02/06/2026
सुप्रीम कोर्ट ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और त्वरित न्याय के अधिकार को मजबूत करते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। माननीय चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की खंडपीठ ने निर्देश जारी किए हैं कि यदि किसी विचाराधीन कैदी को ज़मानत मिलती है, किसी दोषी की सज़ा निलंबित की जाती है या उसे बरी कर दिया जाता है, तो उसकी रिहाई बिना अनावश्यक देरी के उसी दिन या अधिकतम अगले दिन सुनिश्चित की जानी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने यह चिंता व्यक्त की कि कई मामलों में अदालत से राहत मिलने के बावजूद कैदी प्रशासनिक प्रक्रियाओं और संचार में देरी के कारण कई दिनों तक जेल में बंद रहते हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसी देरी ज़मानत, सज़ा निलंबन या बरी किए जाने के उद्देश्य को ही विफल कर देती है और व्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है।
खंडपीठ ने कहा कि जहाँ संभव हो, ज़मानत याचिकाओं पर सुनवाई पूरी होने के बाद आदेश उसी दिन सुनाया जाए और तत्काल अदालत की वेबसाइट पर अपलोड किया जाए। यदि किसी कारणवश आदेश सुरक्षित रखा जाता है, तो उसे अगले दिन सुनाने और तुरंत अपलोड करने का प्रयास किया जाना चाहिए। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि ज़मानत, सज़ा निलंबन या बरी करने से संबंधित आदेशों की जानकारी उसी दिन जेल प्रशासन और संबंधित ट्रायल कोर्ट तक पहुंचाई जाए, ताकि रिहाई की प्रक्रिया में किसी प्रकार की अनावश्यक बाधा न आए।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में कैदी की रिहाई उसी दिन या अधिकतम अगले दिन हो जानी चाहिए। केवल उन परिस्थितियों में अपवाद होगा जहाँ संबंधित व्यक्ति किसी अन्य मामले में भी वांछित हो या ज़मानत की शर्तों एवं अन्य कानूनी औपचारिकताओं को पूरा करने में वास्तविक देरी हो रही हो। साथ ही, आदेश के अनुपालन की निगरानी के लिए ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया गया है कि वह रिहाई संबंधी अनुपालन रिपोर्ट उस हाईकोर्ट बेंच को भेजे जिसने संबंधित आदेश पारित किया है।
यह निर्देश Pila Pahan @ Peela Pahan & Ors. v. State of Jharkhand & Anr. मामले में जारी किए गए हैं। इसी फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्टों को सुरक्षित (Reserved) मामलों में निर्णय सुनाने में अनावश्यक देरी से बचने के लिए महत्वपूर्ण दिशानिर्देश भी जारी किए हैं और अपेक्षा व्यक्त की है कि ऐसे मामलों में निर्णय तीन महीने के भीतर सुनाए जाएं।
यह फैसला न केवल न्यायिक जवाबदेही को मजबूत करता है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि किसी व्यक्ति को अदालत से राहत मिलने के बाद प्रशासनिक देरी के कारण उसकी स्वतंत्रता से वंचित न रहना पड़े। कानूनी विशेषज्ञ इस निर्णय को न्याय व्यवस्था में पारदर्शिता, दक्षता और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मान रहे हैं।
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