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#तलाक_से_बचने_का_एक_कारगर_तरीका_धारा_9

तलाक के मामलों में अधिकतर एक ही पक्ष तलाक पर जोर देता है, दूसरा पक्ष चाहता है कि शादी किसी भी तरह बनी रहे। भले ही बच्चों की परवरिश की खातिर। ऐसे कई मामले हैं। एक मामले में हाल ही में एक महिला ने वैवाहिक अधिकारों की बहाली के तहत पति के साथ रहने में सफलता पाई।

हाल ही में एक मामला अदालत के सामने आया। राजेश नाम का लड़का 2 साल की शादी के बाद पत्नी रीमा से तलाक चाहता है। दोनों का 6 माह का बेटा है रोहन। राजेश ने तलाक के लिए आवेदन दे दिया, लेकिन पत्नी चाहती है कि बच्चे के बड़े होने तक उसे पिता से दूर न रखा जाए। साथ ही रीमा शादी को बनाए रखना चाहती है। वह केवल आर्थिक परेशानी के कारण नहीं, बल्कि वह चाहती है कि बच्चे को पिता का पूरा प्यार और समय मिल सके। बच्चा भावनात्मक रूप से भी पिता से अलग न हो सके। यह बच्चे का अधिकार तो है ही, लेकिन साथ ही यह हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 के तहत वैवाहिक अधिकारों की बहाली भी है।

इन दिनों तलाक के बारे में अखबारों में काफी पढ़ने को मिल रहा है। कई नामी-गिरामी लोग तलाक लेते हैं और वर्षों के वैवाहिक जीवन के बाद। ऐसा लगने लगता है कि सारा बंधन पैसे के लिए कर रखा था। विवाह दो पक्षों का मेल है यह सही है, लेकिन इसमें एक अधिकार की कभी बात ही नहीं की जाती है, वह है वैवाहिक अधिकार की बहाली। हिंदू विवाह कानून में विवाह अधिकारों की बहाली का उल्लेख धारा 9 में किया गया है। यह शादी को बचाने के लिए रहता है। यह अधिकार विशुद्ध रूप से पति-पत्नी के बीच रहता है।

वैवाहिक अधिकारों की बहाली को ऐसे समझ सकते हैं- भले ही पति या पत्नी दोनों बिना किसी कारण के एक-दूसरे से अलग रहते हैं या दोनों में से कोई दूसरे को छोड़कर चला जाता है तो छोड़कर जाने वाले के विरुद्ध ‘वैवाहिक संबंधों की वापसी’ के लिए मुकदमा दायर किया जा सकता है। इस मुकदमे में भी छोड़कर जाने वाले को भरण-पोषण मांगने का अधिकार मुकदमा चलते वक्त भी है और बाद में भी है। यानी पति हो या पत्नी दोनों को ही वैवाहिक अधिकारों की बहाली का अधिकार रहता है। यह कानूनी अधिकार है और अदालत इसमें डिक्री दे सकती है। वैवाहिक संबंधों की बहाली में केवल भौतिक जरूरतों की पूर्ति नहीं है, लेकिन इसमें कई अन्य महत्वपूर्ण पहलू हैं। पति और पत्नी के बीच कुछ अधिकार और कर्तव्य होते हैं, जो विवाह से पूरे होते हैं। ये अधिकार और कर्तव्य ही वैवाहिक अधिकारों के तहत आते हैं।

वैवाहिक अधिकारों की बहाली को एक तरह से वैवाहिक मामलों का उपचार भी कहा जाता है। यह साथ में रहने और भावनात्मक लगाव पर आधारित है। फिर भी अदालत में वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए कुछ बातों की अनिवार्यता लगती है-
- पति या पत्नी किसी एक का अलग रहना।
- अलग रहने के पीछे कोई ठोस कारण नहीं बन रहा हो।

सुप्रीम कोर्ट ने सरोज रानी बनाम सुदर्शन कुमार चड्‌ढा के मामले में पत्नी की याचिका पर वैवाहिक अधिकारों की बहाली की थी। पत्नी को पति के घर से निकाल दिया गया था। ऐसे में निचली कोर्ट ने पत्नी के पक्ष में डिक्री दी, लेकिन पति उसे अमल में नहीं लाया। ऐसे में धारा 9 की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठ गया। यह भी कहा जाने लगा कि क्या यह अनुच्छेद 14 या 21 का उल्लंघन तो नहीं है। अंतत: धारा 9 के तहत सुप्रीम कोर्ट ने इस डिक्री को लागू कराया। जस्टिस सब्यसाची मुखर्जी ने व्यवस्था दी कि हिंदू विवाह कानून की धारा 9 किसी भी तरह से अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 21 का उल्लंघन नहीं कहा जा सकता। एक तरह से यह सामाजिक पक्ष को हल कर रहा है, ताकि शादियों को टूटने से रोका जा सके।
धारा 9 का सामाजिक और कानूनी पक्ष भी यह है कि किसी भी तरह से दोनों पक्षों को अलग होने से बचाया जा सके। वैवाहिक अधिकारों में प्रेम और भावनात्मक लगाव एक अहम पक्ष है और यह धारा उसे परिपूर्ण करने में पूरी मदद करती है।
#फैक्ट : विवाह (संशोधन) विधेयक 2010 का देशभर में पुरुषों द्वारा विरोध किया गया था। तत्कालीन यूपीए सरकार में भी इसे लेकर अंतर्विरोध था।

#दीपक_तिवारी
#अधिवक्ता_हाइकोर्ट_लखनऊ

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