ा, तो यह क्रूरता के आधार को मजबूत कर सकता है।

2-परित्याग के मामलों में- यदि एक पक्ष बिना उचित कारण दूसरे को छोड़कर चला जाए, वापस लौटने की वास्तविक मंशा न हो, और यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहे, तो इसे परित्याग माना जा सकता है। यहाँ यह देखना महत्वपूर्ण होता है कि अलगाव जानबूझकर और स्थायी रूप से था या नहीं।

3-वैवाहिक संबंध का पूर्ण विघटन- कुछ मामलों में अदालतों ने माना है कि यदि पति-पत्नी वर्षों से अलग रह रहे हों, पुनर्मिलन की कोई वास्तविक संभावना न बची हो और विवाह केवल औपचारिक रूप से शेष रह गया हो, तो परिस्थितियों के आधार पर राहत दी जा सकती है। हालांकि यह कोई स्वतः लागू होने वाला सामान्य नियम नहीं है।

4-पारस्परिक सहमति से तलाक- यदि दोनों पक्ष लंबे समय से अलग रह रहे हों और सहमत हों कि साथ रहना संभव नहीं है, तो विधि में निर्धारित शर्तें पूरी होने पर पारस्परिक सहमति से तलाक का मार्ग उपलब्ध हो सकता है।

अदालत किन बातों पर ध्यान देती है-

अदालत केवल समय नहीं गिनती। वह यह देखती है

क्या साथ रहने का प्रयास किया गया था
क्या समझौते या सुलह की कोशिश हुई
क्या अलगाव स्वेच्छा से था या परिस्थितिवश
और क्या वैवाहिक संबंध वास्तविक रूप से समाप्त हो चुके हैं

समय महत्वपूर्ण कारक हो सकता है, लेकिन अंतिम निर्णय का एकमात्र आधार नहीं।

अक्सर देखा जाता है कि लंबे समय का अलगाव मुकदमे को प्रभावित करता है, लेकिन प्रत्येक मामले के तथ्य अलग होते हैं। इसलिए यह मान लेना सही नहीं कि केवल कई साल अलग रहने से तलाक निश्चित हो जाएगा।

सीधी बात-लंबे समय तक अलग रहना एक महत्वपूर्ण परिस्थिति हो सकती है, पर तलाक का आधार तभी बनता है जब उससे जुड़ी कानूनी शर्तें और तथ्य अदालत के सामने स्पष्ट रूप से स्थापित हों।

अस्वीकरण-
यह लेख सामान्य विधिक जागरूकता के उद्देश्य से है।
किसी विशेष मामले में योग्य अधिवक्ता से व्यक्तिगत परामर्श आवश्यक है।
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23/05/2026

ट्रायल कोर्ट का क्षेत्राधिकार कैसे तय होता है:-

हर अदालत हर मामला नहीं सुन सकती

किसी भी मुकदमे में सबसे शुरुआती और महत्वपूर्ण प्रश्न यह होता है कि मामला किस अदालत में चलेगा। यदि किसी अदालत के पास अधिकार क्षेत्र नहीं है, तो उसकी कार्यवाही बाद में चुनौती दी जा सकती है। इसी कारण ट्रायल शुरू होने से पहले यह देखा जाता है कि संबंधित अदालत को मामले की सुनवाई का कानूनी अधिकार प्राप्त है या नहीं।

आपराधिक मामलों में सामान्य सिद्धांत यह है कि जहाँ अपराध हुआ, सामान्यतः उसी क्षेत्र की अदालत मुकदमे की सुनवाई करती है। घटना जिस थाना क्षेत्र या न्यायिक सीमा में हुई हो, वही अदालत प्रारंभिक रूप से सक्षम मानी जाती है।

