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10/02/2022

Constitution of India
अनुछेद 29 -संस्कृति ओर शिक्षा संबंधी अधिकार
:-(1) भारत के राज्यक्षेत्र या उसके किसी भाग के निवासी नागरिकों के किसी अनुभाग को, जिसकी अपनी विशेष भाषा, लिपि या संस्कृति है, उसे बनाए रखने का अधिकार होगा।
(2) राज्य द्वारा पोषित या राज्य-निधि से सहायता पाने वाली किसी शिक्षा संस्था में प्रवेश से किसी भी नागरिक को केवल धर्म, मूलवंश, जाति, भाषा या इनमें से किसी के आधार पर वंचित नहीं किया जाएगा।

08/06/2021

*LEGAL Update

*नाबालिग हिन्दू लड़की का स्वाभाविक अभिभावक उसका पति है, जिससे उसने अपनी इच्छा से शादी की है : पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने पुरुष के खिलाफ अपहरण का आरोप निरस्त किया*

*पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने अपनी इच्छा से एक पुरुष से शादी करने वाली नाबालिग लड़की से संबंधित मामले में व्यवस्था दी :*

🟠 *"हिन्दू माइनॉरिटी एंड गार्डियनशिप एक्ट, 1956 की धाराएं 6, 10 एवं 13 के साथ पढ़े जाने योग्य गार्डियन एंड वार्ड्स एक्ट की धारा 19 एवं 21 के अनुसार,* पति का उस लड़की से रिश्ता है और व्यक्ति (पति) उस नाबालिग लड़की का स्वाभाविक अभिभावक का अधिकार रखता है, क्योंकि वह सांविधिक तौर पर लड़की कारुष के खिलाफ अपहरण का आरोप निरस्त किया*

*पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने अपनी इच्छा से एक पुरुष से शादी करने वाली नाबालिग लड़की से संबंधित मामले में व्यवस्था दी :*

🟠 *"हिन्दू माइनॉरिटी एंड गार्डियनशिप एक्ट, 1956 की धाराएं 6, 10 एवं 13 के साथ पढ़े जाने योग्य गार्डियन एंड वार्ड्स एक्ट की धारा 19 एवं 21 के अनुसार,* पति का उस लड़की से रिश्ता है और व्यक्ति (पति) उस नाबालिग लड़की का स्वाभाविक अभिभावक का अधिकार रखता है, क्योंकि वह सांविधिक तौर पर लड़की का पति है।"

*न्यायमूर्ति हरनरेश सिंह गिल की बेंच ने आगे कहा कि यह नहीं कहा जा सकता कि उसे भगा ले जाने या लुभाने का कोई तत्व मौजूद है।*

*कोर्ट के समक्ष मामला*

🟡 *कोर्ट भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 346 और बाद में जोड़ी गयी धाराएं 363 और 366 के तहत दर्ज प्राथमिकी को निरस्त* करने के लिए *आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 482 के* तहत दायर याचिका की सुनवाई कर रहा था।

🟣पति की दलील दी थी कि उसने प्रतिवादी संख्या 3 - गुलिस्ता (पत्नी) के साथ मार्च 2020 में शादी रचाई थी, जिससे संबंधित विवाह प्रमाण पत्र संलग्न भी किया गया है तथा यह भी दलील दी गयी थी कि वह लड़की खुद ही याचिकाकर्ता के साथ घर से भागी थी तथा बाद में अपनी इच्छा से शादी रचाई थी।

🔴लड़की ने कोर्ट तथा अधिकारियों के समक्ष दर्ज कराये गये अपने बयान में भी कबूल किया था कि उसने अपनी मर्जी से उस व्यक्ति से शादी की थी तथा उसके बाद से वह अपने पति के साथ रह रही है।

*कोर्ट का आदेश*

🟤कोर्ट ने कहा कि लड़की (गुलिस्ता) कथित तौर पर शादी के समय नाबालिग थी, लेकिन यहां तथ्य यह है कि उसने याचिकाकर्ता के साथ अपनी मर्जी से शादी की थी।

*कोर्ट ने महत्वपूर्ण रूप से यह कहा कि :*

⚫ *"यद्यपि शादी के समय लड़की नाबालिग थी और गार्डियन एवं वार्ड्स एक्ट, 1890 के तहत माता-पिता कानूनी अभिभावक होते* हैं, और चूंकि यह शादी हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत अवैध ठहराये जाने योग्य है, लेकिन चूंकि दम्पती ने अपने माता-पिता की मर्जी के विरुद्ध जाकर अपने पार्टनर का चयन किया है तथा दोनों साथ रहकर अपना रिश्ता निभा रहे हैं, यह *कोर्ट गार्डियन्स एंड वार्ड्स एक्ट, 1890 की धारा 25 के तहत इन* तथ्यों का संज्ञान ले सकता है, क्योंकि बच्ची का कल्याण सर्वाधिक महत्वपूर्ण है, जिसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता।"

*कोर्ट ने आगे कहा कि जीवन के संरक्षण एवं स्वतंत्रता का संवैधानिक अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त है।*

