Chandra Shekhar Advocate Supreme Court of India

Chandra Shekhar Advocate Supreme Court of India Advocate Supreme Court of India

बहुत ही कटु सत्य लिख रहा हूँ… शायद प्रदेश के बहुत से माननीय अधिवक्ता भाई-बहन इसे मानने के लिए तैयार न हों, और संभव है मे...
17/05/2026

बहुत ही कटु सत्य लिख रहा हूँ… शायद प्रदेश के बहुत से माननीय अधिवक्ता भाई-बहन इसे मानने के लिए तैयार न हों, और संभव है मेरी इस पोस्ट पर कोई प्रतिक्रिया भी न दें।
लेकिन सच यही है कि आज प्रदेश का अधिवक्ता समाज जिन समस्याओं से जूझ रहा है—
अधिवक्ताओं की हत्याएं,
झूठे मुकदमे दर्ज होना,
मारपीट की घटनाएं,
प्रशासन द्वारा सुनवाई न होना,
चैम्बरों पर कार्रवाई होना—
इन सबके लिए कहीं न कहीं हम स्वयं भी जिम्मेदार हैं।
चुनाव चाहे बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश का हो या स्थानीय बार एसोसिएशन का, आज हमारी सोच बदल चुकी है।
आज से लगभग 30 वर्ष पहले न इतना जातिवाद था, न जिलावाद, न क्षेत्रवाद, और न ही धर्म के आधार पर वोट मांगे जाते थे। कोई यह नहीं पूछता था कि आप किस जाति या धर्म से हैं। प्रत्याशी अपने काम, अपने चरित्र और अपनी योग्यता के आधार पर पहचाना जाता था।
लेकिन जब मैंने इस बार बार काउंसिल का चुनाव होते देखा तब मुझे एहसास हुआ कि हमारे अधिवक्ता समाज के भीतर यह विभाजन कितनी गहराई तक पहुँच चुका है।
अगर समय रहते हमने पूरे अधिवक्ता समाज को अपना परिवार नहीं माना, तो आने वाले समय में हमारी कहीं भी सुनवाई नहीं होगी।
हमें जाति, बिरादरी, धर्म, जिला और क्षेत्र देखकर नहीं, बल्कि प्रत्याशी का चरित्र, संघर्ष और अधिवक्ता हित के प्रति उसकी प्रतिबद्धता देखकर मतदान करना होगा।
लेकिन अब जब वोटों की गिनती हो रही है, तो सच्चाई सामने आ रही है।
कहीं निजी स्वार्थ,
कहीं जिलावाद,
कहीं क्षेत्रवाद,
कहीं आर्थिक लाभ,
और कहीं छिपे हुए व्यक्तिगत समीकरण—
अधिवक्ता हित पर भारी पड़ गए।
आज राजधानी में अधिवक्ताओं के चैम्बर टूट रहे हैं। एक वीडियो में एक वरिष्ठ अधिवक्ता पुलिसकर्मी से विनती कर रहे थे—
"मेरा 36 साल पुराना चैम्बर है… मैं कहाँ जाऊँ? मैं मर जाऊँगा..."
यह दृश्य केवल उनका दर्द नहीं है, यह पूरे उत्तर प्रदेश के अधिवक्ता समाज की विफल सोच का परिणाम है।
हापुड़ कांड से भी यदि हमने सबक नहीं लिया… तो फिर कब लेंगे?
बस "अधिवक्ता एकता ज़िंदाबाद" के नारे लगाते रहिए,
सोशल मीडिया पर बड़े-बड़े आंदोलन की धमकियाँ देते रहिए,
और जहाँ भी कोई घटना हो, वहाँ फोटो खिंचवाकर ग्रुपों में डालते रहिए…
अगर सच में बदलाव चाहिए, तो सबसे पहले अपनी सोच बदलनी होगी।
कड़वा है… लेकिन सच है। 🙏
मेरा मानना है की अधिवक्ता का चैम्बर अवैध है तो जब इतने चैम्बर बन रहें थे तब नगर निगम और प्रशासन कहाँ था अगर गलत था तब बनने ही क्यों दिया गया आज शासन अगर कहीं भी लोगों झुग्गी झोपड़ी हटाता है तो उस से पहले उनके रहने की व्यवस्था करता है लेकिन यहाँ क्यों नहीं
आखिर कब तक ऐसे बटे रहोगे माननीय जी 🙏
चन्द्र शेखर अधिवक्ता हाई कोर्ट इलाहाबाद एवं लखनऊ खंडपीठ।
9410879960.