हालाँकि व्यवहार में हर मामला इतना सीधा नहीं होता। कई मामलों में घटना के अलग-अलग हिस्से अलग स्थानों पर घटित होते हैं। जैसे ऑनलाइन धोखाधड़ी, इलेक्ट्रॉनिक लेन-देन, फोन कॉल या बहु-स्थान घटनाओं में अदालत यह देखती है कि कारण-कार्यवाही का महत्वपूर्ण भाग कहाँ उत्पन्न हुआ। ऐसी परिस्थितियों में एक से अधिक अदालतों का अधिकार क्षेत्र बन सकता है।

यदि अपराध एक स्थान पर शुरू हुआ हो और उसका प्रभाव या परिणाम दूसरे स्थान पर हुआ हो, तब दोनों क्षेत्रों की अदालतों के अधिकार का प्रश्न उठ सकता है। ऐसी स्थिति में रिकॉर्ड और परिस्थितियों को देखकर उपयुक्त अदालत तय की जाती है।

मामले की प्रकृति भी महत्वपूर्ण होती है। हर अदालत हर प्रकार का मुकदमा नहीं सुन सकती। कुछ मामलों की सुनवाई विशेष अदालतों द्वारा की जाती है, जबकि गंभीर अपराधों का ट्रायल सत्र न्यायालय में चलता है। इसी प्रकार पारिवारिक विवाद, आर्थिक अपराध, बाल न्याय या विशेष अधिनियमों से जुड़े मामलों के लिए अलग न्यायिक मंच निर्धारित हो सकते हैं।

दंड की सीमा और न्यायालय की श्रेणी भी महत्व रखती है। निचली अदालतें सीमित दंडाधिकार के भीतर मामलों की सुनवाई करती हैं, जबकि गंभीर अपराध उच्च स्तर की अदालतों को भेजे जा सकते हैं।

यदि किसी पक्ष को यह लगे कि मामला गलत अदालत में चल रहा है, तो वह प्रारंभिक चरण में क्षेत्राधिकार पर आपत्ति उठा सकता है। बहुत देर से उठाई गई आपत्ति को अदालत अलग दृष्टिकोण से देख सकती है, विशेषकर तब जब उससे वास्तविक नुकसान सिद्ध न हो।

आवश्यक परिस्थितियों में उच्च न्यायालय किसी मामले को एक अदालत से दूसरी अदालत में स्थानांतरित भी कर सकता है, यदि निष्पक्ष सुनवाई, सुविधा या न्यायहित ऐसा आवश्यक बनाते हों।

सीधी बात- क्षेत्राधिकार केवल तकनीकी मुद्दा नहीं है। यह तय करता है कि कौन-सी अदालत मुकदमे की सुनवाई करेगी, कौन आदेश पारित कर सकती है और किस स्तर पर चुनौती दी जाएगी। इसलिए मुकदमे की शुरुआत में ही इस प्रश्न को गंभीरता से देखा जाता है।

अस्वीकरण-
यह लेख सामान्य विधिक जागरूकता के उद्देश्य से है। किसी विशेष मामले में योग्य अधिवक्ता से व्यक्तिगत परामर्श आवश्यक है।
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महत्वपूर्ण न्यायालय निर्णय-आज के कुछ महत्वपूर्ण जजमेंट के स्क्रीनशॉट नीचे साझा किए जा रहे हैं। इन मामलों में अदालत द्वार...
23/05/2026

महत्वपूर्ण न्यायालय निर्णय-

आज के कुछ महत्वपूर्ण जजमेंट के स्क्रीनशॉट नीचे साझा किए जा रहे हैं। इन मामलों में अदालत द्वारा महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांतों एवं प्रक्रियागत पहलुओं पर विचार किया गया है।

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चेक बाउंस मामलों में सजा का संतुलन जरूरी हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणीव्यापार और लेन-देन में भरोसा सबसे बड़ी पूंजी माना...
23/05/2026

चेक बाउंस मामलों में सजा का संतुलन जरूरी हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी

व्यापार और लेन-देन में भरोसा सबसे बड़ी पूंजी माना जाता है। इसी भरोसे को बनाए रखने के लिए चेक बाउंस कानून बनाए गए, ताकि आर्थिक लेन-देन में अनुशासन बना रहे। लेकिन साथ ही अदालतों ने यह भी स्पष्ट किया है कि सजा ऐसी होनी चाहिए जो न्यायसंगत और परिस्थितियों के अनुरूप हो।

हाल ही में हाईकोर्ट ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति जुर्माना या मुआवजा जमा नहीं कर पाता, तो उसे दी जाने वाली जेल की सजा बकाया राशि के अनुपात में होनी चाहिए। अदालत ने यह भी माना कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता की कीमत असंगत नहीं हो सकती और समान परिस्थितियों वाले मामलों में संतुलित दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है।

चेक बाउंस के मामलों में अदालत का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि पीड़ित पक्ष को उचित मुआवजा दिलाना भी होता है। कई बार आर्थिक तंगी, व्यापारिक नुकसान या परिस्थितियों के कारण भुगतान में देरी होती है। ऐसे मामलों में अदालतें यह देखती हैं कि आरोपी का व्यवहार क्या रहा, भुगतान की कोशिश हुई या नहीं, और क्या सजा परिस्थिति के अनुरूप है।

यह फैसला इस बात को भी रेखांकित करता है कि न्याय व्यवस्था केवल कठोरता पर नहीं, बल्कि संतुलन और संवेदनशीलता पर भी आधारित है। कानून का सम्मान जरूरी है, लेकिन सजा इतनी असंगत भी न हो कि वह व्यक्ति की मूल स्वतंत्रता पर अत्यधिक प्रभाव डाल दे।

आर्थिक विवाद तेजी से बढ़ रहे हैं, इसलिए जरूरी है कि लोग लेन-देन में पारदर्शिता रखें और चेक जारी करते समय पर्याप्त सावधानी बरतें। वहीं, विवाद होने पर कानूनी प्रक्रिया का सम्मान करते हुए समाधान की दिशा में प्रयास करना भी जरूरी है।

अदालतों की यही कोशिश रहती है कि कानून का उद्देश्य पूरा हो, पीड़ित को राहत मिले और सजा न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप रहे।
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23/05/2026

लंबित आपराधिक आरोपों के आधार पर घरेलू हिंसा मामले में मुआवजा नहीं दिया जा सकता:-राजस्थान हाईकोर्ट

राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि क्रूरता, उत्पीड़न या मानसिक प्रताड़ना से जुड़े आरोप किसी आपराधिक अदालत में पहले से विचाराधीन हैं, तो घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत सुनवाई कर रही अदालत उन आरोपों को सही मानकर मुआवजा नहीं दे सकती।

जस्टिस फरजंद अली की पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए पत्नी को दिए गए 2 लाख रुपये के मुआवजे का आदेश रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि घरेलू हिंसा अधिनियम का उद्देश्य पीड़ित महिला को तत्काल नागरिक राहत देना है, न कि लंबित आपराधिक आरोपों पर पहले से निष्कर्ष निकालना।

मामला उस आवेदन से जुड़ा था जिसमें पत्नी ने वर्ष 2014 में घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत संरक्षण, भरण-पोषण और मुआवजे की मांग की थी। निचली अदालत ने वर्ष 2025 में पति को भरण-पोषण देने के साथ-साथ मानसिक प्रताड़ना के आधार पर 2 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया था।

पति की अपील पर अपीलीय अदालत ने भरण-पोषण की राशि कम कर दी, लेकिन मुआवजा बरकरार रखा। इसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि क्रूरता और उत्पीड़न के वही आरोप पहले से आपराधिक अदालत में लंबित हैं और अभी उन पर अंतिम फैसला नहीं आया है। ऐसे में घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत चल रही कार्यवाही में उन आरोपों को सही मान लेना उचित नहीं होगा।