🔵कोर्ट ने अंत में यह कहा कि चूंकि लड़की ने याचिकाकर्ता (पुरुष / पति) से अपनी मर्जी से शादी की थी और वह अपने ससुराल में खुशहाली से रह रही है, ऐसे में याचिकाकर्ता के खिलाफ आपराधिक मामला जारी रखने से किसी उद्देश्य का हल नहीं होगा।

🟢 *तदनुसार, कोर्ट ने याचिका मंजूर करते हुए (आईपीसी) की धारा 346 और बाद में जोड़ी गयी धाराएं 363 और 366 के तहत दर्ज* मुकदमा और उसके परिणामस्वरूप सभी प्रकार की कार्रवाइयों को निरस्त कर दिया।

*केस का शीर्षक : विकास तोमर बनाम हरियाणा सरकार एवं अन्य*

07/03/2021
06/03/2021

*बिना सोचे-समझे इरादे से धार्मिक भावना आहत करने के लिए लापरवाही से किया गया धर्म का अपमान, धारा 295 ए के तहत अपराध नहींः त्रिपुरा हाईकोर्ट*
***************************
💐 त्रिपुरा उच्च न्यायालय ने माना है कि धर्म का बिना इरादे के किया गया अपमान या बिना जाने-बूझे और दुर्भावनापूर्ण इरादे से किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना, आईपीसी की धारा 295 ए के तहत अपराध नहीं है।

💐 *चीफ ज‌स्ट‌िस अकील कुरैशी की सिंगल बेंच ने कहा,*

"धारा 295 ए धर्म और धार्मिक विश्वासों के अपमान या अपमान की कोशिश के किसी और प्रत्येक कृत्य को दंडित नहीं करता है, यह केवल अपमान या अपमान की कोशिश के के उन कृत्यों को दंडित करता है, जिन्हें विशेष वर्ग की धार्मिक भावनाओं को अपमानित करने के लिए जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण इरादे के साथ किया गया है।"

"बिना इरादे या लापरवाही से या बिना जाने-बूझे या दुर्भावनापूर्ण इरादे के किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को अपमानित करने या धर्म का अपमान करने का कृत्य उक्त धारा के भीतर नहीं आएगा।"

💐ऐसा मानने के लिए खंडपीठ ने धारा 295 ए का उल्लेख किया, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि जो कोई भी,

*"जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण इरादे से"* भारत के किसी भी वर्ग के नागरिकों की धार्मिक भावनाओं को शब्दों से, या तो बोले हुए या लिखे हुए, या संकेतों से या दृश्य प्रतिनिधित्व या अन्यथा, आहत करता है, उस वर्ग के धर्म या धार्मिक विश्वासों का अपमान करता है या अपमान करने का प्रयास करता है..तो उसे तीन साल तक कारावास या जुर्माना या दोनों के साथ दंडित किया जा सकता है।

💐 कोर्ट ने *रामजी लाल मोदी बनाम उत्तर प्रदेश*, AIR 1957 SC 620, में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के निष्कर्षों का भी उल्लेख किया।

💐 *पृष्ठभूमि*

ज‌स्ट‌िस कुरैशी सोशल मीडिया पर अपनी टिप्पणियों के माध्यम से भगवद गीता का अपमान करके हिंदू समुदाय की धार्मिक भावनाओं को कथित रूप से आहत करने के मामले में पिछले साल याचिकाकर्ता के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को रद्द करने की याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। शिकायतकर्ता के अनुसार, याचिकाकर्ता-अभियुक्त ने यह कहकर हिंदू धर्म पर अभद्र और अश्लील टिप्पणी की, कि पवित्र धार्मिक किताब ठकबाजी गीता" है और इसे फेसबुक पर पोस्ट कर दिया।

💐दूसरी ओर याचिकाकर्ता ने दलील दी कि शिकायतकर्ता द्वारा जानबूझकर पोस्ट को जानबूझकर घुमाया गया और गलत तरीके से समझा गया। उसने दलील दी कि उसका न तो इरादा था और न ही किसी समुदाय या नागरिकों के वर्ग की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने की इच्छा थी।

💐उसने आगे कहा कि केवल उसकी व्यक्तिगत मान्यताओं के आधार पर, उसे एक आपराधिक मामले में निशाना बनाया जा रहा है और झूठा फंसाया जा रहा है। इसके अलावा, यह दलील दी गई कि उसकी पोस्ट बंगाली में थी और शिकायतकर्ता ने उसकी पोस्ट का गलत अर्थ निकाला था, जिसका अर्थ वास्तव में यह था कि गीता एक कड़ाही है, जिसमें ठगों को भूना जाता है।

💐अतिरिक्त लोक अभियोजक ने हालांकि याचिका का विरोध किया कि याचिकाकर्ता ने पवित्र किताब के बारे में अपमानजनक टिप्पणी करके धार्मिक भावनाओं को आहत करने का स्पष्ट इरादा प्रदर्शित किया था। उसने यह भी कहा कि यह अकेला मौका नहीं है, जिस पर याचिकाकर्ता ने धार्मिक भावनाओं को आहत करने की ऐसी प्रवृत्ति दिखाई है और उसकी पोस्ट को उसकी पिछली पोस्टों की पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए। जांच - परिणाम अदालत ने शुरु में कहा कि धारा 295 ए केवल धर्म के अपमान के उग्र रूप को दंडित करता है, जब यह उस वर्ग की धार्मिक भावनाओं को अपमानित करने के लिए जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण इरादे के साथ किया जाता है।

