04/09/2020
एनकाउंटर (मुठभेड़)
1- एनकाउंटर का अर्थ 2- एनकाउंटर के प्रकार
3- एनकाउंटर में निम्न तरीके अपनाए जाने चाहिए
4- एनकाउंटर और भारतीय विधि व्यवस्था
क- दण्ड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत उपबन्ध
क- भारतीय दण्ड संहिता के अंतर्गत प्रावधान
5- लोकतंत्र में एनकाउंटर की प्रासंगिकता
1-एनकाउंटर का अर्थ- एनकाउंटर का सामान्य अर्थ होता है, 'मुठभेड़' जो एक तरह का दो गुटों के बीच हिंसात्मक संघर्ष है।
पुलिस या किसी अन्य सशस्त्र बल द्वारा किसी अपराधी या आतंकवादी को मार गिराना पुलिस एनकाउंटर कहलाता है ।
2-पुलिस एनकाउंटर के प्रकार - आमतौर पर पुलिस एनकाउंटर दो प्रकार के होते हैं-
पहला- जिसमें कोई खतरनाक अपराधी पुलिस या सुरक्षाबलों की कस्टडी से भागने की कोशिश करता है,और पुलिस या सुरक्षाबलों को उसे रोकने या पकड़ने के लिए बन्दुख का प्रयोग करना पड़ता है ।
दुसरा- एनकाउंटर का दुसरा प्रकार वह होता है ।जब पुलिस किसी अपराधी को पकड़ने जाती है,और वह पुलिस से बचने के लिए भागता है। इसके अलावा पुलिस पर हमला करने पर भी पुलिस एनकाउंटर कर सकती हैं ।
3- एकाउंटर में निम्न तरीके अपनाए जाने चाहिए-
१- पुलिस को हथियारों के प्रयोग से बचना चाहिए,
२-पहले रुकने की चेतावनी दी जानी चाहिए,
३- चेतावनी पर नहीं रुकने पर हवाई फायर करना चाहिए,
४- इस पर भी अपराधी नहीं रुकता है तो पहले पैर में गोली
गोली मारनी चाहिए,
५- स्थिति नियंत्रण में न आने पर शरिर के अन्य हिस्सों में गोली
मारनी चाहिए ।
4- एनकाउंटर और भारतीय विधि व्यवस्था- भारतीय -संविधान में कहीं भी एनकाउंटर शब्द का जिक्र नहीं किया गया है। संविधान में जिवन का अधिकार अनुच्छेद 21केअन्तर्गत दिया गया है, जिसके अन्तर्गत किसी व्यक्ति के अधिकार को विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया अनुसार ही वंचित किया जा सकता है,अन्यथा नहीं ।
अनुच्छेद 21-प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण- किसी व्यक्ति को ,उसके प्राण और दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जायेगा अन्यथा नहीं ।
मेंनका गांधी बनाम भारत संघ( ए०आई०1978 एस०सी० 597) के वाद में उच्चतम न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है कि अनुच्छेद 21केवल कार्यपालिका कृत्यो के विरुद्ध बल्कि विधायिका के विरुद्ध भी संरक्षण प्रदान करता है। विधान मण्डल द्वारा पारित किसी विधि के अधिन विहित प्रक्रिया जो किसी व्यक्ति उसके प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता से वंचित करती है, उचित ॠजु ,और युक्तियुक्त अर्थात् नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप होनी चाहिए ।
पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज बनाम भारत संघ