अदालत ने कहा कि यदि किसी लंबित आपराधिक मामले के आरोपों के आधार पर मुआवजा दिया जाता है, तो यह विवाद का पूर्व निर्णय करने जैसा होगा, जिससे दोनों पक्षों के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत अदालतें यह देख सकती हैं कि महिला पत्नी है, वह उचित कारणों से अलग रह रही है और उसे आर्थिक सहायता की आवश्यकता है। लेकिन लंबित आपराधिक आरोपों पर दोष या प्रताड़ना संबंधी निष्कर्ष देना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि जब आपराधिक कानून पहले से लागू हो चुका है और आरोपों पर साक्ष्यों के आधार पर फैसला आना बाकी है, तब समान तथ्यों पर दूसरी अदालतों को संयम बरतना चाहिए।

इन्हीं टिप्पणियों के साथ राजस्थान हाईकोर्ट ने मानसिक प्रताड़ना के आधार पर दिया गया 2 लाख रुपये का मुआवजा रद्द कर दिया।
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23/05/2026

चार्जशीट दाखिल होने के बाद भी अग्रिम जमानत स्वतः समाप्त नहीं होती:-कर्नाटक हाईकोर्ट

कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा है कि एक बार किसी आरोपी को अग्रिम जमानत मिल जाने के बाद वह केवल चार्जशीट दाखिल होने से स्वतः समाप्त नहीं हो जाती। जब तक अदालत विधि अनुसार जमानत रद्द न करे, तब तक आरोपी की स्वतंत्रता छीनी नहीं जा सकती।

मामला एक ऐसे आरोपी से जुड़ा था जिसे POCSO Act की धाराओं के तहत दर्ज मामले में पहले ही अग्रिम जमानत मिल चुकी थी। जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने चार्जशीट दाखिल कर दी और आरोपी अदालत में पेश हुआ। इसी दौरान उसने नियमित जमानत के लिए भी आवेदन दिया था, जिस पर सुनवाई लंबित थी।

सुनवाई के दौरान पीड़िता की मां ने अदालत में मौखिक रूप से आरोप लगाया कि आरोपी अब भी लड़की का पीछा कर रहा है, जिससे वह कॉलेज में प्रवेश नहीं ले पा रही है। इसके बाद विशेष अदालत ने आरोपी को न्यायिक हिरासत में भेजने का आदेश दे दिया।

कर्नाटक हाईकोर्ट ने इस कार्रवाई को कानून के विपरीत बताया। अदालत ने कहा कि आरोपी पहले से अग्रिम जमानत पर था और न तो राज्य सरकार और न ही पीड़ित पक्ष ने उसकी जमानत रद्द करने के लिए कोई आवेदन दिया था। ऐसे में विशेष अदालत सीधे आरोपी को हिरासत में नहीं भेज सकती थी।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि केवल चार्जशीट दाखिल होने या अदालत द्वारा संज्ञान लेने से आरोपी को आत्मसमर्पण कर नियमित जमानत लेने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

अदालत ने स्पष्ट किया कि अग्रिम जमानत सामान्य रूप से मुकदमे के अंत तक जारी रह सकती है, जब तक कि किसी वैध आधार पर उसे रद्द न किया जाए।

कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी आरोपी की स्वतंत्रता को स्थापित कानूनी प्रक्रिया को दरकिनार कर खत्म नहीं किया जा सकता। यदि जमानत रद्द करनी है तो उसके लिए विधि अनुसार अलग प्रक्रिया अपनानी होगी।

इन्हीं टिप्पणियों के साथ कर्नाटक हाईकोर्ट ने विशेष अदालत का हिरासत आदेश रद्द कर दिया और आरोपी की तत्काल रिहाई का निर्देश दिया।

केस शीर्षक-
Nikhil Krishna Kankonkar v. The State of Karnataka
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23/05/2026