💐इस मामले में, यह उल्लेख किया गया कि उक्त पोस्ट के माध्यम से याचिकाकर्ता ने वास्तव में क्या कहा था, इस बारे में विवाद है। कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता द्वारा गढ़े गए शब्द का अर्थ जो कुछ भी हो सकता है या नहीं हो सकता है, लेकिन *"यह निश्चित रूप से उस अर्थ को व्यक्त नहीं करता है जो शिकायतकर्ता बताना चाहता है कि भगवद गीता एक कपटपूर्ण दस्तावेज है।"*

💐 *खंडपीठ ने कहा,*

"याचिकाकर्ता अपनी व्यक्तिगत मान्यताओं को धारण कर सकता है और कानून के ढांचे के भीतर भी उन्हें व्यक्त कर सकता है, जब तक कि वह अपने भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रयोग में कानून द्वारा तय किसी भी प्रतिबंध का उल्लंघन नहीं करता है।"

💐इस बिंदु पर, अतिरिक्त लोक अभियोजक ने दलील दी कि ऐसी कोई अभिव्यक्ति नहीं है, जैसा कि याचिकाकर्ता ने अपने फेसबुक पोस्ट पर रखा है। हालांकि, न्यायालय का मत था कि भले ही इस विवाद को स्वीकार कर लिया जाए, यह न्यायालय या इस मामले के लिए पुलिस की भूमिका नहीं है कि वह फेसबुक पोस्ट का अर्थ निकाले कि इसका कोई अर्थ है या नहीं।

💐 कोर्ट ने एपीपी के इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि याचिकाकर्ता को हिंदू धर्म का अपमान करने की आदत है और उनकी पोस्ट को उनकी पिछली पोस्टों की पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए। इस सबंध में कोर्ट ने कहा, "न तो शिकायत में और न ही राज्य द्वारा याचिकाकर्ता की आपत्तिजनक प्रकृति की किसी भी पिछली पोस्ट को पेश किया गया है.... फेसबुक पोस्ट पर कोर्ट ने कहा, किसी पृष्ठभूमि या अग्रभूमि के बिना, किसी भी सामान्य मनुष्य के लिए यह संभव नहीं है कि वह सामान्य ज्ञान और बुद्धिमत्ता के साथ, याचिकाकर्ता द्वारा पवित्र किताब को दिए गए अपमानजनक या अवमाननापूर्ण अर्थ को समझ सके। कोर्ट ने याचिका को अनुमति प्रदान की और प्राथमिकी को रद्द कर दिया।

*केस टाइटिल: दुलाल घोष बनाम त्रिपुरा राज्य और अन्य।*

महिला को छेड़ने से हो सकती है बड़ी सजा जानिए
28/02/2021

महिला को छेड़ने से हो सकती है बड़ी सजा जानिए

27/01/2021

*सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के ' त्वचा से त्वचा संपर्क" फैसले पर रोक लगाई*

⚫सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फैसले के तहत आरोपी को बरी करने पर रोक लगा दी है, जिसमें कहा गया था कि बिना कपड़े उतारे बच्चे के स्तन दबाने से पोक्सो एक्ट की धारा 8 के अर्थ में "यौन उत्पीड़न" नहीं होता है।

*अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि निर्णय 'अभूतपूर्व' है और 'एक खतरनाक मिसाल कायम करने की संभावना है।'*

🟤 *सीजेआई बोबडे ने एजी को निर्णय को चुनौती देने के लिए उचित* याचिका दायर करने का निर्देश दिया। अदालत ने आरोपी को बरी करने पर रोक लगा दी है और 2 सप्ताह के भीतर उसे जवाब दाखिल करने का नोटिस जारी किया है।

🔵बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ ने अपने फैसले में कहा कि इस तरह के कृत्य से आईपीसी की धारा 354 के तहत 'छेड़छाड़' होगी और ये पोक्सो अधिनियम की धारा 8 के तहत यौन शोषण नहीं होगा।

🟢 *न्यायमूर्ति पुष्पा गनेदीवाला की एकल पीठ ने सत्र न्यायालय के उस* आदेश को संशोधित करते हुए यह अवलोकन किया, जिसमें एक 39 वर्षीय व्यक्ति को 12 साल की लड़की से छेड़छाड़ करने और उसकी सलवार निकालने के लिए यौन उत्पीड़न का दोषी ठहराया गया था।

🟣इस मामले को चुनौती देते हुए यूथ बार एसोसिएशन ने भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की है। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि एकल न्यायाधीश द्वारा की गई टिप्पणियां "अनुचित" हैं और एक बालिका के शील पर चिंता करने वाली हैं।

