24/09/2026
अध्याय 13 : राग, आसक्ति और आन्तरिक शान्ति
मनुष्य जिन व्यक्तियों और वस्तुओं के प्रति राग और आसक्ति अनुभव करता है, उन्हें वह ‘मेरा’ कहने लगता है। इसी प्रकार जो व्यक्ति या वस्तुएँ उसके विचारों और इच्छाओं के प्रतिकूल होती हैं, उनके प्रति उसके भीतर द्वेष उत्पन्न हो जाता है। इस प्रकार ‘मेरा’ और ‘पराया’, राग और द्वेष की भावनाएँ मनुष्य के मानसिक संसार को प्रभावित करती रहती हैं।
जब मनुष्य विचारों और अहं की सीमाओं से परे जाने का प्रयास करता है, तब कुछ क्षणों के लिए मन की सामान्य चंचलता शांत हो सकती है। उस स्थिति में भीतर एक प्रकार की शून्यता, निस्तब्धता और शान्ति का अनुभव होने लगता है। यही अनुभव सूक्ष्म चेतना के स्पर्श की प्रारंभिक अनुभूति के रूप में देखा जा सकता है।
यह अवस्था आत्मतत्व के दिव्य स्वरूप की अनुभूति की दिशा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। इसे मानो उस परम आनन्द की एक छोटी-सी झलक कहा जा सकता है, जिसकी खोज मनुष्य बाहरी संसार में करता रहता है।
इस दृष्टि से जीवन की मानसिक अशान्ति को केवल नकारात्मक नहीं माना जा सकता। कभी-कभी वही अशान्ति मनुष्य को भीतर से झकझोरती है और उसे यह प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित करती है कि वास्तविक शान्ति कहाँ है? जीवन का उद्देश्य क्या है? और मेरे अस्तित्व का मूल स्वरूप क्या है?
वास्तव में वह मानसिक अशान्ति भी स्वागत के योग्य हो सकती है, जो मनुष्य को शान्ति की खोज की ओर ले जाए; जो उसे असत्य से सत्य की ओर, बाहरी आकर्षणों से आत्मचिंतन की ओर और भ्रम से अपने मूल स्वरूप के साक्षात्कार की ओर उन्मुख करे।
जब मनुष्य अपनी अशान्ति को समझने लगता है, तब वही अशान्ति उसके भीतर जागरण का कारण बन सकती है। वह जीवन को केवल भोग और संघर्ष के रूप में नहीं, बल्कि आत्मबोध, शान्ति, सौन्दर्य और आत्म-कल्याण की यात्रा के रूप में देखने लगता है।
जीवन की प्रत्येक बेचैनी हमें तोड़ने के लिए नहीं आती। कुछ बेचैनियाँ हमें जगाने के लिए आती हैं। यदि हम उनके संदेश को समझ लें, तो वही बेचैनी शान्ति की खोज का द्वार बन सकती है।
“जिस अशान्ति से शान्ति की खोज जन्म ले, वही अशान्ति आत्म-जागरण की पहली सीढ़ी बन जाती है।”
✍️ प्रस्तुति : रामायण यादव