पत्नी को सरकारी नौकरी मिलने के बाद भरण-पोषण सीमित किया जा सकता है:-इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि पत्नी को सरकारी नौकरी मिल जाती है, तो यह परिस्थितियों में महत्वपूर्ण बदलाव माना जाएगा और ऐसे में भरण-पोषण की राशि को उस अवधि तक सीमित किया जा सकता है जब तक पत्नी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं हुई थी।

मामला धारा 125 CrPC के तहत दायर भरण-पोषण केस से जुड़ा था। पत्नी ने दावा किया था कि विवाह के बाद दहेज की मांग को लेकर उसके साथ प्रताड़ना की गई और उसके पास स्वयं के भरण-पोषण का कोई साधन नहीं है। उसने यह भी कहा कि उसके माता-पिता भी उसका खर्च उठाने में सक्षम नहीं हैं।

परिवार न्यायालय ने मामले की सुनवाई के बाद पति को पत्नी को 10 हजार रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण देने का आदेश दिया था। हालांकि अदालत ने यह भी माना कि पत्नी को बाद में सरकारी नौकरी मिल गई थी और उसने 9 फरवरी 2024 को नौकरी जॉइन कर ली थी।

इसी आधार पर परिवार न्यायालय ने कहा कि पत्नी केवल आवेदन दायर करने की तारीख 14 जुलाई 2019 से लेकर 8 फरवरी 2024 तक ही भरण-पोषण पाने की हकदार होगी। इसके खिलाफ पत्नी ने हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दाखिल की।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि भरण-पोषण कानून का मूल उद्देश्य ऐसे व्यक्ति को आर्थिक सहायता देना है जो स्वयं अपना पालन-पोषण करने में सक्षम न हो। यदि पत्नी सरकारी नौकरी प्राप्त कर लेती है, तो यह एक महत्वपूर्ण परिवर्तन है जिसे अदालत नजरअंदाज नहीं कर सकती।

अदालत ने माना कि परिवार न्यायालय का आदेश संतुलित और उचित है क्योंकि पत्नी को उस अवधि के लिए भरण-पोषण दिया गया जब वह बेरोजगार थी और उसके पास आय का साधन नहीं था।

हाईकोर्ट ने कहा कि एक बार पत्नी नियमित सरकारी सेवा में आ जाए और स्वयं अपना खर्च चलाने में सक्षम हो जाए, तब भरण-पोषण को अनिश्चितकाल तक जारी रखना कानून के उद्देश्य के अनुरूप नहीं माना जा सकता।

इन्हीं टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने पत्नी की याचिका खारिज कर दी और परिवार न्यायालय का आदेश बरकरार रखा।

केस शीर्षक-
A v. State of U.P. and Another
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23/05/2026

सिर्फ चेक बाउंस होने से अपराध साबित नहीं होता, कानूनी देनदारी साबित करना भी जरूरी:-कलकत्ता हाईकोर्ट

कलकत्ता हाईकोर्ट ने चेक बाउंस मामले में आरोपी को बरी करने के निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा है कि केवल चेक जारी होना और उसका बाउंस हो जाना पर्याप्त नहीं है। शिकायतकर्ता को यह भी साबित करना होगा कि चेक किसी वैध और कानूनी देनदारी के भुगतान के लिए दिया गया था।

मामले में शिकायतकर्ता ने दावा किया था कि उसने आरोपी को मित्रतापूर्ण संबंधों के आधार पर निजी ऋण दिया था और उसी रकम की वापसी के लिए आरोपी ने दो चेक दिए थे, जो बैंक में अपर्याप्त धनराशि के कारण बाउंस हो गए।

हालांकि सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह तथ्य आया कि दोनों पक्ष कथित चिटफंड या पोंजी स्कीम जैसे वित्तीय कारोबार से जुड़े हुए थे और एजेंट के रूप में काम कर रहे थे। अदालत ने माना कि यह संभावना अधिक है कि चेक व्यक्तिगत ऋण के बजाय कारोबार से जुड़े लेनदेन के लिए दिए गए थे।