🔴यह भी कहा गया है कि लागू किए गए फैसले को पारित करते समय, एकल न्यायाधीश ने पैरा संख्या 12 में पीड़ित बच्ची का नाम दर्ज किया जो हानिकारक है और आईपीसी की धारा 228 ए की भावना के खिलाफ है जो कुछ अपराधों के पीड़ितों के नामों के प्रकाशन को रोक देता है।

*इसके अलावा, पैरा संख्या 26 में, एकल न्यायाधीश ने कहा है कि,*

*"प्रत्यक्ष शारीरिक संपर्क-यानी यौन प्रवेश के बिना त्वचा-से -त्वचा संपर्क यौन उत्पीड़न नहीं है।"*

🟠याचिकाकर्ता के अनुसार, इस तरह के तर्क से एक भयावह स्थिति पैदा हो जाएगी और पूरे देश की प्रतिष्ठा कम होगी।

🟡 *कुछ दिन पहले, राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) ने घोषणा की थी* कि वह यह कहते हुए इसे फैसले को चुनौती देगा कि महिलाओं की सुरक्षा और सामान्य संरक्षण के विभिन्न प्रावधानों पर न केवल इसका व्यापक प्रभाव पड़ेगा बल्कि ये सभी महिलाओं का उपहास होगा और महिलाओं की सुरक्षा और संरक्षण के लिए विधायिका द्वारा प्रदान किए गए कानूनी प्रावधानों का तुच्छीकरण होगा। इस बीच, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) ने महाराष्ट्र सरकार से इस फैसले के खिलाफ "तत्काल अपील" दायर करने को कहा है। एनसीपीसीआर प्रमुख ने अपने पत्र में रेखांकित किया कि ऐसा लगता है कि पीड़िता की पहचान का खुलासा किया गया है और आयोग का विचार है कि राज्य को इस पर ध्यान देना चाहिए और आवश्यक कदम उठाने चाहिए।

25/11/2020

*लव जिहाद के खिलाफ यूपी में सख्त कानून बनाने की सरकार की तैयारियों के बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला*

सबको जीवनसाथी चुनने का अधिकार, सरकार नहीं दखल दे सकती- इलाहाबाद HC

कुशीनगर के रहने वाले सलामत अंसारी और प्रियंका खरवार मामले में HC का फैसला

HC ने कहा कि उनके शांतिपूर्ण जीवन में कोई व्यक्ति या परिवार दखल नहीं दे सकता है

HC ने कहा कि कानून एक बालिग स्त्री या पुरुष को अपना जीवन साथी चुनने का अधिकार देता है

HC ने प्रियंका खरवार उर्फ आलिया को अपने पति के साथ रहने की छूट दी है।

HC ने कहा मामले में पोक्सो एक्ट नहीं लागू होता है

HC ने कहा प्रियंका खरवार और सलामत को अदालत हिंदू और मुस्लिम के रूप में नहीं देखती है

HC ने याचियों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को रद्द कर दिया है

अदालत ने कहा कि प्रियंका खरवार की मर्जी है कि वह किससे मिलना चाहती है।

कुशीनगर के सलामत और प्रियंका खरवार ने परिवार की मर्जी के खिलाफ शादी की, दोनों ने मुस्लिम रीति रिवाज के साथ 19 अगस्त 2019 को शादी की है. प्रियंका खरवार शादी के बाद आलिया बन गई थी।

31/10/2020

*इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा- सिर्फ शादी के लिए धर्म परिवर्तन वैध नहीं, याची को राहत देने से इनकार*

⚫इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि केवल शादी के लिए धर्म परिवर्तन वैध नहीं है। विपरीत धर्म के जोड़े की याचिका को खारिज करते हुए हाई कोर्ट ने याचियों को संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष हाजिर होकर अपना बयान दर्ज कराने की छूट दी है। याची ने परिवार वालों को उनके शांतिपूर्ण वैवाहिक जीवन में हस्तक्षेप करने पर रोक लगाने की मांग की थी।

*कोर्ट ने हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है।*

🔵 *यह आदेश न्यायमूर्ति एमसी त्रिपाठी ने मुजफ्फरनगर जिले की* प्रियांशी उर्फ समरीन व अन्य की याचिका पर दिया है। हाई कोर्ट ने कहा है कि एक याची मुस्लिम तो दूसरा हिंदू है। लड़की ने 29 जून, 2020 को हिंदू धर्म स्वीकार किया और एक महीने बाद 31 जुलाई को विवाह कर लिया। कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि शादी करने के लिए धर्म परिवर्तन किया गया है।

🟢इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नूर जहां बेगम केस के फैसले का हवाला दिया, जिसमें कोर्ट ने कहा है कि शादी के लिए धर्म बदलना स्वीकार्य नहीं है। इस केस में हिंदू लड़कियों ने धर्म बदलकर मुस्लिम लड़के से शादी की थी। सवाल था कि क्या हिंदू लड़की धर्म बदलकर मुस्लिम लड़के से शादी कर सकती है और यह शादी वैध होगी।

🟤कुरान की हदीसों का हवाला देते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि इस्लाम के बारे में बिना जाने और बिना आस्था विश्वास के धर्म बदलना स्वीकार्य नहीं है।