(ए०आई०आर०1997 एस०सी०) के वाद में पीटीशनर ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 के अधिन लोकहित वाद फाइल करके न्यालयय से प्रार्थना किया कि इम्फाल पुलिस द्वारा नकली मुठभेड जिसमें दो व्यक्ति मारे गये थे की जांच के आदेश दें ,तथा दोषी पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध समुचित कार्यवाही का निर्देश दे तथा मृतक के परिजनों को प्रतिकर प्रदान करें। उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि पुलिस मुठभेड़ में किसी व्यक्ति को जान से मार डालना, अनुच्छेद 21में प्रदत्त जिवन के अधिकार का सरासर उल्लंघन है ।और इन मामलों में सम्प्रभु की उन्मुक्ति का सिद्धांत लागू नहीं होता है । और सरकार इसके लिए दायी है। न्यायालय ने प्रत्येक मृतक के परिजनों को एक-एक लाख रुपए नुकसानी प्रदान करने का आदेश दिया । और कहा कि ऐसे मामलों में 'इंटरनेशनल कान्वेंट इन सिविल एण्ड पोलिटिकल राईट 1966' के अनुच्छेद 9 ( 5) जो ऐसे व्यक्तियों को प्रतिकर प्रदान करता है, भारत में भी लागू किया जा सकता है।
पी०यु०सी०एल० बनाम के महाराष्ट्र राज्य ( 2014) के वाद में पुलिस मुठभेड़ में हुई मौतों एवं गम्भीर रूप से घायल होने की घटनाओं की जांच के लिए दिशानिर्देश जारी किए गए हैं। और सुप्रिम कोर्ट द्वारा कहा गया है कि,इन दिश निर्देशों का पालन सम्पुर्ण प्रभावी और स्वतंत्र जांच के लिए मानक प्रक्रिया के तौर पर किया जायेगा।
तत्कालिन मुख्य न्यायाधीश आर०एम०लोढा और आर० एफ० नरिमन ने कहा कि पुलिस मुठभेड़ में किसी व्यक्ति के मारे जाने से कानुन के शासन और न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता आहत होती है।
जारी किए गए दिशानिर्देश-
१-जब कभी पुलिस को आपराधिक गतिविधियों के बारे में
कोई खुफिया जानकारी या सुराग मिलता है तो इसे केश
डायरी के रुप में लिखित या इलैक्ट्रोनिक रुप में संक्षिप्त
तौर पर रखना चाहिए लेकिन उसमें संदिग्ध के
ब्यौरे अथवा उसकी सम्भावित गतिविधियों के ठिकानों का
जिक्र नहीं किया जाना चाहिए ।यदि इस प्रकार की
खुफिया जानकारी अथवा सुराग वरिष्ठ अधिकारी को
प्राप्त होती है तो उसे भी इसी प्रकार रखा जाना चाहिए कि
संदिग्ध की गतिविधियों के बारे में या उसके लोकेशन के
बारे में किसी को पता न चले ।
२- किसी खुफिया जानकारी या सुराग मिलने के बाद यदि मुठभेड़ होती है, और पुलिस बन्दुख का प्रयोग करती है ,तथा उसमें किसी की जान जाती है,तो एक प्राथमिकी दर्ज कराई जानी चाहिए । और इसे दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 157 के तहत न्यायालय में अग्रसारित किया जाना चाहिए।
३ - मुठभेड़ की जांच स्वतंत्र एजेंसी द्वारा करायी जानी चाहिए।
४- पुलिस फायरिंग के कारण हाने वाली सभी मौतों के मामले
दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 157 के तहत् मजिस्ट्रेट से
जांच कराती जानी चाहिए। उसके बाद रिपोर्ट उस न्यायिक
मजिस्ट्रेट को भेंजी जानी चाहिए, जो दण्ड प्रक्रिया संहिता
की धारा 190 के तहत अधिकृत हो ।
५- मुठभेड़ की सुचना मानवाधिकार आयोग को तुरंत देनी
चाहिए।
६- घायल को तुरंत चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई जानी
चाहिए ।
७- अविलम्ब रुप से प्रथम सुचना रिपोर्ट , केश डायरी,
पंचनामा और स्केच आदि को शीघ्र सम्बन्धित न्यायालय में
भेजा जाना चाहिए ।
८- घटना की जांच पुरी होने के बाद रिपोर्ट धारा 173 के तहत
न्यायालय में भेजी जानी चाहिए ।
९- मौत की स्थिति में निकटस्थ परिजनों को यथाशीघ्र सुचित