हाईकोर्ट ने यह भी नोट किया कि शिकायतकर्ता न तो ऋण देने की सही तारीख बता सका और न ही कोई लिखित समझौता, रसीद या अन्य दस्तावेज पेश कर पाया। यहां तक कि जिन गवाहों का हवाला दिया गया, उन्होंने भी स्पष्ट रूप से लेनदेन देखने से इंकार कर दिया।

अदालत ने कहा कि धारा 139 NI Act के तहत प्रारंभिक कानूनी अनुमान जरूर शिकायतकर्ता के पक्ष में होता है, लेकिन आरोपी को केवल संभावनाओं के आधार पर एक विश्वसनीय बचाव प्रस्तुत करना होता है। यदि आरोपी ऐसा कर देता है तो फिर शिकायतकर्ता पर वास्तविक लेनदेन साबित करने का भार वापस आ जाता है।

कोर्ट ने पाया कि आरोपी ने यह साबित करने के लिए पर्याप्त परिस्थितियां पेश कीं कि चेक किसी वैध व्यक्तिगत कर्ज के भुगतान के लिए जारी नहीं किए गए थे। आरोपी ने यह भी कहा कि मांग नोटिस की जानबूझकर अनदेखी नहीं की गई थी, बल्कि वह उस समय अपनी बीमार मां के कारण दूसरे शहर में था।

हाईकोर्ट ने माना कि रिकॉर्ड पर मौजूद परिस्थितियां शिकायतकर्ता के दावे को कमजोर करती हैं और वैध ऋण की बात संदेह से परे साबित नहीं हो सकी।

इसी आधार पर अदालत ने कहा कि धारा 138 NI Act का आवश्यक तत्व यानी कानूनी रूप से वसूली योग्य देनदारी इस मामले में सिद्ध नहीं हुआ। इसलिए आरोपी को बरी करने का आदेश सही है।

केस शीर्षक-
Anup Agarwala v. Piyotosh Biswas
केस नंबर-
CRA 94 of 20214
#कानूनी_सलाहकार

23/05/2026

लंबित आपराधिक आरोपों के आधार पर घरेलू हिंसा मामले में मुआवजा नहीं दिया जा सकता:-
राजस्थान हाईकोर्ट

23/05/2026

भरण-पोषण का उद्देश्य सहारा देना है
पति को आर्थिक रूप से तोड़ना नहीं:-
राजस्थान हाईकोर्ट

पत्नी को सरकारी नौकरी मिलने पर प्रभावित हो सकता है गुजारा भत्ता:-इलाहाबाद हाईकोर्टइलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा है कि यद...
23/05/2026

पत्नी को सरकारी नौकरी मिलने पर प्रभावित हो सकता है गुजारा भत्ता:-इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा है कि यदि पत्नी को सरकारी नौकरी मिल जाती है, तो यह परिस्थितियों में महत्वपूर्ण बदलाव माना जाएगा और इसका असर भरण-पोषण (गुजारा भत्ता) की राशि पर पड़ सकता है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि भरण-पोषण का मूल उद्देश्य उस व्यक्ति की सहायता करना है जो स्वयं अपना पालन-पोषण करने में असमर्थ हो। ऐसे में यदि पत्नी आर्थिक रूप से सक्षम हो जाती है और नियमित आय प्राप्त करने लगती है, तो अदालत गुजारा भत्ते की राशि में संशोधन या समाप्ति पर विचार कर सकती है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि हर मामले का निर्णय उसकी परिस्थितियों के आधार पर किया जाएगा और केवल नौकरी मिलना ही स्वतः भरण-पोषण समाप्त करने का आधार नहीं होगा, बल्कि आय, जीवन स्तर और अन्य तथ्यों का भी मूल्यांकन किया जाएगा।
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