🟣यह इस्लाम के खिलाफ है। इसी फैसले के हवाले से कोर्ट ने मुस्लिम से हिंदू बन शादी करने वाली याची को राहत देने से इनकार कर दिया है।

02/10/2020

हाथरस केस: बलात्कार को साबित करने के लिए पी‌ड़िता के शरीर में वीर्य की मौजूदगी आवश्यक नहीं, उत्तर प्रदेश पुलिस का दावा कानून के विपरीत

⚫उत्तर प्रदेश पुलिस ने दावा किया है कि हाथरस की 19 वर्षीय दलित युवती के साथ बलात्कार नहीं हुआ। उल्लेखनीय है कि वारदात में आई चोटों के कारण युवती की हाल ही मौत हो गई ‌थी।

🟤उत्तर प्रदेश के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया कि फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला के परिणाम में मृतक युवती के शरीर पर वीर्य के नमूनों की मौजूदगी नहीं दिखी है।

🔵 *एडीजी (कानून व्यवस्था) प्रशांत कुमार ने कहा,* "एफएसएल की रिपोर्ट भी आ चुकी है, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि नमूनों में वीर्य नहीं थे। यह स्पष्ट करता है कि कोई बलात्कार या सामूहिक बलात्कार नहीं हुआ था।"

🔴इस प्रकार के बयानों के साथ, पुलिस ने 22 सितंबर को युवती द्वारा मृत्यु से पहले दिए गए बयान का खंडन करने का प्रयास किया है, जिसमें उसने कहा था कि उसके साथ चार पुरुषों ने बलात्कार किया था।

🟣इस संबंध में, यह ध्यान रखना उचित है कि बलात्कार के अपराध को साबित करने के लिए युवती के शरीर में वीर्य के नमूनों की उपस्थिति स्थापित करना आवश्यक नहीं है।

*भारतीय दंड संहिता की धारा 375 के पिछले संस्करण में कानून की स्थिति यही रही है।*

🔴 *धारा 375 का स्पष्टीकरण (जैसा कि पहले भी था) में यह स्पष्ट किया गया* कि बलात्कार के अपराध के लिए आवश्यक यौन संभोग का गठन करने के लिए ल‌िंग का प्रवेश होना पर्याप्त है।

*सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के कई फैसले में पहलू को स्पष्ट रूप से बताया गया है।*

🟡सुप्रीम कोर्ट ने *परमिंदर उर्फ ​​लडका पोला बनाम दिल्ली राज्य (2014) 2 एससीसी 592, हाईकोर्ट* के एक फैसले की पुष्टि की थी, जिसमें कहा गया था कि बलात्कार को साबित करने के लिए वीर्य की उपस्थिति आवश्यक नहीं है।

*हाईकोर्ट ने मेडिकल ज्युरिसप्रुडेंस और टॉक्सिकोलॉजी (ट्वेंटी फर्स्ट संस्करण) में मोदी के निम्नलिखित पैसेज पर पर भरोसा किया था:*

⚪"इस प्रकार, बलात्कार के अपराध का गठन करने के लिए यह आवश्यक नहीं है कि लिंग के पूर्ण प्रवेश के साथ, हाइमन का टूटने और वीर्य के उत्सर्जन होना चाहिए। लेबिअ मजोर, वल्व या पुडेंडा के भीतर लिंग का आंशिक प्रवेश, वह भी वीर्य के उत्सर्जन के साथ या बिना, या प्रवेश का प्रयास ही कानून के उद्देश्य के लिए पर्याप्त है। इसलिए, जननांग पर किसी घाव के बिना या व‌ीर्य के दाग को छोड़े बिना कानूनी रूप से बलात्कार का अपराध करना संभव है।"

*सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की कार्रवाई को स्वीकार किया था।*

➡️ *वाहिद खान बनाम मध्य प्रदेश 2010 (2) एससीसी 9 में, सुप्रीम कोर्ट ने माना था* कि लिंग का थोड़ा प्रवेश भी ​​बलात्कार के अपराध के लिए पर्याप्त है। लिंग के प्रवेश की गहराई महत्वहीन है।

26/09/2020

*डिफॉल्ट बेल : बलात्कार के आरोपी की याचिका पर विचार करते समय पीड़िता का पक्ष सुनना अनिवार्य नहीं : केरल हाईकोर्ट*

⚫केरल हाईकोर्ट ने माना है कि *दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 439 (1ए) में निहित प्रावधान सीआरपीसी की धारा 167 (2)* के तहत दायर जमानत के आवेदन पर लागू नहीं होते हैं।

🔵 *सीआरपीसी की धारा 439 (1ए) के अनुसार,* सूचना देने वाले या उसके द्वारा अधिकृत किसी भी व्यक्ति की उपस्थिति उस समय अनिवार्य होगी, जब आईपीसी की धारा 376 की उप-धारा (3) या धारा 376एबी या धारा 376डीए या धारा 376डीबी के तहत जमानत के लिए आवेदन दायर किया जाता है।