किया जाना चाहिए ।
१०- पुलिस फायरिंग में मौतों की स्थिति में सभी मामलों ब्यौरा
पुलिस महानिदेशक द्वारा छमाही ब्यौरा मानवाधिकार
आयोग को भेजा जाना चाहिए।
११- जांच में मुठभेड़ अपराध की श्रेणी में आता है तो ऐसे पुलिस अधिकारी को तुरंत निलंबित कर दिया जाना चाहिए।
१२- मुठभेड़ में मारे गये व्यक्ति के आश्रितों को जहांं तक
मुआवजा देने की बात हो तो दण्ड प्रक्रिया संहिता की
धारा 357 पर अमल किया जाना चाहिए ।
१३- मुठभेड़ से सम्बन्धित अधिकारी को जांच के लिए आत्म
समर्पण कर देना चाहिए।
१४- घटना की जानकारी तुरंत परिजनों को दी जानी चाहिए ।
१५- घटना के तुरंत बाद सम्बन्धित अधिकारियों को न तो
कोई पुरस्कार और न ही पदोन्नति दिया जाना चाहिए जब
तक कि उनकी वीरता संदेह से परे साबित न हो जाय ।
१६- पीड़ित के परिजन सत्र न्यायालय में शिकायत कर सकते
हैं और ऐसे शिकायत का निपटारा सत्र न्यायालय द्वारा
गुण - दोष के आधार पर किया जायेगा।
और सुप्रिम कोर्ट द्वारा यह आदेश भी दिया गया कि मुठभेड़ में मारे गये ,और गम्भीर रूप में घायलों से जुड़े सभी मामलों में
संविधान के अनुच्छेद 141 के तहत उपरोक्त मानको का सारतःरूप से पालन किया जाना चाहिए।
क- दण्ड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत उपबन्ध-
धारा 46- गिरफ्तारी कैसे की जायेगी- (1) गिरफ्तारी करने में पुलिस अधिकारी या अन्य व्यक्ति जो गिरफ्तारी कर रहा है, गिरफ्तार किए जाने वाले व्यक्ति के शरीर को वस्तुतः छुएगा या
परिरूध्द करेगा, जब जब तक उसनेे वचन या कर्म द्वारा अपने को अभिरछा समर्पित न कर दिया हो। [परन्तु जहां किसी स्त्री को गिरफ्तार किया जाना है , वहां जब तक कि परिस्थितियों इसके विपरित उपदर्शित न हो, गिरफ्तारी की मौखिक सुचना पर अभिरक्षा में उसके समर्पण कर देने की उपधारणा की जायेगी और जब तक कि परिस्थितियों में अन्यथा अपेक्षित न हो,या जब तक पुलिस अधिकारी महिला ने हो, तब तक पुलिस अधिकारी महिला को गिरफ्तार करने के लिए उसके शरीर को नहीं छुएगा।]
(2) यदि ऐसा व्यक्ति अपने गिरफ्तार किए जाने के प्रयास का बलात प्रतिरोध करता है,या गिरफ्तारी से बचने का प्रयत्न करता है,तो ऐसे पुलिस अधिकारी या अन्य व्यक्ति गिरफ्तारी करने गिरफ्तारी करने के लिए आवश्यक सब संसाधनों को उपयोग में ला सकता है।
(3) इस धारा की कोई बात ऐसे व्यक्ति का जिस पर मृत्यु या आजिवन कारावास से दण्डनिय अपराध का अभियोग नहीं है, मृत्यु कारित करने का अधिकार नहीं देती है।
(4)-असाधारण परिस्थितियों के सिवाय कोई स्त्री सुर्यास्त के पश्चात् और सुर्योदय से पहले गिरफ्तारी नहीं की जायेगी,और जहां ऐसी असाधारण परिस्थितियां विद्यमान है, वहां स्त्री। पुलिस अधिकारी लिखित में रिपोर्ट करके, ऐसे प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट की पुर्व अनुज्ञा अभिप्राप्त करेगी, जिसकी स्थानिय अधिकारिता के भीतर अपराध किया गया है ,या गिरफ्तारी की जानी है।