⚖️ भारत की न्याय व्यवस्था को अधिक प्रभावी और सक्षम बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण संवैधानिक कदम उठाया गया है। राष्ट्रपत...
17/05/2026

⚖️ भारत की न्याय व्यवस्था को अधिक प्रभावी और सक्षम बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण संवैधानिक कदम उठाया गया है। राष्ट्रपति Droupadi Murmu ने “Supreme Court (Judges Strength) Amendment Ordinance, 2026” को मंजूरी प्रदान कर दी है। इस अध्यादेश के लागू होने के बाद Supreme Court of India में जजों की स्वीकृत संख्या 33 से बढ़ाकर 37 कर दी गई है। Chief Justice of India इस संख्या में शामिल नहीं होंगे।

केंद्र सरकार के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट में लगातार बढ़ते लंबित मामलों और न्यायिक कार्यभार को ध्यान में रखते हुए यह निर्णय लिया गया है। वर्तमान में शीर्ष अदालत में बड़ी संख्या में संवैधानिक, आपराधिक, नागरिक एवं जनहित से जुड़े मामले लंबित हैं। जजों की संख्या बढ़ने से अधिक बेंचों का गठन संभव होगा, जिससे मामलों की सुनवाई में तेजी आने और लंबित मामलों के शीघ्र निस्तारण की उम्मीद जताई जा रही है।

केंद्रीय कानून एवं न्याय राज्य मंत्री Arjun Ram Meghwal ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X के माध्यम से जानकारी साझा करते हुए बताया कि राष्ट्रपति ने “Supreme Court (Number of Judges) Act, 1956” में संशोधन संबंधी अध्यादेश को स्वीकृति दे दी है। कानूनी विशेषज्ञों और न्यायिक मामलों के जानकारों के अनुसार, यह फैसला भारतीय न्यायपालिका की संस्थागत क्षमता को मजबूत करने की दिशा में एक अहम पहल माना जा रहा है।

यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब न्यायपालिका में लंबित मामलों को लेकर लगातार चिंता व्यक्त की जा रही थी। अब देखना होगा कि जजों की बढ़ी हुई संख्या न्याय प्रक्रिया को कितनी गति प्रदान कर पाती है और आम नागरिकों को त्वरित न्याय दिलाने में कितनी प्रभावी साबित होती है।

Chandra Shekhar Advocate High Court Allahabad and lucknow Bench.
9410879960

जितने भी स्पेशल एक्ट के मुकदमे होते हैं, उनमें जमानत का सबसे मजबूत और प्रैक्टिकल आधार “प्रोसीजरल लैप्स” ही होता है। खासक...
30/04/2026

जितने भी स्पेशल एक्ट के मुकदमे होते हैं, उनमें जमानत का सबसे मजबूत और प्रैक्टिकल आधार “प्रोसीजरल लैप्स” ही होता है। खासकर NDPS Act, 1985 जैसे सख्त कानून में यह बात और ज्यादा लागू होती है। यह कानून भले ही कठोर हो, लेकिन इसकी प्रक्रिया (procedure) उससे भी ज्यादा सख्ती से लागू की जाती है। अगर जांच एजेंसी—जैसे NCB—कहीं भी प्रक्रिया में चूक कर देती है, तो वही चूक आरोपी के लिए जमानत का दरवाजा खोल देती है।

NDPS मामलों की शुरुआत आमतौर पर मुखबिर की सूचना से होती है, जिसे Section 42 के तहत लिखित रूप में दर्ज करना और समय रहते अपने वरिष्ठ अधिकारी को भेजना अनिवार्य है। लेकिन अक्सर यह देखा जाता है कि अधिकारी या तो सूचना को लिखित में रिकॉर्ड नहीं करते या गिरफ्तारी के बाद भेजते हैं, जबकि कानून के अनुसार यह कार्यवाही पहले होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे मामलों में इसे “fatal defect” माना है, जिससे जमानत मिलने की संभावना काफी बढ़ जाती है।