🔴 *हाईकोर्ट के समक्ष आए इस मामले में* अभियुक्त (जिस स्कूल में पीड़िता पढ़ाई कर रही थी,आरोपी उसी स्कूल में शिक्षक था) के खिलाफ मामला आईपीसी की धारा 376 (2) (एफ), 376एबी और 354बी और पाॅक्सो एक्ट (the Protection of Children from Sexual Offences Act, 2012 ) की धारा 5 (एफ), 5 (एल) और 5 (एम) रिड विद सेक्शन 6 के तहत दर्ज किया गया था। इस मामले में आरोपी 90 दिनों से हिरासत में था और उसके बावजूद भी इस मामले में अंतिम रिपोर्ट दायर नहीं की गई थी।

🟤 *इसलिए अभियुक्त ने आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 167 (2)* के तहत जमानत के लिए विशेष अदालत का रुख किया था। विशेष अदालत ने उसे जमानत देते हुए कहा था कि आरोपी 90 दिनों से हिरासत में है,उसके बावजूद भी मामले की जांच अभी तक पूरी नहीं हुई है। इसलिए आरोपी स्वत: ज़मानत (डिफॉल्ट बेल) का हकदार है।

🟢 *हाईकोर्ट के समक्ष पीड़िता ने दलील दी* कि अभियुक्त के खिलाफ आईपीसी की 376एबी के तहत दंडनीय अपराध में मामला बनाया गया है,इसलिए अदालत को आरोपी को जमानत देते समय संहिता की धारा 439 (1ए) के अनुसार पीड़िता का पक्ष भी सुनना चाहिए था। इसलिए, न्यायालय के समक्ष मुद्दा यह था कि क्या अदालत के लिए यह आवश्यक है कि संहिता की धारा 167 (2) के तहत किसी अभियुक्त को जमानत देते समय वह संहिता की धारा 439 (1 ए) के तहत दिए गए प्रावधान का भी पालन करे ?

*अदालत ने कहा कि संहिता की धारा 167 (2) के तहत मांगी गई जमानत संहिता की धारा 437, 438 और 439 के तहत मांगी गई जमानत से मौलिक रूप से अलग है।*

*जस्टिस पीबी सुरेश कुमार ने यह भी कहा कि,*

🟠विशेष रूप से दोनों एकदम भिन्न है। जहां सीआरपीसी की धारा 167 (2) एक अभियुक्त को अपरिहार्य अधिकार प्रदान करती है, वहीं धारा 437, 438 और 439 अभियुक्त को इस तरह का कोई अधिकार नहीं देती हैं और इन प्रावधानों के तहत जमानत देना केवल न्यायिक विवेक का मामला है। एक अभियुक्त को धारा 167 (2) के तहत जमानत मांगने का अधिकार उस समय मिलता है,जब जांच अधिकारी प्रावधान में निर्दिष्ट समय अवधि के भीतर मामले की जांच पूरी नहीं कर पाता है। वहीं धारा 167 (2) के तहत जमानत के लिए दायर आवेदन पर विचार करते समय, अदालत मामले की योग्यता या मैरिट पर विचार नहीं करती है। ऐसे में अदालत सिर्फ इस सवाल पर विचार करती है कि क्या निर्धारित अवधि के तहत मामले की जांच पूरी करने में जांच एजेंसी की ओर से चूक हुई है या नहीं? यदि जांच एजेंसी निर्धारित समय के भीतर मामले में अंतिम रिपोर्ट दर्ज करने में विफल रहती है, तो हिरासत में रखे गए आरोपी को जमानत का पूर्ण अधिकार प्राप्त हो जाता है।

🟡 *धारा 167 (2) के विपरीत, धारा 437 और 439 के तहत काम* करने वाली अदालत को अपने न्यायिक विवेक का उपयोग करने के लिए विभिन्न विचारों या तर्कों द्वारा निर्देशित किया जाता है,जो इस प्रकार हैं-

(1) आरोप की प्रकृति और दोषी पाए जाने के मामले में सजा की गंभीरता और अभियोजन पक्ष द्वारा पेश की जाने वाली सामग्री की प्रकृति,

(2) गवाहों के साथ छेड़छाड़ की उचित आशंका या शिकायतकर्ता व गवाहों को खतरे की आशंका,

(3) मुकदमे के समय अभियुक्त की उपस्थिति को सुरक्षित रखने की उचित संभावना ,

(4) आरोपी का चरित्र व व्यवहार और परिस्थितियां,जो आरोपी के लिए अजीब हो,

(5) जनता या राज्य का बड़ा हित और इसी तरह के अन्य विचार।

➡️ *अदालत ने कहा कि संहिता की धारा 439 (1ए) का उद्देश्य यह* सुनिश्चित करना है कि जमानत याचिका पर निर्णय देने से पहले पीड़ित व्यक्ति या पीड़ित के हित में काम करने वाले व्यक्ति का पक्ष भी सुना जाए। वहीं संहिता की धारा 167 (2) के तहत दायर जमानत के आवेदन पर निर्णय करते समय कोर्ट सिर्फ अभियुक्त द्वारा हिरासत में बिताई गई अवधि पर विचार करती है। ऐसे में संहिता की धारा 439 (1 ए) में निहित प्रावधान का अनुपालन करने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। ''