यहां पर धारा 46 की उपधारा ( 2) व( 3) महत्वपूर्ण है। उपधारा 2 के अनुसार गिरफ्तार किया जाने वाला व्यक्ति गिरफ्तारी का बलात अर्थात बलपूर्वक विरोध करता है तो गिरफ्तारी करने वाला पुलिस अधिकारी आवश्यकतानुसार बल और अन्य साधनों का प्रयोग कर सकता है। और उपधारा 3 के अनुसार गिरफ्तार किया जाने वाले व्यक्ति का जिस पर मृत्यु या आजिवन कारावास से दण्डनिय अपराध का अभियोग नहीं है, मृत्यु कारित करने का अधिकार नहीं देती है।
उपरोक्त दोनों धाराओं का विश्लेषण करने पर यह विवक्षित अर्थ निकलता है कि जिस व्यक्ति पर मृत्यु या आजिवन कारावास का अभियोग है,और वह गिरफ्तारी का बलात अर्थात बलपूर्वक विरोध करता है तो गिरफ्तारी करने वाला पुलिस अधिकारी आवश्यकतानुसार बल का प्रयोग कर सकता है। और स्थिति अनियंत्रित होने पर उसका एनकाउंटर कर सकता है ।
ख- भारतीय दण्ड 1860 संहिता के अंतर्गत प्रावधान-
भारतीय दण्ड संहिता1860 के अध्याय 4 जो साधारण अपवाद से सम्बन्धित है । जिसमें प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार धारा 96 से लेकर 106 दिया गया है । धारा 96 के अनुसार," कोई बात अपराध नहीं है, जो प्राइवेट प्रतिरक्षा के प्रयोग में की जाती है।" और धारा 100 व 103 में उन परिस्थितियों का वर्णन किया गया है, जिसमें कोई व्यक्ति प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार आक्रमणकारी व्यक्ति की मृत्यु कारित कर सकता है । यह अधिकार आम आदमी के साथ -साथ पुलिस को भी प्राप्त है। और कोई पुलिस अधिकारी धारा100 व 103 की परिस्थितियों में किसी व्यक्ति को एनकाउंटर कर सकता है ।
धारा 100. शरिर की प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार अधिकार का विस्तार मृत्यु कारित करने पर कब होता है- शरिर की प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का विस्तार पुर्ववर्ती धारा में वर्णित निर्बधनों के अधीन रहते हुए, हमलावार की स्वेच्छा मृत्यु कारित करने या कोई अन्य अपहानि करने तक है, यदि वह अपराध, जिसके कारण उस अधिकार के प्रयोग का अवसर आता है, एतस्मिनपशचात प्रगणित भांतियों में से किसी भी भांति का है, अर्थात-
पहला- ऐसा हमला जिससे युक्तियुक्त रूप से यह आशंका
कारित हो कि अन्यथा ऐसे हमले का परिणाम मृत्य
होगा,
दुसरा- ऐसा हमला जिससे युक्तियुक्त रूप से यह आशंका
कारित हो कि अन्यथा ऐसे हमले का परिणाम घोर
उपहति होगा,
तीसरा- बलातसंग करने के आशय से किया गया हमला
चौथा- प्रकृति विरुद्ध काम तृष्णा की तृप्ति के आशय से किया
गया हमला ,
पांचवां-व्यपहरण या अपहरण करने के आशय से किया गया
हमला ।
छठा- इस आशय से किया गया हमला कि किसी व्यक्ति का
ऐसी परिस्थितियों में सदोष परिरोध किया जाय, जिनसे
उसे युक्तियुक्त यह आशंका कारित हो कि वह अपने को
छुड़वाने के लिए लोक प्राधिकारियों की सहायता प्राप्त
नहीं कर सकेगा,
सातवां- तेजाब फेंकने का कार्य या प्रयास करना जिससे
युक्तियुक्त रूप से आशंका कारित हो कि अन्यथा ऐसे
कृत्य का परिणाम घोर छति होगा ।
धारा 103.कब समप्ति की प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का विस्तार मृत्यु कारित करने तक का होता है-सम्पति की प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का विस्तार, धारा 99 में वर्णित निर्बधनों के अधीन दोषकर्ता की मृत्यु या अन्य अपहानि स्वेच्छया कारित करने तक का है, यदि वह अपराध जिसके किए। जाने के,या किए जाने के प्रयत्न के कारण उस अधिकार के प्रयोग का अवसर आता है, एतस्मिनपशचात प्रगणित भांतियों में से किसी भी भांति का है, अर्थात-
