17/05/2026
बहुत ही कटु सत्य लिख रहा हूँ… शायद प्रदेश के बहुत से माननीय अधिवक्ता भाई-बहन इसे मानने के लिए तैयार न हों, और संभव है मेरी इस पोस्ट पर कोई प्रतिक्रिया भी न दें।
लेकिन सच यही है कि आज प्रदेश का अधिवक्ता समाज जिन समस्याओं से जूझ रहा है—
अधिवक्ताओं की हत्याएं,
झूठे मुकदमे दर्ज होना,
मारपीट की घटनाएं,
प्रशासन द्वारा सुनवाई न होना,
चैम्बरों पर कार्रवाई होना—
इन सबके लिए कहीं न कहीं हम स्वयं भी जिम्मेदार हैं।
चुनाव चाहे बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश का हो या स्थानीय बार एसोसिएशन का, आज हमारी सोच बदल चुकी है।
आज से लगभग 30 वर्ष पहले न इतना जातिवाद था, न जिलावाद, न क्षेत्रवाद, और न ही धर्म के आधार पर वोट मांगे जाते थे। कोई यह नहीं पूछता था कि आप किस जाति या धर्म से हैं। प्रत्याशी अपने काम, अपने चरित्र और अपनी योग्यता के आधार पर पहचाना जाता था।
लेकिन जब मैंने इस बार बार काउंसिल का चुनाव होते देखा तब मुझे एहसास हुआ कि हमारे अधिवक्ता समाज के भीतर यह विभाजन कितनी गहराई तक पहुँच चुका है।
अगर समय रहते हमने पूरे अधिवक्ता समाज को अपना परिवार नहीं माना, तो आने वाले समय में हमारी कहीं भी सुनवाई नहीं होगी।
हमें जाति, बिरादरी, धर्म, जिला और क्षेत्र देखकर नहीं, बल्कि प्रत्याशी का चरित्र, संघर्ष और अधिवक्ता हित के प्रति उसकी प्रतिबद्धता देखकर मतदान करना होगा।
लेकिन अब जब वोटों की गिनती हो रही है, तो सच्चाई सामने आ रही है।
कहीं निजी स्वार्थ,
कहीं जिलावाद,
कहीं क्षेत्रवाद,
कहीं आर्थिक लाभ,
और कहीं छिपे हुए व्यक्तिगत समीकरण—
अधिवक्ता हित पर भारी पड़ गए।
आज राजधानी में अधिवक्ताओं के चैम्बर टूट रहे हैं। एक वीडियो में एक वरिष्ठ अधिवक्ता पुलिसकर्मी से विनती कर रहे थे—
"मेरा 36 साल पुराना चैम्बर है… मैं कहाँ जाऊँ? मैं मर जाऊँगा..."
यह दृश्य केवल उनका दर्द नहीं है, यह पूरे उत्तर प्रदेश के अधिवक्ता समाज की विफल सोच का परिणाम है।
हापुड़ कांड से भी यदि हमने सबक नहीं लिया… तो फिर कब लेंगे?
बस "अधिवक्ता एकता ज़िंदाबाद" के नारे लगाते रहिए,
सोशल मीडिया पर बड़े-बड़े आंदोलन की धमकियाँ देते रहिए,
और जहाँ भी कोई घटना हो, वहाँ फोटो खिंचवाकर ग्रुपों में डालते रहिए…
अगर सच में बदलाव चाहिए, तो सबसे पहले अपनी सोच बदलनी होगी।
कड़वा है… लेकिन सच है। 🙏
मेरा मानना है की अधिवक्ता का चैम्बर अवैध है तो जब इतने चैम्बर बन रहें थे तब नगर निगम और प्रशासन कहाँ था अगर गलत था तब बनने ही क्यों दिया गया आज शासन अगर कहीं भी लोगों झुग्गी झोपड़ी हटाता है तो उस से पहले उनके रहने की व्यवस्था करता है लेकिन यहाँ क्यों नहीं
आखिर कब तक ऐसे बटे रहोगे माननीय जी 🙏
चन्द्र शेखर अधिवक्ता हाई कोर्ट इलाहाबाद एवं लखनऊ खंडपीठ।
9410879960.