⏩ *भले ही संहिता की धारा 439 (1 ए) में प्रयुक्त शब्दावली पर* विश्वास करते हुए यह मान लिया जाए कि इस धारा के प्रावधानों का ,संहिता की धारा 167 (2) के तहत जमानत देते समय पालन किया जाना चाहिए, तो भी यह एक महज औपचारिकता होगी। धारा 167 (2) का उद्देश्य किसी ऐसे व्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करना है जिसे हिरासत में लिया गया है और मामले में लंबित जांच के दौरान उसे हिरासत में ही रखा जाएगा। यह भी सही है कि किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता से संबंधित मामलों में, अदालत को व्यक्तिगत स्वतंत्रता के पक्ष में झुकना चाहिए। उपर्युक्त परिस्थितियों में, मेरा यह मानना​है कि संहिता की धारा 439 (1 ए) में निहित प्रावधान, धारा 167 (2) के तहत दायर जमानत के आवेदन पर लागू नहीं होते हैं।''

*इस प्रकार पीठ ने माना कि आरोपी संहिता की धारा 167 (2) के तहत जमानत का हकदार है।*

*मामले का विवरण-*

*केस का नाम- एक्स बनाम केरल राज्य*

*केस नंबर-सीआरएल.एमसी. नंबर 3463/2020*

*कोरम-न्यायमूर्ति पीबी सुरेश कुमार*

*प्रतिनिधित्व-एडवोकेट सूरज टी इलेनजिकल,स्पेशल जीपी सुमन चक्रवर्ती,एडवोकेट एस राजीव*

15/09/2020

*क्या दूसरी पत्नी को पति की संपत्ति में अधिकार है?*

*हाल ही में बॉम्बे हाई कोर्ट के सामने एक अनोखा मामला आया.*

🟤मामला था कि अगर पति की मौत हो जाती है और उन्होंने दो शादियाँ की हैं तो तो मौत के बाद मिलने वाले सरकारी मुआवज़े का हक़दार कौन होगा, पहली पत्नी या दूसरी पत्नी?

*महाराष्ट्र रेलवे पुलिस में काम करने वाले एक सब-इंस्पेक्टर की मौत कोविड-19 से हो गई थी.*

*वहीं राज्य सरकार ने कोविड-19 के दौरान ड्यूटी करने वाले सरकारी कर्मचारियों के लिए 50 लाख के इंश्योंरेस का प्रावधान किया है.*

*इस मामले में इंश्योंरेस, पुलिस वेलफ़ेयर फ़ंड और ग्रेच्युटी मिलाकर ये रक़म क़रीब 65 लाख थी.*

🟢जब ये रक़म देने की बारी आयी तो दूसरी पत्नी से पैदा हुई बेटी ने बॉम्बे हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया. उन्होंने कोर्ट से अपील की कि कोर्ट उन्हें और उनकी मां को भूखा और बेघर होने से बचाया जाए और इसके लिए मुआवज़े की रक़म को समानुपात में बांटे.

🟠 *इस मामले की सुनवाई जस्टिस कतावाला की बेंच* कर रही थी. मृतक की पहली पत्नी की बेटी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए सुनवाई में शामिल हुईं. उनका दावा था कि उन्हें मृतक की दूसरी शादी के बारे में पता तक नहीं था.

⏩दूसरी पत्नी के वकील ने दावा किया कि मृतक की पहली पत्नी, दूसरी शादी के बारे में जानती थीं और मृतक दूसरी पत्नी और उनकी बेटी के साथ धारावी में रेलवे कॉलोनी में रह रहे थे.

👉दूसरी पत्नी के वकील ने बीबीसी को बताया कि मृतक की पहली शादी साल 1992 में हुई थी और उन्होंने साल 1998 में दूसरी शादी की.

*उनके वकील का कहना है कि दोनों शादियों का रजिस्ट्रेशन हिंदू मैरिज एक्ट के तहत करवाया गया.*

🟡अब तक जो मामला मुआवज़े की रक़म के बंटवारे तक ही सीमित था अब उसमें एक पेंच यह भी फँस गया कि कौन सी शादी मान्य मानी जाएगी.

*दूसरी शादी पर क्या कहता है हिंदू मैरिज एक्ट*

*हिंदू मैरिज एक्ट के सेक्शन-5 के अनुसार, शादी के समय वर या वधु पहले से शादीशुदा नहीं होने चाहिए.*

⚫कोई भी महिला और पुरुष दूसरी शादी तभी कर सकते हैं जब उनकी पहली शादी या तो रद्द हो चुकी हो, या पहले पार्टनर की मौत हो चुकी हो, या फिर उनके बीच तलाक़ हो चुका हो.

*वहीं भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार, वही व्यक्ति संपति का अधिकारी हो सकता है जिसका नाम 'विल' में उसने मरने से पहले दिया हो.*

*लेकिन अगर 'विल' ही न बनी हो तो ऐसी स्थिति में संपत्ति का अधिकार किसके पास होगा?*

🔴हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के सेक्शन आठ में संपति का अधिकारी होने के लिए चार क्लास बनाई गई हैं और सेक्शन दस ये बताता है कि क्लास वन में कैसे संपत्ति बांटी जाएगी.