इसके बाद आता है तलाशी और बरामदगी (Search & Seizure) का चरण, जहां Section 50 का पालन बेहद जरूरी है। यदि किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत तलाशी ली जा रही है, तो उसे यह अधिकार स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए कि वह अपनी तलाशी किसी Gazetted Officer या Magistrate के सामने करवा सकता है। कई मामलों में यह अधिकार या तो बताया ही नहीं जाता या सिर्फ औपचारिकता निभा दी जाती है। ऐसे में पूरी recovery ही संदेह के घेरे में आ जाती है और यह जमानत का मजबूत आधार बन जाता है।

गिरफ्तारी के समय भी कानून की प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है। आरोपी को गिरफ्तारी के कारण (grounds of arrest) बताना, arrest memo तैयार करना और उसमें स्वतंत्र गवाह (independent witness) का होना जरूरी होता है। यदि ये चीजें सही तरीके से नहीं की गईं, तो यह भी जमानत के पक्ष में एक महत्वपूर्ण बिंदु बन जाता है।

सबसे अहम चरण होता है sampling और sealing का। जब्त किए गए पदार्थ का नमूना मौके पर ही लिया जाना चाहिए, उसे सही तरीके से seal किया जाना चाहिए और उसकी chain of custody पूरी तरह सुरक्षित रहनी चाहिए। लेकिन अक्सर यहां बड़ी चूक हो जाती है या तो मौके पर sampling नहीं होती, या seal में mismatch होता है, या फिर chain टूट जाती है। कोर्ट ऐसे मामलों में recovery को ही संदिग्ध मान लेती है, जो जमानत के लिए सबसे मजबूत defense बन जाता है।

इसके बाद FSL (Forensic Science Lab) रिपोर्ट आती है, जिसमें भी कई बार देरी, seal mismatch या sample quantity में अंतर जैसी खामियां सामने आती हैं। इससे prosecution का केस और कमजोर हो जाता है। वहीं Section 67 के तहत आरोपी का बयान लिया जाता है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने Tofan Singh केस में साफ कर दिया है कि ऐसा बयान पुलिस के सामने दिए गए confession के समान है और केवल इसी आधार पर सजा नहीं दी जा सकती। यदि आरोपी बाद में अपने बयान से मुकर जाता है, तो prosecution का मामला और कमजोर पड़ जाता है।

Commercial quantity के मामलों में Section 37 NDPS Act के तहत जमानत पाना कठिन होता है, क्योंकि इसमें “twin conditions” लागू होती हैं—prima facie innocence और दोबारा अपराध न करने की संभावना। लेकिन जब प्रक्रिया में गंभीर खामियां होती हैं, तो अदालत इन्हीं खामियों को “reasonable grounds” मानकर जमानत दे देती है।

charge sheet 180 दिनों के भीतर दाखिल करना अनिवार्य होता है (कुछ मामलों में इसे 1 वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है)। यदि इसमें देरी होती है, तो आरोपी को default bail (statutory bail) का अधिकार मिल जाता है। ट्रायल के दौरान prosecution को यह साबित करना होता है कि आरोपी के पास conscious possession था, recovery genuine थी और chain of custody intact थी। लेकिन यदि शुरुआत से ही प्रक्रिया में खामियां हैं, तो पूरा केस कमजोर हो जाता है।

NDPS मामलों में यह स्पष्ट है कि कानून जितना सख्त है, उसकी प्रक्रिया उससे भी अधिक सख्त है और अगर कहीं भी procedure टूटता है, तो prosecution का पूरा केस गिर सकता है। इसलिए प्रैक्टिकल तौर पर NDPS के मामलों में जमानत का सबसे बड़ा आधार “procedural lapses” ही होता है—यही वह बिंदु है, जहां से बचाव पक्ष (defense) सबसे ज्यादा फायदा उठाता है।

22/02/2026

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