पहला- लूट
दुसरा-रात्रौ गृह -भेदन
तीसरा- अग्नि द्वारा रिष्टि ,जो किसी ऐसे निर्माण, तम्बु या
जलयान को की गई है, जो मानव आवास के रूप में
या सम्पति की अभिरक्षा के स्थान के रूप में उपयोग
में लाया जाता है।
चौथा- चोरी,रिष्टि या गृह अतिचार ,जो ऐसी परिस्थितियों में
किया गया है, जिनसे युक्तियुक्त रूप से यह आशंका
कारित हो कि यदि प्राइवेट प्रतिरक्षा के ऐसे अधिकार
का प्रयोग न किया गया तो परिणाम मृत्यु या घोर
उपहति होगा ।
5- लोकतंत्र में एनकाउंटर की प्रासंगिकता
आधुनिक काल में लोकतंत्र में जनता द्वारा चुनी हुई सरकार जनता के प्रतिनिधि के रूप में शासन चलाती है। अब्राहम लिंकन ने लोकतंत्र को परिभाषित करने हुए कहा है कि" लोकतंत्र जनता का शासन,जनता द्वारा, जनता के लिए है।" लोकतंत्र की मुख्य विशेषता शक्तियों का पृथक्करण है। जिसमें शासन की शक्तियां तीन भागों में विभाजित होती है-
पहला- विधायिका
दुसरा- कार्यपालिका
तीसरा- न्यायपालिका
शासन की तीनों शक्तियां अपने क्षेत्र में स्वतंत्र है। विधायिका का काम है विधि बनाना, कार्यपालिका का काम है विधायिका द्वारा बनाई गई विधि को लागू करना, और न्यायपालिका का काम है विधि के अनुसार न्याय करना । चुंकि भारत एक लोकतांत्रिक देश है , इसलिए भारतीय संविधान में शक्तिपृथक्करण के सिद्धांत को अपनाते हुए सरकार तीनों अंगों के क्षेत्रों और शाक्तियों का वर्णन किया गया है।
एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए आवश्यक है कि ये तीनों शक्तियां एक दुसरे के क्षेत्र का अतिक्रमण न करें ।
मध्य काल में पुलिस स्टेट की व्यवस्था थी , जिसमें स्वतंत्र न्यायपालिका का आभाव था । उस समय शासन द्वारा अपने विरोधियों का सत्ता का लाभ उठाते हुए बहुत ही निर्मम तरीके से दमन किया जाता था। इस परिस्थिति से उबरने के लिए लोगों द्वारा काफी संघर्ष और बलिदान देना पड़ा,जिसके बाद लोकतंत्र की स्थापना की जा सकी है । पुलिस द्वारा बढ़ती हुई एनकाउंटर की समस्या उसी मध्य काल के पुलिस स्टेट की तरफ ले जायेंगी, जिसमें सत्यता बैठे हुए लोग किसी भी व्यक्ति को एनकाउंटर में मार सकते हैं, क्योंकि पुलिस पर उनका पुरा नियंत्रण रहता है। और यह स्थिति लोकतंत्र के लिए एक घातक समस्या है क्योंकि एनकाउंटर की बढ़ती हुई संख्या न्यायपालिका के क्षेत्र का अतिक्रमण है । बढ़ती हुई अपराध की समस्या का एकमात्र हल एनकाउंटर नहीं है,इस प्रवृत्ति का दुरूपयोग शासन द्वारा अपने विरोधियों को कुचलने में किया जा सकता है।
न्यायालय में देरी होने का विकल्प भी एनकाउंटर नहीं है, हमारी न्यायपालिका न्याय करने में सक्षम है। हमें न्यायपालिका की समस्याओं को ढुढकर उन्हें दुर करने की जरुरत है। न की पुलिस को न्यायपालिका की जगह खड़े करने की।
लोकतंत्र में एनकाउंटर को केवल एक बुराई के रूप स्वीकार करना चाहिए, हमें नैतिक रुप से इसका समर्थन नहीं करना चाहिए ।