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🟣"हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में संपति के अधिकार को चार कैटेगरी में बांटा गया है जिसमें सबसे पहला हक़ या कहें क्लास वन कैटेगरी में पत्नी, बच्चे, मां, अगर बेटे की मौत हो चुकी है तो उसकी विधवा और बच्चे आते हैं लेकिन अगर बेटी की मौत हो चुकी है तो ऐसी स्थिति में संपति में हक़दार केवल बच्चे होंगे और पति को कोई हिस्सा नहीं मिलेगा. इस अधिनियम के तहत सभी को उसके द्वारा अर्जित की गई संपति में बराबर का हक़ मिलेगा."

🔵अगर क्लास वन में संपति का अधिकार पाने के लिए कोई उत्ताराधिकारी ही नहीं है तो ऐसी स्थिति में संपति का अधिकार क्लास टू में चला जाता है जिसमें पिता के अलावा भाई-बहन और दूसरे रिश्तेदारों को अधिकार मिल जाता है.

🟢"हिंदू विवाह अधिनियम 1955 से पहले हिंदुओं में एक से ज़्यादा शादी मान्य क़रार दी जाती थी यानी अगर किसी व्यक्ति की दो पत्नियां होती थीं तो वो शादी क़ानूनी तौर पर मान्य थी. पति की मृत्यु होने पर विधवाओं और बच्चों का भी संपति पर अधिकार था लेकिन उसको तीन हिस्सों में बांटा जाता था जिसमें एक हिस्सा पत्नियों को और अगर दोनों पत्नियों से मृतक के बच्चे हैं तो वो बच्चों में एक-एक हिस्सा बंट जाता था लेकिन अगर कोई शादी इस अधिनियम के लागू होने के बाद होती है तो ऐसी स्थिति में दूसरी शादी मान्य नहीं मानी जाती लेकिन अगर उस रिश्ते से कोई संतान होती है तो ऐसी स्थिति में बच्चा क़ानूनी रूप से संपति का अधिकारी होगा क्योंकि क़ानून बच्चे को नाजायज़ नहीं मानता."

🟤लेकिन क़ानून ये भी कहता है कि अगर किसी ने हिंदू विवाह अधिनियम के आने से पहले दो शादियां की थीं तो वो अवैध नहीं मानी जाएगी लेकिन इस अधिनियम के आने के बाद अगर कोई व्यक्ति दूसरी शादी करता है तो दूसरी शादी मान्य नहीं होगी.

🟠"अगर कोई व्यक्ति दूसरे धर्म की महिला से शादी करता है तो ऐसी स्थिति में वो हिंदू विवाह अधिनियम के तहत मान्य नहीं है लेकिन अगर उसने दूसरी शादी स्पेशल मैरिज एक्ट के ज़रिए रजिस्टर करवाया है तो ये देखना होगा कि उसने सभी नियमों को कैसे पूरा किया. अगर कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन करके शादी करता है तो ऐसे में संपति के अधिकार के प्रावधान और जटिल हो जाते हैं."

🟡लेकिन अगर मरने से पहले कोई व्यक्ति विल बनवाकर जाता है तो वो अपनी अर्जित संपति को किसी के भी नाम कर सकता है. हालांकि इसके ख़िलाफ़ सगे-संबंधी याचिका डाल सकते हैं लेकिन उसके लिए मज़बूत आधार होना ज़रुरी होता है.

*अन्य धर्मों में क्या हैं प्रावधान?*

➡️"मुसलमानो में जहां शिया और सुन्नी के लिए अलग-अलग क़ानून है और क्योंकि भारत में ज्यादातर सुन्नी हैं और इनमें से भी अधिकतर हनफ़ी क़ानून को मानते हैं तो ऐसे में किसी भी व्यक्ति की मौत के बाद उसकी विधवा के साथ जो भी मेहर की रक़म तय की गई होती है वो सबसे पहले दी जाती है. फिर ये देखा जाता है कि कफ़न-दफ़न का ख़र्च, ख़िदमत में लगे लोगों और जो उधार लिया था वो चुकाया जाए और जो बचता है उसका एक तिहाई विरासत के तौर पर दिया जा सकता है. ईसाइयों में एक तिहाई पत्नी के पास जाता है और दो तिहाई बच्चों में बंट जाता है और अगर बच्चे नहीं हैं तो आधा हिस्सा पत्नी को और आधा हिस्सा रिश्तेदारों को चला जाता है."

⏩इस मामले पर सुनवाई करते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट के फ़ैसले पर रोशनी डालते हुए दूसरी पत्नी के वकील ने बताया है कि इस मामले में कोर्ट ने कहा कि पहली पत्नी और दोनों शादियों से हुई बेटियों को मुआवज़े एक-एक तिहाई हिस्सा मिलेगा.

👉लेकिन पिता की जगह पर किसे नौकरी मिलेगी और दूसरे मसलों पर दोनों परिवार मिलकर सेटलमेंट कर सकते हैं. इस मामले में अगली सुनवाई 19 सितंबर को होगी.

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